Thursday, April 23, 2015

सब कुछ सीखा हमने

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          'मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के...' इस चेतावनी के बाद भी मैंने अपने अतीत को मुड़ कर देखा। बहुत मज़ा आया जैसे कोई पुरानी फिल्म लंबे अर्से के बाद देखने को मिली हो। पीछे मुड़कर देखने में कोई खतरा न था लेकिन उसे लिपिबद्ध करके सार्वजनिक करने में कई खतरे थे। मैंने इस खतरे को उठाने का खतरा लिया लेकिन यह प्रयास खतरनाक नहीं, अतीत के व्यतीत को समझने में सहायक सिद्ध हुआ।
           उम्मीदों की जमीन पर परिवार बने है, रिश्ते-रिश्तेदारी है, दोस्ती-जानपहचान है, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारा, मस्जिद व अन्य प्रार्थना गृह निर्मित किए गए हैं। इन्हीं उम्मीदों को हासिल करने के लिए गुरु की खोज की जाती है, ईश्वर की कल्पना की गई और भगवत्ता की अवधारणा का आधार भी। ये उम्मीदें ही इन्सान की ज़िंदगी को थामने वाली डोर हैं। मनुष्य को सुख चाहिए, सुख को 'फील' करने दुख चाहिए जबकि हम सब जानते हैं कि दुख पाने की वज़ह उम्मीदें हैं और उम्मीदें तो रहती ही हैं, जबकि ये सब भ्रम है, जीने के बहाने हैं।

'निकले थे घर से हम तो खुशी की तलाश में
गम राह में खड़े थे वो ही साथ हो लिए
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए।'
          बचपन से अब तक की घटनाएँ जो हुई, वही तो होनी थी ! ज़्यादा कुछ तो जन्म से पहले तय हो जाता है, माँ का गर्भ, पिता, भाई-बहन और हमारा जन्मस्थान, क्या इन्हें बदलना हमारे हाथ में है ? अगर मैं चाहता हूँ कि मेरे पिता ऐसे होने चाहिए या माँ वैसी होनी चाहिए तो मेरे चाहने से क्या होगा ?
         हमारे आसपास के सभी लोग अपनी सोच और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार करते हैं, हमारी उम्मीदों के अनुरूप नहीं। सच पूछें तो हमारी मदद और हमारी रुकावट, दोनों आसपास के लोग ही हैं। यह हमारी दक्षता है कि हम उनकी मदद ले पाते हैं या रुकावट शिरोधार्य करते हैं। यहाँ पर हमारा स्वभाव सक्रिय भूमिका निभाता है, हमारा स्वभाव यदि 'अपना काम निकालने' वाला है तो येन-केन-प्रकारेण अपने लिए मदद हासिल कर लेंगे, उसके लिए खुशामद कर लेंगे, गाली खा लेंगे, चरणचुंबन कर लेंगे, मान-मनव्वल कर लेंगे या फिर धमका भी सकते हैं पर अपना काम करवा लेंगे। वहीं पर हमारा स्वभाव यदि संकोची है तो मदद लेना बहुत दूर की बात है, मदद के लिए किसी से कहने में भी लज्जा आती है। वह सोचता है- 'हमारे कष्ट को सामने वाला समझे तो अच्छी बात है अन्यथा जो है वह सही है।' इस प्रकार संकोची व्यक्ति अपने मान-अपमान के चक्कर में चुप रह जाता है, अपनी तकलीफ नहीं बताता परिणामस्वरूप उसके कष्ट स्वकेंद्रित हो जाते हैं और उन्हें वह अकेले भुगतता है।
          परिवार में संवाद की कमी से व्यवस्था बिगड़ती है। हमारे जमाने में एकांगी संवाद का प्रचलन था, अर्थात बोलता वही था जिसे बोलने का स्वाभाविक अधिकार था, मसलन, घर का मुखिया या जिसके हाथ में तिजोरी की चाबी है, या जो आक्रामक स्वभाव का है, शेष सब श्रोता थे। इस वज़ह से घर में तानाशाही का वातावरण होने के कारण चर्चा या विमर्श का अभाव था, केवल कथन और श्रवण होता था। जब तक बातचीत का अनुकूल वातावरण विकसित नहीं होता, कैसे एक-दूसरे की समस्या को समझा जाएगा और उनका समाधान खोजा जाएगा ?
          जिन परिवारों में बातचीत का लोकतान्त्रिक माहौल है, वहाँ सब लोग मिलजुल कर आगे बढ़ते हैं और एक दूसरे से सरोकार रखते हैं। किसी एक व्यक्ति का विकास सबका उत्तरदायित्व होता है और किसी व्यक्ति की समस्या पूरे परिवार का सरोकार। आधुनिक युग में परिवारों में बेहतर माहौल विकसित हो रहा है जिसमें खुलकर बात करने की सुविधा है और सब एक दूसरे का सुख-दुख समझते हैं जो परिवार के समग्र विकास के लिए परम आवश्यक है।

