Saturday, March 28, 2015

ज़िंदगी का सफर ये कैसा सफर

आरम्भ से पढ़ने के लिए यहाँ 'क्लिक' करें 

          भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन किया है, ये सभी रस साहित्य, नृत्य और सामान्य भावाभिव्यक्ति में इस तरह रच-बस गए हैं कि इनके गूढ़ार्थ सहज ही सबको समझ आ जाते हैं। एक और रस है जो इन उल्लेखित रसों में उद्घाटित नहीं हो पाया है- वह है- 'बतरस।' आदि-काल से बतरस का प्रभाव हमारे जनजीवन में अति-व्यापक रहा है। बतरस गंभीर वार्तालाप है, भाषण देना-सुनना है, प्रवचन-सत्संग है, निःशुल्क मनोरंजन है और मनुष्य के पेट में उठे दर्द को दूर करने की दवा भी है।
          मेरे बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया की गद्दी में अधिकतर समय उनके मित्रों और परिचितों की बैठक चलती जिसमें भाग लेने के लिए लोग पैदल या साइकल-स्कूटर चलाते या कार में बैठकर नियमित रूप से आते, घंटों विविध विषयों पर बातचीत होती, बहस होती, कहा-सुनी होती और उस बीच में चाय-नास्ता का दौर चलता। अपने विचार सभी लोग व्यक्त करते लेकिन स्वाभाविक रूप से स्थल व चाय-नास्ता मुहय्या करवाने वाले को बोलने का अवसर अधिक मिलता और उसकी बात अधिक मानी जाती। हमारे परिवार के पुरुषों को इस रस का निर्मल आनंद उठाते मैंने बचपन से युवावस्था तक नियमित देखा तो उसका असर मुझ पर भी पड़ा। यद्यपि बड़ी महफिल सजाने का चस्का नहीं लगा लेकिन आपसी संवाद करने का शौक लगातार बढ़ता गया। बचपन में हम लोग की बातचीत के विषय थे- हमारे मास्साब और पढ़ाई, किशोरावस्था में फिल्में, युवावस्था में लड़कियां और प्रौढ़ावस्था में राजनीति और साहित्य।  
          यूं तो बतरस वाली दोस्ती असंख्य लोगों से रही है लेकिन कुछ लोग मेरे जीवन में ऐसे रहे जिनके साथ बातें करते मेरे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता जिसमें सर्वोच्च हैं मेरी 'बेस्टेस्ट फ्रेंड' माधुरी। उनके अतिरिक्त किशोरावस्था के मित्र- (स्व॰) लक्ष्मीनारायण शर्मा; और सुधीर खंडेलवाल; वयस्क-प्रौढ़ वय के मित्र- (स्व॰) पंडित मुरलीधर मिश्र,  (स्व॰) प्रोफेसर बी॰के॰ श्रीवास्तव, (स्व॰) भागवत प्रसाद दुबे, (स्व॰) राम किशन खंडेलवाल, (स्व॰) कुतुबुद्दीन भारमल, (स्व॰) महेश भट्ट, (स्व॰) इंदर सोंथलिया, (स्व॰) रमाकांत मिश्र; और बजरंग लोहिया, जगत नारायण तिवारी, सतीश जायसवाल, कान्तिलाल जोबनपुत्रा, वी॰एस॰तैलंग, डा॰ महेश कासलीवाल, चन्द्रशेखर जालान, सुभाष दुबे, जगदीश दुआ, बजरंग केडिया, विनोद मिश्र, विवेक जोगलेकर आदि कुछ और भी। मित्रों के इस समूह के साथ बैठकर आपस में विभिन्न विषयों पर होती चर्चा से प्राप्त परम-आनंद के क्या कहने ! वह जीवंनदायी बतरस था जो बहुत कुछ सिखाता, व्यक्तित्व विकसित करता, प्रतिकूल परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत देता, मार्ग दर्शन देता, दुख कम करता और कभी-कभी हँसाता भी था। जब भी प्रतिकूल मनस्थिति में मेरे दिमाग को लकवा लगने जैसा लगता तब ये लोग मेरे विवेक-रक्षक-साथी थे। मैंने इतने बुरे दिन देखे कि यदि इन मित्रों का साथ न होता तो मैं किसी पागलखाने में होता या किसी तेजी से आती ट्रेन के आगे खड़ा होकर अपने प्राण दे चुका होता।
          कठिन समय में इनका साथ बहुत साथ देता था, इनकी बातें भी साथ देती थी। बातें करने से दिल बहल जाता था, थोड़ा 'डायवर्सन' हो जाता था और दिल को दिलासा भी। कुछ मित्र तो मुझसे इतनी दूर चले गए कि अब उनसे मिलना न होगा लेकिन कुछ का साथ अब भी बना हुआ है।
          श्री बजरंग केडिया मुझसे दस वर्ष बड़े हैं, सौभाग्य से मित्रवत है। उनसे दिल की बातें निःसंकोच की जा सकती हैं, वे मुझे 'प्रेक्टिकल' सलाहकार से लगते हैं। एक दिन अपनी चिन्ता का बोझ लिए मैं उनके घर पहुंचा, मेरी समस्या को वे गौर से सुने और बोले- 'देखो द्वारिका, मैं तुमको एक बात बताता हूँ, किसी लड़की की शादी आज तक पैसों की कमी के कारण नहीं रुकी। सब इंतजाम हो जाता है, कैसे हो जाता है, पता नहीं ! तुम मानो, हर लड़की इस संसार में अपना भाग्य लेकर आती है।'
     
