ये जीवन है
उस समय की बात बता रहा हूँ जब हमारी बिटिया संगीता इंदौर के डेंटल कालेज़ में पढ़ रही थी, संज्ञा बिटिया बिलासपुर में माइक्रोबायोलाजी में बीएससी करने के बाद राज्य शासन की प्रतियोगी परीक्षा देने की तैयारी में व्यस्त हो गई और पुत्र कुंतल इलेक्ट्रिकल्स एंड इलेक्ट्रानिक्स में बी॰टेक॰ करने के लिए त्रिची में पढ़ रहे थे। उन दिनों के हालात अत्यंत व्याकुल करने वाले थे, आर्थिक स्थिति दयनीय थी। कुंतल का कालेज़ केम्पस बहुत बड़ा था, लिहाज़ा, उसके हास्टल, विभिन्न विभागों और क्लासरूम के बीच अधिक दूरी होने के कारण आने-जाने में उनका बहुत समय बर्बाद होता था लेकिन हमारे पास उसे साइकल दे सकने की हैसियत भी न थी। हमारे तीनों बच्चे अत्यंत असुविधाओं में पढ़े-बढ़े, उन्हें ज़रूर शिकायत रही होगी लेकिन उन्होने मुझसे कभी कुछ कहा नहीं।
किसी अवकाश पर संगीता घर आई, कुछ दिनों रुककर वे बिलासपुर से इंदौर जानेवाली नर्मदा एक्स्प्रेस ट्रेन से सुबह निकाल गई। उनके जाने के कुछ देर बाद घर के 'लेंडलाइन' फोन पर किसी ने 'काल' किया- 'संगीता है क्या ?'
'नहीं, वह तो सुबह की ट्रेन से इंदौर निकल गई।' संगीता की मम्मी माधुरी ने जवाब दिया।
'अरे !'
'आप कौन हैं।'
'मैं उसका दोस्त बोल रहा हूँ।'
'क्या नाम है आपका ?'
'उसने आपको मेरे बारे में नहीं बताया ?'
'क्या नहीं बताया, आप कौन हैं ?'
'आपको बताने में संकोच कर गई होगी।'
'क्या ?'
'यही कि हम दोनों प्यार करते हैं और संगीता 'प्रेग्नेंट' है।'
'अरे, उसने तो ऐसा कुछ नहीं बताया। वैसे मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुम उसके इतने गहरे मित्र हो और तुमको यह पता नहीं है कि वह आज सुबह की ट्रेन से इंदौर जाने वाली है ?'
'मेरी बात नहीं हो पाई।'
'चलो, कोई बात नहीं, आप कहाँ हैं ?'
'यहीं बिलासपुर में।'
'आज हमारे घर आ जाइए, साथ में 'लंच' लेंगे, उस समय संगीता के पापा भी रहेंगे और हम सब बैठकर आपसे बात करेंगे।'
'जी, ठीक है।'
'अपना नाम तो बता दीजिए।' माधुरी ने पूछा।
'मैं आपसे मिलकर बताऊंगा।' उसने कहा।
हम दोनों अपने 'भावी दामाद' की 'लंच' पर प्रतीक्षा करते रहे किन्तु वह नहीं आया ! हमने इस घटना की चर्चा संगीता से करना उचित नहीं समझा, वे अनभिज्ञ रही।
जब संगीता बी॰डी॰एस॰ के अंतिम वर्ष में थी, हमें उसके विवाह की फिक्र होने लगी क्योंकि वे 25 वर्ष पार कर चुकी थी। बाद में किसी अवकाश पर जब वे बिलासपुर आई, उनसे हमने विवाह की चर्चा की तो वह तैयार हो गई लेकिन शर्तों के साथ, 'लड़का ऐसा हो जो सिगरेट और शराब न पीता हो !' अब, आज के युग में ऐसा पवित्र लड़का कहाँ खोजा जाए, बहुत बड़ी झंझट थी। मैंने कहा- 'तुमको इतना पढ़ाया-लिखाया, तुम अपने लायक पति नहीं खोज पाई ?'
