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वायदे के मुताबिक संगीता के सास-श्वसुर जी, संगीता की विदा की अगली सुबह उसे उसके 'हॉस्टल' छोड़ गए ताकि वह परीक्षा की तैयारी कर सके। परीक्षा निरापद हो गई, 'रिजल्ट' आ गया। संगीता ने बी॰डी॰एस॰ के प्रमाणपत्र की छायाप्रति मुझे भेजा और उसी के पीछे एक पत्र भी लिखा :
12-5-2003
छोटी बिटिया संज्ञा माइक्रो-बायलाजी में स्नातक होने के बाद राज्य-सेवा परीक्षा की तैयारी में लग गई। हमारे पुत्र कुंतल त्रिची में बी॰टेक॰ के अंतिम सेमेस्टर में थे। कुंतल के बारे में इसके बाद की घटनाएँ आपको बताऊँ, आपको मैं उस पहले पत्र के बारे में बताना चाहता हूँ जिसे मैंने उन्हें चार वर्ष पूर्व तब लिखा था जब उनके त्रिची कॉलेज में शुरूआती दिन थे। इस पत्र में लिखी बातें उनके आगामी जीवन को समझने में आपके लिए मददगार होंगी। पत्र यह था :
'बिलासपुर
16-9-1999
प्रिय कम्मू,
तुमसे दूर होने का दुख हम सबको है लेकिन हर समय तुम्हारी स्मृति हमारे आस-पास रहती है। इतनी दूर से हम तुम्हारे लिए कुछ खास नहीं कर पाते लेकिन हम यह जानते हैं कि तुम सक्षम हो, सुयोग्य हो और केवल अपने लिए नहीं- हम सबके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हो। तुम्हारे व्यक्तित्व का निर्माण- एक सार्थक मनुष्य के रूप में तुम्हारी परिणिति- हमें परम संतोष का सुख देगा।
मम्मी तुम्हें खूब याद करती है, कभी बहुत खुश हो जाती है, कभी आँखें गीली हो जाती हैं, आखिर माँ हैं। संज्ञा की पढ़ाई तेजी से शुरू हो गई है, आसार अच्छे नज़र आते हैं। अपना ख्याल रखना।
पापा॰'
त्रिची इंजीनियरिंग कालेज तमिलनाडु में है जहां अंग्रेज़ी और तमिल भाषा का बोलबाला है। तमिलनाडु की अँग्रेजी भी तमिल भाषा के लहज़े से प्रभावित रहती है इसलिए कुंतल को शुरुआती दिनों में भाषा संबंधी असुविधा रही जिसके कारण उन्हें वहाँ के माहौल से स्वयं को अनुकूलित करना कठिन लगा लेकिन समय बीतता गया और कुंतल बी॰टेक॰ के अंतिम सेमेस्टर में पहुँच गए। उन्हीं दिनों देश की अनेक प्रतिष्ठित व्यापारिक संस्थान कालेज में 'केम्पस इंटरव्यू' के लिए पहुंचे। कुंतल ने पुणे के संस्थान 'टेल्को आटोमोबाइल्स' के लिए साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार पूरा हो जाने के बाद कुंतल ने उठते-उठते उनसे कहा- 'मैं आपकी कंपनी में केवल 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' विभाग में ही काम करूंगा, अन्य कार्यों में मेरी रुचि नहीं है।'
'हम ऐसा वादा नहीं कर सकते।' उन्होंने उत्तर दिया।
'तो फिर, यदि आपने मेरा चयन किया हो तो बेहतर है यह 'जाब' किसी दूसरे को दे दीजिए।'
'हम ऐसा कर सकते हैं कि 'प्रोबेशन पीरियड' में आपका काम देखेंगे, अगर उचित समझ में आया तो 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' दे देंगे।'
'मुझे मंजूर है।' कुंतल ने सहमति दी। इस प्रकार कुंतल को अंतिम सेमेस्टर के दौरान 25 फरवरी 2003 को 'आफ़र लेटर' आ गया। नियुक्ति की शर्त यह थी कि 'ग्रेजुएट डिग्री' न्यूनतम 60% अंक लेकर उत्तीर्ण होना अनिवार्य था जबकि कुंतल ने 82% अंक हासिल किए। इसी कुंतल को बिलासपुर के हिन्दी माध्यम स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' के प्राचार्य ने परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका को कोरा छोड़ देने और उस पर आचार्य जी का कार्टून बनाने के अपराध में कड़ी चेतावनी दी गई थी. पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह कुंतल की जब आँख खुली तब उसने वह हासिल किया जो सच में किसी अजूबे से कम न था।
26 मार्च 2003 को त्रिची से कुंतल ने एक पत्र हमें भेजा, उसके पूर्वार्द्ध हिस्से को आप पढिए :
'डीयर पापा, मम्मी और दीदी,
मैं यहाँ एकदम ठीक हूँ और आप लोग भी मज़े में होंगे ऐसी कामना करता हूँ।
अब बस, कालेज के कुछ आखिरी दिन बचे हैं। आज भी उस दिन की यादें एकदम सजीव हैं जिस दिन घर से निकला था यहाँ आने के लिए। पता ही नहीं चला कब समय निकल गया। चार साल तो बस यूं ही निकल गए। इन चार सालों में बहुत कुछ सीखा, कुछ पाया, कुछ खोया, अच्छा समय देखा। दोस्त बनाए, तमिल नहीं सीख पाया। काम किया, सोया, ज़्यादा पढ़ाई नहीं की पर एक अच्छी नौकरी लग गई। English improve हो गई, हिन्दी खराब हो गई, और भी बहुत कुछ ! बिना उम्मीद किए एक मौका भी मिला, इन सब चीजों से ऊपर उठकर ( या फिर नीचे जाकर) अपने आपको पहचानने का। एक गुरु, जिन्होंने जीवन को एक नई दिशा दी है। समझ में आया कि अभी तक जो कुछ भी कर रहा था- पता नहीं क्यों कर रहा था ? अभी भी लक्ष्य एकदम स्पष्ट नहीं है, पर atleast, एक दिशा है। मार्ग पर चलना अभी भी कठिन है। ढेर सारे दुश्मन हैं, बाहर नहीं, अंदर हैं। जब तक खुद पर काबू नहीं कर पाता, लक्ष्य तक पहुँचना असंभव रहेगा।
आप लोगों को अज़ीब लग रहा होगा की छोटा सा कम्मू कैसी-कैसी बातें कर रहा है पर पता नहीं, कुछ तो परिवर्तन आया है। बाहर से शायद अभी भी वैसा दिखूँ, पर अंदर ही अंदर, जीवन के लिए पूरा दृष्टिकोण ही बदल गया है। शुरू-शुरू में बहुत कठिनाई हुई, अभी भी होती है क्योंकि आस-पास रहनेवाले लोग इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाते पर धीर-धीरे इन चीजों से निपटना भी आने लगा है। एक बात तो है, जीवन पहले जैसा नहीं रहा। अब यह कहीं ज़्यादा रोमांचक, अर्थपूर्ण और मज़ेदार होता जा रहा है।.....
