Tuesday, January 27, 2015

प्यारी दुल्हनियाँ चली

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          मैं बिलासपुर आ गया, घर आ गया। कैन्सर नामक गंभीर रोग से लड़-भिड़ कर वापस आ गया लेकिन घर में बैठकर आराम करने का समय मेरे पास नहीं था। हमारे समाज का व्यवहार है कि ऐसे 'युद्ध' से वापस लौटे सिपाही की ख़ैर-मकदम के लिए रिश्तेदार-मित्र-परिचित घर आते हैं, हाल-चाल पूछते हैं तो बीमार को भी 'फील गुड' होता है लेकिन मेरे पास इस तरह का मज़ा उठाने का गुंजाइश न थी। अगले दिन संगीता के विवाह के निमंत्रणपत्र लेकर अपनी स्कूटर में माधुरी के साथ निकाल पड़ा और मैं उन सबके पास खुद पहुँच गया। मुझे देखकर सब विस्मित हुए- 'अरे, तुम्हारा तो कैन्सर का आपरेशन हुआ है, न ?'
'हाँ, हो गया।' मैंने उन्हें बताया। वे अपना सिर खुजलाते, मेरे चेहरे पर सर्जरी के निशानों को घूरते,,मुझे अज़ीब निगाहों से देखते और विवाह के कार्यक्रम के बारे में बात करने लगते।
          बैंक से बिना रिश्वत दिए ऋण स्वीकृत हो गया। अत्यंत गाढ़े समय पर मिली आर्थिक मदद रमाकांत मिश्रा को वापस हो गई, छोटे भाई राजकुमार ने ढेर सारी मिठाइयाँ बनवाकर पैक करवा दी, बड़े भैया ने भावी दामाद को तिलक करने के लिए नगद राशि दी। मेरी अम्मा उन दिनों रायपुर में बड़े भैया के घर में थी, उनको अपने साथ इंदौर ले जाने के लिए मैंने छोटे भाई को कहा, वे तैयार हो गए लेकिन अम्मा जी के कमजोर स्वास्थ्य के कारण बड़े भैया उन्हें भेजने के लिए सहमत नहीं हुए इसलिए संगीता का विवाह दादी की अनुपस्थिति में ही होना नियत हो गया।
          ढेर सारे डिब्बों और बैग में सामान पैक करके हम लोग इंदौर के लिए ट्रेन से रवाना हुए, अगले दिन इंदौर पहुँच गए। वहाँ एक हॉटल में दोनों परिवारों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। विवाह की पूर्वरात्रि को शहर से बाहर स्थित 'चोखी ढाणी' में नृत्य उत्सव और राजस्थानी भोज आयोजित हुआ। हमारा पूरा परिवार आया, देश-विदेश से मित्रगण विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए पधारे। शाम के धुंधलके में दूल्हे राजा अपने परिवार के साथ हॉटल से नीचे उतरे, वरयात्रा आरम्भ हुई, समीप स्थित मंदिर में देवदर्शन के पश्चात बरात लग गई। न बैंड न बाजा, न आतिशबाज़ी और न ही नाच-गाना, एकदम 'सिंपल'। जब युगल एक दूसरे को पुष्पहार पहना रहे थे, मैं कुछ दूर खड़ा उस प्रक्रिया को प्यार से निहार रहा था, मेरा मन प्रफुल्लित था लेकिन आँखें सजल थी। इस प्रकार हमारी बिटिया संगीता का विवाह संपन्न हो गया. सब प्रसन्न थे लेकिन मैं और माधुरी एक-दूसरे को देखकर उदास हो जाते, हमें मालूम था कि कल सुबह हमारी बेटी पराई हो जाएगी, उसके बगैर हम कैसे रह पाएंगे ?
          अगली सुबह विदा हो गई, मन उदास था और शरीर थकान से टूट रहा था। कुछ प्रिय-अप्रिय घटनाएं भी हो गई लेकिन शादी-ब्याह में कुछ-न-कुछ ऊंचा-नीचा हो ही जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से भिड़ने का अभ्यास हो गया था इसलिए अजीब न लगा बल्कि ऐसा लगा जैसे भोजन करते समय अन्जाने में तेज हरी मिर्च का टुकड़ा चबा जाने पर आँखों से आंसू बह निकले हों। खैर, सब चलता है।
          परिवारजनों और मित्रों ने जो 'व्यवहार' दिया था, वह पूरी राशि लेकर मैं अपने दामाद केदारनाथ के कमरे में गया और उनसे कहा- 'ये रख लीजिए, आप घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे कलर टीवी, वाशिंग मशीन, आलमारी, पलंग-गद्दे आदि, या जो भी आवश्यक लगे, आप खरीद लीजिएगा।'
'इसे आप रख लीजिए, इसकी ज़रुरत नहीं है।' केदारनाथ ने कहा.
'क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, हम आपको सहृदय दे रहे हैं।'
'एक काम कीजिए, मैं इसमें से दस हजार ले लेता हूँ, आलमारी के लिए। बाकी चीजें जब हम कमाएंगे तो खरीद लेंगे।' केदारनाथ ने कहा और शेष रुपये वापस कर दिए।