          हमारी जीवन शैली में श्रम को कष्ट का पर्याय क्यों माना जाता है, यह बात समझ के बाहर है। कोई किसानी कर रहा है या मजदूरी, नौकरी कर रहा है या व्यापार, इन जीवनयापन के कार्यों को कष्ट से जोड़ना अजीब है। 'किचन' में भोजन या नाश्ता बनाना, 'हाउस कीपिंग' करना, बाजार से राशन या साग-सब्ज़ी की खरीददारी करना जैसे जीवनोपयोगी कार्य भी परिश्रम की श्रेणी में आ गए हैं। पैदल चलना, योग-व्यायाम करना, जिम जाना भी कष्टसाध्य लगता है। दरअसल, जीवन के आरंभ से ही हमें 'आराम ही सुख है' की समझाइश मिली जिसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य काम न करने के रास्ते खोजने का विशेषज्ञ बन गया और शनैः शनैः आलसी और कामचोर बन गया। इसी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य अपनी क्षमता का समुचित प्रयोग नहीं कर पाता और 'काम न करने' का स्वभाव विकसित हो जाने के कारण उसकी प्रगति की राह स्वयं-अवरुद्ध हो जाती है। यद्यपि स्कूलों में युवाओं को सक्रिय करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन कालेज पहुँचते-पहुँचते शारीरिक सक्रियता कम होती जाती है और अधिकाँश युवा 'केरियर' बनाने के चक्कर में अपनी कुर्सी-टेबल में कैद हो जाते हैं फलस्वरूप शारीरिक श्रम करने का अभ्यास कम होते जाता है। इस आलस्य के मनोविज्ञान ने न केवल मनुष्य की असीमित व्यक्तिगत क्षमता का ह्रास किया वरन सम्पूर्ण समाज को भी गंभीर क्षति पहुंचाई है।
          समाज में अब दो वर्ग विकसित हो गए हैं, पहला वर्ग है गंदगी करने वाला, यह समर्थ वर्ग है जिसे गंदगी या कचरा फैलाने में कोई संकोच नहीं है। चूंकि उनकी जेब में पैसे हैं इसलिए वे इस धृष्टता को अपना अधिकार समझते हैं और उन्हें मालूम है कि कोई दूसरा व्यक्ति है जो सफाई करेगा। इस वर्ग के अच्छे-खासे, पढे-लिखे लोग गंदगी फैलाने के मामले में अनपढ़ों को भी मात दे देते हैं। अपने घर और दूकान का कचरा सड़क पर निःसंकोच फेकना, पान-गुटके की पीक इधर-उधर थूकना, रेल्वे प्लेटफार्म और रेल के डिब्बे में गंदगी फैलाना इस अदा से करते हैं जैसे उनका परम कर्तव्य हो। समाज में दूसरा वर्ग है, सफाई करने वाला जो वास्तव में सफाई करना नहीं चाहता, वह भी फैलाना ही चाहता है लेकिन इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है, गरीबी है, मज़बूरी है।  जापान में प्रचलित प्रबंधन शैली में 'हाउस-कीपिंग' की अवधारणा है जिसे '5 S' कहते हैं, उसका एक महत्वपूर्ण सूत्र है: 'कचरा करने वाला और उसे समेटने वाला व्यक्ति अलग-अलग नहीं, एक होना चाहिए।'
         मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन काल में सफाई के महत्व से जन सामान्य को जोड़ा और अपने प्रशंसकों को वैसा करने के लिए प्रेरित भी किया। गिरिराज किशोर के उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में गांधीजी के उस समय के भारत प्रवास का विवरण दिया है जब वे दक्षिण अफ्रीका से कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए कलकत्ता आए थे।

