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कुन्तल के आश्रम चले जाने के बाद जो सूनापन हमारे परिवार में पसरा उसे किन शब्दों में बाँधा जाए ! कुन्तल की माँ टूट सी गई. हर समय चुप रहने लगी, वे कई रात आंसुओं से भीगती हुई जागती रहती. उनकी बेचैनी को मैं भला कैसे समझ पाता ? मैंने कुंतल को अपनी कोख में रखा नहीं था, मैंने उन्हें अपना दूध पिलाया नहीं था, मैंने उनकी तरह 'होनेवाली बहू' की पायल की छम-छम सुनने की आशा नहीं की थी, मैंने पोते-पोतियों की उनके जैसी कल्पना और आनंदानुभूति नहीं की थी. वे मुझसे नाराज़ भी रहने लगी- उन्हें बहुत लंबे समय तक मुझसे शिकायत बनी रही कि कुन्तल को विदा करने का निर्णय अचानक मैंने खुद क्यों ले लिया, उनको विश्वास में क्यों नहीं लिया ? उन्हें लगता था कि कुन्तल यदि कुछ दिन और रोक लिए जाते तो शायद रुक जाते. उन्नीस दिनों के प्रवास में कुन्तल से हम सबका जो भी वार्तालाप हुआ और मुझे उनकी जो भाव-भंगिमा दिखी- मुझे उनको शीघ्र मुक्त कर देना उचित लगा क्योकि वे वैराग्य के भावातिरेक से परिपूर्ण थे, उन्हें और अधिक रोकना उनके साथ अन्याय हो जाता और जैसे-जैसे समय बीतता, हम दोनों और अधिक तनावग्रस्त होते जाते. यद्यपि मैं उस निर्णय के पक्ष में नहीं था, बहुत क्षुब्ध था, लेकिन यह मैं जानता था कि इस दुर्धर्ष निर्णय को मुझे ही लेना होगा, उनकी माँ उतना कठिन निर्णय नहीं ले पाएगी इसीलिए अचानक ही मैंने उनका विदाई कार्यक्रम बनाया और सहज विधि से विदा कर दिया.
कुन्तल के आश्रम चले जाने के बाद जो सूनापन हमारे परिवार में पसरा उसे किन शब्दों में बाँधा जाए ! कुन्तल की माँ टूट सी गई. हर समय चुप रहने लगी, वे कई रात आंसुओं से भीगती हुई जागती रहती. उनकी बेचैनी को मैं भला कैसे समझ पाता ? मैंने कुंतल को अपनी कोख में रखा नहीं था, मैंने उन्हें अपना दूध पिलाया नहीं था, मैंने उनकी तरह 'होनेवाली बहू' की पायल की छम-छम सुनने की आशा नहीं की थी, मैंने पोते-पोतियों की उनके जैसी कल्पना और आनंदानुभूति नहीं की थी. वे मुझसे नाराज़ भी रहने लगी- उन्हें बहुत लंबे समय तक मुझसे शिकायत बनी रही कि कुन्तल को विदा करने का निर्णय अचानक मैंने खुद क्यों ले लिया, उनको विश्वास में क्यों नहीं लिया ? उन्हें लगता था कि कुन्तल यदि कुछ दिन और रोक लिए जाते तो शायद रुक जाते. उन्नीस दिनों के प्रवास में कुन्तल से हम सबका जो भी वार्तालाप हुआ और मुझे उनकी जो भाव-भंगिमा दिखी- मुझे उनको शीघ्र मुक्त कर देना उचित लगा क्योकि वे वैराग्य के भावातिरेक से परिपूर्ण थे, उन्हें और अधिक रोकना उनके साथ अन्याय हो जाता और जैसे-जैसे समय बीतता, हम दोनों और अधिक तनावग्रस्त होते जाते. यद्यपि मैं उस निर्णय के पक्ष में नहीं था, बहुत क्षुब्ध था, लेकिन यह मैं जानता था कि इस दुर्धर्ष निर्णय को मुझे ही लेना होगा, उनकी माँ उतना कठिन निर्णय नहीं ले पाएगी इसीलिए अचानक ही मैंने उनका विदाई कार्यक्रम बनाया और सहज विधि से विदा कर दिया.
कम्मू का इस तरह परिवार से विमुख हो जाना हम सबको अखर गया। उन्होंने अपने जीवन की नई राह इतनी विचित्र चुनी थी कि हमारा भरोसा नहीं बन पा रहा था- वे आश्रम की कठिन डगर पर चल पाएंगे या नहीं ! कहीं बीच राह से वापस लौट आए तो न यहाँ का रहेंगे, न वहाँ के ! प्रतिदिन मेरा मन ऐसे उपायों की तलाश में लगा रहता जिसके माध्यम से उन्हें घर-परिवार में वापस बुलाया जा सके। एक रेलयात्रा के दौरान अकेले बैठे-बैठे मेरे मन में सारा घटनाक्रम घुमड़ता रहा और मुझे लगा- 'सद्गुरु ने मेरे पुत्र का 'अपहरण' कर लिया है।' उस समय मैं इस कदर 'वाइल्ड' हो गया कि मेरे सिर पर खून सवार हो गया और सद्गुरु को राह से हटा देने तक की बात मन में घर कर गई। मेरे जैसा संकोची मनुष्य जो किसी का जरा सा खून देखकर विचलित हो जाता है, वह किसी का खून करवाने की बात सोच रहा था, आप अनुमान लगाइए, मैं कितना दग्ध था ? उन क्षणों में तात्कालीन भावावेश के वशीभूत होकर मुझसे वह जघन्य अपराध हो गया। अपराध इसलिए हो गया क्योंकि भगवान महावीर ने कहा है- 'हिंसा का केवल भाव ही हृदय में आ गया तो समझ लो हिंसा हो गई।' वैसे, मेरी उत्तेजना क्षणिक थी, शांत हो गई। मैंने उस बात को जब माधुरी को बताया तो वे भी हिल गई, उन्होंने मुझे अपने ढंग से समझाया।
सच पूछिए तो मेरा हाल भी बेहाल था। मुश्किल यह है कि हम पुरुष चाहकर भी रो नहीं पाते। सूने में भले ही मेरी आँखें भर आती थी लेकिन सबके सामने संयत रहना पड़ता है। मैं रोता तो कुंतल की माँ को कैसे समझाता ? दिल को पत्थर बना लिया, मन उदास हो गया लेकिन मुझे यह भलीभांति समझ में आ गया कि परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने और अपनी शाही बीमारी से लड़ने का मेरा कार्यकाल बढ़ गया है। मैंने स्वयं को और अधिक मजबूत बनाने का निर्णय लिया और उसकी आंतरिक तैयारी में भिड़ गया। मेरा दिल तो मजबूत था लेकिन 57 वर्ष के कैन्सरग्रस्त मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा कम होती जा रही थी। मैंने प्रत्येक सुबह 'जिम' जाना शुरू कर दिया। दो वर्ष तक नियमित रूप से जिम जाता रहा परिणामस्वरूप मेरा वजन 99 किलो से घटकर 90 किलो हो गया, मेरा मोटापा छंट गया और युवाओं के साथ व्यायाम करने का मुझे मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिला, हाँ, कुछ युवा जिम में मुझे अभ्यास करता देखकर हँसते तो कुछ विस्मित होते थे।