कंपनी से offer/joining letter आ गया है। उसकी जेरोक्स कापी भेज रहा हूँ, उसमें ढेर सारी बातें लिखी हैं। पता नहीं क्या मिलेगा...कितना मिलेगा ? पर, अनुमानतः दस-बारह हजार के आसपास हाथ में आना चाहिए। खैर, वहाँ जाकर ही पता चलेगा कि क्या होने वाला है। I am absolutely ready and very excited. पर उसके पहले घर में बीतनेवाली छुट्टियों का लालच आ रहा है। मैं इस बार भी घर से कहीं नहीं निकलने वाला। उम्मीद है आप लोग मुझे ज़्यादा नहीं हड़काएंगे।.....
अब पत्र बंद करता हूँ। ढेर सारा प्यार।
आपका - कम्मू '
दद्दाजी के निधन के पश्चात अम्माजी अकेली पड़ गई। दद्दाजी उन्हें आदतन डांटते रहते थे, वे उनकी डांट की इतनी आदी हो गई थी कि उन पर उसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। दद्दाजी कहा करते थे- 'ये मेरे ज़िन्दा रहते, मेरे सामने चली जाएँ तो अच्छा है' लेकिन ऐसा होते-होते रह गया। इस धरती पर आना या वापस जाना किसी के हाथ में तो है नहीं!
'आपको मालूम है कि बढ़ई मिलना कितना कठिन है, बड़ी मुश्किल से यह आया है तो आपने इसे भगा दिया।'
'मरीज की तकलीफ भी तो देखिए, डाक्टर साहब!'
'मरीज तो अभी ठीक है, क्या हुआ है, आप हमारे काम में रोक-टोक मत करें, मरीज को कुछ होगा तो हम देखेंगे।' डाक्टर ने मुझे धमकाया। मुझे उन पर इतना गुस्सा आया कि मैं क्या बताऊँ लेकिन गुस्से को पी गया क्योंकि वह शहर की इकलौता अस्पताल था जहां अम्माजी का उपचार हो सकता था। बढ़ई का काम फिर शुरू हो गया। मुझे लग रहा था, जैसे बढ़ई नहीं, डाक्टर खुद मेरे सीने में खील ठोक रहा हो॰ क्या करोगे, जिसने भी भारतवर्ष में जन्म लिया है, सबको इसी तरह की परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है और सब की भलाई इसी में रहती है कि वह चुप रहे !
खैर, किसी प्रकार बढ़ई जी का काम पूरा हुआ और वे चले गए। उस रात, छोटे भाई राजकुमार अम्माजी के पास सोए। अगली सुबह लगभग आठ बजे जब मैं कमरे में पहुंचा तो अम्माजी और राजकुमार दोनों गहरी निद्रा में लीन थे। मैंने अम्माजी को जगाने के लिए आवाज़ दी लेकिन वे नहीं जागी, उन्हें हिलाया लेकिन वे नहीं हिली तो मैंने नर्स को बुलाया। नर्स ने उनकी नब्ज चेक की, नब्ज गायब, धड़कन सुनी तो उसे कुछ समझ में न आया तो फटाफट ब्लड-प्रेशर नापा और घबरा कर बोली- 'सब कुछ गड़बड़ है, डाक्टर साहब ही कुछ बताएंगे लेकिन उनको आने में अभी एक घंटे की देर है वे नौ बजे के बाद अस्पताल आते हैं।' मुझे ऐसा लगा कि अम्माजी शांत हो चुकी हैं फिर भी मैंने राजकुमार से कहा- 'डाक्टर के क्वार्टर में जाओ और उन्हें तुरंत लेकर आओ।' राजकुमार डाक्टर को लेने चले गए और मैं अम्माजी के निश्चेष्ट पड़े शरीर को एकटक देखता खड़ा रहा। अचानक मुझे उनके एक घुटने में हल्की सी हरकत दिखी, उसी समय डाक्टर आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'इन्हें 'हाइपो-ग्लायसीमिया' हो गया, नब्ज और धड़कन नहीं के बराबर है, सांस भी नहीं चल रही है। जब मैंने डाक्टर को घुटने में हरकत होने की बात बताई तो वे बोले- 'कोशिश करता हूँ।' उन्होंने नर्स को एक गिलास पानी में शक्कर घोलकर तुरंत लाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में नर्स दौड़ती हुई पानी लेकर आई। डाक्टर ने पानी पिलाने की कोशिश की लेकिन अम्माजी के दाँत एक दूसरे से इस तरह भिंचे हुए थे कि पानी को मुंह में डालना संभव न था। डाक्टर ने ज़ोर लगाकर किसी प्रकार जबड़े को इतना खोला कि पानी जाने की जगह बन गई। कुछ पानी अंदर चला गया, कुछ बाहर बह गया। हम लोग सांस रोके वह सब देखते रहे। दो मिनट बाद नब्ज, सांस और धड़कन वापस आने लगी, दस मिनट बाद उनके शरीर में हरकत होने लगी, उन्होंने आँखें खोल दी। चमत्कार हो गया। कल दोपहर को वह डाक्टर मुझे दैत्य लग रहा था, आज वह देवता-तुल्य लगने लगा।
इस प्रकार दद्दाजी की अम्माजी को अपने सामने विदा करने की इच्छा फलीभूत न हो पाई और इस घटना के चार वर्ष बाद दद्दाजी स्वयं विदा हो गए और अम्माजी को अकेला छोड़ गए। दद्दाजी के महाप्रयाण के बाद अम्माजी चार वर्ष और जीवित रही, 80+ की आयु, हाई-ब्लड प्रेशर, हाई-डायबिटीज़, संक्रमित किडनी, बेतरह कमर का दर्द, बेकार दोनों घुटने, कमजोर आँखें और हर तरह से निर्बल शरीर ओढ़े अम्माजी ने जिस तरह अपना वैधव्य बिताया, मैं आपको क्या बताऊँ ! नौ बच्चों की माँ पेड़ से गिरे सूखे पत्ते की तरह इधर से उधर भटकती रही, उपेक्षित जीवन जीती रही, न जाने क्यों जीती रही ? मुझे इस बात का अक्सर अफसोस होता था कि अम्माजी 1996 की उस सुबह क्यों पुनर्जीवित हो गई ?
