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भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन किया है, ये सभी रस साहित्य, नृत्य और सामान्य भावाभिव्यक्ति में इस तरह रच-बस गए हैं कि इनके गूढ़ार्थ सहज ही सबको समझ आ जाते हैं। एक और रस है जो इन उल्लेखित रसों में उद्घाटित नहीं हो पाया है- वह है- 'बतरस।' आदि-काल से बतरस का प्रभाव हमारे जनजीवन में अति-व्यापक रहा है। बतरस गंभीर वार्तालाप है, भाषण देना-सुनना है, प्रवचन-सत्संग है, निःशुल्क मनोरंजन है और मनुष्य के पेट में उठे दर्द को दूर करने की दवा भी है।
मेरे बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया की गद्दी में अधिकतर समय उनके मित्रों और परिचितों की बैठक चलती जिसमें भाग लेने के लिए लोग पैदल या साइकल-स्कूटर चलाते या कार में बैठकर नियमित रूप से आते, घंटों विविध विषयों पर बातचीत होती, बहस होती, कहा-सुनी होती और उस बीच में चाय-नास्ता का दौर चलता। अपने विचार सभी लोग व्यक्त करते लेकिन स्वाभाविक रूप से स्थल व चाय-नास्ता मुहय्या करवाने वाले को बोलने का अवसर अधिक मिलता और उसकी बात अधिक मानी जाती। हमारे परिवार के पुरुषों को इस रस का निर्मल आनंद उठाते मैंने बचपन से युवावस्था तक नियमित देखा तो उसका असर मुझ पर भी पड़ा। यद्यपि बड़ी महफिल सजाने का चस्का नहीं लगा लेकिन आपसी संवाद करने का शौक लगातार बढ़ता गया। बचपन में हम लोग की बातचीत के विषय थे- हमारे मास्साब और पढ़ाई, किशोरावस्था में फिल्में, युवावस्था में लड़कियां और प्रौढ़ावस्था में राजनीति और साहित्य।
यूं तो बतरस वाली दोस्ती असंख्य लोगों से रही है लेकिन कुछ लोग मेरे जीवन में ऐसे रहे जिनके साथ बातें करते मेरे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता जिसमें सर्वोच्च हैं मेरी 'बेस्टेस्ट फ्रेंड' माधुरी। उनके अतिरिक्त किशोरावस्था के मित्र- (स्व॰) लक्ष्मीनारायण शर्मा; और सुधीर खंडेलवाल; वयस्क-प्रौढ़ वय के मित्र- (स्व॰) पंडित मुरलीधर मिश्र, (स्व॰) प्रोफेसर बी॰के॰ श्रीवास्तव, (स्व॰) भागवत प्रसाद दुबे, (स्व॰) राम किशन खंडेलवाल, (स्व॰) कुतुबुद्दीन भारमल, (स्व॰) महेश भट्ट, (स्व॰) इंदर सोंथलिया, (स्व॰) रमाकांत मिश्र; और बजरंग लोहिया, जगत नारायण तिवारी, सतीश जायसवाल, कान्तिलाल जोबनपुत्रा, वी॰एस॰तैलंग, डा॰ महेश कासलीवाल, चन्द्रशेखर जालान, सुभाष दुबे, जगदीश दुआ, बजरंग केडिया, विनोद मिश्र, विवेक जोगलेकर आदि कुछ और भी। मित्रों के इस समूह के साथ बैठकर आपस में विभिन्न विषयों पर होती चर्चा से प्राप्त परम-आनंद के क्या कहने ! वह जीवंनदायी बतरस था जो बहुत कुछ सिखाता, व्यक्तित्व विकसित करता, प्रतिकूल परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत देता, मार्ग दर्शन देता, दुख कम करता और कभी-कभी हँसाता भी था। जब भी प्रतिकूल मनस्थिति में मेरे दिमाग को लकवा लगने जैसा लगता तब ये लोग मेरे विवेक-रक्षक-साथी थे। मैंने इतने बुरे दिन देखे कि यदि इन मित्रों का साथ न होता तो मैं किसी पागलखाने में होता या किसी तेजी से आती ट्रेन के आगे खड़ा होकर अपने प्राण दे चुका होता।