                    मैं बिलासपुर आ गया, घर आ गया। कैन्सर नामक गंभीर रोग से लड़-भिड़ कर वापस आ गया लेकिन घर में बैठकर आराम करने का समय मेरे पास नहीं था। हमारे समाज का व्यवहार है कि ऐसे 'युद्ध' से वापस लौटे सिपाही की ख़ैर-मकदम के लिए रिश्तेदार-मित्र-परिचित घर आते हैं, हाल-चाल पूछते हैं तो बीमार को भी 'फील गुड' होता है लेकिन मेरे पास इस तरह का मज़ा उठाने का गुंजाइश न थी। अगले दिन संगीता के विवाह के निमंत्रणपत्र लेकर अपनी स्कूटर में माधुरी के साथ निकाल पड़ा और मैं उन सबके पास खुद पहुँच गया। मुझे देखकर सब विस्मित हुए- 'अरे, तुम्हारा तो कैन्सर का आपरेशन हुआ है, न ?'
'हाँ, हो गया।' मैंने उन्हें बताया। वे अपना सिर खुजलाते, मेरे चेहरे पर सर्जरी के निशानों को घूरते,,मुझे अज़ीब निगाहों से देखते और विवाह के कार्यक्रम के बारे में बात करने लगते।
          बैंक से बिना रिश्वत दिए ऋण स्वीकृत हो गया। अत्यंत गाढ़े समय पर मिली आर्थिक मदद रमाकांत मिश्रा को वापस हो गई, छोटे भाई राजकुमार ने ढेर सारी मिठाइयाँ बनवाकर पैक करवा दी, बड़े भैया ने भावी दामाद को तिलक करने के लिए नगद राशि दी। मेरी अम्मा उन दिनों रायपुर में बड़े भैया के घर में थी, उनको अपने साथ इंदौर ले जाने के लिए मैंने छोटे भाई को कहा, वे तैयार हो गए लेकिन अम्मा जी के कमजोर स्वास्थ्य के कारण बड़े भैया उन्हें भेजने के लिए सहमत नहीं हुए इसलिए संगीता का विवाह दादी की अनुपस्थिति में ही होना नियत हो गया।
          ढेर सारे डिब्बों और बैग में सामान पैक करके हम लोग इंदौर के लिए ट्रेन से रवाना हुए, अगले दिन इंदौर पहुँच गए। वहाँ एक हॉटल में दोनों परिवारों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। विवाह की पूर्वरात्रि को शहर से बाहर स्थित 'चोखी ढाणी' में नृत्य उत्सव और राजस्थानी भोज आयोजित हुआ। हमारा पूरा परिवार आया, देश-विदेश से मित्रगण विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए पधारे। शाम के धुंधलके में दूल्हे राजा अपने परिवार के साथ हॉटल से नीचे उतरे, वरयात्रा आरम्भ हुई, समीप स्थित मंदिर में देवदर्शन के पश्चात बरात लग गई। न बैंड न बाजा, न आतिशबाज़ी और न ही नाच-गाना, एकदम 'सिंपल'। जब युगल एक दूसरे को पुष्पहार पहना रहे थे, मैं कुछ दूर खड़ा उस प्रक्रिया को प्यार से निहार रहा था, मेरा मन प्रफुल्लित था लेकिन आँखें सजल थी। इस प्रकार हमारी बिटिया संगीता का विवाह संपन्न हो गया. सब प्रसन्न थे लेकिन मैं और माधुरी एक-दूसरे को देखकर उदास हो जाते, हमें मालूम था कि कल सुबह हमारी बेटी पराई हो जाएगी, उसके बगैर हम कैसे रह पाएंगे ?
          अगली सुबह विदा हो गई, मन उदास था और शरीर थकान से टूट रहा था। कुछ प्रिय-अप्रिय घटनाएं भी हो गई लेकिन शादी-ब्याह में कुछ-न-कुछ ऊंचा-नीचा हो ही जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से भिड़ने का अभ्यास हो गया था इसलिए अजीब न लगा बल्कि ऐसा लगा जैसे भोजन करते समय अन्जाने में तेज हरी मिर्च का टुकड़ा चबा जाने पर आँखों से आंसू बह निकले हों। खैर, सब चलता है।
          परिवारजनों और मित्रों ने जो 'व्यवहार' दिया था, वह पूरी राशि लेकर मैं अपने दामाद केदारनाथ के कमरे में गया और उनसे कहा- 'ये रख लीजिए, आप घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे कलर टीवी, वाशिंग मशीन, आलमारी, पलंग-गद्दे आदि, या जो भी आवश्यक लगे, आप खरीद लीजिएगा।'
'इसे आप रख लीजिए, इसकी ज़रुरत नहीं है।' केदारनाथ ने कहा.
'क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, हम आपको सहृदय दे रहे हैं।'
'एक काम कीजिए, मैं इसमें से दस हजार ले लेता हूँ, आलमारी के लिए। बाकी चीजें जब हम कमाएंगे तो खरीद लेंगे।' केदारनाथ ने कहा और शेष रुपये वापस कर दिए।