इस बीच एक और घटना हो गई। मैंने आपको बताया था कि अम्माजी की दशा उनकी बढ़ती उम्र और अव्यवस्थित जीवन के कारण दयनीय होती जा रही थी। वृद्धावस्था की समस्याएँ भी कठिन होती हैं, शिकायतें बनी रहती हैं जैसे- 'कोई पास बैठकर बातें करता नहीं', 'कोई कुछ पूछता नहीं'। इस उम्र में शरीर निष्क्रिय हो जाता है, अनेक रोग घेर लेते हैं, अंट-शंट खाने का मन करता है लेकिन पचता नहीं, जब भूख लगती रहती है तो कोई ध्यान नहीं देता, रात को ठीक से नींद नहीं आती, सुबह ठीक से पेट साफ नहीं होता, गर्मी के दिनों में गर्मी बहुत लगती है, ठंड के दिनों में जाड़ा अधिक लगता है आदि। दरअसल, उनके तीनों पुत्र उनके साथ 'खो' का खेल रहे थे। ऐसा नहीं था कि उनकी उपेक्षा हो रही थी, वे जिसके घर में रहती थी, उनके खान-पान और इलाज़ का ध्यान रखा जाता था लेकिन पुत्रत्व का अभाव था।
उन दिनों अम्माजी रायपुर में बड़े भैया के घर में रहती थी, एक शाम वे मेरी छोटी बहन आशा के साथ कार में बिलासपुर आई और सीधे श्री जगदीश लाज़ में उतरी। मैंने उन्हें कार से उतारा, उनका सामान उतरवाया, उन्हें बैठाया। कुछ देर सुस्ताकर वे बोली- 'भैया, मैं यहीं लाज़ में रहूँगी, अब किसी के घर नहीं जाऊँगी।'
अम्माजी ने अपनी लॉज के एक कमरे को अपना आवास बना लिया। लॉज के सहायकगण सुबह से लेकर रात तक उनकी सेवा-सुश्रुषा में लगे रहते। सुबह के समय मैं उनको बाथरूम में सहारा देकर ले जाता और उनकी दैनिक क्रिया संपन्न करवाने के पश्चात कपड़े पहना कर आराम से लिटा देता। लॉज की प्रबन्धक-द्वय हेमा कपूर और मंजू ठाकुर उनको नास्ता-भोजन करवाती, समय-समय पर दवा देती, सिर-हाथ-पैर दबा देती और उनके पास घंटों बैठकर उनसे उनके अतीत के संस्मरण सुनती। अम्माजी शाम के समय 'रिसेप्शन' के पास आराम कुर्सी में घंटे-दो घंटे बैठी रहती और बाज़ार के चहल-पहल बड़े कौतूहल से देखती क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के विगत 85 वर्ष घर की चारदीवारी के भीतर ही गुजारे थे ! मेरे कुछ मित्र और ग्राहक जब उनका परिचय जानते तो उन्हें चरण-स्पर्श या प्रणाम करते तो वे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती। प्रत्येक शाम को वे आदेश देती- 'भैया आइसक्रीम मँगवाओ।'
सच पूछिए तो मेरा हाल भी बेहाल था। मुश्किल यह है कि हम पुरुष चाहकर भी रो नहीं पाते। सूने में भले ही मेरी आँखें भर आती थी लेकिन सबके सामने संयत रहना पड़ता है। मैं रोता तो कुंतल की माँ को कैसे समझाता ? दिल को पत्थर बना लिया, मन उदास हो गया लेकिन मुझे यह भलीभांति समझ में आ गया कि परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने और अपनी शाही बीमारी से लड़ने का मेरा कार्यकाल बढ़ गया है। मैंने स्वयं को और अधिक मजबूत बनाने का निर्णय लिया और उसकी आंतरिक तैयारी में भिड़ गया। मेरा दिल तो मजबूत था लेकिन 57 वर्ष के कैन्सरग्रस्त मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा कम होती जा रही थी। मैंने प्रत्येक सुबह 'जिम' जाना शुरू कर दिया। दो वर्ष तक नियमित रूप से जिम जाता रहा परिणामस्वरूप मेरा वजन 99 किलो से घटकर 90 किलो हो गया, मेरा मोटापा छंट गया और युवाओं के साथ व्यायाम करने का मुझे मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिला, हाँ, कुछ युवा जिम में मुझे अभ्यास करता देखकर हँसते तो कुछ विस्मित होते थे।
इस बीच एक और घटना हो गई। मैंने आपको बताया था कि अम्माजी की दशा उनकी बढ़ती उम्र और अव्यवस्थित जीवन के कारण दयनीय होती जा रही थी। वृद्धावस्था की समस्याएँ भी कठिन होती हैं, शिकायतें बनी रहती हैं जैसे- 'कोई पास बैठकर बातें करता नहीं', 'कोई कुछ पूछता नहीं'। इस उम्र में शरीर निष्क्रिय हो जाता है, अनेक रोग घेर लेते हैं, अंट-शंट खाने का मन करता है लेकिन पचता नहीं, जब भूख लगती रहती है तो कोई ध्यान नहीं देता, रात को ठीक से नींद नहीं आती, सुबह ठीक से पेट साफ नहीं होता, गर्मी के दिनों में गर्मी बहुत लगती है, ठंड के दिनों में जाड़ा अधिक लगता है आदि। दरअसल, उनके तीनों पुत्र उनके साथ 'खो' का खेल रहे थे। ऐसा नहीं था कि उनकी उपेक्षा हो रही थी, वे जिसके घर में रहती थी, उनके खान-पान और इलाज़ का ध्यान रखा जाता था लेकिन पुत्रत्व का अभाव था।