इस बीच कुन्तल की पढ़ाई पूरी हो गई, त्रिची से वापस लौटना था. कुन्तल ने मुझे सूचित किया वे मुझे कोयम्बत्तुर में मिलेंगे, वहां एक दिन रूककर त्रिची जाएंगे फिर सब सामान लेकर वापस बिलासपुर. निश्चित तिथि पर मैं कोयम्बत्तुर पहुँच गया. वहां से हम लोग कोई ३५ किलोमीटर दूर वेलियंगिरी पर्वत श्रंखला की तलहटी पर बसे एक आश्रम में पहुंचे. अत्यंत मनोरम वातावरण, 'ध्यान लिंग' का भव्य मंदिर, शांत माहौल वाली यह जगह मनमोहक लगी। वहाँ से हम दोनों सड़क परिवहन से त्रिची के लिए रवाना हुए। बस में कुंतल ने मुझसे कहा- 'पापा, मैं नौकरी नहीं करूंगा।'
'अरे, फिर क्या, व्यापार करोगे ?' मैंने पूछा।
'नहीं।'
'तो ?'
'मैंने कुछ और सोचा है।'
'क्या ?'
'पापा, इस दौरान मैंने देखा कि हमारे आसपास के लोग बहुत दुखी हैं, कष्टों से जूझ रहे हैं, अपने जीवन को सही ढंग से नहीं जी पा रहे हैं।'
'यह सच है, मैं भी ऐसा ही देख रहा हूँ।'
'मैं इस दिशा में कुछ करना चाहता हूँ।'
'क्या करना चाहते हो ?'
'मुझे एक गुरु मिल गए हैं, सद्गुरु जग्गी वासुदेव। मैं उनके साथ काम करना चाहता हूँ।'
'क्या काम ?'
'लोगों को योग-साधना से जोड़ने का। मैंने स्वयं गौर किया, कई ढंग से समझने की कोशिश की तब इस निर्णय पर पहुंचा कि केवल अपने लिए जीने का कोई अर्थ नहीं, मुझे कष्टों से जूझ रहे लोगों के लिए जनजागरण करना चाहिए। योग को अपनाकर वे अपने मन और शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सद्गुरु अद्भुत व्यक्ति हैं, मैं उनके साथ इसी काम को करना चाहता हूँ।' कुंतल ने अपना निर्णय बताया। मैं चुप रह गया। ऐसा समझिए जैसे किसी अनजान सन्नाटे ने मुझे अपने आगोश में समेट लिया हो। हमारी बस तेजी से आगे बढ़ रही थी, मैंने बाहर की ओर देखा, हरे-भरे खेतों की फस्लें पीछे की ओर भागती जा रही थी, सड़क के किनारे लगे ताड़ और नारियल के वृक्ष भी जैसे उल्टे पैर दौड़ रहे थे।
हवा के झोकें आ रहे थे और मैं बस में बैठ-बैठे न जाने कब सो गया। मैंने अनुभव किया है कि जब मेरा दिमाग सुन्न होने लगता है तो नींद मेरी मदद के लिए उपस्थित हो जाती है। त्रिची पहुंचने के बाद हम एक हॉटल में पहुँचे। मेरी दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि कुंतल के इस निर्णय को किन शब्दों में उनकी माँ को बताऊँ ? कैसे संगीता और संज्ञा को बताऊँ ? उस बात को अकेले सह लेने की ताकत मुझमें न थी इसलिए मैंने संगीता को ही बताना तय किया। उन दिनों संगीता इंदौर में रहती थी, मैंने फोन पर जब सब जानकारी दी, वह भी आश्चर्यचकित रह गई। संगीता ने कहा- 'आने दो कम्मू को वापस, फिर बात करेंगे।'
हॉस्टल पहुँच कर सारा सामान पैक किया और कुंतल के विभागाध्यक्ष से मिलने के लिए मैं कुंतल के साथ 'इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेन्ट' पहुँचा। विभाग-प्रमुख मुझसे बेहद गर्मजोशी से मिले और कहा- 'मिस्टर अग्रवाल, यू शेल बी प्राउड ऑफ योर सन, ही इज़ अ मेग्नीफिसेंट एंड डीसेंट ब्वाय।' मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और त्रिची शहर को प्रणाम करके बिलासपुर अपने घर के लिए रवाना हो गए।
डेढ़ दिन का त्रिची से बिलासपुर तक का रेल-सफर एकदम चुप रहा। कभी कुंतल मुझे हौले से देखकर मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता, कभी मैं उसे देखकर कुछ समझने की। ढेर सारी पुरानी यादें दिमाग में घुमड़ने लगी, बचपन का मोटा-ताज़ा कम्मू, बालों में दो चोटी वाला कम्मू, सर्कस में शेर की दहाड़ सुनकर 'पापा, सू-सू लगी है'- कहने वाला कम्मू, सबका प्यारा-दुलारा कम्मू आज कितना बड़ा हो गया ! इतना बड़ा हो गया कि उसे समझना तक मुश्किल हो गया।
कुंतल घर आए, कुल उन्नीस दिन हमारे साथ रहे। सबसे खुलकर बातें की, सबकी बातें धैर्य से सुनी। कठोर और कड़वी बातों को भी सहज भाव से लिया। अत्यंत धीमे स्वर में अपनी बात बताने और समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन उनकी बात किसी को समझ में नहीं आ रही थी। असल में, उनकी बातों के सूत्र कठिन थे, प्रचलित परिपाटी से भिन्न थे इसलिए सहज स्वीकार नहीं हो पा रहे थे। मुझे ऐसा भी लगा कि हम सबके कुछ प्रश्नों के उत्तर जब उन्हें नहीं सूझते थे तो गले से थूक निगल कर चुप हो जाते और मौन साध लेते थे। यह बताना कठिन है कि हम उन्हें नहीं समझा पा रहे थे या हम उन्हें समझ नहीं रहे थे, फिर भी हम सब आश्वस्त थे कि देर-सबेर वे हमारी भावना को अवश्य समझेंगे और अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगे। हमारी चर्चा के अनेक दौर चले, उनकी माँ ने रात-रात भर जागकर उनसे बात की, उनको समझाने की कोशिश की लेकिन कुंतल निरंतर प्रबल होते गए और उनके उत्साह के सामने हम लोग कमजोर पड़ते गए।
अब, माधुरी और मैं अपना मन बनाने में लगे थे लेकिन सांसारिक मनुष्य या तो अतीत में जीता है या भविष्य की योजनाओं में, वर्तमान तो उसकी परिधि से बाहर रहता है इसलिए अनेक विचार-कुविचार दिमाग में आते- जैसे, क्या हो गया है इस लड़के को ? इसे सम्मोहित कर लिया गया है क्या ? इसका दिमाग बहक गया है क्या ? इसकी तबियत ठीक नहीं है क्या ? इसे त्रिची पढ़ने के लिए भेजना क्या हमारा गलत निर्णय था ? यह कोयम्बत्तूर के आश्रम में क्यों गया और वहां कैसे अरझ गया ? इसके गुरु का नाम हमने आज तक नहीं सुना, यह कहीं गलत-सलत बाबा जी के चक्कर में तो नहीं पड़ गया ? इसका भविष्य क्या होगा ? क्या इसको परिवार की जिम्मेदारियां समझ में नहीं आती ?- इस प्रकार के अनंत अनुत्तरित प्रश्न उमड़ते थे। सच बताऊँ, हम लोगों की बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया था।