कठिन समय में इनका साथ बहुत साथ देता था, इनकी बातें भी साथ देती थी। बातें करने से दिल बहल जाता था, थोड़ा 'डायवर्सन' हो जाता था और दिल को दिलासा भी। कुछ मित्र तो मुझसे इतनी दूर चले गए कि अब उनसे मिलना न होगा लेकिन कुछ का साथ अब भी बना हुआ है।
श्री बजरंग केडिया मुझसे दस वर्ष बड़े हैं, सौभाग्य से मित्रवत है। उनसे दिल की बातें निःसंकोच की जा सकती हैं, वे मुझे 'प्रेक्टिकल' सलाहकार से लगते हैं। एक दिन अपनी चिन्ता का बोझ लिए मैं उनके घर पहुंचा, मेरी समस्या को वे गौर से सुने और बोले- 'देखो द्वारिका, मैं तुमको एक बात बताता हूँ, किसी लड़की की शादी आज तक पैसों की कमी के कारण नहीं रुकी। सब इंतजाम हो जाता है, कैसे हो जाता है, पता नहीं ! तुम मानो, हर लड़की इस संसार में अपना भाग्य लेकर आती है।'
एक दिन भावी समधी जी का एसएमएस आया- 'मेरा तालाब सूख गया है उसमें जल भरें।' मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। अब मैं क्या जवाब देता ? मेरे नल से तो पानी की जगह हवा निकल रही थी और उसमें से 'सूँ-सूँ' की आवाज़ आ रही थी, इस आवाज़ से तो समधी जी का सूखा तालाब भरने से रहा। और तो और, एक दिन भावी दामाद का भी फोन पर तगादा आ गया- 'क्या हुआ ?'
उधर वे हमसे हलाकान थे, इधर हम खुद से परेशान। विवाह की तिथि जितनी नजदीक आती जा रही थी, चिन्ता उतनी बढ़ती जा रही थी। हमारी हालत उस किसान की तरह थी जो अपनी सूखती फ़सल को बचाने के लिए बारिश के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहा हो और बादलों का कोई अता-पता न हो। मुझे निष्क्रिय और निश्चिंत देखकर माधुरी झल्ला उठती- 'क्या कर रहे हो तुम ?'
'कुछ नहीं।' मेरा बुझा सा उत्तर उसे और बुझा देता। उन्होंने मुझसे कहा- 'मेरे गहने 'बैंक लाकर' से निकाल लो, बेचो और झंझट खत्म करो।'
'उतने से भी काम नहीं बनने वाला।'
'फिर ?'
'देखते हैं।' मैंने तथागत गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठे-बैठे उत्तर दिया।
एक दिन सुबह दस बजे मैं अपने एक पुराने सहपाठी के घर पहुँच गया। हम दोनों हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे। मुझे देख उसने पूछा- 'आओ द्वारिका, आज अचानक, सुबह-सुबह ?' मैंने अपनी समस्या बताई तो उसने कहा- 'फिक्र मत कर, तेरा काम हो जाएगा, रुक तेरे लिए चाय बनवाता हूँ। कैसी चाय पिएगा, शक्कर वाली या बिना शक्कर वाली ?'
'शक्कर वाली, ज़रा कडक।' मैंने कहा। हम दोनों के लिए चाय आई, मेरे लिए कड़ी-मीठी और उसके लिए बिना शक्कर वाली।
घर आकर मैंने माधुरी को बताया- 'हो गया।'
'अरे वाह, किसने दिया ?'
'फकीरों ने।'
'फकीरों ने ?'
'हूँ, उन्होंने कहा था न, 'अल्लई देगा', उसी ने दिया।' मैंने कहा।
इसके कुछ दिनों बाद हमारी लाज़ में एक ग्राहक आए, रीवा (मध्यप्रदेश) से, पंडित अखंड प्रताप नारायण मिश्र, अपनी बेटी को राज्य सेवा की परीक्षा दिलवाने। दो-तीन दिन रुके, परिचय बढ़ा, उनकी बातचीत की शैली प्रभावित करने वाली थी। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अगले माह बेटी का विवाह है। उन्होंने मुझसे पूछा- 'कुंडली मिलवा ली है न ?'