उन दिनों अम्माजी रायपुर में बड़े भैया के घर में रहती थी, एक शाम वे मेरी छोटी बहन आशा के साथ कार में बिलासपुर आई और सीधे श्री जगदीश लाज़ में उतरी। मैंने उन्हें कार से उतारा, उनका सामान उतरवाया, उन्हें बैठाया। कुछ देर सुस्ताकर वे बोली- 'भैया, मैं यहीं लाज़ में रहूँगी, अब किसी के घर नहीं जाऊँगी।'
अम्माजी ने अपनी लॉज के एक कमरे को अपना आवास बना लिया। लॉज के सहायकगण सुबह से लेकर रात तक उनकी सेवा-सुश्रुषा में लगे रहते। सुबह के समय मैं उनको बाथरूम में सहारा देकर ले जाता और उनकी दैनिक क्रिया संपन्न करवाने के पश्चात कपड़े पहना कर आराम से लिटा देता। लॉज की प्रबन्धक-द्वय हेमा कपूर और मंजू ठाकुर उनको नास्ता-भोजन करवाती, समय-समय पर दवा देती, सिर-हाथ-पैर दबा देती और उनके पास घंटों बैठकर उनसे उनके अतीत के संस्मरण सुनती। अम्माजी शाम के समय 'रिसेप्शन' के पास आराम कुर्सी में घंटे-दो घंटे बैठी रहती और बाज़ार के चहल-पहल बड़े कौतूहल से देखती क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के विगत 85 वर्ष घर की चारदीवारी के भीतर ही गुजारे थे ! मेरे कुछ मित्र और ग्राहक जब उनका परिचय जानते तो उन्हें चरण-स्पर्श या प्रणाम करते तो वे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती। प्रत्येक शाम को वे आदेश देती- 'भैया आइसक्रीम मँगवाओ।'
रात को आठ बजे के आसपास हमारी हॉटल में 'डिनर' के लिए ग्राहकों का आगमन आरंभ हो जाता। कई पारिवारिक समूह आते जिन्हें आते-जाते अम्माजी बड़े गौर से देखती। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा- 'ये सब के सब खाना खाने यहाँ आते हैं, इनके घर में खाना नहीं बनता क्या ?'
'बनता है, क्यों नहीं बनता लेकिन कभी-कभार खाना बनाने से छुट्टी भी तो मिलनी चाहिए !' मैंने कहा।
'हमको तो कभी छुट्टी नहीं मिली, हमको कभी किसी ने नहीं कहा कि चलो बाहर खा लो।'
'आजकल कभी-कभी कहना पड़ता है अम्मा, तब बाकी दिन घर में खाना बनता है।'
'पर घर जैसा अच्छा खाना बाहर तो नहीं मिलता होगा ?'
'तो क्या हम लोग रद्दी खाना बनाते हैं ?'
'नहीं, वैसा नहीं कह रही हूँ, घर जैसा स्वादिष्ट भला और कौन बना सकता है ?'
'अम्मा, स्वाद की बात नहीं है, बात कुछ और है।'
'क्या है, घर में आज काम न करना पड़े, यही न ?' अम्माजी ने पूछा, मैं उनकी बात का जवाब नहीं दे पाया।
'बनता है, क्यों नहीं बनता लेकिन कभी-कभार खाना बनाने से छुट्टी भी तो मिलनी चाहिए !' मैंने कहा।
'हमको तो कभी छुट्टी नहीं मिली, हमको कभी किसी ने नहीं कहा कि चलो बाहर खा लो।'
'आजकल कभी-कभी कहना पड़ता है अम्मा, तब बाकी दिन घर में खाना बनता है।'
'पर घर जैसा अच्छा खाना बाहर तो नहीं मिलता होगा ?'
'तो क्या हम लोग रद्दी खाना बनाते हैं ?'
'नहीं, वैसा नहीं कह रही हूँ, घर जैसा स्वादिष्ट भला और कौन बना सकता है ?'
'अम्मा, स्वाद की बात नहीं है, बात कुछ और है।'
'क्या है, घर में आज काम न करना पड़े, यही न ?' अम्माजी ने पूछा, मैं उनकी बात का जवाब नहीं दे पाया।
कुछ समय बाद अचानक उनके स्वास्थ्य में गिरावट आना शुरू हो गई, कमजोरी तेजी से बढ़ने लगी, वे बहुत बेचैन रहने लगी। उसी बीच कुंतल भी बिलासपुर आए हुए थे। वे दोपहर के समय उनके पास घंटों बैठे रहते। एक दिन कुंतल ने अपनी माँ से पूछा- 'माँ, बुढ़ापा क्या इतना कष्टप्रद होता है, मैं तो अम्माजी की हालत देख कर दहल गया ?'
'हाँ, ऐसा ही होता है।' माधुरी ने उत्तर दिया।
'तो अभी से शान्त रहने की तैयारी करो माँ, बुढ़ापे में शान्ति नहीं सधेगी।' कुंतल ने सुझाव दिया।
अचानक अम्माजी के मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव दिखने लगे, वे कमरे से बाहर निकालकर चीखने लगती, ज़ोर-ज़ोर से असंगत बातें करती, पूरी रात जागती और दिन में कुछ देर के लिए सो पाती। 30 जून 2004 की सुबह उन्होंने मुझसे कहा- 'आज मेरी तबीयत बहुत खराब है, मैं अब नहीं बचूँगी, मुझे अस्पताल ले चल।'
'मैं डाक्टर को यहीं बुलवाता हूँ, अम्मा।' मैंने कहा, डाक्टर आए, उनकी जांच की और बताया- 'एज़ फेक्टर' है, अस्पताल में चाहें तो इन्हें भर्ती कर दीजिए, वहाँ 'ग्लूकोस' चढ़ाया जा सकता है परंतु अब तकलीफ कम नहीं हो सकती बल्कि बढ़नी ही है।'
उनके कमरे से अपने काउंटर तक आते-आते मैं सोच रहा था- 'क्या करूँ ?' मैंने निर्णय लिया- 'अस्पताल में यदि इनकी तबियत थोड़ा सुधर गई तो और कष्ट पाने के लिए जीवित रहेंगी इसलिए बेहतर है कि अब इन्हें जाने दिया जाए.…।' मैं उन्हें अस्पताल नहीं ले गया। उसी शाम मैं बड़े भाई साहब के साथ 'अपोलो हास्पिटल' में अपने एक रिश्तेदार को देखने गया। शाम को सात बजे के आसपास जब मैं लॉज लौटा तो मुझे बताया गया कि अम्माजी की तबीयत और अधिक बिगड़ गई है, मैं दौड़कर उनके कमरे में गया, वे अपनी अंतिम सांसें ले रही थी। मैंने अपने हाथों से उनका माथा सहलाया, कुछ मिनटों में ही मेरे देखते-देखते उनका शरीर शांत हो गया। तीन लड़कों-बहुओं और छः लड़कियों की माँ ८४ वर्षीया सुंदरबाई ने श्री जगदीश लॉज के कमरा नंबर ४०१ में अपने प्राण त्यागे !