                    बेटी का पिता होना बेहद सुखद होता है लेकिन उसे विदा करना उतना ही दुखद होता है। 'उसकी ससुराल कैसी होगी', 'नए परिवेश में वह खुद को कैसे ढालेगी' जैसे सवाल माँ-बाप के दिमाग में हर पल टकराते हैं और उत्तर दिए बिना वापस लौट जाते हैं। हर पल प्रतीक्षा बनी रहती है कि कब बिटिया का फोन आएगा और वह कहेगी- 'मैं अच्छी हूँ मम्मी, ....मज़े में हूँ पापा।' आम तौर पर हिन्दुस्तानी लड़कियां ससुराल में तकलीफ होने पर भी अपने माता-पिता से झूठ बोल देती हैं ताकि वे दुखी न हों इसलिए कई बार वैसा संदेह भी बना रहता है, 'क्या पता, सच बता रही है या नहीं !'
          विवाह कार्यक्रम के पश्चात इंदौर से लौटते समय जो बेचैनी मेरे मन में थी वह अवर्णनीय है। ऐसा लगे- ये क्या हो गया ? क्या हमारी बेटी हम पर बोझ थी कि हमने इतनी हड़बड़ी में उसे ब्याह दिया ? क्या हमें उसे और अधिक पढ़ने का अवसर नहीं देना था ? इतनी पढ़ी-लिखी लड़की छोटी सी बस्ती में ब्याह कर जा रही है, उसे वहाँ कैसा लगेगा ? आदि प्रश्न बार-बार मस्तिष्क में घुमड़ते और मुझे डांटते। पूरी राह मेरे अन्तःमन में के॰एल॰ सहगल का गाया गीत गूँजता रहा और मैं गुनगुनाता रहा- 'बाबुल मोरा नैहर छूटहि जाए...चार कहार मोरी डोलिया उठाए, मोरा अपना बेगाना हुआ जाए....बाबुल मोरा नैहर छूटहि जाए...'।
          बिलासपुर पहुँचकर हम लोग अपने-अपने काम से लग गए, विषाद कम होता गया, समय सब कुछ भुला ले जाता है। एक सुबह संगीता की बहुत याद आई। जो याद आया उसे लिपिबद्ध कर लिया... वह इस तरह था-

'तू क्यों चली गई ?

खिलखिलाता बचपन
मुस्कुराती चितवन
तोड़ नेह का बंधन

आँगन की छम-छम
चौके की सिहरन
पूरे घर की धड़कन

मेज पर करती पढ़ाई
घर में सबसे लड़ाई
लेकर सबकी बड़ाई

सहमी सी मेज
सिसकती कुर्सी
सुबकती किताबें

कोने से घूरती
धूल भरी सायकल
भौंचक मोपेड

पुरानी चप्पलें
तह लगे कपड़े
चुप आलमारियाँ

वो उछलकूद
वो गहमागहमी
वो रूठना मनाना

हर बात पे गुस्सा
हर बात से आहत
हर बात की चिन्ता

बहना से भिड़ंत
लड़ाई-झगड़े अनंत
इस तरह करके अंत

ढूंढती सुबह
बेचैन दोपहर
सवालिया शाम

खिड़कियाँ सिसकती
दरवाजे चिहुंकते
परदे फड़कते

दरकते फर्श
सूनी दीवारें
उदास गलियारे

बेचैन हवाएँ
वीरान सा घर
सिसकता आँगन

मुरझाई पत्तियाँ
उदास कलियाँ
हैरान अमियाँ

बग़ीचे में बढ़ी तुलसी
मोंगरे की सुगंध सी
फागुन की बयार सी

पापा के सखा
मम्मी की सखियाँ
सबकी भीगी अँखियाँ

तेरा आना पुरवाई जैसा
तेरा रहना शहनाई जैसा
तेरा जाना रुसवाई जैसा

अपने भाई को देख
सूनी कलाई को देख
उसकी रुलाई को देख

क्या बस इतना ही साथ
स्वप्न सा छोटा सा साथ
इससे तो न होता साथ

अब क्या रह गया इस घर में
मम्मी-पापा के जीवन में
सब कुछ सूना एक पल में

तू क्यों चली गई ?'