उसी समय कुंतल अपनी बड़ी बहन संगीता से मिलने इंदौर गए, साथ में संज्ञा भी गई। संगीता, संज्ञा और हमारे दामाद केदार जी के साथ उनकी सुदीर्घ वार्ता हुई। संगीता ने मुझे फोन किया और बताया- 'कुंतल निर्णय कर चुका है, उसे कुछ समझाना असंभव है, मेरे ख्याल से उसे रोकना उचित नहीं होगा, जाने दीजिए।' संगीता के निष्कर्ष से मुझे एक बोध-कथा का स्मरण हो आया- भगवान महावीर एक राजपुत्र थे। किशोरावस्था में भी वे सामान्यतया मौन रहा करते थे। राज्य की गतिविधियों और आमोद-प्रमोद में उनकी रुचि न थी। उनके इस व्यवहार से उनके माता-पिता चिन्तित रहा करते थे क्योंकि महावीर उनके वरिष्ठ पुत्र थे, आगे चलकर राज-काज का काम उन्हें ही सम्हालना था। अचानक पिता की मृत्यु हो गई तब माँ ने राज्य की बागडोर सम्हालने के लिए महावीर से कहा तो वे बोले- 'मेरी राज-काज में रुचि नहीं है, छोटे भाई को राजा बना दीजिए, मैं वन जाना चाहता हूँ, मुझे अनुमति दीजिए।' माँ ने महावीर के स्थान पर छोटे भाई का राजतिलक कर दिया लेकिन महावीर को वन-गमन की अनुमति नहीं दी। महावीर चुप रहे और माँ की बात मान गए लेकिन वे हर समय अपने कक्ष में सिमटे रहते और नितांत एकाकी जीवन बिताने लगे। कई वर्ष बीत गए, महावीर यथावत रहे। जब उनकी माँ ने देखा कि महावीर के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं है तो एक दिन उनसे कहा- 'पुत्र, हमें लगता है कि हमने तुम्हें यहाँ निरर्थक रोक रखा है, तुम वन प्रस्थान कर सकते हो।'
'माँ, मैं तो कब का जा चुका !' महावीर ने उत्तर दिया।
कुंतल इंदौर से वापस आ गए। अब मेरे लिए केवल इतनी उत्सुकता शेष रह गई थी कि कुंतल के सन्यास-संकल्प में कितनी मज़बूती है ! शायद उनका भी मन तनिक डगमगाया भी इसलिए उन्होंने सद्गुरु को 'मेल' से संदेश भेजा, अपनी भावना बताई और मार्गदर्शन माँगा। उत्तर में सद्गुरु ने उन्हें आश्रम पहुँचने के लिए कहा और अपने पास बुला लिया। कुंतल ने सद्गुरु की बात मानी, हमारी नहीं। इस प्रकार कुंतल के द्वारा लिया गया निर्णय पुष्ट हो गया और उनका आश्रम में प्रविष्ट होना तय हो गया। हमारे पास उन्हें अनुमति देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहा। कुंतल ने हमसे कहा- 'इस राह में जाने वाले आम तौर से अपने परिवार को बिना बताए निकल जाते हैं, उनका पता भी नहीं लगता क्योंकि वे जानते हैं कि परिवार के लोग इसके लिए कभी सहमत नहीं होंगे लेकिन मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया। मुझे आप लोगों पर भरोसा है कि आप मेरी बात समझेंगे और इस राह पर आगे बढ्ने की सहर्ष अनुमति देंगे।' हम समझ गए कि उन्हें गुरु मिल गए, वैराग्य घट चुका, संसारिक मोह छूट गया।
ओशो ने पतंजलि योग सूत्र में कहा है - 'सद्गुरु एक 'केटलिटिक एजेंट' है; वह कुछ करता नहीं फिर भी उसके द्वारा बहुत कुछ होता है। वह कर्ता नहीं होता बल्कि एक मौजूदगी होता है जिसके आसपास चीजें घटित होती हैं। ....मात्र उसकी मौजूदगी- यदि तुम प्रवेश करने दो उसकी मौजूदगी को। यह शिष्य पर निर्भर करता है और शिष्य होने का अर्थ यही है कि तुम प्रवेश करने देते हो, कि तुम सहयोग करते हो, कि तुम ग्रहणशील होते हो, कि अब तुम कोई बाधा खड़ी नहीं करते मौजूदगी को प्रवेश करने में। गुरु स्वयं कुछ नहीं करता है, उसकी मौजूदगी ही काम करती है- कुछ होने लगता है।....गुरु और कुछ नहीं है सिवाय एक गर्भ के; उसके द्वारा तुम दोबारा जन्म लेते हो।'
१९ जून २००४ की शाम हमने उन्हें आदर के साथ आसन पर बिठाया, उनका तिलक किया, नारियल और पुष्प भेंट किए और उन्हें जाने की अनुमति देते हुए उन्हें छोड़ने रेलवे स्टेशन गए, उन्हें विदा किया और जाते-जाते कहा- 'हम दोनों इस बात पर विश्वास रखते हैं कि मनुष्य जिस काम को दिल से करता है, उसे ही अच्छे से करता है। तुम जो करना चाहते हो करो, अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ करना, जाओ बेटे, हम तुम्हारे साथ हैं। कभी भी हमारी ज़रूरत हो, हमें ज़रूर याद करना।'
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वायदे के मुताबिक संगीता के सास-श्वसुर जी, संगीता की विदा की अगली सुबह उसे उसके 'हॉस्टल' छोड़ गए ताकि वह परीक्षा की तैयारी कर सके। परीक्षा निरापद हो गई, 'रिजल्ट' आ गया। संगीता ने बी॰डी॰एस॰ के प्रमाणपत्र की छायाप्रति मुझे भेजा और उसी के पीछे एक पत्र भी लिखा :
12-5-2003
प्रिय पापा और मम्मी,
आप लोगों के आशीर्वाद और अनथक सतत प्रयास से अंततः ये हमारा स्वप्न पूर्ण हुआ और आपकी आलसी बेटी एक उपाधि-प्राप्त चिकित्सक बन गई है।
आगे भी यही प्रयास रहेगा कि इतने परिश्रम से जो कार्य की उत्कृष्टता प्राप्त की है उसका फायदा अपने पास आने वाले हर मरीज़ को दूँ। ये मेरी डिग्री पूरी तरह से आप लोगों को समर्पित है।
जैसे मैं और कम्मू एक रास्ते पर चल पड़े हैं, संज्ञा भी जल्दी ही एक राह पकड़ लेगी। अपना परिवार एक मिसाल बनने की राह पर है, आमीन ! !