उस जमाने में किसी औरत का ब्याह कैसा होता रहा होगा, आज आप कल्पना करिए। तेरह-चौदह वर्ष की कच्ची उम्र, एक हाथ लम्बा घूँघट, भरे-पूरे घर का 'पूरा' कामकाज, पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में गर्भाधान, हर साल बच्चे का प्रसव, न अस्पताल, न डाक्टर ! पति के सामने घूँघट ओढ़कर संतान उत्पन्न करने का अद्भुत कारनामा आज की पीढ़ी को कैसे समझाया जा सकता है ? संतानों की संख्या भी कोई कम नहीं, आम तौर पर एक दंपति एक दर्जन का आंकड़ा छू लिया करता था। कुछ बच्चे जन्म के समय या बाल्यावस्था में इलाज के अभाव में मर-खप जाते थे या कुछ प्रसूता ही दिवंगत हो जाती। ऐसा होने पर विधुर पुरुष का नया विवाह हो जाता लेकिन विधवा स्त्री का पुनर्विवाह निषिद्ध था। कवि प्रदीप ने तात्कालीन नारी विवशता पर यह मार्मिक गीत लिखा था :
'पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोय
बाहर से तो खामोश रहे तू भीतर-भीतर रोय।
तेरा दर्द न जाने कोय।
कह न सके तू अपनी कहानी, तेरी भी पंछी क्या ज़िंदगानी
विधि ने तेरी कथा लिखी, आँसू में कलम डुबोय।
तेरा दर्द न जाने कोय।
चुपके-चुपके रोने वाले, रखना छुपाकर दिल के छाले
ये पत्थर का लेख पगले, कोई न तेरा होय।
तेरा दर्द न जाने कोय।'
हमारी अम्माजी बेहद जीवट वाली थी। जितना मैंने उनसे उनके बारे में सुना और जो मैंने देखा, उसका विवरण आपको बताया जाए तो उस जमाने की गृहस्थन का सम्पूर्ण स्वरुप आपके समक्ष प्रगट हो जाएगा। तेरह वर्ष की आयु में वे मेरे पिता के पास ब्याह कर आई थी, तब से ६७ वर्ष तक दोनों का साथ रहा. अम्माजी गरीब परिवार की लड़की थी, ब्याह कर आई तो फिर गरीब घर ही मिला। आसमान से गिरी तो खजूर में अटक गई। रात-रात भर जागकर दिये की रोशनी में गेहूं की सफाई करती तो उनको एक बोरे ( लगभग नब्बे किलो) का मेहनताना एक रुपया मिलता जिसे वे जतन से बचाकर रखती ताकि वक्त-जरूरत पर परिवार के काम आए। कुछ अधिक जुड़ जाता तो उसका सोना खरीद लेती जो उन दिनों 20/- से 25/- तोला (लगभग 12 ग्राम) मिल जाया करता था। यही सोना उनके बच्चों के ब्याह में काम आया, जो बच गया वह उनके अंतिम दिनों में जिसके जो हाथ लगा, विलुप्त हो गया।
उनके पति और श्वसुर दोनों अद्भुत प्राणी थे। अम्माजी भोजन बनाने में अपने प्राण भी लगा दे तो भी उनको स्वाद नहीं आता था, खाते जाते थे, दांत पीसते जाते थे और थाली-गिलास पटक कर अपना क्रोध प्रगट करते रहते, बेचारी अम्मा चुपचाप सुनती-सहती रहती। हमारे घर में रोज दो-चार मेहमानों का भोज होता था, समाज में दोनों बाप-बेटे की मेहमाननवाज़ी की तारीफ हुआ करती थी, अम्माजी की बदौलत। बेचारी चूल्हे की आग में तपती भोजन बनाती, खुद परोसती-खिलाती और सब खानेवाले मुंह पोछते बिना कुछ कहे चले जाते। जिस भोजन के स्वाद पर दोनों बाप-बेटे अम्माजी को गरियाते थे, उस भोजन को याद करके आज हम तरसते हैं।
अम्माजी लाजवाब भोजन बनाती थी। चूल्हे में लकड़ी जलाकर बटुवे में पकी दाल और भात का स्वाद आज भी मुझे याद आता है। रोटी और पूड़ी को ऐसा गोल बेलती कि 'सर्कुलेटर' से 'चेक' कर लो। उनमें गजब की फुर्ती थी, रोटी सेंकते हर समय उनकी एक रोटी तवे पर होती, दूसरी अंगार पर और तीसरी पटे पर ! उनके हाथ से सेंकी हुई रोटियों की मुलायमियत अब स्मृति-शेष होकर रह गई। फूली हुई पूडियां और रसीली आलू या लौकी की सब्जी आज भी बहुत याद आती हैं। उनके हाथ से बने पापड़, बिजौरा, बड़ी, कचरिया, अथान (अचार) अब कहाँ ? मूंग और बेसन के लड्डू का वह सोंधापन, गुझिया और इन्दरसा की मिठास और प्रसव के पश्चात प्रसूता को खिलाए जाने वाले मेवा-मसालेदार 'सोंठइला लड्डू' का स्वाद न जाने कहाँ विलीन हो गया !