Sunday, January 11, 2015

ये क्या हुआ

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          डा. थामस फुलर ने लिखा है- 'Health is not valued till sickness comes.'- स्वस्थ होने की कीमत बीमार होने पर ही समझ में आती है. हम मनुष्यों के साथ एक दुर्गुण जीवन भर साथ चलता है कि जिस शरीर में हमारे प्राण रहते हैं उसकी हिफाज़त पर हम बिलकुल ध्यान नहीं देते. ख़ास तौर से हमारा खान-पान अत्यंत दोषपूर्ण है लेकिन हम बेहोशी में सब-कुछ निगलते रहते हैं और अपने शरीर को खुद रोगग्रस्त करते हैं. शरीर के प्रति जागरूकता के अभाव ने हमें दवाइयों और अस्पतालों पर निर्भर बना दिया है. बीमार शरीर को ढोते-ढोते सबका मन भी बीमार हो चला है. आखिर इतनी बेहोशी क्यों ?
           प्रकृति ने हम मनुष्यों को मांसाहार और शाकाहार भोजन उपलब्ध कराया है जिसे हम विविध उपायों से स्वादिष्ट बनाकर अपने शरीर को भेजते हैं. हमारे शरीर को उनके स्वाद से कुछ लेना-देना नहीं है, उसे तो भोजन के पोषक तत्वों से मतलब है लेकिन हमारी भोजन शैली की स्वाद की विविधता ने भोजन के अधिकतर पोषक तत्व छीन लिए और हम अपने शरीर को वह देते हैं जो उसे हर कण से दूषित कर रहे हैं. हमें बचपन से जो खाने को मिला वही हमारा अभ्यास हो गया और उसे ही हम अपने पेट भरने का सही उपाय मानते हैं. धीरे-धीरे हम और हमारा भोजन स्वाद के अधीन हो गए और हमारा शरीर भांति-भांति की बीमारियों के.
          स्वस्थ मन के लिए स्वस्थ शरीर की ज़रूरत है और स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन की. हमारे आस-पास के माहौल में इसे दूषित करने के चौतरफ़ा उपाय चल रहे हैं और सभी इनके चक्कर में फ़ंसते ही जा रहे हैं. जैसे, बचपन से मैंने जो खाया वही आज भी मुझे रुचता है, वही मुझे चाहिए, उदाहरण के लिए, हमारे घर में रात के भोजन में सदैव पूड़ी-सब्जी बनती थी इसलिए आज भी मुझे वह सर्वाधिक प्रिय है, भले ही वह गारिष्ठ होने के कारण शरीर के लिए हानिप्रद है, यह बात अलग है कि मेरी पत्नी ने इस परम्परा को तीस वर्ष पूर्व तोड़ दिया,अब पूड़ियों के दर्शन केवल त्योहारों में होते हैं. दस वर्ष की उम्र से मैं मिठाई दूकान में बैठ रहा हूं इसलिए मीठा और नमकीन खाने का शौकीन हूं, भले ही ये सब शरीर की आवश्यकता न हो. बस, खाए जाओ - खाए जाओ. खान-पान का यह स्वछंद प्रयोग नित-दिन हमारे शरीर की आन्तरिक व्यवस्था को अव्यवस्थित करता है और हम उसके प्रति तनिक भी सचेत नहीं हैं. इसी प्रकार सब इसी तरह की खाद्य विसंगतियों के शिकार हैं. सबसे अधिक नुकसान पशु या पशुउत्पादित खाद्य पदार्थों से होता है क्योंकि इनमें मनुष्य के शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व सर्वाधिक होते हैं लेकिन जागरूकता की कमी या भ्रमपूर्ण प्रचलित सूचनाओं के कारण लोग इन्हें शरीर के लिए लाभप्रद समझकर खाते हैं. 
           मेरे परिवार के पुरुषों में धूम्रपान की आदत प्रायः सबको रही. मेरे दादाजी और चाचाजी बीड़ी फ़ूंकते थे तथा पिताजी और बड़े भैया सिग्रेट पीते थे. मेरा बचपन इन लोगों के द्वारा नाक से छोड़े गए धुएं को सूंघते हुए गुजरा, इसलिए अप्रत्यक्ष ढंग से मुझे बीड़ी और सिग्रेट की गन्ध का भान है लेकिन मैंने कभी इसका सेवन नहीं किया यद्यपि कुछ धूम्रपानप्रेमी मित्रों का दबाव रहता था. इसी प्रकार शराब पीने से भी बचा रहा जबकि जेसीज और रोटरी जैसे क्लबों में लम्बे समय तक जुड़ा रहा जहां ‘न पीने वाले’ मुझ जैसे बन्दे उंगलियों में गिनने लायक थे. पर पता नहीं क्यों, मैं स्वयं को तम्बाखू से नहीं बचा पाया! अपनी युवावस्था में मैं पान खाने का शौकीन था- मीठीपत्ती+चमनबहार लेकिन एक दिन मेरे एक अभिन्न मित्र ने मेरे पान में दो पत्ती ‘बाबा-१६०’ डाला और कहा- ‘खाकर तो देख.’ केशर की खुश्बू से ओतप्रोत उस तम्बाखू का स्वाद और ‘झूम’ मनमोहक थी, मैं उस फ़न्दे में फ़ंस गया. कुछ दिन तक बाबा खाया उसके बाद देशी तम्बाखू खाने लगा. तम्बाखू के साथ-साथ पान खाने की आवृत्ति बढ़्ती गई, एक दिन में पन्द्रह से बीस पान खपने लग गए. अनेक बार छोड़ने की कोशिश की लेकिन मुई छूटती ही न थी, छोड़ने के दो-चार दिन बाद पैर अपने-आप पान की दूकान की ओर बढ़ जाते और वह अल्पकालिक संकल्प मोहक तम्बाखू के समक्ष धाराशायी हो जाता.