          एक दिन भावी समधी जी का एसएमएस आया- 'मेरा तालाब सूख गया है उसमें जल भरें।' मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। अब मैं क्या जवाब देता ? मेरे नल से तो पानी की जगह हवा निकल रही थी और उसमें से 'सूँ-सूँ' की आवाज़ आ रही थी, इस आवाज़ से तो समधी जी का सूखा तालाब भरने से रहा। और तो और, एक दिन भावी दामाद का भी फोन पर तगादा आ गया- 'क्या हुआ ?'
          उधर वे हमसे हलाकान थे, इधर हम खुद से परेशान। विवाह की तिथि जितनी नजदीक आती जा रही थी, चिन्ता उतनी बढ़ती जा रही थी। हमारी हालत उस किसान की तरह थी जो अपनी सूखती फ़सल को बचाने के लिए बारिश के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहा हो और बादलों का कोई अता-पता न हो। मुझे निष्क्रिय और निश्चिंत देखकर माधुरी झल्ला उठती- 'क्या कर रहे हो तुम ?'
'कुछ नहीं।' मेरा बुझा सा उत्तर उसे और बुझा देता। उन्होंने मुझसे कहा- 'मेरे गहने 'बैंक लाकर' से निकाल लो, बेचो और झंझट खत्म करो।'
'उतने से भी काम नहीं बनने वाला।'
'फिर ?'
'देखते हैं।' मैंने तथागत गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठे-बैठे उत्तर दिया।

          एक दिन सुबह दस बजे मैं अपने एक पुराने सहपाठी के घर पहुँच गया। हम दोनों हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे। मुझे देख उसने पूछा- 'आओ द्वारिका, आज अचानक, सुबह-सुबह ?' मैंने अपनी समस्या बताई तो उसने कहा- 'फिक्र मत कर, तेरा काम हो जाएगा, रुक तेरे लिए चाय बनवाता हूँ। कैसी चाय पिएगा, शक्कर वाली या बिना शक्कर वाली ?'
'शक्कर वाली, ज़रा कडक।' मैंने कहा। हम दोनों के लिए चाय आई, मेरे लिए कड़ी-मीठी और उसके लिए बिना शक्कर वाली।
          घर आकर मैंने माधुरी को बताया- 'हो गया।'
'अरे वाह, किसने दिया ?'
'फकीरों ने।'
'फकीरों ने ?'
'हूँ, उन्होंने कहा था न, 'अल्लई देगा', उसी ने दिया।' मैंने कहा।

          इसके कुछ दिनों बाद हमारी लाज़ में एक ग्राहक आए, रीवा (मध्यप्रदेश) से, पंडित अखंड प्रताप नारायण मिश्र, अपनी बेटी को राज्य सेवा की परीक्षा दिलवाने। दो-तीन दिन रुके, परिचय बढ़ा, उनकी बातचीत की शैली प्रभावित करने वाली थी। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अगले माह बेटी का विवाह है। उन्होंने मुझसे पूछा- 'कुंडली मिलवा ली है न ?'
'हमें लड़के की कुंडली नहीं दी गई, लेकिन उनका जन्म समय और स्थान मालूम था इसलिए उस आधार पर कंप्यूटर से मिलान करवाया था, कुछ दोष हैं, पर चलता है।' मैंने बताया।
'एक बार मुझे दिखाएंगे क्या, अगर आप उचित समझें ?'
'क्यों नहीं।' मैंने उन्हें दोनों कुंडली दी, उन्होंने कुछ देर दोनों का अध्ययन किया और मुझसे बोले- 'अग्रवाल जी, मेरी राय है कि आप यह संबंध न करें।'
'क्यों ?' मैंने प्रश्न किया। उन्होंने संज्ञा के वैवाहिक भविष्य और ससुराल के बारे में कई ऐसी बातें बताई जो चिंताजनक थी, नकारात्मक दिशा में जा रही थी। मैं सोच में पड़ गया। दुविधा अज़ब थी, एक तरफ हमारी बेटी का प्यार और दूसरी तरफ हमारा अपनी बिटिया से प्यार !
'जो होगा, सो होगा पंडित जी, अब इस विवाह को रोकना हमारे लिए असंभव है।' मैंने कहा।
'तो जैसा प्रभु ने रच रखा है, होने दीजिए, सब उनकी माया है।' वे गंभीर होकर बोले।

          नियत तिथि पर दोनों परिवार एकत्रित हुए, वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए और हमने अपनी बिटिया को विदा किया। हमें खुशी थी कि हम अपनी बेटी के प्यार को सुखद परिणिति तक ले जाने में सहयोग कर सके।
          पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म 'नीलकमल' (1968) में रफी साहब ने साहिर लुधियानवी का लिखा यह मार्मिक गीत गाया था, इसे सरसरी निगाह से नहीं, जरा डूब कर पढिए:

'बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰

नाज़ों से तुझे पाला मैंने
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको
बाहों में मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की ऐ नाज़ुक डाली
तुझे हर पल नई बहार मिले॰

जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों में हंसी की धूप खिले
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी ज्योति न हो फीकी
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले॰

बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ
आराम की ठंडी छांव में,
कांटा भी न चुभने पाए कभी
मेरी लाडली तेरे पाँव में,
उस द्वार से सब दुख दूर रहे
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले॰

बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰'


          जीवन की घटनाएँ क्या हमारे अनुमान के अनुरूप घटती हैं ? अनुमान से थोड़ा कम या ज़्यादा तो ठीक है लेकिन जब सब एकदम विपरीत हो तो अपनी ही अक्ल और समझदारी पर संदेह होने लगता है और अगर अपनी अक्ल पर दोष देने की हिम्मत न हो तो फिर 'भाग्य का लिखा' तो है ही। जिस छोटे से संसार में हम रहते हैं, उसी छोटी सी सीमा में लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, जानने-समझने की कोशिश करते हैं, सम्बन्धों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह सब अनुमान ही रहता है, इन अनुमानों का सटीक निकलना 'मेरी होशियारी' है और यदि अनुमान गलत निकल गए तो 'मैं नहीं, वह गलत' है।
          खुशी-खुशी विदा हुई संज्ञा की खुशियाँ अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। उसके बाद हमें ऐसा लगने लगा कि हमारे अनेक जन्मों के पाप के फल हमारे जीवन में दौड़ते चले आ रहे हैं। इतना कष्ट, इतना अपमान, इतना डर, इतनी लाचारी, इतनी उपेक्षा, इतनी बेहूदगी, इतनी नासमझी, इतनी गाली-गलौच मेरे इतने लंबे जीवन में न देखा, न सुना और न जाना। वह सब देख लिया जो पुरानी पारिवारिक फिल्मों में देखा करता था, आश्चर्य है, आज की पढ़ी-लिखी दुनियाँ में वैसा ही चल रहा है ! उस दौरान जो नरक-यातना हमने भुगती, उसे आपको कैसे बताऊँ ?
          न बता पाने की एक वैधानिक मजबूरी भी है, विवाह के तीन वर्ष बाद हमारे दामाद जी ने हमारी बेटी पर 'घरेलू क्रूरता' का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी और कुछ दिनों बाद उन्होंने कुटुंब न्यायालय में संज्ञा के विरुद्ध तलाक़ हेतु केस दायर कर दिया। चूंकि प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए विवाह के बाद की घटनाएँ बताना न्यायोचित नहीं है। वैसे, आपके लिए आगे की कथा बुनने के लिए विकल्प खुला है, आप दो तरीके से कहानी को आगे बढ़ा सकते हैं- एक- 'हमारी बेटी ने ससुराल वालों को सताया' या दो- 'ससुराल वालों ने हमारी बेटी को सताया'। प्रकरण दायर किए हुए अब लगभग सात वर्ष हो चुके हैं। आप जानते हैं कि समय की गति तेज होती है और न्याय की गति धीमी, न जाने कितना और समय लगेगा क्योंकि अभी इस न्यायालय के बाद उच्च न्यायालय है, फिर सर्वोच्च न्यायालय है ! जिस अदालत में हत्यारों और चोर-उचक्कों की भीड़ खड़ी रहती है वहाँ उनके इर्दगिर्द मेरी बेटी अपनी बेटी के साथ जज की होने वाली पुकार की प्रतीक्षा करते खड़ी रहती है क्योंकि उसने किसी से प्रेम करने का अपराध किया था। आज भी वे उसी पति से प्रेम करती हैं, उसी के साथ रहना चाहती हैं लेकिन उनका प्रेमी अब ऐसा पति बना दिया गया है जो उनके साथ नहीं रह सकता। हमारी नातिन अनन्या अब बड़ी हो गई है और इतना समझने लग गई है कि 'कुछ गड़बड़ है' लेकिन वह संभवतः यह नहीं समझ पा रही होगी कि 'मम्मी-पापा के बीच यह कैसी कट्टी है जो अगले दिन मिट्ठी में नहीं बदलती ?'
          जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं चुपचाप अपने जीवन की लहरों के उतार-चढ़ाव को देख रहा हूँ, सच बताऊँ, अब मुझ पर बाह्य परिस्थितियों का असर कम ही होता है। वैसे, बहुत से लोगों से तबीयत के साथ जिरह करने की तमन्ना है लेकिन इस अदालत में नहीं, 'उस' अदालत में करूंगा।
         हमें खुशी है कि हमारी बेटी हमारे साथ है, हमारी आँखों के सामने है और साथ में उनकी हँसती-खेलती बेटी अनन्या भी जो अब नौ वर्ष की होने जा रही है। इन वृद्ध कंधों में अभी भी इतनी शक्ति है कि अपनी बेटी और उनकी बेटी का भार, निर्भार समझ कर उठा सकता है। इस खुशी के साथ-साथ हमारे हृदय में एक अदृश्य पीड़ा भी समानान्तर में चल रही है जिसे वे माता-पिता आसानी से समझ सकते हैं जिनकी बेटी ससुराल में मर-खप गई हो या बचकर उनके घर वापस आ गई हो। आप भी इस अनुभूति को महसूस कर सकते हैं, बशर्ते, आप हमारी बेटी को अपनी बेटी मान लें तो उस अकथनीय पीड़ा के शब्द आप तक अपने-आप पहुँचने लगेंगे।
          राजिन्दर किशन ने इस गीत में मेरी व्यथा को कम शब्दों में ही पिरो दिया  :

'कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !

मुझको बर्बादी का कोई गम नहीं
गम है बर्बादी का क्यूँ चर्चा हुआ !

देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ !

कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !'

==========
आगे पढ़ने केलिए यहाँ 'क्लिक' करें                                

Tuesday, March 10, 2015

पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई

आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ 'क्लिक'करें
 
          अम्माजी के निधन के पश्चात गोलबाजार वाले घर में मृत्योपरांत होनेवाले कार्यक्रम तेरह दिन गहमागहमी के साथ चले, समस्त परिवारजन और रिश्तेदार एकत्रित हुए।  कुछ देर तो अम्माजी की चर्चा चलती और फिर कुंतल के आश्रम-गमन पर चर्चा होने लगती और बढ़ती ही जाती। कुंतल के आश्रम जाने के 11 दिन बाद ही अम्माजी का निधन हुआ था इसलिए सब उसी 'विचित्र किन्तु सत्य' घटना की तह तक पहुँचना चाहते थे। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो गया ? हमसे इस तरह के प्रश्न किए गए :
'क्यों चला गया ?'
'क्या बात हो गई ?'
'आपने समझाया नहीं ?'
'आपने रोका नहीं ?'
'ऐसे कैसे जाने दिया ?'
          तीसरे दिन अम्माजी की अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मैं इलाहाबाद निकल गया, इधर पुत्र-विछोह से दग्ध माधुरी किस्म-किस्म के पूछे जा रहे सवालों से अकेले जूझती रही और सबको समझाते-बताते खुद भी कुंतल के उस अबूझ निर्णय को समझने का असफल प्रयास करती रही। उन चर्चाओं से उनका दुख और अधिक गहरा गया, वे बेचैन हो गई, उनकी रातों की नींद उड़ गई। 'लोगों का सामना न करना पड़े' इसलिए उन्होंने खुद को अपने घर में सीमित कर लिया और गोलबाजार वाले घर में जाना कम कर दिया। मैं अस्थि-विसर्जन करके वापस लौटा तो वे मेरे कंधे में सिर रखकर रोने लगी और बोली- 'बताओ, क्या जवाब दूँ, सबको ?' मैं उनको क्या बताता, मैं खुद ही बे-जवाब था ! उन दिनों हम दोनों अपने आंसुओं को थामे एक-दूसरे को थामते हुए किसी तरह जी रहे थे। सच में, हम बेसहारा से हो गए थे; ऐसा लगे, कम्मू वापस आ जाए तो हमारी ज़िंदगी वापस आए।
           13 जुलाई 2004 को सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप विधि-विधान से अम्माजी की तेरहवी का पूजन और भोज का कार्यक्रम हुआ। रात को हम लोग थके-मांदे अपने घर वापस आए और सो गए। उस रात माधुरी की तबीयत खराब हुई लेकिन उन्होंने मुझे जगाया-बताया नहीं। अगली सुबह मैं यथासमय उठा, मैंने उन्हें देखा, वे गहरी नींद में सो रही थी। लगभग सात बजे वे जागी और बाथरूम जाने के लिए निकली। रास्ते में उन्हें संभवतः चक्कर आया और वे गलियारे में धम्म से बैठ गई, फिर जमीन पर पसर गई। मैं बाहर बरामदे में अखबार पढ़ रहा था, मुझे कुछ आहट मिली, अंदर जाकर देखा तो माधुरी पसीने से लथपथ फर्श पर पड़ी हुई थी। मैंने उन्हें नाम लेकर पुकारा लेकिन कोई उत्तर नहीं आया, वे अचेत हो चुकी थी, शरीर ठंडा पड़ गया था। मैं बुरी तरह घबरा गया, उनकी हालत देखकर मेरी हालत खराब होने लगी, मेरे कपड़े पसीने से तर-बतर हो गए। मैं उसे पुकार रहा था- 'माधुरी...माधुरी' और वह कुछ बोल नहीं रही थी, आंखे बंद और शरीर एकदम निश्चेष्ट था। एकबारगी मुझे ऐसा लगा- यह एक नई अनहोनी है जो आज होने जा रही है। मैं दौड़ते हुए अपने पड़ोसी डाक्टर अशोक दीक्षित के घर गया और माधुरी का हाल बताया, वे बोले- 'आप घर पहुंचिए, मैं तुरंत आता हूँ।' वहाँ से लौट कर मैंने माधुरी की मित्र सोनू सिहारे को फोन किया और उनसे तुरंत घर आने के लिए कहा। इस बीच डा॰ दीक्षित आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'शी इज़ सिंकिंग, 'ब्लड प्रेशर' और 'हार्टबीट' दोनों गड़बड़ है, इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाइए, यहाँ कुछ नहीं हो सकता।'
          इस बीच सोनू भाभी अपने पति डा॰ प्रदीप सिहारे को लेकर घर आ गई। डा॰ प्रदीप सिहारे अपने साथ 'ग्लूकोज़' के 'पाउच' लेकर आए थे, उन्होंने हाथ की नस टटोलकर सुई घुसेड़ी और 'ग्लूकोज़' चढ़ाने लगे। 'पाउच' को वे अपने हाथ की गदेलियों से दबाकर 'ग्लूकोज़' को शरीर के भीतर जल्दी-जल्दी भेजने का प्रयास कर रहे थे। मैं अपनी सांस रोके चुपचाप अपनी जीवनसंगिनी की डूबती काया को किंकर्तव्यविमूढ़ होकर निहार रहा था।    