अम्माजी की याद में कितनी घटनाएँ मेरे ज़ेहन में उमड़ रही हैं, उन सब यादों को जोड़कर यदि उनका व्यक्तित्व परिभाषित किया जाए तो वे अत्यंत परिश्रमी और सरल स्वभाव की महिला थी। उनकी सरलता ने उनको बहुत सताया और जिस मान-सम्मान की वे हकदार थी, वह उन्हें नहीं मिला।
मुझे याद है कि अपने विवाह-समारोह के पश्चात जब हम पति-पत्नी सड़क मार्ग से जबलपुर से बिलासपुर आ रहे थे, मैंने अपनी पत्नी को अपने परिवार के बारे में बताते हुए उनसे कहा था- 'अम्माजी को जीवन में कभी सुख नहीं मिला, तुम उनके दुख को कम करने की कोशिश करना।' बेचारी माधुरी को पता ही नहीं था कि वह किस बीहड़ की बहू बनकर जा रही है। हमारे घर के कंटीले-पथरीले रास्तों ने उनको अवश्य निराश किया होगा लेकिन विपरीत स्थितियों का सामना करने का उनका साहस कभी कमजोर नहीं हुआ बल्कि उन्होंने इन कठिनाइयों को चुनौती के रूप में लिया और मेरा कहा मानने की पूरी कोशिश की।
अम्माजी और दद्दाजी विपरीत स्वभाव वाले युगल थे, एक आग का गोला तो दूसरा बर्फ की चट्टान ! लेकिन दद्दाजी तो दद्दाजी थे, उनके स्वभाव का क्या कहने ? एक दिन की बात है, हम पिता-पुत्र रसोईघर में चटाई पर बैठकर भोजन कर रहे थे, अचानक किसी बात पर दद्दाजी भड़क गए और मुझसे बोले- 'देखो भैया, बहू ने आजतक एक दिन भी न अच्छा खाना बनाया और न प्रेम से खिलाया।' माधुरी सिगड़ी में रोटियाँ सेंक रही थी, हरदम चुप रहनेवाली बहू भड़क गई और घूँघट के अंदर से बोली- 'और आपने कभी अपने मुंह से बोला कि बहू आज तुमने अच्छा खाना बनाया ?' दद्दाजी ने गुस्से में आकर भोजन की थाली दोनों हाथ से उठाई और जमीन पर पटक दी और बोले- 'देखो, देखो अब मुंह भी लड़ाने लगी है।' मैं और अम्माजी सकते में आ गए, दद्दाजी को तो कोई कुछ कह नहीं सकता था मैं माधुरी को चुप रहने के लिए कहता रहा। दद्दाजी उठकर चले गए, माधुरी रोने लगी तो अम्माजी बोली- 'चुप हो जा बहू, इनकी तो आदत है, चाहे जितना अच्छा बना दो, इनको पसंद नहीं आता।' मैंने अम्माजी से कहा- 'अम्मा, तुम जब इस घर में बहू बनकर आई थी, उसी समय यदि आज जैसा जवाब दद्दाजी को मिल गया होता तो दद्दाजी कब के सुधर गए होते !'
'हमारे जमाने में हम लोग मुंह खोलना नहीं जानते थे।' अम्माजी उदास हो कर बोली।
मैंने देखा है कि सीधे-सरल स्वभाव के व्यक्ति के साथ हमेशा अन्याय होता है। मनुष्य को फुफकारने वाले नाग की तरह जीवनशैली अपनानी चाहिए ताकि लोग उससे भयभीत रहें, यदि आप पिटपिटिया साँप के तरह अपना बचाव करते रहेंगे तो लोग आपको पैरों से कुचलते रहेंगे, आपको अपने अनुभव की बात बता रहा हूँ।
अपनी माँ और पिता को उनके जीते-जी समझ पाना कठिन है लेकिन उनके न होने के बाद उन्हें समझना आसान हो जाता है। जो हमें हासिल है, उसकी बेकद्री है लेकिन जो साथ छोड़कर दूर हो गया या बहुत दूर हो गया तब उसकी कद्र की कद्र होती है। वैसे तो संसार के सभी रिश्ते इसी तरह बनते-निभते हैं लेकिन मेरे देखने में आया कि माँ का बेटे के साथ, पिता का बेटी के साथ कुछ अधिक ही नेह रहता है। सिगमंड फ्रायड के मतानुसार यह विपरीतलिंगी प्रभाव है, वैसा हो सकता है लेकिन भारतीय परिवेश में इसे समझने के लिए हमारी परिवारिक व्यवस्था के मनोविज्ञान पर गौर करना होगा।
आम तौर पर किसी बालिका से प्रश्न किया जाए कि बड़ी होकर वह किसके जैसी बनना चाहेगी तो उसका संभावित उत्तर होगा- 'अपनी मम्मी जैसी' और यही प्रश्न किसी बालक से पूछा जाए तो जवाब होगा- 'अपने पापा जैसा।' उन दोनों को बड़ा होने दीजिए, पढ़ने-लिखने दीजिए, अक़्लमंद होने दीजिए, जैसे ही ये किशोर-वय को प्राप्त होंगे, दोनों 'यू टर्न' ले लेंगे। लड़की कहेगी- 'कैसी भी लेकिन माँ जैसी नहीं' और लड़का बोलेगा- 'कैसा भी लेकिन अपने बाप जैसा नहीं।' विचारणीय प्रश्न यह है कि बचपन से किशोरावस्था के मध्य उन दस वर्षों में इस तरह का 'पेराडाइम शिफ्ट' क्यों हो जाता है ?
डा॰ एरिक बर्न ने 'ट्रांजेक्सनल एनालिसिस' नामक अद्भुत मनोवैज्ञानिक शोध किया है जिसमें वे मनुष्य के व्यवहार को गहराई से समझने में मदद करते हैं। इस विशद अध्ययन में उन्होंने 'I am okay, you are okay.' की मनस्थिति को विकसित करने के सूत्र बताए हैं। इसे आप समझने का प्रयत्न कीजिए, आपको मैं सरल ढंग से संक्षिप्त रूप में बताने का यत्न करता हूँ। सबसे पहले 'I am okay, you are okay.' का हिन्दी अनुवाद कर लिया जाए- 'मैं सही, तुम सही'।
मनुष्य के जीवन में चार विभिन्न मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ बनती हैं-
मनुष्य के जीवन में चार विभिन्न मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ बनती हैं-
1 : मैं सही नहीं, तुम सही॰ (I am not okay, you are okay.)
2 : मैं सही नहीं, तुम भी सही नहीं॰ (I am not okay, you are not okay.)
3 : मैं सही, तुम सही नहीं॰ (I am okay, you are not okay.)
4 : मैं सही, तुम भी सही॰ (I am okay, you are okay.)