'मेरे कालेज़ के सब लड़के इन बुरी आदतों के शिकार हैं।'
'तो हम कहाँ खोजें ?'
'वह मैं नहीं जानती, आपका काम है।'
'कमाल है, तुमको पढ़ाएँ भी हम और तुम्हारे लिए पति भी हम खोजें !' मैंने कहा। संगीता मुस्कुरा दी।
घर-गृहस्थी चलाना हर समय एक बड़ी चुनौती रही है। मनुष्य खुद को तो साध नहीं पाता जबकि उसे परिवार के अन्य सदस्यों को साधने की जुगत बैठानी पड़ती है। परिवार के मुखिया को भगवान विष्णु के तरह अनेक अवतार लेने पड़ते हैं, महिषासुर-मर्दिनी दुर्गा की तरह कई हाथों से एक साथ काम लेना होता है, राक्षस-श्रेष्ठ रावण की तरह दसाननमुखी रूप धारण कर दस दिशाओं में बुद्धि लगानी पड़ती है, तब कहीं जाकर थोड़ी-बहुत बात बनती है। बात क्या बनती है, भ्रम बना रहता है कि सब ठीक चल रहा है ! किसी को पुचकार दो तो उसका भेजा घूम जाता है, किसी को डांट दो तो उसका भेजा गरम हो जाता है। किसी की तारीफ कर दो तो सिर पर सवार होने लगता है, किसी की आलोचना कर दो तो वह सिर पटकने लगता है.
सबकी भिन्न सोच, नज़रिया और अपेक्षाएँ एक दूसरे को समझने की राह में गंभीर बाधाएँ हैं। परिवार में कोई अपने मन की बात खुलकर कह देता है, कोई नहीं कह पाता; कोई अपनी बात का प्रस्तुतीकरण प्रभावी ढंग से कर लेता है तो कोई नहीं कर पाता; कोई मुखर है तो कोई संकोची; ये बातें परिवार के आंतरिक सम्प्रेषण की वे समस्याएँ हैं जो प्रत्येक समूह में पाई जाती हैं। यह स्थिति परिवार के संचालन की सबसे बड़ी मुसीबत है।
परिवार की व्यवस्था बनाने में मैंने अपने बब्बाजी (दादाजी) को जितना दुखी देखा, उतना ही दद्दाजी (पिताजी) को भी परेशान देखा। इन दोनों महानुभावों को भ्रम था कि वे अपने परिवार का भरपूर डांट-डपट के माध्यम से सुसंचालन कर रहे हैं लेकिन मैं आपको अंदर की बात बता रहा हूँ- उनकी नज़र के सामने ठीक-ठाक रहता था और पीठ-पीछे सब गड़बड़। मेरे दोनों पूर्वज स्थिति को अपने नियंत्रण में रखने का अनवरत प्रयास करते रहते थे लेकिन वे अपने-अपने पुत्रों को साध पाने में सर्वथा असफल रहे, उनकी बेटियाँ बेचारी मजबूर थी, रोती-कलपती अपनी ससुराल चली गई और ससुराल उन्हें स्वर्ग जैसा लगा ! ससुराल भी आज जैसी नहीं जहां आधुनिक सासें अपनी बहू को 'बहूरानी, 'बहूरानी' कहती हैं, उस जमाने की सास- 'ललिता पवार' जैसी सास !
हम तीन भाई हैं, तीनों एक-दूसरे से लगभग दस वर्ष बड़े-छोटे। एक पिता की ऊर्जा से उत्पन्न, एक माँ की कोख से जन्मे, एक वातावरण में पले-बढ़े- तीनों कुछ-एक ही समानताएँ हैं लेकिन अनेकों असमानताएँ है, खास तौर से तीनों के 'माइंड सेट' अलग-अलग हैं। प्रकृति ने कितनी दक्षता से समस्त मनुष्य प्रजाति को एक जैसे अंग-प्रत्यंग दिए लेकिन मुखाकृति, रंग और डील-डौल के अंतर को इस तरह विभाजित किया कि सब एक जैसे होकर भी एक जैसे नहीं हैं, सबकी अपनी-अपनी अलग पहचान है। ज़रा सोचिए, अगर ऐसा न होता तो कैसा होता ? कैसे किसी को व्यक्तिगत पहचान मिलती ? समाज में कितनी अराजकता हो जाती ?