आपकी बेटी
संगीता
'बिलासपुर
16-9-1999
प्रिय कम्मू,
नए परिवेश में एक आल्हादकारी भविष्य के लिए मिले सुअवसर की बधाई। निश्चिन्त और सुरक्षित व्यवस्था से दूर, एक स्वतंत्र तथा जिम्मेदार युग में तुमने प्रवेश किया है। मैं तुम्हारी मानसिक स्थिति का अनुमान लगा सकता हूँ, तुम्हारे रोमांच और उत्सुकता की कल्पना मुझे है। इसे समग्र रूप से जीना, अपने व्यक्तित्व को विकसित करना और समय का सुनियोजित उपयोग करना- ये सब कैसे होगा- इसे तुम देखो, समझो और करो। तुम भाग्यशाली हो की तुम्हें ऐसे संस्थान में पढ़ने का, स्वयं को विकसित करने का अवसर मिला जिसमें देश के सर्वश्रेष्ठ युवा साथ मिलजुल कर अपने भविष्य की कहानी लिख रहे हैं।
तुमने मुझसे चर्चा में कहा था कि इन श्रेष्ठ छात्रों के साथ तुम्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक है लेकिन यदि गौर करो तो वास्तविक प्रतिस्पर्धा तुम्हारी स्वयं से है। प्रति-क्षण, तुम बीते क्षण के मुक़ाबले अब कैसे हो ? बताओ, मुख्य प्रतिस्पर्धी कौन है ? निश्चयतः व्यवस्थित परिश्रम के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। तुम योग्य हो और समझदार भी। हम सब, तुम पर, तुम्हारी प्रतिभा पर भरोसा करते हैं।
तुमने मुझसे चर्चा में कहा था कि इन श्रेष्ठ छात्रों के साथ तुम्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक है लेकिन यदि गौर करो तो वास्तविक प्रतिस्पर्धा तुम्हारी स्वयं से है। प्रति-क्षण, तुम बीते क्षण के मुक़ाबले अब कैसे हो ? बताओ, मुख्य प्रतिस्पर्धी कौन है ? निश्चयतः व्यवस्थित परिश्रम के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। तुम योग्य हो और समझदार भी। हम सब, तुम पर, तुम्हारी प्रतिभा पर भरोसा करते हैं।
मम्मी तुम्हें खूब याद करती है, कभी बहुत खुश हो जाती है, कभी आँखें गीली हो जाती हैं, आखिर माँ हैं। संज्ञा की पढ़ाई तेजी से शुरू हो गई है, आसार अच्छे नज़र आते हैं। अपना ख्याल रखना।
पापा॰'
त्रिची इंजीनियरिंग कालेज तमिलनाडु में है जहां अंग्रेज़ी और तमिल भाषा का बोलबाला है। तमिलनाडु की अँग्रेजी भी तमिल भाषा के लहज़े से प्रभावित रहती है इसलिए कुंतल को शुरुआती दिनों में भाषा संबंधी असुविधा रही जिसके कारण उन्हें वहाँ के माहौल से स्वयं को अनुकूलित करना कठिन लगा लेकिन समय बीतता गया और कुंतल बी॰टेक॰ के अंतिम सेमेस्टर में पहुँच गए। उन्हीं दिनों देश की अनेक प्रतिष्ठित व्यापारिक संस्थान कालेज में 'केम्पस इंटरव्यू' के लिए पहुंचे। कुंतल ने पुणे के संस्थान 'टेल्को आटोमोबाइल्स' के लिए साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार पूरा हो जाने के बाद कुंतल ने उठते-उठते उनसे कहा- 'मैं आपकी कंपनी में केवल 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' विभाग में ही काम करूंगा, अन्य कार्यों में मेरी रुचि नहीं है।'
'हम ऐसा वादा नहीं कर सकते।' उन्होंने उत्तर दिया।
'तो फिर, यदि आपने मेरा चयन किया हो तो बेहतर है यह 'जाब' किसी दूसरे को दे दीजिए।'
'हम ऐसा कर सकते हैं कि 'प्रोबेशन पीरियड' में आपका काम देखेंगे, अगर उचित समझ में आया तो 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' दे देंगे।'
'मुझे मंजूर है।' कुंतल ने सहमति दी। इस प्रकार कुंतल को अंतिम सेमेस्टर के दौरान 25 फरवरी 2003 को 'आफ़र लेटर' आ गया। नियुक्ति की शर्त यह थी कि 'ग्रेजुएट डिग्री' न्यूनतम 60% अंक लेकर उत्तीर्ण होना अनिवार्य था जबकि कुंतल ने 82% अंक हासिल किए। इसी कुंतल को बिलासपुर के हिन्दी माध्यम स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' के प्राचार्य ने परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका को कोरा छोड़ देने और उस पर आचार्य जी का कार्टून बनाने के अपराध में कड़ी चेतावनी दी गई थी. पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह कुंतल की जब आँख खुली तब उसने वह हासिल किया जो सच में किसी अजूबे से कम न था।
26 मार्च 2003 को त्रिची से कुंतल ने एक पत्र हमें भेजा, उसके पूर्वार्द्ध हिस्से को आप पढिए :
'डीयर पापा, मम्मी और दीदी,
मैं यहाँ एकदम ठीक हूँ और आप लोग भी मज़े में होंगे ऐसी कामना करता हूँ।
अब बस, कालेज के कुछ आखिरी दिन बचे हैं। आज भी उस दिन की यादें एकदम सजीव हैं जिस दिन घर से निकला था यहाँ आने के लिए। पता ही नहीं चला कब समय निकल गया। चार साल तो बस यूं ही निकल गए। इन चार सालों में बहुत कुछ सीखा, कुछ पाया, कुछ खोया, अच्छा समय देखा। दोस्त बनाए, तमिल नहीं सीख पाया। काम किया, सोया, ज़्यादा पढ़ाई नहीं की पर एक अच्छी नौकरी लग गई। English improve हो गई, हिन्दी खराब हो गई, और भी बहुत कुछ ! बिना उम्मीद किए एक मौका भी मिला, इन सब चीजों से ऊपर उठकर ( या फिर नीचे जाकर) अपने आपको पहचानने का। एक गुरु, जिन्होंने जीवन को एक नई दिशा दी है। समझ में आया कि अभी तक जो कुछ भी कर रहा था- पता नहीं क्यों कर रहा था ? अभी भी लक्ष्य एकदम स्पष्ट नहीं है, पर atleast, एक दिशा है। मार्ग पर चलना अभी भी कठिन है। ढेर सारे दुश्मन हैं, बाहर नहीं, अंदर हैं। जब तक खुद पर काबू नहीं कर पाता, लक्ष्य तक पहुँचना असंभव रहेगा।
आप लोगों को अज़ीब लग रहा होगा की छोटा सा कम्मू कैसी-कैसी बातें कर रहा है पर पता नहीं, कुछ तो परिवर्तन आया है। बाहर से शायद अभी भी वैसा दिखूँ, पर अंदर ही अंदर, जीवन के लिए पूरा दृष्टिकोण ही बदल गया है। शुरू-शुरू में बहुत कठिनाई हुई, अभी भी होती है क्योंकि आस-पास रहनेवाले लोग इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाते पर धीर-धीरे इन चीजों से निपटना भी आने लगा है। एक बात तो है, जीवन पहले जैसा नहीं रहा। अब यह कहीं ज़्यादा रोमांचक, अर्थपूर्ण और मज़ेदार होता जा रहा है।.....