          ''मोहनदास को शौच जाना था। शौचालयों की संख्या ठहरे हुए डेलीगेट्स के अनुपात में बहुत कम थी। मोहनदास सब शौचालयों के चक्कर काट आए, इतनी दुर्गंध थी कि लगा सिर फट जाएगा। वे लौट आए। एक स्वयंसेवक को बुलाकर पूछा- 'क्या सफाई का यहाँ कोई प्रबंध नहीं है ?'
'यह हमारा काम नहीं, भंगी का काम है।'
'क्या भंगी हम खुद नहीं हो सकते ?'
          स्वयंसेवक उनकी बात पर हंस दिया, तब तक एक-दो स्वयंसेवक और आ गए। मोहनदास ने उनसे पूछा- 'क्या एक झाड़ू और बाल्टी का इंतजाम हो सकता है ?'
          उन लोगों ने गांधी की ओर आश्चर्य से देखा। उनकी नाक ऐसे चढ़ गई जैसे दुर्गन्ध के ढेर के सामने खड़े हों। उनमें से एक बोला- 'क्यों ?'
'जब हम गंदगी फैलाते हैं तो सफ़ाई क्यों नहीं कर सकते ?'
          उनका आश्चर्य दूसरे भाव में बदल गया। उन्होंने ऐसे देखा, या तो यह सूटेड-बूटेड आदमी सिरफिरा है या कोई निम्न कोटि का है। मांगकर सूट-बूट पहनकर आया है। वे उनकी बात अनसुनी करके सरक गए।
          मोहनदास ने इधर-उधर घूम-फिरकर झाड़ू और बाल्टी का बड़ी मुश्किल से इंतजाम किया, मुंह पर ढाटा बांधा और एक शौचालय में घुस गए। उन्हें रह-रहकर उबकाई आ रही थी। मोहनदास ने बाल्टी भर-भरकर पानी लाना और पाखाने को बहाना शुरू किया। बदबू के मारे माथा फटा जा रहा था। जमीन पर पाखाना बुरी तरह लिहस गया था। वे उसे झाड़ू से रगड़-रगड़ कर छुड़ा रहे थे। स्वयंसेवक दूर से देख रहे थे और हंस रहे थे।
          मोहनदास ने बाहर निकलकर कहा- 'आप बेफिक्र रहें, यह शौचालय मैंने अपने लिए साफ किया है। हम लोग जबतक अपनी सेवा आप करना नहीं सीखेंगे, दूसरों की सेवा जितना बड़ा काम कैसे कर पाएंगे ? आज अपने लिए किया, कल दूसरों के लिए करूंगा।'
'दूसरे....?' उनमें से कोई कुछ कहना चाहता था, मोहनदास बीच में बोले- 'दूसरों की सेवा के लिए पहले अपनी तैयारी ज़रूरी है।'
          अगली सुबह मोहनदास उठे, तो दुर्गन्ध का भभका उन्हें घेरता महसूस हुआ। बरामदे तक मल की दुर्गन्ध आ रही थी। मोहनदास ने फिर से झाड़ू उठा ली और कुए से बाल्टी में पानी भरकर सफाई करने लगे। डेलीगेट्स भी चिंतित थे, वे आपस में बातें कर रहे थे- 'पता नहीं कैसे-कैसे लोग आ जाते हैं !'
'सुना है दक्षिण अफ्रीका से आए हैं।'
'दक्षिण अफ्रीका जाकर क्या लोग धर्म-कर्म, सुच-असुच तक भूल जाते हैं ?'
'क्या यह आदमी पिछ्ले जन्म में भी तो वही नहीं था ?'
'या, फिर अब होगा।'
'दरअसल, ऐसे लोग दूसरों पर दबाव बनाए रखने के लिए इस तरह के पतित काम करते हैं।''  

          यह घटना लगभग एक सौ वर्ष पुरानी है, इन सौ वर्षों में शिक्षा के प्रभाव ने हमें आधुनिक अवश्य बना दिया लेकिन हमारी सोच आज भी वैसी ही पुरातन है- 'हमारा काम गंदगी फैलाना है, सफाई करना दूसरे का काम है।' क्यों है न ?
          कारण ? कारण है, आलस्य और हमारी संवेदनहीनता।

          सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'जो काम करना जरूरी है, जो अवसर तुम्हारे सामने है- उसके लिए अभी सही समय है, कल नहीं।' इस बात को अगर जीवन की शुरुआत में समझ लिया जाए तो जीवन अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। घटनाओं को होते हुए चुपचाप देखने से कुछ हासिल नहीं होता। 'जेहि विधि राखे राम सोई विधि रहिए' की अवधारणा तसल्ली करने के लिए अच्छी है, भगवान पर भरोसा करना भी ठीक है लेकिन भगवान के भरोसे रहना बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं है।
          बचपन में मनुष्य को कुछ समझ में आता नहीं, माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को व्यतीत करना होता है, वे नाव को जिस दिशा में ले जाएं, जो कहें, वह सही। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देता है और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उसे आलसी स्वभाव का बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
          युवावस्था में दोस्त और उनकी दोस्ती अच्छी लगती है। उसी दौर में शरीर के 'हार्मोंस' विपरीतलिंगी आकर्षण उत्पन्न करना आरम्भ देते हैं। अधिकतर युवा सपनों की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं जो जीवन के यथार्थ से कोसों दूर होती है। उनकी रचनात्मक ऊर्जा कामोत्तेजना के आसपास भटकती रह जाती है, दिशाभ्रम हो जाता है, न लक्ष्य समझ में आता है और न सही राह। इसी चक्कर में अनेक संभावनाएं गड्डमड्ड राहों में खो गई और जीवन भर गृहस्थी का बोझ ढोने के लिए मजबूर हो गई।
          इस काल में जिसने परिश्रम कर लिया, वह सुविधापूर्ण जीवन की राह पर चल पड़ता है लेकिन जिसने आलस्य को अपनाया, समझ लीजिए वह जीवन भर कष्ट भुगतने के लिए अभिशप्त है। एक बोधकथा है:  दो आलसी युवा बेर के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। उनकी नज़र पेड़ में लगे बेर के फल पर गई। उनमें से एक बोला- 'आ बेर, नीचे गिर।' वह चाहता था कि बेर अपने-आप गिर जाए तो उसे पेड़ पर चढ़ कर तोड़ने की मेहनत न करना पड़े। जब दूसरे ने यह सुना तो उसने पहले को ज़ोर से डांटा और चुप रहने का निर्देश दिया, फिर उसने सुधार कर कहा- 'आ बेर, मेरे मुँह में गिर।'
          आलसी व्यक्ति का मनोविज्ञान अज़ब होता है, आलसी कहो तो उसे चोट नहीं लगती, बुरा लगता है ! ऐसे लोग रात हो या दिन, हर समय सपने देखते हैं और 'बातें बनाने' के विशेषज्ञ होते हैं। ये अपने जीवन में बबूल के पौधे रोपते रहते हैं और उसमें आम फलने की उम्मीद करते हैं।

          आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः। नास्ति उद्यम समो बंधु कृत्वा नावसीदति॥
          (मनुष्य के शरीर में आलस्य जैसा कोई शत्रु नहीं और न ही उद्यम के जैसा कोई बंधु। )

          किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।

          मैंने जब स्कूल और कालेज में पढ़ाई की तब शिक्षा का वह माहौल न था जैसा अब दिखाई पड़ता है, संभवतः ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी वैसा ही हो जैसा हमारे जमाने में था। कक्षा में सबसे सामने बैठे आठ-दस 'विद्यार्थियों' को ही पढ़ाई-लिखाई से मतलब होता था, बाकी युवा अपने-अपने विभिन्न कारणों से कक्षा में बैठे रहते थे। मैंने कुल 18 वर्ष पढ़ाई की लेकिन मुझे उस समय यह समझ में नहीं आता था कि हम क्यों पढ़ रहे हैं, ये सब हमारे क्या काम आएगा ? पढ़ने के नाम से उकताहट होती थी, नींद आती थी। परीक्षा के एक सप्ताह पहले 'आई॰एम॰पी॰' पता लगाते थे, दिन-रात रटते थे, परीक्षा देते थे, पास हो जाते थे। उस 'बेवज़ह' की वज़ह अब समझ आती है, आज लगता है, फिर से स्कूल और कालेज में जाकर बैठूँ, वह सब पढ़ूँ जो उस समय छूट गया था। 
          युवावस्था में सही दिशा पकड़ने के लिए अच्छे मित्र चाहिए होते हैं जो भाग्य से ही मिलते हैं। हमारे आसपास हमें बहकाने वाले बहुतेरे मिलेंगे लेकिन सही राह दिखाने वाले बहुत कम। गलत लोगों के साथ नरम होना घातक सिद्ध होता है, उन्हें दृढ़ता के साथ खुद से दूर रखना श्रेयस्कर है। मेरे एक मित्र जो कालांतर में एक विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, कालेज की पढ़ाई के दौरान सिगरेट पिया करते थे। हम दोनों साइकल में नगर-भ्रमण कर रहे थे, रास्ते में पान की एक दूकान पर रुके, दो सिगरेट खरीदी, एक मुझे दी। मैंने मना कर दिया तो वे मुझ पर नाराज हो गए और कहा- 'तुम दोस्ती के लायक नहीं।' मैंने अपनी साइकल उठाई और उन्हें वहीं सिगरेट पीता छोड़कर चला गया। दोस्ती तोड़ दी।
          पढ़ाई में आगे बढ़ना है तो कक्षा में सामने की बेंच में बैठनेवालों से दोस्ती ठीक रहेगी, व्यापार-उद्योग में आगे बढ़ना हो तो सफल व्यापारियों-उद्योगपतियों की संगत, 'प्रोफेशनल' बनना है तो प्रोफेशनल्स' से मेलजोल, साहित्यकार बनना है तो लेखकों और कवियों के साथ उठना-बैठना या आध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ना है साधु-सन्यासियों के चरणों में समर्पित होना पड़ेगा। जैसी सोहबत वैसी निस्बत।  
          'मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया' मनुष्य की संतोषजीविता का संकेत है लेकिन यह उस वक्त ठीक है जब अकेले जीवन व्यतीत करना हो लेकिन यदि गृहस्थी चलानी है तो 'जो मिल गया' से काम नहीं चलेगा, उसके लिए अतिरिक्त प्रयास और परिश्रम करना होगा। परिवार, गुरुजन और मित्रों से अपनी रुचि के विषय में खुलकर बातचीत करें। भरपूर 'होमवर्क' करें और सभी विकल्पों पर गौर करें, अपनी रुचि को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, आर्थिक पक्ष को समझते हुए उचित निर्णय लेकर आगे बढ़ें। विचार सबके जानिए लेकिन निर्णय स्वयं का होना चाहिए, किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित होकर या किसी के दबाव में नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति के अनुरूप। प्रश्न केवल आजीविका कमाने का नहीं है, वह करने का है जो करना आपको प्रिय है। सफलता के लिए सम्पूर्ण समर्पण, लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, भरपूर परिश्रम और धैर्य चाहिए। सफलता का कोई 'शार्टकट' नहीं होता, वह अपनी कीमत वसूल करती है, उसे अदा करना ही होगा।    
           विश्वप्रसिद्ध चित्रकार विन्सेन्ट वान गॉग ने अपनी जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ' में लिखा है- 'दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है। आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है, वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है। वह उदारता प्राप्त करने को आया है, उस बेहूदगी को पार करने आया है जिसमें ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है।'     