          पंद्रह मिनट की मशक्कत के बाद माधुरी के शरीर में कुछ हरकत शुरू हुई, थोड़ी देर बाद डा॰ सिहारे उन्हें कार में बिठाकर अपने हास्पिटल ले गए और वहाँ भर्ती कर लिया। दो दिनों तक उन्हें लगातार ग्लूकोज़ और दवा दी गई।  डा॰ सिहारे तब तक लगातार उनकी देखरेख करते रहे जब तक माधुरी सामान्य नहीं हो गई। चूंकि डा॰ प्रदीप सिहारे शिशुरोग विशेषज्ञ हैं, उनके हास्पिटल में केवल बच्चों का इलाज़ होता है इसलिए वहाँ पर भर्ती अन्य बच्चों के परिजन इनती बड़ी 'साइज' की बच्ची को देखकर विस्मित हो रहे थे और हल्के-हल्के मुस्कुरा भी रहे थे। । माधुरी का और मेरा नास्ता, भोजन, चाय-दूध का जिम्मा सोनू सिहारे ने अपने ऊपर ले लिया था, सच में, उन्होने हमारी बहुत देखरेख की। हमारे घर-परिवार के लोग भी माधुरी को देखने पहुंचे, देखे और चले गए। सोनू भाभी और डा॰ प्रदीप ने उस दिन माधुरी के प्राण बचाए और हमारा परिवार तहस-नहस होने से बच गया। धन्यवाद सिहारे दंपति, आप दोनों की जोड़ी सदा बनी रहे।
          माधुरी घर वापस आ गई लेकिन उनका मन बहुत बेचैन रहता था। उन्हें मानसिक आघात लगा था जिसके कारण उनकी रातों की नींद उड़ गई। वे गुमसुम रहने लगी, मैं भी उदास रहता था और कुंतल को वापस बुलाने के उपाय खोजता रहता था लेकिन कुछ न सूझता। एक दिन मेरे मित्र रमाकांत मिश्रा ने मुझे बताया कि तमिलनाडु के राज्यपाल श्री पी॰ राममोहन राव अपनी बहन से मिलने बिलासपुर आए हुए हैं, क्यों न उनकी मदद ली जाए ! हम दोनों उनसे मिलने उनके बहनोई श्री अशोक राव के घर गए और अपनी व्यथा बताई। श्री राव ने कहा- 'मैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव को जानता हूँ, उन्होंने मुझे अपने आश्रम के कार्यक्रम में बुलाया भी था लेकिन मैं नहीं जा पाया। सद्गुरु जग्गी वासुदेव की निकट सहयोगी भारती जी के पति मुझसे मिलते रहते हैं, उनकी मदद से सद्गुरु तक आपकी बात पहुंचाई जा सकती है।'
'यह ठीक रहेगा, आपके कहने से यदि बात बन जाए तो आपकी बहुत कृपा होगी। कुंतल का आश्रम जाने का निर्णय हम पर बहुत भारी पड़ गया, उनकी माँ टूट गई हैं। हम यह चाहते हैं कि वे योग प्रशिक्षक के रूप में काम करते रहें और अपनी पारिवारिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे।' मैंने कहा।        
'आप लिखकर दीजिए, मैं बात करता हूँ।' राज्यपाल महोदय ने कहा।
           ऐसे प्रभावशाली सूत्र और राज्यपाल महोदय के सहयोगी रुख से हमारी हिम्मत बंधी लेकिन आप तो जानते हैं कि जब विपरीत दिन आते हैं तो अनुकूल प्रयास भी प्रतिकूल परिणाम देने लगते है। राज्यपाल महोदय को न जाने क्या सूझी उन्होने मेरे पत्र को कोयंबत्तुर के कलेक्टर को टीप लगाकर भेज दिया, कलेक्टर ने पुलिस अधीक्षक को और पुलिस अधीक्षक ने थाना-प्रभारी को। आश्रम में जांच के लिए पुलिसबल पहुँच गया और वहाँ के ब्रह्मचारियों, सन्यासियों और संचालकों से गहन पूछताछ करने लगा। अब, पुलिस कैसी जांच करती है, इसका अनुमान आपको होगा ही।
          उस दिन कुंतल संभवतः चेन्नई में थे। आश्रम से जब उन्हें पुलिस-कार्यवाई की खबर मिली तो उन्होने मुझे फोन किया- 'पापा, आपने राज्यपाल से आश्रम के बारे में शिकायत की क्या ?'
'नहीं तो।' मैंने उत्तर दिया।
'पुलिस आश्रम में है, मुझे अभी खबर मिली है। पुलिसवाले बता रहे हैं कि वे आपकी ही शिकायत पर जांच करने आए हैं।'
'मैं राज्यपाल महोदय से मिला था और उनसे निवेदन किया था कि मध्यस्थता करके तुम्हें वहाँ से मुक्त करवाएँ, परंतु मेरे पत्र में आश्रम के विरुद्ध शिकायत का एक भी शब्द नहीं है।'
'पर वहाँ तो तमाशा बन गया, मेरा भी।'
'ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।'
'जो हो गया सो हो गया लेकिन इसके बाद अगर इस ढंग की कोई बात हुई तो याद रखिए आपसे मेरा संपर्क हमेशा के लिए टूट जाएगा, आपको पता भी नहीं लगेगा कि मैं कहाँ हूँ।'
'जी, मैं समझ गया।' मैंने पिता होने के अहंकार को तिरोहित करते हुए कहा।
          जांच के बाद कलेक्टर ने कुंतल को अपने कार्यालय में बुलाया। कलेक्टर ने पूछा- 'क्या आप अपनी मर्जी से यहाँ आए हैं या आप पर कोई दबाव है ?'
'मैं अपनी मर्जी से यहाँ आया हूँ।' कुंतल ने उत्तर दिया।
'आप माता-पिता के इकलौते पुत्र हो, इस तरह उन्हें छोडकर आश्रम क्यों आ गए ?'
'घर में रहता तो केवल माता-पिता की सेवा करता, यहाँ मुझे बहुत सारे माता-पिता की सेवा करने का अवसर मिला है। मुझे सब में अपने माता-पिता ही दिखते हैं।' कुंतल ने बताया।