1 : मैं सही नहीं, तुम सही : मनुष्य के जन्म से बचपन तक का समय दूसरों पर आश्रित रहता है। कदम-कदम पर उसे ऐसा महसूस होता है कि बहुत से कार्य ऐसे हैं जिसे वह नहीं कर पाता लेकिन जो उम्र में बड़े हैं- वे कर सकते हैं। इस वज़ह से उसमें हीनभावना विकसित हो जाती है और उसे लगता है- 'मैं अक्षम हूँ लेकिन अन्य लोग सक्षम हैं।'
1 : मैं सही नहीं, तुम सही : मनुष्य के जन्म से बचपन तक का समय दूसरों पर आश्रित रहता है। कदम-कदम पर उसे ऐसा महसूस होता है कि बहुत से कार्य ऐसे हैं जिसे वह नहीं कर पाता लेकिन जो उम्र में बड़े हैं- वे कर सकते हैं। इस वज़ह से उसमें हीनभावना विकसित हो जाती है और उसे लगता है- 'मैं अक्षम हूँ लेकिन अन्य लोग सक्षम हैं।'
2 : मैं सही नहीं, तुम भी सही नहीं : बच्चा जब थोड़ा समझदार होता है तो वह अनुभव करता है कि गलतियां केवल उससे ही नहीं होती, दूसरे भी करते हैं तब वह अपनी गलतियों को 'जस्टिफाई' करने के लिए दूसरों पर उंगली उठाता है- 'अगर मैं गलत हूँ तो वह भी तो गलत है।'
3 : मैं सही, तुम सही नहीं : वयस्क होने के बाद जब शारीरिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो जाती है तब उसे लगता कि वह सही है, सक्षम है, बुद्धिमान है और दूसरे गलत हैं। स्वयं के दोष उसे नहीं दिखते और अन्य के दोष उसे दिखाई देने लगते हैं, इस प्रकार उसे लगने लगता है- 'मैं सही हूँ, दूसरे गलत हैं।'
4 : मैं सही, तुम भी सही : उपरोक्त 1, 2 और 3 मनस्थितियाँ नकारात्मक हैं। स्वयं को अक्षम समझना हमें हीन, कमजोर और लाचार बनाता है जबकि दूसरों में दोष देखना हमें परछिद्रान्वेषी, घमंडी, ईर्ष्यालु, बहानेबाज और गैरजिम्मेदार बनाता है। मनुष्य के लिए आदर्श और सकारात्मक सोच है- मैं सही, तुम भी सही।
डा॰ एरिक बर्न की उक्त कसौटी पर माता-पिता और उनके बच्चों के मध्य विकसित होने वाले मनोभावों को आसानी से समझा जा सकता है। बचपन में माता-पिता पर निर्भरता बच्चे पर उनके प्रति अनुकूल प्रभाव रखती है लेकिन उस निर्भरता के समाप्त होते ही वह आत्म-स्वतन्त्रता की ओर उन्मुख होने लगता है। माता-पिता का मार्गदर्शन और आदेश उसे नहीं सुहाता। दरअसल, वयस्क मन स्वयं समझ विकसित करके निर्णय लेना चाहता है जिसमें माता-पिता उसे बाधक समझ आते हैं। यहीं से उनके मध्य मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं जो धीरे-धीरे मनभेद की ओर बढ़ जाते हैं और कालांतर में संघर्ष का रूप ले लेते हैं।
हमारे परिवारों में लड़कियों को प्रशिक्षित करने की ज़िम्मेदारी माँ के कंधों पर होती है और लड़कों की उनके पिता पर। मनुष्य स्वभाव से आलसी प्राणी है इसलिए उसे काम करना स्वाभाविक रूप से नापसंद होता है और यदि कोई काम करने के लिए दबाव डालता है, या सौंपे गए काम को न करने पर प्रश्न उपस्थित करता है तो वह अप्रिय लगने लगता है। इस प्रकार माँ अपनी लड़की की 'फ्रेंड लिस्ट' से बाहर हो जाती है और पिता अपने बेटे की 'फ्रेंड लिस्ट' से। जब घर में ये विसंगतियाँ बड़ा रूप लेने लगती है और वाक्युद्ध में परिवर्तित होने लगती हैं तब लड़की की रक्षा करने के लिए पिता अवतरित हो जाते हैं- 'धीरे-धीरे सीख लेगी, क्यों पीछे पड़े रहती हो ?' वहीं पर लड़के की तरफदारी करने के लिए उसकी माँ सामने खड़ी हो जाती है- 'बच्चे की जान लोगे क्या ?' संभवतः इसीलिए माँ का बेटे के साथ और पिता का बेटी के साथ अधिक ही नेह विकसित हो जाता है। फ्रायड इसे विपरीतलिंगी आकर्षण ठहरा सकते हैं लेकिन मुझे तो यह सुविधा-असुविधा से जुड़ा मामला लगता है।
मेरी गृहस्थी में भी इसी तरह से अनेक घटनाएँ हुई और यही कई बार हम पति-पत्नी के मध्य मतभेद के कारण बने। परिवार में सभी वरिष्ठ कडक हो जाएँ, ऐसा उचित नहीं। 'एक कड़क तो दूसरा नरम' की नीति उपयोगी रहती है लेकिन मेरी पत्नी की मुझसे शिकायत रहती है कि जब वे जब बच्चों के साथ कड़क हों तो मुझे उनका साथ देना चाहिए वरना डांट का असर कमजोर पड़ जाता है और अपेक्षित परिणाम नहीं आते। इस मुद्दे पर अनंत बहस की जा सकती है लेकिन मुझे लगता है कि घर-परिवार में किसी प्राणी का जन्म निरर्थक तनाव झेलने के लिए नहीं हुआ है, घर में शांति होनी चाहिए, परस्पर प्रेम होना चाहिए, आपस में मदद और देखरेख का भाव होना चाहिए और यह सब तब हो सकता है जब बच्चों को समझा जाए और उन्हें प्रेम से समझाया जाए। मेरे दद्दाजी बहुत कड़क इंसान थे लेकिन मैंने अनुभव किया कि वे न तो अपने बच्चों को सुधार पाए और न ही अपने अनुरूप नहीं बना पाए, हाँ, उन्होंने अपने जीते-जी हमारा जीना हराम करके जरूर रखा।
मेरे बचपन में तीन तानाशाह मुझे सुधारने में लगे रहते थे- बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया। उस त्रिभुज के मध्य मैं इधर से उधर टकराता रहता, किसी से डाँट, किसी से घुड़की तो किसी से मार। इन तीनों आततायियों के आतंक से मुझे बचा पाने में अम्माजी असमर्थ थी क्योंकि वे विरोध नहीं करती थी लेकिन रोज ही मेरी हिम्मत बँधाते रहती और अगली यातना सहने के लिए मुझे तैयार करती। इन तीनों के प्रहारों पर नियंत्रण करना असंभव था क्योंकि इनका घर में विकट खौफ था, इनसे कोई कुछ नहीं कह सकता था और हमारी अम्माजी तो नरमदल वाली थी। अम्माजी के नरम होने की वजह से वे घर में इतनी महत्वहीन हो गई थी कि 'उनके' बच्चों का विवाह-संबंध तय करने के पूर्व उनकी राय लेना तो बहुत दूर की बात है, उनको बताया तक नहीं जाता था। ऐसे महत्व के निर्णय घर के पुरुषगण आपस में ले लेते थे, अम्माजी को हम लोग सुनी-सुनाई बातें बताया करते थे जिसे वे चुपचाप सुन लेती थी और धीरे से सिर हिला देती थी ! हे भगवान, आज के समय में ऐसा सम्भव है क्या ?