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Monday, April 13, 2015

जीवन चलने का नाम

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          कैंसर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2002 में हुई थी, छः वर्ष बाद फिर से हो गई। अब तक दोनों बेटियाँ ब्याह गई थी, कर्ज़ पट गए थे, माधुरी लाज का काम-काज सीख-समझ गई थी इसलिए मुझे अपने जीवन से विदा लेने में कोई दुविधा या असुविधा नहीं थी। रही बात कष्ट की, सो जितनी तम्बाखू खाई थी, उसका जो मज़ा लिया था तो फल भी मुझे ही भुगतना था। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी थी लेकिन 40-50 पृष्ठ ही लिखे गए थे, मैं चला भी जाता तो भी कुछ खास बात नहीं थी, करोड़ों आत्मकथाएँ अधलिखी या बिनालिखी चिता की अग्नि में स्वाहा हो गई, मेरी भी हो जाती।
          असल में जून 2008 में ही मेरे मुंह में पनप रहे कैंसर ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। चौबीस घंटे कनपटी, दाढ़ और कान में तीखे दर्द का एहसास बना रहता था। मैंने दो माह तक होम्योपैथी दवा ली लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हो रहा था। 2 अगस्त को भोपाल के लायन्स क्लब में आयोजित 'केबिनेट मीटिंग' में मुझे 'संगठन प्रबंधन' पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था। मुँह में दर्द बहुत अधिक था, बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी आयोजक को किए गए वादे से मुकरना मुझे नापसंद था, मैं भोपाल गया और दो घंटे की प्रस्तुति दी। पूरे चेहरे में दर्द और बढ़ गया। भोपाल से मैं जबलपुर चला गया और अपने भांजे डा॰ विकेश अग्रवाल से सलाह ली। उन्होंने मुझे आंकोलाजिस्ट डा॰ अर्पण मिश्रा को दिखाया। डा॰ मिश्रा ने रोग के तेजी से बढ्ने की चेतावनी और तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? निर्णय लेने की किसी भी चूक का परिणाम घातक हो सकता था। मैं कैंसर से लड़ने की बजाय उसे तटस्थ भाव से देखना चाहता था जबकि संगीता और केदार मुझे यह आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने इंदौर में 21 अगस्त को सर्जरी निश्चित करवा ली। पहली सर्जरी में हुआ भयानक कष्ट मुझे याद था, अगली सर्जरी और भी गहरी और गंभीर होने वाली थी। संभावित पीड़ा की कल्पना से मैं रह-रहकर काँप उठता लेकिन मेरे सामने दो ही विकल्प थे, या तो सर्जरी का तात्कालीन कष्ट सहूँ या मृत्यु की प्रतीक्षा का अनिश्चितकालीन कष्ट। अंततः मैंने सर्जरी को चुना।
          एक दिन मैंने बाज़ार से आधा किलो छेने का चमचम खरीदा, घर लाया और डब्बा खोलकर खाने बैठा गया। माधुरी जी मुझे मीठा खाते देखकर चौंक गयी क्योंकि पिछले कई वर्षों से मैं मीठा नहीं खा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा- 'अरे, मिठाई खा रहे हो?'
'हाँ.' मैंने ठंडा सा उत्तर दिया.
'कैसे? तुम तो चाय तक बिनां शक्कर की पीते हो, आज क्या हो गया?'
'मैंने देखा है कि जिसे भी दोबारा कैंसर होता है, वह नहीं बचता। मुझे लगता है कि मेरा समय भी पूरा हो चुका है।'
'तुम कैसी बातें कर रहे हो? कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा लेकिन आज यह मिठाई खाने की क्या सूझी?'
'मैंने सोचा, अब आखिरी समय है, सब सब खा-पी कर मरूं.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब मरने का समय आएगा तो अतृप्त इच्छाओं के कारण मेरी आँखों के सामने बालूशाही, जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन नृत्य करेंगे। संभव है कि इसी वज़ह से अगले जन्म में मैं फिर हलवाई बन जाऊं! यार, अगले जन्म में हलवाई नहीं बनना मुझे.'
'इसलिए मीठा शुरू?'
'यस, आज से मीठा शुरू.' मैंने हंसते हुए कहा.  
          18 अगस्त की शाम को संगीता का फोन आया और मुझसे अगली सुबह 'सेकेंड ओपीनियन' हेतु मुंबई चलने के लिए कहा। 19 अगस्त की सुबह की 'फ्लाइट' से हम मुंबई पहुँच गए और मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल के आंकोलाजी विभाग में डा॰ मंदार देशपांडे के सामने बैठे थे। अस्पताल नया था, हाल-हाल में शुरू हुआ था जबकि डाक्टर पुराने और अनुभवी लेकिन युवा थे। डा॰ मंदार देशपांडे को मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में मुँह की शल्यक्रिया का दीर्घ अनुभव था, अब वे इस अस्पताल में कार्यरत थे। डा॰ देशपांडे ने मेरी जांच की, इंदौर की रिपोर्ट देखी और कहा- 'अंकल आपकी सर्जरी करनी पड़ेगी, 'सुप्रा मेजर सर्जरी' होगी। गाल खोलकर हड्डी निकालनी होगी और फिर 'प्लास्टिक सर्जरी' से उसे आपकी जांघ से मांस का टुकड़ा निकालकर वहाँ जोड़ेंगे ताकि आपका चेहरा एक तरफ धंसा हुआ न दिखे। चेहरा एकदम जस का तस नहीं बन पाएगा, या तो एक तरफ थोड़ा दबेगा या बढ़ सकता है। '
'ठीक है।' मैंने कहा।
'सर्जरी के बाद आपको बारह से चौदह दिनों तक अस्पताल में रहना होगा और छुट्टी होने के बाद लगभग दो माह मुंबई में ही रुकना पड़ेगा ताकि आपकी रेडियोथेरेपी की जा सके।'
'मैं सर्जरी करवाने के लिए तैयार हूँ लेकिन रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करवाऊंगा।'
'मेरा अनुमान है कि सर्जरी के पश्चात  रेडियोथेरेपी तो करनी पड़ेगी।'
'फिर मुझे न सर्जरी करवानी है न रेडियोथेरेपी, मैं चलता हूँ, आपको धन्यवाद।'
'मैं एक बात कहूँ अंकल ?'
'जी कहिए।'
'आप अगर मेरे पापा होते तो मैं यह 'चांस' अवश्य लेता।'
'आपने बहुत गभीर बात कह दी।'
'जी, मैं अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे रहा हूँ कि आप सर्जरी और रेडियोथेरेपी के लिए खुद को तैयार करें।'
'तो फिर ठीक है, कर दीजिए, कब करेंगे ?'
'आज आपकी 'बायप्सी' ले लेते हैं, आठ दिनों में रिपोर्ट आ जाएगी, उसके तीन दिन बाद आपकी सर्जरी।'
'डाक्टर साहब, यह बताइए, बायप्सी क्यों करते हैं ?'
'कैंसर 'कंफर्म' करने के लिए।'
'आपने अभी मेरा गाल 'चेक' किया, आपको ऐसा लगता है कि कुछ 'कंफर्म' करने की ज़रूरत है ?'  
'आपको कैंसर है, पक्का है, यह मुझे दिख रहा है लेकिन 'पेशेंट' की तसल्ली के लिए बायप्सी रिपोर्ट देखते हैं।'
क्यों आप आठ दिन का समय निरर्थक नष्ट कर रहे हैं ? आप कल मेरी सर्जरी कर दीजिए।'
'ऐसा क्या ?' डाक्टर ने पूछा।
'जी, शुभस्य शीघ्रम।' मैंने कहा।