बड़ों का नियंत्रण तब तक ही रहता है- जब तक उनकी बात मानी जाती रहे, उनकी बात तब तक मानी जाती रहेगी- जब तक बात मानने वाले को उनसे काम निकालना होगा। हाँ, काम निकल जाने के बाद भी यदि कोई बात मान रहा है तो समझिए उस माता-पिता के अहो-भाग्य हैं, उनके पिछले अनेक जन्मों का पुण्य प्रताप काम आ रहा है वरना बुद्धिमान संतानें अपने पिता से प्रश्न किया करती हैं- 'मैंने आपके यहाँ आने की 'एप्लिकेशन' लगाई थी क्या ?'
परिवार के प्रबन्धन में आर्थिक पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि घर धन-धान्य से परिपूर्ण है तो समस्याओं के निदान आसान होते हैं क्योंकि महात्मा गांधी के चित्र छपे कागज के डग बहुत लंबे होते हैं, वे एक डग में सारा संसार नाप लेते हैं। पंजाब की एक कहावत है- 'जिदे घर दांणें, वे कमले बी स्याणें'- (जिनकी जेब भरी रहती है वे अगर पगले भी हैं तो सयाने माने जाते हैं), वहीं पर यदि अर्थसंकट चल रहा हो तो अच्छे-अच्छे विद्वान भी त्राहिमाम करने लगते हैं।
हमारी देनदारी ही हमारी संपत्ति थी, वही जीवन था और वही जीने की जुगत थी। दरअसल मैं खुद से युद्ध लड़ रहा था, जो मैं हासिल नहीं कर पाया उस लकीर को मैं अपने बच्चों के हाथ से मिटाना चाहता था। हमने बच्चों में आगे बढ़ने की संभावना देखी इसलिए उन्हें हर स्थिति में प्रोत्साहित किया, आप तो जानते हैं कि 'केनवास' पर बनी 'पेंटिग' को रचने में रंगों को अपना अस्तित्व मिटाना पड़ता है।
सन 2001 में हमारी दोनों बेटियाँ विवाह योग्य हो गई थी लेकिन हम लोग धनाभाव के कारण चुपचाप कुंडली मारे बैठे थे। गाँव का माहौल होता तो चर्चा गरम होने लगती है- 'बताओ, बांस जैसी बड़ी लड़कियां, घर में बिठाए हुए है, शादी-ब्याह की फिक्र नहीं...' लेकिन शहरों में ऐसी चर्चा नहीं होती। जब तक विवाह तय न हो, लड़की को पढ़ाते रहो और कोई कुछ कहे तो अपना जवाब तैयार- 'लड़की अभी पढ़ रही है...'।परिवार के प्रबन्धन में आर्थिक पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि घर धन-धान्य से परिपूर्ण है तो समस्याओं के निदान आसान होते हैं क्योंकि महात्मा गांधी के चित्र छपे कागज के डग बहुत लंबे होते हैं, वे एक डग में सारा संसार नाप लेते हैं। पंजाब की एक कहावत है- 'जिदे घर दांणें, वे कमले बी स्याणें'- (जिनकी जेब भरी रहती है वे अगर पगले भी हैं तो सयाने माने जाते हैं), वहीं पर यदि अर्थसंकट चल रहा हो तो अच्छे-अच्छे विद्वान भी त्राहिमाम करने लगते हैं।
हमारी देनदारी ही हमारी संपत्ति थी, वही जीवन था और वही जीने की जुगत थी। दरअसल मैं खुद से युद्ध लड़ रहा था, जो मैं हासिल नहीं कर पाया उस लकीर को मैं अपने बच्चों के हाथ से मिटाना चाहता था। हमने बच्चों में आगे बढ़ने की संभावना देखी इसलिए उन्हें हर स्थिति में प्रोत्साहित किया, आप तो जानते हैं कि 'केनवास' पर बनी 'पेंटिग' को रचने में रंगों को अपना अस्तित्व मिटाना पड़ता है।