'हमें लड़के की कुंडली नहीं दी गई, लेकिन उनका जन्म समय और स्थान मालूम था इसलिए उस आधार पर कंप्यूटर से मिलान करवाया था, कुछ दोष हैं, पर चलता है।' मैंने बताया।
'एक बार मुझे दिखाएंगे क्या, अगर आप उचित समझें ?'
'क्यों नहीं।' मैंने उन्हें दोनों कुंडली दी, उन्होंने कुछ देर दोनों का अध्ययन किया और मुझसे बोले- 'अग्रवाल जी, मेरी राय है कि आप यह संबंध न करें।'
'क्यों ?' मैंने प्रश्न किया। उन्होंने संज्ञा के वैवाहिक भविष्य और ससुराल के बारे में कई ऐसी बातें बताई जो चिंताजनक थी, नकारात्मक दिशा में जा रही थी। मैं सोच में पड़ गया। दुविधा अज़ब थी, एक तरफ हमारी बेटी का प्यार और दूसरी तरफ हमारा अपनी बिटिया से प्यार !
'जो होगा, सो होगा पंडित जी, अब इस विवाह को रोकना हमारे लिए असंभव है।' मैंने कहा।
'तो जैसा प्रभु ने रच रखा है, होने दीजिए, सब उनकी माया है।' वे गंभीर होकर बोले।
नियत तिथि पर दोनों परिवार एकत्रित हुए, वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए और हमने अपनी बिटिया को विदा किया। हमें खुशी थी कि हम अपनी बेटी के प्यार को सुखद परिणिति तक ले जाने में सहयोग कर सके।
पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म 'नीलकमल' (1968) में रफी साहब ने साहिर लुधियानवी का लिखा यह मार्मिक गीत गाया था, इसे सरसरी निगाह से नहीं, जरा डूब कर पढिए:
'बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰
नाज़ों से तुझे पाला मैंने
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको
बाहों में मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की ऐ नाज़ुक डाली
तुझे हर पल नई बहार मिले॰
जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों में हंसी की धूप खिले
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी ज्योति न हो फीकी
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले॰
बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ
आराम की ठंडी छांव में,
कांटा भी न चुभने पाए कभी
मेरी लाडली तेरे पाँव में,
उस द्वार से सब दुख दूर रहे
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले॰
बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰'
जीवन की घटनाएँ क्या हमारे अनुमान के अनुरूप घटती हैं ? अनुमान से थोड़ा कम या ज़्यादा तो ठीक है लेकिन जब सब एकदम विपरीत हो तो अपनी ही अक्ल और समझदारी पर संदेह होने लगता है और अगर अपनी अक्ल पर दोष देने की हिम्मत न हो तो फिर 'भाग्य का लिखा' तो है ही। जिस छोटे से संसार में हम रहते हैं, उसी छोटी सी सीमा में लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, जानने-समझने की कोशिश करते हैं, सम्बन्धों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह सब अनुमान ही रहता है, इन अनुमानों का सटीक निकलना 'मेरी होशियारी' है और यदि अनुमान गलत निकल गए तो 'मैं नहीं, वह गलत' है।
खुशी-खुशी विदा हुई संज्ञा की खुशियाँ अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। उसके बाद हमें ऐसा लगने लगा कि हमारे अनेक जन्मों के पाप के फल हमारे जीवन में दौड़ते चले आ रहे हैं। इतना कष्ट, इतना अपमान, इतना डर, इतनी लाचारी, इतनी उपेक्षा, इतनी बेहूदगी, इतनी नासमझी, इतनी गाली-गलौच मेरे इतने लंबे जीवन में न देखा, न सुना और न जाना। वह सब देख लिया जो पुरानी पारिवारिक फिल्मों में देखा करता था, आश्चर्य है, आज की पढ़ी-लिखी दुनियाँ में वैसा ही चल रहा है ! उस दौरान जो नरक-यातना हमने भुगती, उसे आपको कैसे बताऊँ ?