          डाक्टर देशपांडे ने कहा- 'आज आप 'एडमिट' हो जाइए, कल दिन में आपके कुछ 'टेस्ट' होंगे और यदि 'ओ टी' खाली होगा तो परसों सर्जरी। उन्होंने 'ऑपरेशन थियेटर इंचार्ज' को फोन लगाया, इंचार्ज ने बताया- '21 को 'ओ टी' खाली नहीं है।'
'कोशिश करो, शायद कोई सर्जरी 'शिफ्ट' हो।' डाक्टर ने उनसे कहा। हमसे कहा- 'ऑपरेशन 21 को न हो सका तो 22 को करेंगे, आप आज रात को भर्ती हो जाइए, कल से आपका 'प्रोसीजर' शुरू कर देंगे।'
'सही है।' मैंने कहा।
          फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोरकुमार ने एक मज़ेदार गाना गाया था- 'जाते थे जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए न ?' इसी तरह मुझे सर्जरी के लिए इंदौर जाना था लेकिन मैं मुंबई पहुँच गया। रात को जब भर्ती होने के लिए काउंटर पर गए तो मालूम हुआ कि 'सुप्रा मेजर सर्जरी' का 'ट्विन शेयर' में पैकेज दो लाख पचहत्तर हजार का है और एक लाख अस्सी हजार रुपए अभी जमा करना है तब 'एडमिशन' होगा। हमने अस्पताल में स्थापित एटीएम से साठ हजार निकाल लिए लेकिन रात को दस बजे शेष एक लाख बीस हजार कहाँ से आते ? उस समय हमारे मित्र रमेश जोबनपुत्रा के बहनोई रजनीकान्त गढ़िया, जो मुंबई में रहते हैं, हमारे साथ थे, वे बोले- 'आधे घंटे रुकिए, मैं अपने घर से लेकर आता हूँ।'
          रात को ग्यारह बजे मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था, लेटते ही 'प्रोसीजर' शुरू हो गया। 20 अगस्त को माधुरी और केदार मुंबई आ गए। दिन भर 'स्केन', 'एक्स-रे', खून-पेशाब-एड्स' आदि की जांच हुई। डाक्टर देशपांडे ने शाम को फोन किया- 'आपकी सारी रिपोर्ट मेरे कंप्यूटर पर आ गई है, सब 'नार्मल' है। कल सुबह जिस 'पेशेंट' की सर्जरी होनी थी, 'सुगर' बढ़ने के कारण 'पोस्टपोन' हो गई है। आपकी सर्जरी के लिए 'ओ टी' खाली मिल गई, कल सुबह सात बजे आपको तैयार रहना है। ऑल द बेस्ट।'
          21 अगस्त की सुबह मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय सबने शुभकामना संकेत दिए, मैंने भी वापसी संकेत किए। मुझे 'स्ट्रेचर' पर लिटाकर 'प्री सर्जरी रूम' में ले जाया गया, वहाँ और भी मरीज थे। बहुत देर तक मैं वहाँ लेटा रहा, निर्विकार भाव से, बीच-बीच में उठकर अन्य मरीजों को देखता और फिर वापस लेट जाता। तब ही अनेस्थेटिस्ट डा॰ अपर्णा दाते मेरे समीप आई औए बोली- 'अंकल, चलें ?'
'मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूँ, चलिए।' मैंने उत्तर दिया। कुछ देर बाद मैं एक शानदार ऑपरेशन थिएटर की तेज रोशनी वाली लाइट के नीचे लेटा हुआ था। डा॰ दाते ने हाथ की नस में धीरे से एक 'इंजेक्शन' लगाया, उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या पता ! 'आंकोलाजिस्ट डा॰ मंदार देशपांडे और प्लास्टिक सर्जन डा॰ चारुदत्ता चौधरी ने मेरी सर्जरी की। हमारी बिटिया संगीता को भी ओटी में अपने पापा की सर्जरी देखने का सुअवसर मिला।