लड़कियों की शादी होने में लड़की की खूबसूरती और उसके पिता का धन-संग्रह बहुत काम आता है। लड़की खूबसूरत है (यहाँ खूबसूरती का आशय लड़की के 'गोरेपन' से है) तो लड़के वाले ऐसी लड़कियों पर नज़र रखते हैं और आग्रह करके अपने लड़के के लिए मांग लेते हैं, दहेज मिले, न मिले। मुश्किल यह है कि सभी लड़कियां गोरी नहीं होती, कुछ गेहुए रंग की होती है तो कुछ साँवली। भारत उष्ण कटिबन्ध में स्थित देश है जिसमें उत्तर भारत के लोग अपेक्षाकृत गोरे है लेकिन मध्य और दक्षिण भारत के रहवासी क्रमशः गेहुएँ और कृष्णवर्ण के हैं। सभी सन्तानें अपने पूर्वजों के रंग को 'इनहेरिट' करती हैं लेकिन सबको गोरी लड़की चाहिए इसलिए मांग और पूर्ति में बहुत बड़ा अंतर रहता है।
गोरेपन के अभाव में लड़की के पिता का धन काम आता है। धन के दबाव में लड़केवाले समझौता कर लेते हैं और मध्यम खूबसूरत लड़कियां ब्याह जाती हैं। अब शेष बची बच्चियाँ 'एक्सपाइरी डेट' वाले लड़कों से ब्याही जाती हैं। 'एक्सपाइरी डेट वाले लड़कों' का मतलब है- वे लड़के जो देखने में अच्छे हैं, अच्छी नौकरी में हैं, पैसे वाले घर के लड़के हैं लेकिन अनेक अच्छी-भली लड़कियों को 'रिजेक्ट' करने के बाद अंततः कुँवारे रह गए और उनके लिए रिश्ते आने बंद हो गए हों। इसी प्रकार मध्यम या कमजोर आर्थिक स्थिति वाले माता-पिता भी अपनी सुंदर लड़कियां तगड़ी कमाई वाले कृष्णवर्णी लड़कों से इसलिए ब्याह देते हैं कि 'लड़का सांवला है तो क्या होता है, लड़की तो धन-धान्य से भरपूर परिवार में रहेगी, झूला झूलेगी।' मेरे विवाह में संभवतः इसी सोच ने काम किया होगा अन्यथा माधुरी जैसी खूबसूरत कन्या मेरे भाग्य में कहाँ ? ये 'फार्मूले' अंतिम नहीं हैं, अपवाद भी होते हैं, पर आमतौर पर ऐसा ही चल रहा है।
मैं और माधुरी अक्सर चर्चा करते थे कि हमारी दोनों लड़कियों का विवाह कैसे होगा ? उन दिनों किसी साधारण घर में लड़की ब्याहने का बजट पाँच से दस लाख चल रहा था और असाधारण घर में दस लाख से अधिक। हमारे पास अंक तो लाखों के थे लेकिन थे देनदारी के ! माधुरी का अनुमान था कि दोनों पढ़-लिख रही है, नौकरी मिल जाएगी तो कोई-न-कोई जुगाड़ बन जाएगा, फिर भी, वैवाहिक खर्च तो लगेगा ही। वे मुझसे पूछती- 'तुम्हारी जो दशा है, तुम कैसा करोगे ?' मैं चुप रह जाता और बात बदल देता। मेरी दुर्दशा का माधुरी को पता था लेकिन उसकी गहराई का पता नहीं था। उसे अगर देनदारी का सही 'फीगर' मालूम पड़ जाता तो बेचारी की रातों की नींद उड़ जाती, मैं तो बेशर्म हो चुका था, रात को बेफिक्र सोता था।