कंपनी से offer/joining letter आ गया है। उसकी जेरोक्स कापी भेज रहा हूँ, उसमें ढेर सारी बातें लिखी हैं। पता नहीं क्या मिलेगा...कितना मिलेगा ? पर, अनुमानतः दस-बारह हजार के आसपास हाथ में आना चाहिए। खैर, वहाँ जाकर ही पता चलेगा कि क्या होने वाला है। I am absolutely ready and very excited. पर उसके पहले घर में बीतनेवाली छुट्टियों का लालच आ रहा है। मैं इस बार भी घर से कहीं नहीं निकलने वाला। उम्मीद है आप लोग मुझे ज़्यादा नहीं हड़काएंगे।.....
अब पत्र बंद करता हूँ। ढेर सारा प्यार।
आपका - कम्मू '
दद्दाजी के निधन के पश्चात अम्माजी अकेली पड़ गई। दद्दाजी उन्हें आदतन डांटते रहते थे, वे उनकी डांट की इतनी आदी हो गई थी कि उन पर उसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। दद्दाजी कहा करते थे- 'ये मेरे ज़िन्दा रहते, मेरे सामने चली जाएँ तो अच्छा है' लेकिन ऐसा होते-होते रह गया। इस धरती पर आना या वापस जाना किसी के हाथ में तो है नहीं!
हुआ यह कि सन १९९६ में अम्माजी को एक शाम 'माइनर हार्ट अटैक' आया, उन्हें शासकीय अस्पताल में भरती किया गया। आई॰सी॰सी॰यू॰ में उन्हें सघन देखभाल और चिकित्सा के लिए रखा गया। वहाँ के 'मेडिकल स्पेशलिस्ट' डा॰एस॰के॰निगम की देखरेख में इलाज़ चल रहा था। दूसरे दिन की बात है, एक बढ़ई आई॰सी॰यू॰ में आया और रोशनदान की 'रिपेयरिंग' करने लगा। हथौड़े से चल रही तोड़फोड़ के कारण तेज आवाज हो रही थी, इस कारण अम्माजी को सोने में व्यवधान हो रहा था। मैंने बढ़ई को टोका और काम करने से रोका। बढ़ई चला गया और थोड़ी देर बाद डाक्टर को अपने साथ ले आया। डाक्टर मुझ पर भड़क गए और कहा- 'आपने बढ़ई को काम करने से क्यों रोका ?'
'बहुत तेज आवाज़ के कारण मरीज को तकलीफ हो रही थी, इसलिए।' मैंने जवाब दिया।'आपको मालूम है कि बढ़ई मिलना कितना कठिन है, बड़ी मुश्किल से यह आया है तो आपने इसे भगा दिया।'
'मरीज की तकलीफ भी तो देखिए, डाक्टर साहब!'
'मरीज तो अभी ठीक है, क्या हुआ है, आप हमारे काम में रोक-टोक मत करें, मरीज को कुछ होगा तो हम देखेंगे।' डाक्टर ने मुझे धमकाया। मुझे उन पर इतना गुस्सा आया कि मैं क्या बताऊँ लेकिन गुस्से को पी गया क्योंकि वह शहर की इकलौता अस्पताल था जहां अम्माजी का उपचार हो सकता था। बढ़ई का काम फिर शुरू हो गया। मुझे लग रहा था, जैसे बढ़ई नहीं, डाक्टर खुद मेरे सीने में खील ठोक रहा हो॰ क्या करोगे, जिसने भी भारतवर्ष में जन्म लिया है, सबको इसी तरह की परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है और सब की भलाई इसी में रहती है कि वह चुप रहे !
खैर, किसी प्रकार बढ़ई जी का काम पूरा हुआ और वे चले गए। उस रात, छोटे भाई राजकुमार अम्माजी के पास सोए। अगली सुबह लगभग आठ बजे जब मैं कमरे में पहुंचा तो अम्माजी और राजकुमार दोनों गहरी निद्रा में लीन थे। मैंने अम्माजी को जगाने के लिए आवाज़ दी लेकिन वे नहीं जागी, उन्हें हिलाया लेकिन वे नहीं हिली तो मैंने नर्स को बुलाया। नर्स ने उनकी नब्ज चेक की, नब्ज गायब, धड़कन सुनी तो उसे कुछ समझ में न आया तो फटाफट ब्लड-प्रेशर नापा और घबरा कर बोली- 'सब कुछ गड़बड़ है, डाक्टर साहब ही कुछ बताएंगे लेकिन उनको आने में अभी एक घंटे की देर है वे नौ बजे के बाद अस्पताल आते हैं।' मुझे ऐसा लगा कि अम्माजी शांत हो चुकी हैं फिर भी मैंने राजकुमार से कहा- 'डाक्टर के क्वार्टर में जाओ और उन्हें तुरंत लेकर आओ।' राजकुमार डाक्टर को लेने चले गए और मैं अम्माजी के निश्चेष्ट पड़े शरीर को एकटक देखता खड़ा रहा। अचानक मुझे उनके एक घुटने में हल्की सी हरकत दिखी, उसी समय डाक्टर आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'इन्हें 'हाइपो-ग्लायसीमिया' हो गया, नब्ज और धड़कन नहीं के बराबर है, सांस भी नहीं चल रही है। जब मैंने डाक्टर को घुटने में हरकत होने की बात बताई तो वे बोले- 'कोशिश करता हूँ।' उन्होंने नर्स को एक गिलास पानी में शक्कर घोलकर तुरंत लाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में नर्स दौड़ती हुई पानी लेकर आई। डाक्टर ने पानी पिलाने की कोशिश की लेकिन अम्माजी के दाँत एक दूसरे से इस तरह भिंचे हुए थे कि पानी को मुंह में डालना संभव न था। डाक्टर ने ज़ोर लगाकर किसी प्रकार जबड़े को इतना खोला कि पानी जाने की जगह बन गई। कुछ पानी अंदर चला गया, कुछ बाहर बह गया। हम लोग सांस रोके वह सब देखते रहे। दो मिनट बाद नब्ज, सांस और धड़कन वापस आने लगी, दस मिनट बाद उनके शरीर में हरकत होने लगी, उन्होंने आँखें खोल दी। चमत्कार हो गया। कल दोपहर को वह डाक्टर मुझे दैत्य लग रहा था, आज वह देवता-तुल्य लगने लगा।
इस प्रकार दद्दाजी की अम्माजी को अपने सामने विदा करने की इच्छा फलीभूत न हो पाई और इस घटना के चार वर्ष बाद दद्दाजी स्वयं विदा हो गए और अम्माजी को अकेला छोड़ गए। दद्दाजी के महाप्रयाण के बाद अम्माजी चार वर्ष और जीवित रही, 80+ की आयु, हाई-ब्लड प्रेशर, हाई-डायबिटीज़, संक्रमित किडनी, बेतरह कमर का दर्द, बेकार दोनों घुटने, कमजोर आँखें और हर तरह से निर्बल शरीर ओढ़े अम्माजी ने जिस तरह अपना वैधव्य बिताया, मैं आपको क्या बताऊँ ! नौ बच्चों की माँ पेड़ से गिरे सूखे पत्ते की तरह इधर से उधर भटकती रही, उपेक्षित जीवन जीती रही, न जाने क्यों जीती रही ? मुझे इस बात का अक्सर अफसोस होता था कि अम्माजी 1996 की उस सुबह क्यों पुनर्जीवित हो गई ?