          'हूँ, देखो, मैं हूँ।' मुझे आवाज सुनाई पड़ी। मैंने आंखे खोली, सामने माधुरी खड़ी थी। उनकी आँखों से प्रसन्नता उमड़ रही थी, होठों में मुस्कान और चेहरा आश्वस्त। मैंने अपने बाएँ हाथ से उनके गाल छुए, उन्होंने मेरे हाथ की गदेलियों को अपनी दोनों गदेलियों से लपेट लिया। मेरी आँखें भर आई, गला रूँध गया, हम दोनों के मध्य एक मौन संभाषण हुआ। उस संभाषण को शब्दों में कैसे बताऊं ? मेरे मुंह में रुई ठुँसी हुई थी, किसी तरह बुदबुदाते हुए मैंने उनसे पूछा- 'ऑपरेशन कब तक चला ?'
'क्या पता, तुम दस घंटे बाद बाहर आए, कल की बात है, अब कैसा लग रहा है ?' माधुरी ने प्रश्न किया। मैंने अपने दाहिने अंगूठे से तर्जनी को जोड़कर इशारा किया जिसका अर्थ था- 'बढ़िया।' तीन-चार मिनट की इस छोटी सी मुलाक़ात को मैं अपने जीवन भर सँजोकर रखूँगा। यह पुनर्मिलन जैसा था। आई॰सी॰यू॰ में कुछ देर बाद संगीता आई- 'कैसे हो पापा ?' मैंने अपनी पलकें झपकाकर कुशल होने का संकेत दिया और एक हाथ उठाकर गाल को छू लिया। मेरे उस स्पर्श में उनके द्वारा किए गए अपूर्व प्रयासों के लिए आभार, शाबासी और न जाने क्या-क्या भाव थे !
'पापा, मैं तीन घंटे तक आपकी सर्जरी में खुद खड़ी रही, बहुत अच्छा ऑपरेशन हुआ है आपका, डा॰ देशपांडे और डा॰ चौधरी ने शानदार काम किया।' संगीता ने बताया। कुछ देर बाद हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ मुझे देखने आए, मुझे देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे।
          हम सबने मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जम कर लोहा लिया। अभी तक सब अनुकूल था लेकिन सर्जरी के बाद होने वाली रेडियोथेरेपी का दैत्य मेरे सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था जिसकी डरावनी गूंज मुझे अनवरत सुनाई पड़ रही थी।