हम अग्रवालों में जब लड़की की शादी की बात चलाई जाती है तो लड़के वाले अपने स्तर पर जासूसी करके पता लगा लेते हैं कि लड़की वाला कितना 'पोठ' है ! तसल्ली हो जाने पर बात इस तरह शुरू होती है- 'भाई जी, हमें तो कुछ नहीं चाहिए।' जब संबंध तय हो जाएगा तब कहेंगे- 'इतना तो करना पड़ेगा, हमारे रिश्तेदारों के सामने हमारी इज्ज़त का फालूदा न बने।' जब शादी हो जाएगी तब हर तीज-त्यौहार और कई अन्य बहानों से रक्त चूसने का निर्मम अभियान चलता रहेगा क्योंकि लड़की उनके हाथ में है। यदि लड़की के माता-पिता अपनी बच्ची को ससुराल में 'बने रहने' देना चाहते हैं तो सब सुनना पड़ेगा, मानना पड़ेगा। मित्र, लड़की का माँ-बाप होना कितना अपमानजनक होता है, यह बिटिया के विवाह या उसके बाद में समझ आता है। किसी को भाग्य से भले लोग भी मिल जाते हैं अन्यथा सामान्यतया लड़की वालों को अत्यंत पीड़ादायक स्थिति से होकर गुजरना पड़ता है।
अपनी बिरादरी में ही संबंध करने का हमारा आग्रह कभी नहीं रहा, हम खुले दिमाग से रिश्ते बनाना चाहते थे, अच्छा लड़का या अच्छी लड़की होना हमारी प्राथमिकता थी। उनमें 'अच्छा' क्या- यह बच्चों को तय करना था। हमने यह भी तय किया कि अपने बेटे कुंतल के विवाह के बाद बहू केवल एक बार ही हमारे घर में आएगी, अगली बार उनकी अलग व्यवस्था बना दी जाएगी ताकि साथ रहकर विकसित होने वाली कड़ुवाहट से बचा जा सके और शेष जीवन में प्रेमपूर्ण संबंध बने रहें।सन 2001 की एक शाम बीत रही थी, मैं अपने लाज के काउंटर में बैठा था, फोन की घंटी बजी- 'मैं डा॰ केदारनाथ अग्रवाल, इंदौर से बोल रहा हूँ।'
'जी, कहिए।' मैंने कहा।
'क्या मेरी बात द्वारिका प्रसाद जी से हो सकती है ?'
'जी, मैं बोल रहा हूँ।'
'आपसे एक पारिवारिक बात करनी है।'
'जी।'
'आपकी बेटी संगीता से मैं विवाह करना चाहता हूँ।'
'ओके, क्या आप दोनों एक दूसरे से परिचित हैं ?'
'जी नहीं।'
'फिर ?'
'मैं संगीता का 'सीनियर' हूँ, मैंने उसे देखा है लेकिन कभी मिला नहीं।'
'क्या संगीता आपको जानती है ?'
'शायद नहीं।'
'तो फिर ?'
'आप मेरे बारे में पता कर लीजिए, मेरा परिवार जबलपुर के पास गोटेगांव में रहता है, मैं आपको उनका विवरण और फोन नंबर बता रहा हूँ, साथ में अपना भी, आप नोट कर लीजिए और यदि उचित समझें तो आगे बढ़ें।' डा॰ केदारनाथ ने विवरण बताए और परस्पर नमस्कार के पश्चात फोन बंद हो गया।
मैंने संगीता को फोन करके पूरी बात बताई तो वे चकित रह गई। वे इस नाम से अनभिज्ञ थी फिर भी मैंने उन्हें डा॰ केदारनाथ की क्लीनिक का पता दिया और पतासाजी की सलाह दी। संगीता ने अपने दो सहपाठी मित्रों को पता करने भेजा, वे दोनों उनसे मिलकर आए तब इस बात की पुष्टि हुई कि 'फोन-काल' 'वेलिड' था। उसके बाद मैंने संगीता से कहा- 'तुम खुद जाकर देखो और अपनी राय दो।'
'आप हद करते हो पापा, मैं अपने लिए पति देखने जाऊंगी ?'