दद्दाजी सवा छः फीट ऊंचे-पूरे व्यक्ति थे, धोती-कुरता-जाकिट-टोपी पहनते थे और जब हाथ में बेंत लेकर उसे लहराते हुए सड़क पर निकलते तो हर आने-जाने वाले की नजर उन पर ज़रूर पड़ती। यह बेंत सहारे के लिए नहीं, 'लुक' के लिए उनके साथ चलती थी। उनके पास दो बेंत थी जिसे उन्होंने बनारस से मंगवाया था, एक बेंत ऊपर से नीचे तक चिकनी थी और दूसरी अनानास के छिलके की तरह उभरी हुई नोकदार।
एक शाम की बात है, मैं अपने घर के बाहर कबड्डी खेल रहा था। उसी समय बड़े भैया का आगमन हुआ, उनकी उम्र उस समय 18 वर्ष की रही होगी और मैं लगभग आठ-नौ वर्ष का रहा हूंगा, उन्होंने गुस्से में मुझे बांह से पकड़कर घसीटते हुए घर के अंदर किया और दद्दाजी की उसी नुकीली बेंत से मेरी जमकर कुटाई की। न जाने क्यों, वे मेरे धूल में खेलने के सख्त खिलाफ थे, अक्सर झपड़ियाते रहते थे लेकिन उस शाम उनका पारा अधिक चढ़ा हुआ था इसलिए बेंत के माध्यम से अपना रोष व्यक्त किया। मेरी दाहिनी बांह और पीठ पर चोट के निशान उभर आए, सूजन आ गई। अम्माजी ने देखा और भड़क गई और बड़े भैया को डांटा- 'अरे, ऐसा जानवरों की तरह मारा जाता है ?' मैंने अपने जीवन में केवल एक बार ही नाराज़ होते देखा, फिर कभी नहीं। वे दया और करुणा की साक्षात अनुकृति थी, मैं उनके निर्जीव देह के समक्ष खड़ा अनेक पुरानी बातें याद कर रहा था और सोच रहा था कि विपरीत स्थितियों को अनुकूल करने की चेष्ठा करने वाली यह अद्भुत स्त्री प्रतिकूल परिस्थितियों से अंततः मुक्त हो ही गई।
अपने अंतिम दिनों में अम्माजी ने मुझसे कहा था- 'मुझे मेरे घर ले चल, एक बार दिखा दे मुझे।'
'वहाँ जाने के लिए मुन्ना भैया (छोटे भाई राजकुमार का घरेलू नाम) आएंगे तो उनसे कहना।' मैंने कहा। उन दोनों के बीच क्या बात हुई, मुझे नहीं मालूम लेकिन अम्माजी की यह इच्छा उनकी मृत्यु के पश्चात पूरी हो गई। उनकी पार्थिव देह को उसी रात 'उनके' घर ले जाया गया। सुबह तक सब परिवारजन और नागरिक एकत्रित हुए और अंतिम संस्कार किया गया। न जाने क्यों, मेरी आँखों से एक बूंद आँसू न गिरा। विदा अम्मा।
निदा फ़ाजली की यह गजल अम्माजी के बहुत करीब है :
'बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ,
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ।
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3 : मैं सही, तुम सही नहीं : वयस्क होने के बाद जब शारीरिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो जाती है तब उसे लगता कि वह सही है, सक्षम है, बुद्धिमान है और दूसरे गलत हैं। स्वयं के दोष उसे नहीं दिखते और अन्य के दोष उसे दिखाई देने लगते हैं, इस प्रकार उसे लगने लगता है- 'मैं सही हूँ, दूसरे गलत हैं।'
4 : मैं सही, तुम भी सही : उपरोक्त 1, 2 और 3 मनस्थितियाँ नकारात्मक हैं। स्वयं को अक्षम समझना हमें हीन, कमजोर और लाचार बनाता है जबकि दूसरों में दोष देखना हमें परछिद्रान्वेषी, घमंडी, ईर्ष्यालु, बहानेबाज और गैरजिम्मेदार बनाता है। मनुष्य के लिए आदर्श और सकारात्मक सोच है- मैं सही, तुम भी सही।
डा॰ एरिक बर्न की उक्त कसौटी पर माता-पिता और उनके बच्चों के मध्य विकसित होने वाले मनोभावों को आसानी से समझा जा सकता है। बचपन में माता-पिता पर निर्भरता बच्चे पर उनके प्रति अनुकूल प्रभाव रखती है लेकिन उस निर्भरता के समाप्त होते ही वह आत्म-स्वतन्त्रता की ओर उन्मुख होने लगता है। माता-पिता का मार्गदर्शन और आदेश उसे नहीं सुहाता। दरअसल, वयस्क मन स्वयं समझ विकसित करके निर्णय लेना चाहता है जिसमें माता-पिता उसे बाधक समझ आते हैं। यहीं से उनके मध्य मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं जो धीरे-धीरे मनभेद की ओर बढ़ जाते हैं और कालांतर में संघर्ष का रूप ले लेते हैं।
हमारे परिवारों में लड़कियों को प्रशिक्षित करने की ज़िम्मेदारी माँ के कंधों पर होती है और लड़कों की उनके पिता पर। मनुष्य स्वभाव से आलसी प्राणी है इसलिए उसे काम करना स्वाभाविक रूप से नापसंद होता है और यदि कोई काम करने के लिए दबाव डालता है, या सौंपे गए काम को न करने पर प्रश्न उपस्थित करता है तो वह अप्रिय लगने लगता है। इस प्रकार माँ अपनी लड़की की 'फ्रेंड लिस्ट' से बाहर हो जाती है और पिता अपने बेटे की 'फ्रेंड लिस्ट' से। जब घर में ये विसंगतियाँ बड़ा रूप लेने लगती है और वाक्युद्ध में परिवर्तित होने लगती हैं तब लड़की की रक्षा करने के लिए पिता अवतरित हो जाते हैं- 'धीरे-धीरे सीख लेगी, क्यों पीछे पड़े रहती हो ?' वहीं पर लड़के की तरफदारी करने के लिए उसकी माँ सामने खड़ी हो जाती है- 'बच्चे की जान लोगे क्या ?' संभवतः इसीलिए माँ का बेटे के साथ और पिता का बेटी के साथ अधिक ही नेह विकसित हो जाता है। फ्रायड इसे विपरीतलिंगी आकर्षण ठहरा सकते हैं लेकिन मुझे तो यह सुविधा-असुविधा से जुड़ा मामला लगता है।