न बता पाने की एक वैधानिक मजबूरी भी है, विवाह के तीन वर्ष बाद हमारे दामाद जी ने हमारी बेटी पर 'घरेलू क्रूरता' का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी और कुछ दिनों बाद उन्होंने कुटुंब न्यायालय में संज्ञा के विरुद्ध तलाक़ हेतु केस दायर कर दिया। चूंकि प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए विवाह के बाद की घटनाएँ बताना न्यायोचित नहीं है। वैसे, आपके लिए आगे की कथा बुनने के लिए विकल्प खुला है, आप दो तरीके से कहानी को आगे बढ़ा सकते हैं- एक- 'हमारी बेटी ने ससुराल वालों को सताया' या दो- 'ससुराल वालों ने हमारी बेटी को सताया'। प्रकरण दायर किए हुए अब लगभग सात वर्ष हो चुके हैं। आप जानते हैं कि समय की गति तेज होती है और न्याय की गति धीमी, न जाने कितना और समय लगेगा क्योंकि अभी इस न्यायालय के बाद उच्च न्यायालय है, फिर सर्वोच्च न्यायालय है ! जिस अदालत में हत्यारों और चोर-उचक्कों की भीड़ खड़ी रहती है वहाँ उनके इर्दगिर्द मेरी बेटी अपनी बेटी के साथ जज की होने वाली पुकार की प्रतीक्षा करते खड़ी रहती है क्योंकि उसने किसी से प्रेम करने का अपराध किया था। आज भी वे उसी पति से प्रेम करती हैं, उसी के साथ रहना चाहती हैं लेकिन उनका प्रेमी अब ऐसा पति बना दिया गया है जो उनके साथ नहीं रह सकता। हमारी नातिन अनन्या अब बड़ी हो गई है और इतना समझने लग गई है कि 'कुछ गड़बड़ है' लेकिन वह संभवतः यह नहीं समझ पा रही होगी कि 'मम्मी-पापा के बीच यह कैसी कट्टी है जो अगले दिन मिट्ठी में नहीं बदलती ?'
जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं चुपचाप अपने जीवन की लहरों के उतार-चढ़ाव को देख रहा हूँ, सच बताऊँ, अब मुझ पर बाह्य परिस्थितियों का असर कम ही होता है। वैसे, बहुत से लोगों से तबीयत के साथ जिरह करने की तमन्ना है लेकिन इस अदालत में नहीं, 'उस' अदालत में करूंगा।
हमें खुशी है कि हमारी बेटी हमारे साथ है, हमारी आँखों के सामने है और साथ में उनकी हँसती-खेलती बेटी अनन्या भी जो अब नौ वर्ष की होने जा रही है। इन वृद्ध कंधों में अभी भी इतनी शक्ति है कि अपनी बेटी और उनकी बेटी का भार, निर्भार समझ कर उठा सकता है। इस खुशी के साथ-साथ हमारे हृदय में एक अदृश्य पीड़ा भी समानान्तर में चल रही है जिसे वे माता-पिता आसानी से समझ सकते हैं जिनकी बेटी ससुराल में मर-खप गई हो या बचकर उनके घर वापस आ गई हो। आप भी इस अनुभूति को महसूस कर सकते हैं, बशर्ते, आप हमारी बेटी को अपनी बेटी मान लें तो उस अकथनीय पीड़ा के शब्द आप तक अपने-आप पहुँचने लगेंगे।
राजिन्दर किशन ने इस गीत में मेरी व्यथा को कम शब्दों में ही पिरो दिया :
'कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !
मुझको बर्बादी का कोई गम नहीं
गम है बर्बादी का क्यूँ चर्चा हुआ !
देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ !
कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !'