          सन १९७२ में मेरा मुंह कम खुलने लगा, मैंने अपने मित्र चिकित्सक डा. महेश कासलीवाल को दिखाया तो उन्होंने बताया कि यह ‘सब्म्यूकस फ़ाइब्रोसिस’ है जो मुंह के कैन्सर का प्रारम्भिक लक्षण है. उन्होंने उपचार के तौर पर एक ‘इन्जेक्शन’ लिखा जिसे मुझे हर सप्ताह में एक बार रायपुर जाकर डी.के. हास्पिटल के डेन्टिस्ट डा.पी.के.अग्रवाल से लगवाना पड़ता था. डाक्टर उस दवा को एक इंजेक्शन सिरिंज में भर लेते और मुंह के अन्दर निडिल से आठ-दस जगह ठूंस देते जैसे- ऊपर-नीचे तालु में, अगल-बगल गाल में, जीभ में, दोनों होठों में और न जाने कहां-कहां ! अपूर्व दर्द से मैं तड़प उठता, मुंह से खून बहता लेकिन इस तपस्या का भी कोई फ़ल न निकला. इसके बावज़ूद मैंने तम्बाखू वाला पान खाना नहीं छोड़ा. डा.महेश कासलीवाल मुझसे कहा करते थे- ‘पान-तम्बाखू खाना छोड़ दे, नहीं तो कैन्सर से मरेगा.’ लेकिन नशा तो नशा होता है. नशा करने वाले के पास नशा करने के कई कुतर्क होते हैं जिनके सहारे मैं लम्बे समय तक टिका रहा लेकिन अचानक २० अगस्त १९९३ को मैंने एक अत्यन्त कड़ा निर्णय लिया और पान, तम्बाखू और सुपारी को सदा के लिए छोड़ दिया लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी, रोग की जड़ें मेरे शरीर में पनप चुकी थी. अन्ततः २००२ में मैं कैन्सर की गिरफ़्त में आ गया।
                   कैन्सर का नाम सुनते ही इन्सान घबरा जाता है. घबराने की असल वज़ह होती है- डर. यह बीमारी ज़रा नखरीली है, मानी तो मानी और न मानी तो सता-सता कर मारती है. लोग इस बीमारी का नाम सुनकर ही सदमा खा जाते हैं, ‘साइलेन्ट हार्ट अटैक’ तो हो ही जाता है. सुनते साथ ही आँखों के सामने मृत्यु का तांडव नृत्य आरम्भ हो जाता है. जैसे ही इस बीमारी के समाचार का आगमन होता है, अनेक विद्वान सलाहकारों का अपने-आप अभ्युदय हो जाता है. सब के सब कैन्सर ठीक होने का मुफ़ीद इलाज़ बताते हैं- एकदम ‘गेरेन्टीड’, न ठीक होने पर सलाह वापस ! जैसे, गौ-मूत्र, स्व-मूत्र का सेवन; गेहूँ के ज्वार का रस, आयुर्वैदिक या होम्योपैथिक उपचार आदि. इसके अतिरिक्त बस्तर के जंगल में रहने वाले किसी आदिवासी का इलाज़, बनारस के किसी वैद्य के द्वारा दी जा रही दवा जैसी अनेक उपचार विधा मेरी जानकारी में आई लेकिन मैं असमन्जस में था कि क्या करूं, किसकी शरण में जाऊं ? सबसे अधिक डर इस सूचना का था - ‘किसी हालत में ‘सर्जरी’ मत करवाना क्योंकि चाकू के लगते ही कैन्सर शरीर में बुरी तरह फ़ैलता है.’
          मैंने इस क्षेत्र के नामी होम्योपैथ से दवा की एक ‘डोज़’ ले ली लेकिन मेरा जी घबरायमान हो रहा था. हमारी बिटिया संगीता और भावी दामाद डा, केदारनाथ मेरी सर्जरी के पक्ष में थे और वह भी तुरन्त क्योंकि देर करने से कैन्सर के शरीर के अन्य अंगों में फ़ैलने का डर था लेकिन मैं तो त्रिकोणीय समस्या से जूझ रहा था. पहला कोण था- १५ फ़रवरी को संगीता का विवाह, दूसरा कोण- विवाह के एक माह पूर्व कैन्सर की सर्जरी और तीसरा कोण- देर हो जाने पर कैन्सर के फ़ैलने का डर. अब, आपको तो मालूम है ही कि इस संसार में बिना पैसे कुछ होता नहीं है और मेरी माली हालत इतनी खराब थी कि ‘क्या नहाएं, क्या निचोएं !’