==========

          हमारे तीन में से दो बच्चे व्यवस्थित हो गए, संगीता बिटिया का विवाह हो गया, कुंतल आश्रम चले गए, अब घर में हमारे साथ छोटी बिटिया संज्ञा बची जो अपना भविष्य सँवारने में लगी हुई थी। संज्ञा का बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में दिल नहीं लगता था लेकिन 'सिविल सर्विस' प्रतियोगिता से जुडने के बाद उनमें पढ़ाई के प्रति अभूतपूर्व लगन जगी। अपने तेज दिमाग का समुचित प्रयोग करती संज्ञा को देख कर हम लोगों को बहुत खुशी होती थी। संज्ञा काम-काज करने में भले धीमी थी लेकिन किसी से काम लेने में उसे महारत हासिल थी, यदि वे किसी प्रशासनिक सेवा में प्रविष्ट हो जाती तो उनका स्वभाव और प्रभाव बहुत अनुकूल रहता। सन 2003 की छत्तीसगढ़ शासन की सेवाओं हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षा में भरपूर उम्मीद के बावजूद सफलता नहीं मिली, वे दोषपूर्ण 'स्केलिंग' की शिकार हो गई। फिर यह तय हुआ कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रयत्न किया जाए इसलिए उन्होंने इलाहाबाद और दिल्ली जाकर मार्गदर्शन लिया। इसी दौरान उन्हें दिल्ली में कोचिंग करते समय एक साथी मिल गया जिसे जीवनसाथी बनाने का मन बनाया और प्रतियोगिताओं से दूर एक गृहस्थन की परीक्षा देने का निर्णय ले लिया।
          संज्ञा विवाह योग्य हो गई थी, लड़का भी उन्होने खोज लिया, चार्टर्ड एकाउंटेंट था। बच्चे अपनी पसंद का विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है, यह बात ठीक थी लेकिन विवाह फोकट में तो होते नहीं। मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार न था इसलिए विवाह को टालने में ही भलाई समझ आई। यद्यपि खबर यह थी कि लड़के ने अपने घरवालों को अपनी पसंद की लड़की से विवाह के लिए राजी कर लिया है लेकिन हड़बड़ी का कुछ गलत मतलब न निकल जाए इसलिए मैं उस ओर से किसी गंभीर संकेत की प्रतीक्षा में था और वे लोग संभवतः 'लड़के वाले' होने के कारण पहल करने में हिचक रहे थे, परिणामस्वरूप मामला लटका रहा। इधर दोनों प्रेमी रोज रात घंटों तक मोबाइल में लटके रहते और मैं सोचता कि ये लोग सब बातें अभी कर लेंगे तो शादी के बाद बात करने के लिए भला क्या बचेगा !
         हमारा होटल कुछ आगे बढ़ा लेकिन देनदारी इतनी अधिक थी कि घर का खर्च और ब्याज पटाने में ही खप जाता। कई बार बैंक की किश्त अनियमित हो जाती तो सेंट्रलबैंक के शाखाप्रबंधक का फोन आता जिसमे उसके अपमानजनक उद्गार को सुनकर चुप रह जाना पड़ता और 'फोन पटक कर' रखने की आवाज़ भी सुनता जो आज भी मेरे कानों में गूँजती है। जेब में पैसा न हो तो इंसान को बहुत सहना पड़ता है, चुप रहना पड़ता है।
          संज्ञा के जन्मदिन के अवसर पर संज्ञा के संभावी श्वसुर ने एक रिस्टवाच भेजी जिससे हमें संबंध की बातचीत आगे बढ़ाने का संकेत मिल गया लेकिन फिर भी हमारी हिम्मत न पड़े। मेरे भय के दो कारण थे, एक तो मैं आपको बता चुका, हमारा घनघोर धनाभाव और दूसरा हमारे संभावी समधी पुलिस सेवा में थे। हम व्यापारी वर्ग के लोग पुलिस आफिसर और इन्कम टैक्स आफिसर से थर-थर कांपते हैं क्योंकि न जाने कब इनके दिमाग का बिगुल बज उठे और इनकी तलवार म्यान के बाहर निकल जाए ! आप आश्चर्य करेंगे, खरबूजा प्रजाति का यह व्यापारी समुदाय इन लोगों को अपने पारिवारिक उत्सव में निमंत्रण देने तक में हिचकिचाता है। दीवाली के अवसर पर 'लिफाफा' और मिठाई देने इनके घर जाएगा लेकिन शादी-ब्याह की निमंत्रणसूची में इनका नाम नहीं लिखता, हाँ, कुछ बहुत पुरानी जान-पहचान या 'सेटिंग' हो तो अलग बात है। 'इनसे दूरी बनी रहे, उसी में भलाई है'- यह सोच कर उनके यहाँ संबंध की बात आगे बढ़ाने में मेरा जी घबरा रहा था।
          मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि फोन पर दोनों प्रेमी इतनी अधिक बातें कर रहे हैं, कुछ दिनों में ऊब जाएंगे तो किस्सा अपने-आप फुस्स हो जाएगा लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला।
           मेरी होटल की जिस छत पर प्रतिदिन धूप आती थी, कभी-कभी पानी भी बरसता था, इस बीच 'कृपा' भी बरसी। छत पर 'एयरटेल' की 'सेटेलाइट टावर' लग गई जिसके किराये से प्रत्येक माह बैंक की किश्त देने की स्थायी व्यवस्था बन गई और उस अशिष्ट शाखाप्रबंधक का तगादा आना बंद हो गया।