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भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन किया है, ये सभी रस साहित्य, नृत्य और सामान्य भावाभिव्यक्ति में इस तरह रच-बस गए हैं कि इनके गूढ़ार्थ सहज ही सबको समझ आ जाते हैं। एक और रस है जो इन उल्लेखित रसों में उद्घाटित नहीं हो पाया है- वह है- 'बतरस।' आदि-काल से बतरस का प्रभाव हमारे जनजीवन में अति-व्यापक रहा है। बतरस गंभीर वार्तालाप है, भाषण देना-सुनना है, प्रवचन-सत्संग है, निःशुल्क मनोरंजन है और मनुष्य के पेट में उठे दर्द को दूर करने की दवा भी है।
मेरे बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया की गद्दी में अधिकतर समय उनके मित्रों और परिचितों की बैठक चलती जिसमें भाग लेने के लिए लोग पैदल या साइकल-स्कूटर चलाते या कार में बैठकर नियमित रूप से आते, घंटों विविध विषयों पर बातचीत होती, बहस होती, कहा-सुनी होती और उस बीच में चाय-नास्ता का दौर चलता। अपने विचार सभी लोग व्यक्त करते लेकिन स्वाभाविक रूप से स्थल व चाय-नास्ता मुहय्या करवाने वाले को बोलने का अवसर अधिक मिलता और उसकी बात अधिक मानी जाती। हमारे परिवार के पुरुषों को इस रस का निर्मल आनंद उठाते मैंने बचपन से युवावस्था तक नियमित देखा तो उसका असर मुझ पर भी पड़ा। यद्यपि बड़ी महफिल सजाने का चस्का नहीं लगा लेकिन आपसी संवाद करने का शौक लगातार बढ़ता गया। बचपन में हम लोग की बातचीत के विषय थे- हमारे मास्साब और पढ़ाई, किशोरावस्था में फिल्में, युवावस्था में लड़कियां और प्रौढ़ावस्था में राजनीति और साहित्य।
यूं तो बतरस वाली दोस्ती असंख्य लोगों से रही है लेकिन कुछ लोग मेरे जीवन में ऐसे रहे जिनके साथ बातें करते मेरे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता जिसमें सर्वोच्च हैं मेरी 'बेस्टेस्ट फ्रेंड' माधुरी। उनके अतिरिक्त किशोरावस्था के मित्र- (स्व॰) लक्ष्मीनारायण शर्मा; और सुधीर खंडेलवाल; वयस्क-प्रौढ़ वय के मित्र- (स्व॰) पंडित मुरलीधर मिश्र, (स्व॰) प्रोफेसर बी॰के॰ श्रीवास्तव, (स्व॰) भागवत प्रसाद दुबे, (स्व॰) राम किशन खंडेलवाल, (स्व॰) कुतुबुद्दीन भारमल, (स्व॰) महेश भट्ट, (स्व॰) इंदर सोंथलिया, (स्व॰) रमाकांत मिश्र; और बजरंग लोहिया, जगत नारायण तिवारी, सतीश जायसवाल, कान्तिलाल जोबनपुत्रा, वी॰एस॰तैलंग, डा॰ महेश कासलीवाल, चन्द्रशेखर जालान, सुभाष दुबे, जगदीश दुआ, बजरंग केडिया, विनोद मिश्र, विवेक जोगलेकर आदि कुछ और भी। मित्रों के इस समूह के साथ बैठकर आपस में विभिन्न विषयों पर होती चर्चा से प्राप्त परम-आनंद के क्या कहने ! वह जीवंनदायी बतरस था जो बहुत कुछ सिखाता, व्यक्तित्व विकसित करता, प्रतिकूल परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत देता, मार्ग दर्शन देता, दुख कम करता और कभी-कभी हँसाता भी था। जब भी प्रतिकूल मनस्थिति में मेरे दिमाग को लकवा लगने जैसा लगता तब ये लोग मेरे विवेक-रक्षक-साथी थे। मैंने इतने बुरे दिन देखे कि यदि इन मित्रों का साथ न होता तो मैं किसी पागलखाने में होता या किसी तेजी से आती ट्रेन के आगे खड़ा होकर अपने प्राण दे चुका होता।