          मेरे मोहल्ले में एक सज्जन रहते हैं श्री के.के.बिश्वास जो एक राष्ट्रीयकृत बैंक के ‘लोन सेक्शन’ में कार्यरत थे. मैं उनसे मिला और अपनी समस्या बताई. उन्होंने बताया- ‘पर्सनल लोन का प्रावधान नहीं है लेकिन कान को पीछे से पकड़ना पड़ेगा, आपको कितना चाहिए ?’
‘सर्जरी और बिटिया के विवाह में कम से कम चार लाख लगेगा.’ मैंने कहा.
‘एक लाख का केस होता तो यहीं ‘सेंक्शन’ हो जाता लेकिन उससे अधिक के लिए ‘रीजनल आफ़िस’ से सेंक्शन लेना होगा. समस्या यह है कि वहां का साहब आपका बिरादर है और एक नम्बर का खाऊ है, बिना पैसा लिए काम नहीं करता.’
‘रिश्वत नहीं दूंगा.’
‘ठीक है, आपका केस तैयार करके मैं खुद वहां ले जाता हूँ, शायद आपकी समस्या सुनकर उसे दया आ जाए लेकिन महीने-डेढ़ महीने ज़रूर लगेंगे.’
‘ठीक है, कोशिश करिए.’ मैंने कहा.
           सर्जरी की तारीख नज़दीक आते जा रही थी और अपनी जेब खाली थी, मैं निरुपाय था, चुपचाप अपनी बीमारी के डर को सीने में छुपाए सहज बने रहने की कोशिश करता. मेरा दिमाग दिनोंदिन सुन्न पड़ते जा रहा था, हर दिन मेरे लिए कठिन होता जा रहा था. उसी दौरान एक दिन जब मैं अपनी लाज में बैठा था, मेरे अभिन्न मित्र रमाकान्त मिश्रा (राजा) जो भारतीय स्टेट बैंक से स्वैच्छिक अवकाश ले चुके थे, आए. हम दोनों ने साथ-साथ चाय पी. उन्होंने पूछा- ‘कब निकल रहे हो, इन्दौर के लिए ?’
‘अभी तो कोई प्रोग्राम नहीं बना.’ मैंने कहा.
‘अरे, तुझे सर्जरी के लिए निकलना था न ?’
‘सर्जरी मुफ़्त में होती है क्या ?’
‘कितना लगेगा ?’
‘क्या पता, लेकिन एक लाख से कम क्या लगेगा ?’
‘फ़िर ?’
‘फ़िर क्या...चुपचाप बैठा हूँ.’ मैंने बताया. बैठक समाप्त हो गई. रमाकान्त चले गए. लगभग दो घंटे बाद आए और मुझे एक बन्डल दिया और कहा- ‘ये बहत्तर हजार हैं, इसे लेकर कल सुबह इन्दौर के लिए निकल जा, एक दिन की भी देर नहीं करना. मेरे खाते में अभी इतना ही था. और पैसे की ज़रूरत होगी तो मुझे वहां से फ़ोन करना, मैं खुद लेकर आऊंगा.’ उन्होंने मुझे आदेश जैसा दिया और चले गए. उन रुपयों को देखकर मेरी आंखे डबडबा गई, मैं सोच रहा था- मौत की ओर तेजी से कदम बढ़ाते इन्सान की भला कौन ऐसी मदद करता है !
                       मैं और माधुरी  इन्दौर पहुंच गए. उसी शाम सर्जन डा. दीपक अग्रवाल से मिले. मैंने उनसे निवेदन किया- ‘बिटिया की शादी आज से ठीक एक महीने बाद है, अगर आप उचित समझें तो इस सर्जरी को अभी टाल दें. मैं विदा के अगले दिन आपके पास हाज़िर हो जाऊंगा.’
‘द्वारिका प्रसाद जी, बिटिया के विवाह की चिन्ता आप मत करें, हम लोग हैं, सब हो जाएगा. आप अभी जाकर सुयश हास्पिटल में भर्ती हो जाइए, परसों सुबह आपकी सर्जरी होगी.’ डा. दीपक अग्रवाल ने समझाया.
‘क्या इतना ‘अरजेन्ट’ है ?’
‘जी, तब ही ऐसा कह रहा हूं.’
‘फ़िर जैसा आप कहें.’ मैंने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया.
          वहां से हम लोग अस्पताल पहुंचे. अगले दिन आवश्यक जांच-पड़ताल हुई. १७ जनवरी २००२ की सुबह ७ बजे नर्स आई, सर्जरी करने के पूर्व सहमति लेने वाला प्रपत्र लाई और माधुरी से उस पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा. माधुरी मेरी ओर देखकर मुस्कुराई और बोली- ‘आज तो मेरा हस्ताक्षर चलेगा.’
‘हां, हां, क्यों नहीं, धन्यवाद.’ मैंने कहा और हम दोनों ठहाका मार कर हंस पड़े. नर्स हम दोनों का चेहरा देखती ही रह गई.