'तुमको जंचे तब तो बात आगे बढ़ाएँ।'
'ठीक है, आप बड़ी मुसीबत में फंसा रहे हो।' वे बोली।
'एक न एक दिन फंसना ही है बेटा ! मैंने समझाया।
संगीता अपनी 'कज़िन' ममता दीदी, जिनके संरक्षण में इंदौर में रहती थी, के साथ उनसे मिलने गई। वहाँ से लौट कर मुझे 'मेल' किया- 'I don't see any reason to reject him but the matter has to be finalised by you & mummy.' हम दोनों संगीता के इस विवाह प्रस्ताव से प्रसन्न थे लेकिन झिझक भी रहे थे क्योंकि विवाह की बात शुरू करने में बात फंस जाने का खतरा था, कड़की चल रही थी, 'अगर शादी तय हो गई तो कैसे होगा' का प्रश्न दिमाग को खदबदा रहा था लेकिन माधुरी ने महत्व की बात कही- 'वे खुद होकर विवाह का प्रस्ताव कर रहे हैं तो हमें उनकी बात को हल्के से नहीं लेना चाहिए बल्कि उनका मान करना चाहिए। तुम इंदौर जाकर उनसे मिलो, बातचीत करो, उनके बारे में पता करो, फिर आगे का देखेंगे।'
कुछ दिनों बाद मैं इंदौर पहुंचा और डा॰ केदारनाथ से मिलने के पहले उनके मित्र डा॰अनूप व्यास से मिला जो उनके सहपाठी थे और संगीता के 'सर' भी। मैंने डा॰अनूप व्यास से कहा- 'आपकी दोहरी ज़िम्मेदारी है, केदार आपके मित्र हैं, संगीता आपकी शिष्या !'
'मैंने ही संगीता के लिए केदार को 'सजेस्ट' किया था।'
'आप मुझे केदार जी के बारे में बताइए।'
'बहुत अच्छा है, हम दोनों चार साल तक हॉस्टल में एक साथ रहकर पढे हैं, मैं उसके बारे में सब कुछ जानता हूँ।'
'क्या जानते हैं ?'
'यही कि वह बहुत 'केल्कुलेटिव्ह' इंसान है लेकिन 'मेनिपुलेटिव्ह' बिलकुल नहीं।'
'और ?'
'वह गंदी आदतों से एकदम दूर है, सिगरेट- शराब बिलकुल नहीं लेता।'
'सच कह रहे हैं आप ?'
'यदि लेता होता तो मुझसे छुपता क्या ?'
'क्यों नहीं लेते, मेडिकल कालेज में तो यह सब आम है ?' मैंने पूछा।
'आप सही कह रहे हैं लेकिन केदारनाथ को ये सख्त नापसंद है, उसे कोई जबर्दस्ती करके भी नहीं पिला सकता।' डा॰ अनूप व्यास ने बताया।
डा॰ व्यास से अनुकूल सूचना मिलने के पश्चात मैं डा॰ केदारनाथ से मिलने उनकी क्लीनिक में पहुँच गया. मैंने उनसे बात की और अनुरोध किया कि विवाह के लिए वे दो वर्ष और रुक जाएं ताकि संगीता एम.डी.एस.कर ले और इस बीच विवाह में होने वाले खर्च की व्यवस्था भी बन सकेगी। उन्होंने कहा- 'रुकना संभव न हो सकेगा, हाँ, विवाह में खर्च की चिन्ता न करें, विवाह के सभी कार्यक्रम सादगी से होंगे, आप जो करेंगे, जितना करेंगे, ठीक है। '
उनसे मिलने के बाद मैं उनके गृहनगर गोटेगाँव गया, उनके परिवारजनों से मिलकर विवाह का प्रस्ताव किया, संगीता का फोटोग्राफ और कुंडली उन्हें सौंपी। उन्होंने 'विचार करके बाद में खबर करने' की बात कही. एक सप्ताह बाद संगीता के मामा मदनगोपालजी (जबलपुर) के पास फोटोग्राफ और कुंडली वापस आ गई- 'कुण्डली का मिलान सही नहीं हो रहा है।' प्रकरण समाप्त हो गया, हम चुप बैठ गए लेकिन 'होनी' चुप नहीं बैठी !