कठिन समय में इनका साथ बहुत साथ देता था, इनकी बातें भी साथ देती थी। बातें करने से दिल बहल जाता था, थोड़ा 'डायवर्सन' हो जाता था और दिल को दिलासा भी। कुछ मित्र तो मुझसे इतनी दूर चले गए कि अब उनसे मिलना न होगा लेकिन कुछ का साथ अब भी बना हुआ है।
श्री बजरंग केडिया मुझसे दस वर्ष बड़े हैं, सौभाग्य से मित्रवत है। उनसे दिल की बातें निःसंकोच की जा सकती हैं, वे मुझे 'प्रेक्टिकल' सलाहकार से लगते हैं। एक दिन अपनी चिन्ता का बोझ लिए मैं उनके घर पहुंचा, मेरी समस्या को वे गौर से सुने और बोले- 'देखो द्वारिका, मैं तुमको एक बात बताता हूँ, किसी लड़की की शादी आज तक पैसों की कमी के कारण नहीं रुकी। सब इंतजाम हो जाता है, कैसे हो जाता है, पता नहीं ! तुम मानो, हर लड़की इस संसार में अपना भाग्य लेकर आती है।'
एक दिन भावी समधी जी का एसएमएस आया- 'मेरा तालाब सूख गया है उसमें जल भरें।' मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। अब मैं क्या जवाब देता ? मेरे नल से तो पानी की जगह हवा निकल रही थी और उसमें से 'सूँ-सूँ' की आवाज़ आ रही थी, इस आवाज़ से तो समधी जी का सूखा तालाब भरने से रहा। और तो और, एक दिन भावी दामाद का भी फोन पर तगादा आ गया- 'क्या हुआ ?'
उधर वे हमसे हलाकान थे, इधर हम खुद से परेशान। विवाह की तिथि जितनी नजदीक आती जा रही थी, चिन्ता उतनी बढ़ती जा रही थी। हमारी हालत उस किसान की तरह थी जो अपनी सूखती फ़सल को बचाने के लिए बारिश के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहा हो और बादलों का कोई अता-पता न हो। मुझे निष्क्रिय और निश्चिंत देखकर माधुरी झल्ला उठती- 'क्या कर रहे हो तुम ?'
'कुछ नहीं।' मेरा बुझा सा उत्तर उसे और बुझा देता। उन्होंने मुझसे कहा- 'मेरे गहने 'बैंक लाकर' से निकाल लो, बेचो और झंझट खत्म करो।'
'उतने से भी काम नहीं बनने वाला।'
'फिर ?'
'देखते हैं।' मैंने तथागत गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठे-बैठे उत्तर दिया।
एक दिन सुबह दस बजे मैं अपने एक पुराने सहपाठी के घर पहुँच गया। हम दोनों हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे। मुझे देख उसने पूछा- 'आओ द्वारिका, आज अचानक, सुबह-सुबह ?' मैंने अपनी समस्या बताई तो उसने कहा- 'फिक्र मत कर, तेरा काम हो जाएगा, रुक तेरे लिए चाय बनवाता हूँ। कैसी चाय पिएगा, शक्कर वाली या बिना शक्कर वाली ?'
'शक्कर वाली, ज़रा कडक।' मैंने कहा। हम दोनों के लिए चाय आई, मेरे लिए कड़ी-मीठी और उसके लिए बिना शक्कर वाली।
घर आकर मैंने माधुरी को बताया- 'हो गया।'
'अरे वाह, किसने दिया ?'
'फकीरों ने।'
'फकीरों ने ?'
'हूँ, उन्होंने कहा था न, 'अल्लई देगा', उसी ने दिया।' मैंने कहा।
इसके कुछ दिनों बाद हमारी लाज़ में एक ग्राहक आए, रीवा (मध्यप्रदेश) से, पंडित अखंड प्रताप नारायण मिश्र, अपनी बेटी को राज्य सेवा की परीक्षा दिलवाने। दो-तीन दिन रुके, परिचय बढ़ा, उनकी बातचीत की शैली प्रभावित करने वाली थी। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अगले माह बेटी का विवाह है। उन्होंने मुझसे पूछा- 'कुंडली मिलवा ली है न ?'