          कुछ देर बाद दो वार्डब्वाय स्ट्रेचरट्राली लेकर आए, मुझे उसपर लिटाया और ‘ओ.टी.’ की ओर ले चले. मैं लेटे-लेटे ऊपर दिख रही ‘सीलिंग’ को आगे बढ़ता देख रहा था. दाएं-बाएं घूमते हुए ट्राली शल्यकक्ष में प्रविष्ट हो गई. मुझे आपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया. थोड़ी देर बाद डाक्टर और नर्सों ने मुझे घेर लिया. ओ.टी. में लगे साउन्डबाक्स में से मोहम्मद रफ़ी साहब का गाया गीत हम सब को सुनाई दे रहा था- ‘आज मौसम बड़ा बेईमान है, आने वाला कोई तूफ़ान है, आज मौसम....’ किसी ने मुझसे धीरे से कहा- ‘आपके हाथ में एक इन्जेक्शन दे रहे हैं, थोड़ा दर्द होगा, ठीक है ?’ उसके बाद वह गीत वातावरण से जैसे गुम हो गया. फिर, मुझे डा. अग्रवाल की आवाज सुनाई पड़ी- ‘द्वारिका प्रसाद जी, जागिए, आपका आप्रेशन हो गया, आप मुझे सुन रहे हैं न ?’ मैंने उन्हें देखा, अपनी पलकें झपकाई और मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन मुस्कुरता कैसे, मुंह के अंदर तो रुई ठुंसी हुई थी !
          मुझे बताया गया कि सर्जरी तीन घंटे चली. सर्जरी के बाद मुझे ‘पोस्ट आपरेटिव्ह केयर रूम’ में रखा गया. वहां मुझे एक विचित्र समस्या का सामना करना पड़ा. जब डाक्टर ‘विजिट’ पर आए, उन्होंने मुझसे पूछा-
‘यूरिन पास हुई ?’
‘नहीं.’
‘अरे, इनको तुरंत टायलेट ले जाओ.’ उन्होंने नर्स को आदेश दिया. मेरे शरीर में अनेक पाइप लगे हुए थे, उस समय मुझे बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी. नर्स मेरी बाहों को पकड़कर मुझे टायलेट ले गई और मेरे साथ अन्दर तक गई क्योंकि कमोड जरा अन्दर था. मुझे बहुत जोर की लगी थी, मैंने बहुत कोशिश की लेकिन झिझक के कारण मामला नहीं सधा तो मैंने नर्स से बाहर जाने के लिए कहा तो उसने मुझसे कहा- ‘आपको इस हालत में छोड़कर कैसे जाऊं, आप कहीं गिर पड़े तो ?’
‘आप बाहर जाइए, माधुरी को भेज दीजिए.’ पर वे मुझे छोड़कर नहीं गई और वहीं से आवाज़ देकर माधुरी को बुलाया. माधुरी ने जब मुझे सम्हाला तब वे बाहर गई. तब भी यूरिन नहीं उतरी तब मैंने माधुरी को भी बाहर जाने के लिए कहा. जब वे भी बाहर निकल गई तब एकदम अकेले होने के बाद बामुश्किल काम बना. कभी-कभी इंसान को अत्यंत विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ता है.
          मुंह से खाना-पीना बंद था, नाक में एक पाइप डाला गया था जिसकी मदद से पानी, दूध, फ़लों का रस जैसे पेय पदार्थों से तीन सप्ताह तक शरीर को पोषण देना था. मुंह में रुई भरी थी इसलिए बोलना भी बन्द था. मैं उन दिनों इन्हीं वज़हों से इशारेबाजी में दक्ष हो गया था. आप उस व्यक्ति की मनस्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसका बोलना, खाना-पीना बाधित हो लेकिन क्या करोगे मित्र, जब सिर पर आती है तो सब सहना पड़ता है !
          अगली सुबह डाक्टर आए और उन्होंने पूछा- ‘कैसे हैं आप ?’ मैंने अपने ठीक होने का इशारा किया. ‘रिकवरी’ तेज थी इसलिए पांचवें दिन अस्पताल से छुट्टी हो गई. अस्पताल के भुगतान के लिए हमारी बिटिया संगीता ने जब बिल देखा तो वह विस्मित रह गई- बाइस हज़ार रुपए मात्र जो अस्पताली खर्च और दवाइयों का मूल्य था. सर्जन डा. दीपक अग्रवाल और उनके सहयोगी डा. विलास नेवास्कर ने कोई फ़ीस नहीं ली थी जबकि हमने अस्पताल में पता किया कि इन दोनों डाक्टरों की फ़ीस नब्बे हजार की आस-पास होती थी. उसी शाम हम लोग डा. दीपक अग्रवाल के चेम्बर में उनसे मिलने गए और सर्जरी की फ़ीस न लेने की वज़ह पूछी तो उन्होंने कहा- ‘आपसे फ़ीस लेने का मेरा हक नहीं बनता.’
‘क्यों ?’
‘आपकी बिटिया और दामाद दोनों डाक्टर हैं, हम आपसे कैसे फ़ीस ले सकते हैं, बस, आप अपना आशीर्वाद दीजिए ?’
                    सर्जरी के जरिये गाल से निकाले गए टुकड़ों को जांच के लिए लेब भेजा गया ताकि कैंसर का अन्दरूनी विस्तार पता करके उसके अनुरूप रेडियो-थेरेपी या कीमो-थेरेपी उपचार हेतु अगला कदम तय किया जा सके. डाक्टर ने एक सप्ताह तक इन्दौर में ही रुकने का निर्देश दिया ताकि सर्जरी में लगाए गए टांकों की नियमित जांच हो सके और सूख जाने पर उन्हें निकाला जा सके. तरल पदार्थ पेट तक भेजने के लिए नाक में एक पाइप घुसा हुआ था, कान के नीचे से होठों तक सिलाई इस तरह दिख रही थी जैसे बोरे को सुतली से सिला जाता है.            