जीवन का क्या है, चलते रहता है; घटनाओं का क्या है, होते रहती हैं। घटनाओं के साथ हम कर भी क्या सकते हैं, वे होने के लिए स्वतंत्र हैं ! हमारी चिंता केवल यह रहती है कि कैसे इनका सामना करें ?
एक दिन संगीता के मामा मदन गोपाल जी का फोन आया- 'क्या हुआ जीजाजी, संगीता की शादी का ?'
'कुछ नहीं।' मैंने बताया।
'कुछ नहीं ? आपने गोटेगांव वालों से फिर बाद में बात नहीं की क्या ?'
'क्यों, उन्होने आपको कुंडली और फोटो वापस करके मना नहीं किया था क्या ?'
'तो क्या हुआ, उनका काम है मना करना, अपन लड़की वाले हैं, हमारा काम है फिर पूछना।'
'भाई साहब, बेइज्जती मत करवाइए। ये मुझसे न होगा ।'
'आप भी दद्दाजी के ऊपर गए हो ! एक बार फिर फोन लगाकर पूछिए, अब शायद उनका विचार बन गया हो।'
'जब कुंडली नहीं मिली तो अब क्या ग्रहों ने स्थिति बदल ली होगी ?'
'जीजाजी, कुंडली मिलान के लिए नहीं, मना करने के लिए होती है।'
'ऐसा क्या ?'
'जी हाँ।'
'फिर भी, मैं उनसे बात नहीं करूंगा, हाँ, डा॰ केदारनाथ से बात कर सकता हूँ।'
'ठीक है उन्हीं से करिए।' मदन गोपालजी ने कहा और ठंडी सांस भरी। मैंने डा॰ केदारनाथ को फोन लगाया- 'क्या विचार बना डाक्टर साहब ?'
'मुझे कल तक का समय दीजिए।' डा॰ केदारनाथ ने कहा।
अगले दिन डा॰ केदारनाथ का फोन आया- 'घर में मेरी बात हो गई है, सब राजी हो गए हैं। आप वहाँ जाकर पिताजी से मिल लीजिए और विवाह की तिथि तय करने के लिए आपस में चर्चा कर लीजिए।'
'फौरन से पेस्तर' मैं मदन गोपालजी के साथ गोटेगांव पहुंचा, विवाह की व्यवस्था पर चर्चा की और चांदी की थाली-कटोरी में परोसा गया भोजन ग्रहण करके खुशी-खुशी बिलासपुर वापस आ गया। सब भाइयों, बहनों व रिश्तेदारों को संगीता के विवाह तय होने की सूचना दी। विवाह की तिथि तय हुई- 15 फरवरी 2002 लेकिन उसी बीच संगीता की वार्षिक परीक्षा की तिथियाँ भी टकरा गई। हमने 8 मई को विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन केदारनाथ जी की कुंडली के अनुसार 15 फरवरी ही शुभ तिथि थी अन्यथा एक वर्ष बाद ही शुभ-तिथि का योग था इसलिए मजबूरन संगीता की परीक्षा के बीच ही विवाह होना निश्चित हुआ। हमें संगीता की ससुराल से स्पष्ट आश्वासन मिला कि वैवाहिक कार्यक्रम के तीन दिनों तक ही संगीता की पढ़ाई में व्यवधान होगा, विदा के अगले दिन उसे परीक्षा की तैयारी करने के लिए 'मुक्त' कर दिया जाएगा।
इस बीच, दिसंबर 2001 में मेरे दाहिने गाल में कुछ छाले हो गए जिनकी इंदौर में संगीता के प्रोफेसर डा॰ अनूप व्यास और डा॰ विलास नेवास्कर ने जांच की। कुछ संदेह होने पर कैंसर विशेषज्ञ डा॰ दीपक अग्रवाल से 'ओपीनियन' लेने की राय बनी। डा॰ विलास नेवास्कर स्वयं डा॰अग्रवाल के पास मुझे लेकर गए और मेरी जांच करवाई। डा॰ अग्रवाल को भी मेरे गाल में कैंसर विकसित होने का संदेह हुआ इसलिए उन्होंने अगले दिन ही एक 'माइनर सर्जरी' करने का निर्णय लिया ताकि कैंसर से संभावित हिस्से को अलग करके उसे आगे बढ्ने से तुरंत रोका जा सके। गाल के अंदर एक बड़ा 'एक्सीजन' किया गया और उसके कुछ टुकड़े इंदौर की दो अलग-अलग 'लैब' में जांच के लिए भेजे गए। एक सप्ताह बाद एक लैब ने कैंसर होने की 'रिपोर्ट' दी तो दूसरी ने 'न' होने की !