'हमें लड़के की कुंडली नहीं दी गई, लेकिन उनका जन्म समय और स्थान मालूम था इसलिए उस आधार पर कंप्यूटर से मिलान करवाया था, कुछ दोष हैं, पर चलता है।' मैंने बताया।
'एक बार मुझे दिखाएंगे क्या, अगर आप उचित समझें ?'
'क्यों नहीं।' मैंने उन्हें दोनों कुंडली दी, उन्होंने कुछ देर दोनों का अध्ययन किया और मुझसे बोले- 'अग्रवाल जी, मेरी राय है कि आप यह संबंध न करें।'
'क्यों ?' मैंने प्रश्न किया। उन्होंने संज्ञा के वैवाहिक भविष्य और ससुराल के बारे में कई ऐसी बातें बताई जो चिंताजनक थी, नकारात्मक दिशा में जा रही थी। मैं सोच में पड़ गया। दुविधा अज़ब थी, एक तरफ हमारी बेटी का प्यार और दूसरी तरफ हमारा अपनी बिटिया से प्यार !
'जो होगा, सो होगा पंडित जी, अब इस विवाह को रोकना हमारे लिए असंभव है।' मैंने कहा।
'तो जैसा प्रभु ने रच रखा है, होने दीजिए, सब उनकी माया है।' वे गंभीर होकर बोले।
नियत तिथि पर दोनों परिवार एकत्रित हुए, वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए और हमने अपनी बिटिया को विदा किया। हमें खुशी थी कि हम अपनी बेटी के प्यार को सुखद परिणिति तक ले जाने में सहयोग कर सके।
पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म 'नीलकमल' (1968) में रफी साहब ने साहिर लुधियानवी का लिखा यह मार्मिक गीत गाया था, इसे सरसरी निगाह से नहीं, जरा डूब कर पढिए:
'बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰
नाज़ों से तुझे पाला मैंने
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको
बाहों में मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की ऐ नाज़ुक डाली
तुझे हर पल नई बहार मिले॰
जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों में हंसी की धूप खिले
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी ज्योति न हो फीकी
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले॰
बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ
आराम की ठंडी छांव में,
कांटा भी न चुभने पाए कभी
मेरी लाडली तेरे पाँव में,
उस द्वार से सब दुख दूर रहे
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले॰
बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰'
जीवन की घटनाएँ क्या हमारे अनुमान के अनुरूप घटती हैं ? अनुमान से थोड़ा कम या ज़्यादा तो ठीक है लेकिन जब सब एकदम विपरीत हो तो अपनी ही अक्ल और समझदारी पर संदेह होने लगता है और अगर अपनी अक्ल पर दोष देने की हिम्मत न हो तो फिर 'भाग्य का लिखा' तो है ही। जिस छोटे से संसार में हम रहते हैं, उसी छोटी सी सीमा में लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, जानने-समझने की कोशिश करते हैं, सम्बन्धों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह सब अनुमान ही रहता है, इन अनुमानों का सटीक निकलना 'मेरी होशियारी' है और यदि अनुमान गलत निकल गए तो 'मैं नहीं, वह गलत' है।
खुशी-खुशी विदा हुई संज्ञा की खुशियाँ अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। उसके बाद हमें ऐसा लगने लगा कि हमारे अनेक जन्मों के पाप के फल हमारे जीवन में दौड़ते चले आ रहे हैं। इतना कष्ट, इतना अपमान, इतना डर, इतनी लाचारी, इतनी उपेक्षा, इतनी बेहूदगी, इतनी नासमझी, इतनी गाली-गलौच मेरे इतने लंबे जीवन में न देखा, न सुना और न जाना। वह सब देख लिया जो पुरानी पारिवारिक फिल्मों में देखा करता था, आश्चर्य है, आज की पढ़ी-लिखी दुनियाँ में वैसा ही चल रहा है ! उस दौरान जो नरक-यातना हमने भुगती, उसे आपको कैसे बताऊँ ?