          दिन बीतते जा रहे थे या यूं कहें, गुजरते जा रहे थे। रोज सुबह जागना, हॉटल जाना, रात में सो जाना, बस, ऐसी ही ज़िन्दगी चल रही थी। कोई चमत्कार होने से रहा जो ज़िन्दगी को चमका दे, यह मनगणित ज़रूर चलता था कि संज्ञा के विवाह के खर्च की व्यवस्था कैसे बनेगी ! इसी चक्कर में लगभग एक साल टल गया लेकिन न मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आया और न हमने विवाह का कोई प्रस्ताव किया। फोन पर हुई बातचीत के कुछ ऐसे सूत्र बने कि एक दिन मैं संज्ञा और उनकी मम्मी के साथ संभावी दामाद के घर पहुँच गया। स्वागत-सत्कार हुआ, कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान हुआ, उन्होंने हमें और हमने उन्हें देखा। वहाँ संभावी दामाद के वयोवृद्ध दादाजी भी मिले जो बेहद रोचक और खूब सारी बातें करने वाले मज़ेदार इंसान थे। वे मूल रूप से हरयाणा के थे, उन्होंने मुझे अपने बचपन और युवावस्था की वे बातें बताई जिन्हें सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने यह भी कहा- 'आप लड़की वाले हो, आपको तो हमने अपने बगल में कुर्सी पर बैठाया है, हमारे हरयाणा में लड़की वाले को जूते के पास बैठाते हैं।' उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ क्षणों के लिए सन्नाटे में आ गया फिर ठहाका मारकर हंस पड़ा, लड़की का बाप जो ठहरा !
          लौटते समय संज्ञा को संभावी सास ने कान के बुंदे दिए। हम सब प्रसन्न-मन लौट आए और समझ गए कि इस संबंध को अब और अधिक टाला नहीं जा सकता। मैंने लिखित प्रस्ताव भेज दिया। कुछ दिनों बाद मुझे समधी जी का फोन आया कि वे सपरिवार रतनपुर की महामाया के दर्शन के लिए बिलासपुर होकर जाएंगे इसलिए हम भी सपरिवार उनके साथ चलें। साथ बन गया, सबने महामाया के दर्शन किए और जब वापस लौटे तब मैं और समधी जी मेरी 'मारुति 800' में आए और शेष परिवार उनकी शासकीय गाड़ी में। रास्ते में समधी जी ने बातों-बातों में मुझसे कहा- 'आपसे एक बात कहनी है।'
'जी, कहिए।' मैंने कहा।
'आप लड़की के पिता हैं, लड़कियां अपने पिता के बहुत करीब रहती हैं और कहा भी मानती हैं।'
'जी।'
'आप संज्ञा को समझाएँ कि वह हमेशा हमारे संयुक्त परिवार से जुड़कर रहे, अलग घर बसाने की बात मन में न लाए। अगर हमारा बेटा कभी अलग होने के लिए कहे, तब भी।' वे बोले। कुछ देर के लिए मैं चुप रह गया, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दूँ ? उनकी बात को नकारा नहीं जा सकता था, उनकी अपेक्षा उचित थी लेकिन उनके पारिवारिक भविष्य के बारे में मैं 'कमिटमेंट' कैसे कर सकता था ?
'भाई साहब, 2 + 2 = कितना होता है ?' मैंने उनसे पूछा।
'चार।' वे आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे।
'भाई साहब, आप सही हैं लेकिन 2 + 2 = 22 हो सकता है और 0 भी।'
'मैं समझा नहीं।'
'जीवन गणित के नियमों से नहीं चलता। कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। कौन साथ देगा, कौन साथ छोड़ देगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। मेरे बेटे कुंतल का उदाहरण देखें, वह त्रिची में इंजीनियर बनने गया और पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबाजी बन गया, आश्रम चला गया। कल का क्या पता ?
'यह 'एक्सेप्नल केस' है।'
'जी, आप सही हैं लेकिन मैं यह मानता हूँ कि किसी से उम्मीद करने से कोई लाभ नहीं। आपने फिल्म 'चित्रलेखा' का साहिर का लिखा गीत सुना होगा- "उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे, जन्म मरण का संग है सपना ये सपना बिसरा दे, कोई न संग मरे, मन रे, तू काहे न धीर धरे।" मैंने उन्हें समझाया।
          इतने में बिलासपुर आ गया, वे सब कुछ देर के लिए हमारी लाज में पधारे, फिर अपने घर के लिए रवाना हो गए।