           साथ के सब लोग स्वादिष्ट भोजन करते, नास्ता करते और मैं उन्हें ललचाई नज़र से देखता, खुश्बू का अहसास करता और मन ही मन कुढ़ता. खास तौर से जब लोग वहां की मशहूर आलू-कचौड़ी-चटनी खाते तो मेरी जान जल जाती लेकिन मैं अपनी नाक में घुसे पाइप के द्वारा जूस, दूध और दाल का पानी पीने के लिए अभिशप्त था. मैंने अपने जीवन में जितनी तम्बाखू खाई थी उसके मज़े की सज़ा भुगत रहा था. जितने भी तम्बाखू-सिग्रेट के शौकीन हैं, वे कैंसर के खतरे से परिचित हैं, वैधानिक चेतावनी पढ़ते भी हैं लेकिन वे भी मेरी तरह भ्रम में रहते हैं कि दूसरों को कैंसर हो सकता है उन्हें नहीं होने वाला. न हो, अच्छा है लेकिन यदि हो गया तो कैंसर की बातें करना अलग बात है और कैंसर को भुगतना अलग बात. जब परिवार में यह बीमारी किसी एक व्यक्ति को होती है तो उसे पूरा परिवार भुगतता है !
          बुरी आदतें जोंक की तरह होती हैं, चिपक गई तो फिर अलग नहीं होती॰ मेरे कैंसर और उसकी सर्जरी को देखकर मेरे बड़े भाई साहब और छोटे भाई साहब का दिल भी ज़रूर दहला होगा, उनके मन में भी भय समाया होगा क्योंकि दोनों तम्बाखू वाले गुटखा के प्रबल शौकीन हैं पर मेरी दुर्दशा को इतने करीब से देखने के बावजूद वे इस लत से मुक्त न हो सके॰ इन दोनों ने अलग-अलग अवसरों पर इस नशे से मुक्त न होने का एक अभूतपूर्व तर्क दिया जिसे सुनकर मैं नतमस्तक हो गया- 'एक बार तम्बाखू खाना शुरू कर दिया तो फिर छोड़ना नहीं चाहिए, तुमको इसलिए कैंसर हुआ क्योंकि तुमने तम्बाखू खाना छोड़ दिया॰'  चरण-वंदन है !
          सर्जरी के बारह दिन बाद डाक्टर ने मेरी जांच की और संतुष्ट दिखे, टांके खोल दिए और मुसकुराते हुए कहा- `द्वारिका प्रसाद जी, आप जैसा मरीज मिलना सौभाग्य की बात है॰'
'ऐसी क्या बात है डाक्टर साहब ?' मैंने पूछा॰
'मैंने आपसे जब भी पूछा कि आप कैसे हो, कैसा 'फील' कर रहे हो, आपने बताया- 'पहले से बेहतर॰' इतनी बड़ी सर्जरी हो गई, आपने एक भी बार दर्द होने की शिकायत नहीं की॰ आम तौर पर लोग बहुत हल्ला मचाते हैं॰'
'सच बताऊँ डाक्टर साहब॰'
'हाँ, बताइये॰'
'दर्द तो बहुत हुआ लेकिन आपको देखते ही उड़न-छू हो जाता था, आपकी दर्द निवारक दवा में वह बात नहीं जो आपकी मुस्कान में है॰' मैंने कहा॰
          इस बीच पेथालाजी रिपोर्ट आ गई, भेजे गए नमूने निरापद निकले जिससे रेडियो-थेरेपी और कीमो-थेरेपी देने की ज़रूरत न रही॰ मन प्रसन्न हो गया, लगा, सस्ते में छूटे॰ नाक से पाइप निकाल दिया गया, मुंह से भोजन करने और घर वापस जाने की इजाज़त मिल गई, मुझे लगा जैसे लंबी सज़ा काट रहे कैदी को उसके अच्छे व्यवहार के कारण उसकी सज़ा की अवधि कम करके समय-पूर्व रिहा कर दिया गया हो॰
          संगीता के विवाह के लिए कम समय बचा था. आभूषण, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएं बाज़ार से खरीदना, आमन्त्रितों की सूची तैयार करना, निमन्त्रणपत्र तैयार करके वितरित करना, रिश्तेदारों को फ़ोन के माध्यम से मनुहार करना और अपनी तबीयत का ख्याल रखते हुए आवश्यक सावधानी रखना- ये सब एक साथ करना था. हमने समय का भरपूर उपयोग किया जाए इसलिए इन्दौर में जो भी सम्भव था, घूम-घूम कर निबटा लिया. डाक्टर ने फ़ीस नहीं ली और छोटे भाई राजकुमार ने इन्दौर रवाना होते समय कुछ रुपए मुझे दिए थे इसलिए जेब गर्म थी, सब जानते हैं कि यदि जेब भरी हो तो 'सब सम्भव हो जाता, जी नहीं घबराता, जय लक्ष्मी माता.'
     
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