न बता पाने की एक वैधानिक मजबूरी भी है, विवाह के तीन वर्ष बाद हमारे दामाद जी ने हमारी बेटी पर 'घरेलू क्रूरता' का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी और कुछ दिनों बाद उन्होंने कुटुंब न्यायालय में संज्ञा के विरुद्ध तलाक़ हेतु केस दायर कर दिया। चूंकि प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए विवाह के बाद की घटनाएँ बताना न्यायोचित नहीं है। वैसे, आपके लिए आगे की कथा बुनने के लिए विकल्प खुला है, आप दो तरीके से कहानी को आगे बढ़ा सकते हैं- एक- 'हमारी बेटी ने ससुराल वालों को सताया' या दो- 'ससुराल वालों ने हमारी बेटी को सताया'। प्रकरण दायर किए हुए अब लगभग सात वर्ष हो चुके हैं। आप जानते हैं कि समय की गति तेज होती है और न्याय की गति धीमी, न जाने कितना और समय लगेगा क्योंकि अभी इस न्यायालय के बाद उच्च न्यायालय है, फिर सर्वोच्च न्यायालय है ! जिस अदालत में हत्यारों और चोर-उचक्कों की भीड़ खड़ी रहती है वहाँ उनके इर्दगिर्द मेरी बेटी अपनी बेटी के साथ जज की होने वाली पुकार की प्रतीक्षा करते खड़ी रहती है क्योंकि उसने किसी से प्रेम करने का अपराध किया था। आज भी वे उसी पति से प्रेम करती हैं, उसी के साथ रहना चाहती हैं लेकिन उनका प्रेमी अब ऐसा पति बना दिया गया है जो उनके साथ नहीं रह सकता। हमारी नातिन अनन्या अब बड़ी हो गई है और इतना समझने लग गई है कि 'कुछ गड़बड़ है' लेकिन वह संभवतः यह नहीं समझ पा रही होगी कि 'मम्मी-पापा के बीच यह कैसी कट्टी है जो अगले दिन मिट्ठी में नहीं बदलती ?'
जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं चुपचाप अपने जीवन की लहरों के उतार-चढ़ाव को देख रहा हूँ, सच बताऊँ, अब मुझ पर बाह्य परिस्थितियों का असर कम ही होता है। वैसे, बहुत से लोगों से तबीयत के साथ जिरह करने की तमन्ना है लेकिन इस अदालत में नहीं, 'उस' अदालत में करूंगा।
हमें खुशी है कि हमारी बेटी हमारे साथ है, हमारी आँखों के सामने है और साथ में उनकी हँसती-खेलती बेटी अनन्या भी जो अब नौ वर्ष की होने जा रही है। इन वृद्ध कंधों में अभी भी इतनी शक्ति है कि अपनी बेटी और उनकी बेटी का भार, निर्भार समझ कर उठा सकता है। इस खुशी के साथ-साथ हमारे हृदय में एक अदृश्य पीड़ा भी समानान्तर में चल रही है जिसे वे माता-पिता आसानी से समझ सकते हैं जिनकी बेटी ससुराल में मर-खप गई हो या बचकर उनके घर वापस आ गई हो। आप भी इस अनुभूति को महसूस कर सकते हैं, बशर्ते, आप हमारी बेटी को अपनी बेटी मान लें तो उस अकथनीय पीड़ा के शब्द आप तक अपने-आप पहुँचने लगेंगे।
राजिन्दर किशन ने इस गीत में मेरी व्यथा को कम शब्दों में ही पिरो दिया :
'कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !
मुझको बर्बादी का कोई गम नहीं
गम है बर्बादी का क्यूँ चर्चा हुआ !
देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ !
कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !'
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केडिया जी के कथन से में सहमत हु। मेरे मामा परिवारो में लड़कियों की संख्या भारी रही मगर जैसे २ विवाह होते गए उनके जीवन स्तर में गुणात्मक परिवर्तन आता गया। सात २ वेटिओ के विवाह एक से एक अच्छा होता गया। कोई कंवारी नही रही जबकि विवाह योग्य कंवारे तो इस समाज में २५%से अधिक हे।
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