अब हम लोग 'कनफ्यूज' हो गए, दिल कहता था कि कैंसर न होने वाली रिपोर्ट के मान लें लेकिन बुद्धि कहती थी कि कैंसर के होने वाली रिपोर्ट पर गौर किया जाए। अंततः यह तय हुआ कि मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में 'सेम्पल' की जांच करवाई जाए। हमारे होने वाले दामाद डा॰ केदारनाथ सेम्पल ले कर मुंबई रवाना हो गए, सात दिन तक वहीं रहे। 1 जनवरी 2002 की रात रिपोर्ट लेकर इंदौर वापस आए और मुझे फोन किया- 'टाटा हास्पिटल में कैंसर होने की पुष्टि हो गई है। अब आपकी 'मेजर सर्जरी' होगी जो इंदौर के सुयश हास्पिटल में 12 जनवरी के लिए 'फिक्स' हो गई है, सर्जरी डा॰ दीपक अग्रवाल करेंगे।' फोन सुनकर मैं अवाक रहा गया। माधुरी ने पूछा- 'क्या हुआ ?'
'कैंसर 'कंफर्म' हो गया।' मैंने बताया। कुछ देर के लिए मैं अंदर तक हिल गया। मेरा जी धक से कर गया। अपने अनेक परिचितों को मैंने मुंह के कैंसर हो जाने पर सर्जरी, रेडियो-थेरेपी और कीमो-थेरेपी की अत्यंत कष्टप्रद प्रक्रिया से होते हुए एक साल के अंदर बुरी दशा में मरते हुए देखा था, वे सभी चेहरे और उनकी तकलीफ़ें मेरे दिमाग में एकबारगी तैर गई। मुझे समझ में आ गया कि अब मेरी गिनती की सांसें बच गई हैं। मेरे तीनों अव्यवस्थित बच्चे, पत्नी और पहाड़ जैसी देनदारी के विचार ने मुझे उस समय इस तरह जकड़ा जैसे अजगर किसी शिकार को अपने फंदे में लपेटता है। मैंने खुद से पूछा- 'अब कैसे होगा ?'
'मुझे एक गिलास पानी दो।' मैंने माधुरी से कहा। माधुरी दौड़ती गई, पानी लाई, मैंने पिया और अपने बिस्तर में मच्छरदानी को भलीभाँति दबाकर लेट गया। लेटते ही मेरे दिल ने मुझसे कहा- 'छोड़ यार, आज की रात सो लिया जाए, कल की कल देखेंगे।'
अगली सुबह मुझे माधुरी ने बताया- 'रात को बिस्तर पर लेटने के दो मिनट बाद तुम्हारे खर्राटे सुनाई पड़ने लगे थे.'
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संघर्ष भी शिक्षा है
ReplyDeleteतो वो विशेष तरह का दूल्हा आपको मिल ही गया । पता नहीं उनको ये सब पता है या नहीं । अब ये सब पता चलता होगा तो उनकी प्रतिक्रिया कैसी होती होगी ?
ReplyDeleteहा हा हा॰
DeleteSir aap ki baatain padh kar mann ko bahut sukoon mill raha hain. Thada ek chotti bacchi ke baap hone ne naate main aap ka abhaari hu ki aap apni life experience share kar rahe hain. dhanyavaad.
ReplyDeleteGirish Bhat ji, यह कथा आपके लिए उपयोगी है > इससे मेरा परिश्रम सार्थक हो जाता है॥
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