          कुछ दिनों बाद भावी समधी जी का फोन आया- 'आइये, विवाह के बारे में बातें करनी है।' अगले दिन मैं उनसे मिलने निकल पड़ा और सुबह साढ़े नौ बजे उनके शहर ट्रेन से पहुँच गया। स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने इधर-उधर अपनी नज़र घुमाई, उनकी गाड़ी मुझे लेने आने वाली थी, नहीं दिखी इसलिए मैं एक आटो में बैठकर उनके गेस्ट हाउस में पहुँच गया जहां वे अस्थाई रूप से निवास कर रहे थे। नमस्कार की औपचारिकता के पश्चात उन्होंने पूछा- 'आपको 'रिसीव' करने के लिए गाड़ी भेजा था, मिल गई ?'
'मैंने खोजा लेकिन दिखी नहीं।' मैंने कहा।
'अरे, मैंने ड्राइवर से गाड़ी लगाने के लिए कहा था !'
'कोई बात नहीं, मैं आटो से आ गया।' मैंने कहा।
          विवाह कार्यक्रम के सभी चरणों पर विस्तार से विचारों का आदानप्रदान हुआ फिर उन्होंने पूछा- 'आपका बजट क्या है ?'
'पाँच।' मैंने घबराते हुए उत्तर दिया।
'ठीक है, आप 'चार' हमें 'कैश' दे दीजिए, 'एक'आप अपने खर्च के लिए रख लीजिए।' उन्होंने कहा।
'ठीक है।' मैंने कहा।
          बात करते-करते दोपहर का एक बज गया। मैंने पूछा- 'तो मैं चलूँ, मुझे अनुमति दीजिए।'
'ओह, अब तो खाने का समय हो गया ! असल में, यहाँ मेरे लिए 'मेस' से खाना आता है, अतिरिक्त खाने के लिए किचन में खबर करनी पड़ती है लेकिन मैं भूल गया। सुबह हमारे बेटे ने मुझसे 'मेस' में खबर करने के लिए पूछा भी था लेकिन मुझे आपके लिए खाना बोलने का ध्यान ही न रहा।' उन्होंने कहा।
'तो क्या हो गया, आपका खाना आएगा न ? उसी में हम दोनों खा लेंगे।' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। हम दोनों ने मिलकर भोजन किया और उनसे विदा ली। लौटते वक्त ट्रेन में बैठे-बैठे मैं अपने बारे में सोच रहा था- 'लड़की का बाप....बेचारा।'
         घर वापस आकर मैंने माधुरी को पूरा वार्तालाप बताया तो वे मुझ पर भड़क गई- 'तुम्हारे पास भूँजी-भांग खरीदने के लिए पैसा नहीं है, इतना कहाँ से लाओगे ?'
'यार 'सी.ए॰' लड़कों का 'रेट' पंद्रह चल रहा है, मैं तो केवल पाँच बोल कर आया।' मैंने अपने बचाव में कहा।
'वो ठीक है, वादा कर आए हो तो कब भेजोगे ?'
'जब इंतजाम हो जाएगा।'
'कब होगा ?'
'क्या पता !'
'अजीब आदमी हो तुम, 'क्या पता' बोलने से हो जाएगा ?'
'हो जाएगा।'
'कैसे ?'
'देखो, जब मैं छोटा था, 'पेंड्रावाला' मिठाई दूकान में बैठता था तब दो फकीर सड़क के बीचों-बीच अपने हाथों में तासा लिए खैरात मांगते थे। उनमें से एक फकीर ज़ोर से आवाज़ लगाता- 'दे दे मौला।' दूसरा फकीर धीरे से बोलता- 'अल्लई (अल्लाह ही) देगा।' मैंने उन दोनों को कभी भी किसी की दूकान में जाकर या रुककर मांगते नहीं देखा। जिसको देना होता, वह खुद चलकर उनके पास जाता और उनके तासा में सिक्के डालता।'
'तुम्हारे कहने का क्या मतलब ?'
'अल्लई देगा।' मैंने हँसते हुए कहा, वे मेरे चेहरे को बड़ी देर तक घूरती रही।

==========
आगे पढ़ने के लिए यहाँ 'क्लिक' करें