मेरी गृहस्थी में भी इसी तरह से अनेक घटनाएँ हुई और यही कई बार हम पति-पत्नी के मध्य मतभेद के कारण बने। परिवार में सभी वरिष्ठ कडक हो जाएँ, ऐसा उचित नहीं। 'एक कड़क तो दूसरा नरम' की नीति उपयोगी रहती है लेकिन मेरी पत्नी की मुझसे शिकायत रहती है कि जब वे जब बच्चों के साथ कड़क हों तो मुझे उनका साथ देना चाहिए वरना डांट का असर कमजोर पड़ जाता है और अपेक्षित परिणाम नहीं आते। इस मुद्दे पर अनंत बहस की जा सकती है लेकिन मुझे लगता है कि घर-परिवार में किसी प्राणी का जन्म निरर्थक तनाव झेलने के लिए नहीं हुआ है, घर में शांति होनी चाहिए, परस्पर प्रेम होना चाहिए, आपस में मदद और देखरेख का भाव होना चाहिए और यह सब तब हो सकता है जब बच्चों को समझा जाए और उन्हें प्रेम से समझाया जाए। मेरे दद्दाजी बहुत कड़क इंसान थे लेकिन मैंने अनुभव किया कि वे न तो अपने बच्चों को सुधार पाए और न ही अपने अनुरूप नहीं बना पाए, हाँ, उन्होंने अपने जीते-जी हमारा जीना हराम करके जरूर रखा।
मेरे बचपन में तीन तानाशाह मुझे सुधारने में लगे रहते थे- बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया। उस त्रिभुज के मध्य मैं इधर से उधर टकराता रहता, किसी से डाँट, किसी से घुड़की तो किसी से मार। इन तीनों आततायियों के आतंक से मुझे बचा पाने में अम्माजी असमर्थ थी क्योंकि वे विरोध नहीं करती थी लेकिन रोज ही मेरी हिम्मत बँधाते रहती और अगली यातना सहने के लिए मुझे तैयार करती। इन तीनों के प्रहारों पर नियंत्रण करना असंभव था क्योंकि इनका घर में विकट खौफ था, इनसे कोई कुछ नहीं कह सकता था और हमारी अम्माजी तो नरमदल वाली थी। अम्माजी के नरम होने की वजह से वे घर में इतनी महत्वहीन हो गई थी कि 'उनके' बच्चों का विवाह-संबंध तय करने के पूर्व उनकी राय लेना तो बहुत दूर की बात है, उनको बताया तक नहीं जाता था। ऐसे महत्व के निर्णय घर के पुरुषगण आपस में ले लेते थे, अम्माजी को हम लोग सुनी-सुनाई बातें बताया करते थे जिसे वे चुपचाप सुन लेती थी और धीरे से सिर हिला देती थी ! हे भगवान, आज के समय में ऐसा सम्भव है क्या ?
दद्दाजी सवा छः फीट ऊंचे-पूरे व्यक्ति थे, धोती-कुरता-जाकिट-टोपी पहनते थे और जब हाथ में बेंत लेकर उसे लहराते हुए सड़क पर निकलते तो हर आने-जाने वाले की नजर उन पर ज़रूर पड़ती। यह बेंत सहारे के लिए नहीं, 'लुक' के लिए उनके साथ चलती थी। उनके पास दो बेंत थी जिसे उन्होंने बनारस से मंगवाया था, एक बेंत ऊपर से नीचे तक चिकनी थी और दूसरी अनानास के छिलके की तरह उभरी हुई नोकदार।
एक शाम की बात है, मैं अपने घर के बाहर कबड्डी खेल रहा था। उसी समय बड़े भैया का आगमन हुआ, उनकी उम्र उस समय 18 वर्ष की रही होगी और मैं लगभग आठ-नौ वर्ष का रहा हूंगा, उन्होंने गुस्से में मुझे बांह से पकड़कर घसीटते हुए घर के अंदर किया और दद्दाजी की उसी नुकीली बेंत से मेरी जमकर कुटाई की। न जाने क्यों, वे मेरे धूल में खेलने के सख्त खिलाफ थे, अक्सर झपड़ियाते रहते थे लेकिन उस शाम उनका पारा अधिक चढ़ा हुआ था इसलिए बेंत के माध्यम से अपना रोष व्यक्त किया। मेरी दाहिनी बांह और पीठ पर चोट के निशान उभर आए, सूजन आ गई। अम्माजी ने देखा और भड़क गई और बड़े भैया को डांटा- 'अरे, ऐसा जानवरों की तरह मारा जाता है ?' मैंने अपने जीवन में केवल एक बार ही नाराज़ होते देखा, फिर कभी नहीं। वे दया और करुणा की साक्षात अनुकृति थी, मैं उनके निर्जीव देह के समक्ष खड़ा अनेक पुरानी बातें याद कर रहा था और सोच रहा था कि विपरीत स्थितियों को अनुकूल करने की चेष्ठा करने वाली यह अद्भुत स्त्री प्रतिकूल परिस्थितियों से अंततः मुक्त हो ही गई।
अपने अंतिम दिनों में अम्माजी ने मुझसे कहा था- 'मुझे मेरे घर ले चल, एक बार दिखा दे मुझे।'
'वहाँ जाने के लिए मुन्ना भैया (छोटे भाई राजकुमार का घरेलू नाम) आएंगे तो उनसे कहना।' मैंने कहा। उन दोनों के बीच क्या बात हुई, मुझे नहीं मालूम लेकिन अम्माजी की यह इच्छा उनकी मृत्यु के पश्चात पूरी हो गई। उनकी पार्थिव देह को उसी रात 'उनके' घर ले जाया गया। सुबह तक सब परिवारजन और नागरिक एकत्रित हुए और अंतिम संस्कार किया गया। न जाने क्यों, मेरी आँखों से एक बूंद आँसू न गिरा। विदा अम्मा।
निदा फ़ाजली की यह गजल अम्माजी के बहुत करीब है :
'बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ,
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ।
बान की खुरीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ।
चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसे माँ।
बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ।
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ।'
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ।
चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसे माँ।
बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ।
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ।'
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