इस बीच कुन्तल की पढ़ाई पूरी हो गई, त्रिची से वापस लौटना था. कुन्तल ने मुझे सूचित किया वे मुझे कोयम्बत्तुर में मिलेंगे, वहां एक दिन रूककर त्रिची जाएंगे फिर सब सामान लेकर वापस बिलासपुर. निश्चित तिथि पर मैं कोयम्बत्तुर पहुँच गया. वहां से हम लोग कोई ३५ किलोमीटर दूर वेलियंगिरी पर्वत श्रंखला की तलहटी पर बसे एक आश्रम में पहुंचे. अत्यंत मनोरम वातावरण, 'ध्यान लिंग' का भव्य मंदिर, शांत माहौल वाली यह जगह मनमोहक लगी। वहाँ से हम दोनों सड़क परिवहन से त्रिची के लिए रवाना हुए। बस में कुंतल ने मुझसे कहा- 'पापा, मैं नौकरी नहीं करूंगा।'
'अरे, फिर क्या, व्यापार करोगे ?' मैंने पूछा।
'नहीं।'
'तो ?'
'मैंने कुछ और सोचा है।'
'क्या ?'
'पापा, इस दौरान मैंने देखा कि हमारे आसपास के लोग बहुत दुखी हैं, कष्टों से जूझ रहे हैं, अपने जीवन को सही ढंग से नहीं जी पा रहे हैं।'
'यह सच है, मैं भी ऐसा ही देख रहा हूँ।'
'मैं इस दिशा में कुछ करना चाहता हूँ।'
'क्या करना चाहते हो ?'
'मुझे एक गुरु मिल गए हैं, सद्गुरु जग्गी वासुदेव। मैं उनके साथ काम करना चाहता हूँ।'
'क्या काम ?'
'लोगों को योग-साधना से जोड़ने का। मैंने स्वयं गौर किया, कई ढंग से समझने की कोशिश की तब इस निर्णय पर पहुंचा कि केवल अपने लिए जीने का कोई अर्थ नहीं, मुझे कष्टों से जूझ रहे लोगों के लिए जनजागरण करना चाहिए। योग को अपनाकर वे अपने मन और शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सद्गुरु अद्भुत व्यक्ति हैं, मैं उनके साथ इसी काम को करना चाहता हूँ।' कुंतल ने अपना निर्णय बताया। मैं चुप रह गया। ऐसा समझिए जैसे किसी अनजान सन्नाटे ने मुझे अपने आगोश में समेट लिया हो। हमारी बस तेजी से आगे बढ़ रही थी, मैंने बाहर की ओर देखा, हरे-भरे खेतों की फस्लें पीछे की ओर भागती जा रही थी, सड़क के किनारे लगे ताड़ और नारियल के वृक्ष भी जैसे उल्टे पैर दौड़ रहे थे।
हवा के झोकें आ रहे थे और मैं बस में बैठ-बैठे न जाने कब सो गया। मैंने अनुभव किया है कि जब मेरा दिमाग सुन्न होने लगता है तो नींद मेरी मदद के लिए उपस्थित हो जाती है। त्रिची पहुंचने के बाद हम एक हॉटल में पहुँचे। मेरी दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि कुंतल के इस निर्णय को किन शब्दों में उनकी माँ को बताऊँ ? कैसे संगीता और संज्ञा को बताऊँ ? उस बात को अकेले सह लेने की ताकत मुझमें न थी इसलिए मैंने संगीता को ही बताना तय किया। उन दिनों संगीता इंदौर में रहती थी, मैंने फोन पर जब सब जानकारी दी, वह भी आश्चर्यचकित रह गई। संगीता ने कहा- 'आने दो कम्मू को वापस, फिर बात करेंगे।'
हॉस्टल पहुँच कर सारा सामान पैक किया और कुंतल के विभागाध्यक्ष से मिलने के लिए मैं कुंतल के साथ 'इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेन्ट' पहुँचा। विभाग-प्रमुख मुझसे बेहद गर्मजोशी से मिले और कहा- 'मिस्टर अग्रवाल, यू शेल बी प्राउड ऑफ योर सन, ही इज़ अ मेग्नीफिसेंट एंड डीसेंट ब्वाय।' मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और त्रिची शहर को प्रणाम करके बिलासपुर अपने घर के लिए रवाना हो गए।
डेढ़ दिन का त्रिची से बिलासपुर तक का रेल-सफर एकदम चुप रहा। कभी कुंतल मुझे हौले से देखकर मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता, कभी मैं उसे देखकर कुछ समझने की। ढेर सारी पुरानी यादें दिमाग में घुमड़ने लगी, बचपन का मोटा-ताज़ा कम्मू, बालों में दो चोटी वाला कम्मू, सर्कस में शेर की दहाड़ सुनकर 'पापा, सू-सू लगी है'- कहने वाला कम्मू, सबका प्यारा-दुलारा कम्मू आज कितना बड़ा हो गया ! इतना बड़ा हो गया कि उसे समझना तक मुश्किल हो गया।
कुंतल घर आए, कुल उन्नीस दिन हमारे साथ रहे। सबसे खुलकर बातें की, सबकी बातें धैर्य से सुनी। कठोर और कड़वी बातों को भी सहज भाव से लिया। अत्यंत धीमे स्वर में अपनी बात बताने और समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन उनकी बात किसी को समझ में नहीं आ रही थी। असल में, उनकी बातों के सूत्र कठिन थे, प्रचलित परिपाटी से भिन्न थे इसलिए सहज स्वीकार नहीं हो पा रहे थे। मुझे ऐसा भी लगा कि हम सबके कुछ प्रश्नों के उत्तर जब उन्हें नहीं सूझते थे तो गले से थूक निगल कर चुप हो जाते और मौन साध लेते थे। यह बताना कठिन है कि हम उन्हें नहीं समझा पा रहे थे या हम उन्हें समझ नहीं रहे थे, फिर भी हम सब आश्वस्त थे कि देर-सबेर वे हमारी भावना को अवश्य समझेंगे और अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगे। हमारी चर्चा के अनेक दौर चले, उनकी माँ ने रात-रात भर जागकर उनसे बात की, उनको समझाने की कोशिश की लेकिन कुंतल निरंतर प्रबल होते गए और उनके उत्साह के सामने हम लोग कमजोर पड़ते गए।
अब, माधुरी और मैं अपना मन बनाने में लगे थे लेकिन सांसारिक मनुष्य या तो अतीत में जीता है या भविष्य की योजनाओं में, वर्तमान तो उसकी परिधि से बाहर रहता है इसलिए अनेक विचार-कुविचार दिमाग में आते- जैसे, क्या हो गया है इस लड़के को ? इसे सम्मोहित कर लिया गया है क्या ? इसका दिमाग बहक गया है क्या ? इसकी तबियत ठीक नहीं है क्या ? इसे त्रिची पढ़ने के लिए भेजना क्या हमारा गलत निर्णय था ? यह कोयम्बत्तूर के आश्रम में क्यों गया और वहां कैसे अरझ गया ? इसके गुरु का नाम हमने आज तक नहीं सुना, यह कहीं गलत-सलत बाबा जी के चक्कर में तो नहीं पड़ गया ? इसका भविष्य क्या होगा ? क्या इसको परिवार की जिम्मेदारियां समझ में नहीं आती ?- इस प्रकार के अनंत अनुत्तरित प्रश्न उमड़ते थे। सच बताऊँ, हम लोगों की बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया था।
उसी समय कुंतल अपनी बड़ी बहन संगीता से मिलने इंदौर गए, साथ में संज्ञा भी गई। संगीता, संज्ञा और हमारे दामाद केदार जी के साथ उनकी सुदीर्घ वार्ता हुई। संगीता ने मुझे फोन किया और बताया- 'कुंतल निर्णय कर चुका है, उसे कुछ समझाना असंभव है, मेरे ख्याल से उसे रोकना उचित नहीं होगा, जाने दीजिए।' संगीता के निष्कर्ष से मुझे एक बोध-कथा का स्मरण हो आया- भगवान महावीर एक राजपुत्र थे। किशोरावस्था में भी वे सामान्यतया मौन रहा करते थे। राज्य की गतिविधियों और आमोद-प्रमोद में उनकी रुचि न थी। उनके इस व्यवहार से उनके माता-पिता चिन्तित रहा करते थे क्योंकि महावीर उनके वरिष्ठ पुत्र थे, आगे चलकर राज-काज का काम उन्हें ही सम्हालना था। अचानक पिता की मृत्यु हो गई तब माँ ने राज्य की बागडोर सम्हालने के लिए महावीर से कहा तो वे बोले- 'मेरी राज-काज में रुचि नहीं है, छोटे भाई को राजा बना दीजिए, मैं वन जाना चाहता हूँ, मुझे अनुमति दीजिए।' माँ ने महावीर के स्थान पर छोटे भाई का राजतिलक कर दिया लेकिन महावीर को वन-गमन की अनुमति नहीं दी। महावीर चुप रहे और माँ की बात मान गए लेकिन वे हर समय अपने कक्ष में सिमटे रहते और नितांत एकाकी जीवन बिताने लगे। कई वर्ष बीत गए, महावीर यथावत रहे। जब उनकी माँ ने देखा कि महावीर के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं है तो एक दिन उनसे कहा- 'पुत्र, हमें लगता है कि हमने तुम्हें यहाँ निरर्थक रोक रखा है, तुम वन प्रस्थान कर सकते हो।'
'माँ, मैं तो कब का जा चुका !' महावीर ने उत्तर दिया।
कुंतल इंदौर से वापस आ गए। अब मेरे लिए केवल इतनी उत्सुकता शेष रह गई थी कि कुंतल के सन्यास-संकल्प में कितनी मज़बूती है ! शायद उनका भी मन तनिक डगमगाया भी इसलिए उन्होंने सद्गुरु को 'मेल' से संदेश भेजा, अपनी भावना बताई और मार्गदर्शन माँगा। उत्तर में सद्गुरु ने उन्हें आश्रम पहुँचने के लिए कहा और अपने पास बुला लिया। कुंतल ने सद्गुरु की बात मानी, हमारी नहीं। इस प्रकार कुंतल के द्वारा लिया गया निर्णय पुष्ट हो गया और उनका आश्रम में प्रविष्ट होना तय हो गया। हमारे पास उन्हें अनुमति देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहा। कुंतल ने हमसे कहा- 'इस राह में जाने वाले आम तौर से अपने परिवार को बिना बताए निकल जाते हैं, उनका पता भी नहीं लगता क्योंकि वे जानते हैं कि परिवार के लोग इसके लिए कभी सहमत नहीं होंगे लेकिन मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया। मुझे आप लोगों पर भरोसा है कि आप मेरी बात समझेंगे और इस राह पर आगे बढ्ने की सहर्ष अनुमति देंगे।' हम समझ गए कि उन्हें गुरु मिल गए, वैराग्य घट चुका, संसारिक मोह छूट गया।
ओशो ने पतंजलि योग सूत्र में कहा है - 'सद्गुरु एक 'केटलिटिक एजेंट' है; वह कुछ करता नहीं फिर भी उसके द्वारा बहुत कुछ होता है। वह कर्ता नहीं होता बल्कि एक मौजूदगी होता है जिसके आसपास चीजें घटित होती हैं। ....मात्र उसकी मौजूदगी- यदि तुम प्रवेश करने दो उसकी मौजूदगी को। यह शिष्य पर निर्भर करता है और शिष्य होने का अर्थ यही है कि तुम प्रवेश करने देते हो, कि तुम सहयोग करते हो, कि तुम ग्रहणशील होते हो, कि अब तुम कोई बाधा खड़ी नहीं करते मौजूदगी को प्रवेश करने में। गुरु स्वयं कुछ नहीं करता है, उसकी मौजूदगी ही काम करती है- कुछ होने लगता है।....गुरु और कुछ नहीं है सिवाय एक गर्भ के; उसके द्वारा तुम दोबारा जन्म लेते हो।'
१९ जून २००४ की शाम हमने उन्हें आदर के साथ आसन पर बिठाया, उनका तिलक किया, नारियल और पुष्प भेंट किए और उन्हें जाने की अनुमति देते हुए उन्हें छोड़ने रेलवे स्टेशन गए, उन्हें विदा किया और जाते-जाते कहा- 'हम दोनों इस बात पर विश्वास रखते हैं कि मनुष्य जिस काम को दिल से करता है, उसे ही अच्छे से करता है। तुम जो करना चाहते हो करो, अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ करना, जाओ बेटे, हम तुम्हारे साथ हैं। कभी भी हमारी ज़रूरत हो, हमें ज़रूर याद करना।'
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