                    ऑपरेशन के पश्चात मुझे 'इंटेन्सिव केयर यूनिट' में रखा गया। उसी शाम मुझे होश आ गया। अपने बिस्तर पर मैं चित लेटा हुआ था, नाक और मूत्रनली में 'पाइप' लगे हुए थे। एक हाथ से 'ग्लूकोज़' दिया जा रहा था और दूसरे हाथ पर रक्तचाप मापने का यंत्र लगा हुआ था जो प्रत्येक तीस मिनट में अपने-आप चालू होता और उसे कंप्यूटर में अंकित कर लेता। हृदय की धड़कन नापने वाली मशीन के पाइप छाती से चिपके हुए थे। गाल और गर्दन में हुई सर्जरी के कारण मेरा सिर स्थिर था और शरीर के अन्य अंगों के हिलने-डुलने की भी गुंजाइश न थी। मुझे लगातार नींद आ रही थी, बीच-बीच में टूटती, फिर सो जाता। 'सर्जरी एरिया' में असुविधा थी लेकिन दर्द नहीं था। आधी रात के पश्चात मेरी नींद उचट गई क्योंकि रात्रिकालीन देखरेख के लिए नियुक्त डाक्टर और नर्स तेज आवाज में बातचीत कर रहे थे। बातचीत क्या, ही-ही, खी-खी चल रही थी। तंद्रा की अवस्था में मैं सोना चाहता था लेकिन उनकी आवाजें मुझे चुभती रही, मैं लाचार पड़ा रहा। मुझे यह भी नहीं मालूम था की 'कालबेल' बिस्तर में लगी है अन्यथा उन्हें बुलाकर मना करता। मेरे मुंह में रुई से 'पैक' था इसलिए बोल नहीं पा रहा था। नर्सें मुझे दूर से आती-जाती दिखती, मैं हाथ उठाकर बुलाने का इशारा करता लेकिन वे मेरी तरफ न देखकर सीधे निकल जाती, ऐसे में उन्हें कैसे बुलाता ? घंटों बेचैनी में बीत गए, रात को लगभग दो बजे एक नर्स मेरे पास आई, मैंने उसे अपनी समस्या बताई, उसने डाक्टर की सलाह से मुझे 'मार्फिन' की एक 'डोज़' दे दी लेकिन उनकी ही-ही खी-खी के आगे मार्फिन ने भी घुटने टेक दिए। वे सुबह होने तक बतियाते रहे, मैं रात भर बेचैन जागता रहा। जब सुबह हुई तो मेरी बायीं ओर लगे पारदर्शी काँच से सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट होने लगा, मैंने मन ही मन कहा- 'गुड मार्निंग।' मुझे उम्मीद थी कि उन बे-शऊर डाक्टरों और नर्सों की 'ड्यूटी' का समय खत्म होने वाला होगा, जब ये सब यहाँ से विदा हो जाएंगे तब मैं चैन से सो सकूँगा। कुछ देर बाद वैसा ही हुआ तब मैं सुख की नींद ले सका।
          दोपहर को 'प्लास्टिक सर्जरी' विशेषज्ञ डा॰ चारुदत्ता मुझे देखने आए, मेरी जांच की और मुझे बताया- 'आपकी जांघ से निकाले गए मांस के जिस टुकड़े को चेहरे में 'ग्राफ्ट' किया गया था, वह सक्रिय हो गया है।' शाम को डा॰ मंदार देशपांडे मुझे देखने आए, उन्होंने मेरे मुंह के अंदर की रुई को बाहर निकाल दिया और पूछा- 'अंकल, कैसे हो।' मैंने इशारे से अपने ठीक होने का संकेत दिया तो उन्होंने कहा- 'बोलकर बताइए।' कुछ अस्फुट आवाज मेरे गले से निकली, वे मुझे और अधिक बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। मेरी प्रगति से वे संतुष्ट दिखे, उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ, आपकी 'रिकवरी' भी ठीक है, आज रात आपको आई॰सी॰यू॰ में रखेंगे, कल सुबह रूम में शिफ्ट करेंगे।' मैंने उनसे बीती रात का हाल बताया और हाथ जोड़कर कहा- 'डाक्टर साहब, मैं इस यातनागृह में अब और नहीं रहना चाहता, मुझे आज ही कमरे में शिफ्ट कर दीजिए ताकि मैं रात को आराम से सो सकूँ।' सहृदय डाक्टर ने मेरी बात मान ली और रात को नौ बजे मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
           आई॰सी॰यू॰ की रात वाली बात को छोड़ दिया जाए तो बारह दिनों के उस अस्पताली आवास को भुलाया नहीं जा सकता। डाक्टरों की लगातार देखरेख, आत्मीयतापूर्ण बातचीत, नर्स और अन्य स्टाफ का अनथक परिश्रम, उत्कृष्ट साफ-सफाई और स्वादिष्ट भोजन और पेय की जितनी प्रशंसा के जाए, कम है। सब काम एकदम समय पर, किसी से कुछ कहने या याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, मुझे वहाँ सम्पूर्ण व्यवस्थित प्रबंधन का व्यावहारिक रूप देखने के लिए मिला। सभी लोग अच्छे थे लेकिन नगालैंड से आई एक नर्स जिसका नाम था- बेबी, उसका व्यवहार और सरोकार आज भी याद आता है।
          मेरे आई॰सी॰यू॰ से बाहर आने के बाद माधुरी और केदारनाथ घर वापस चले गए। संगीता मेरी देखरेख के लिए मेरे साथ रही। इस बीमारी की पहचान से उपचार तक संगीता ने जिस सक्रियता से मेरी सेवा-सुश्रूषा की, मुझे लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, बेटा है।

            29 अगस्त को सर्जरी के दौरान गाल से निकाले गए अंदरूनी टुकड़ों की जांच के परिणाम आ गए। कैंसर का प्रभाव आरंभिक और एक ही स्थान पर केन्द्रित था इसलिए डाक्टर ने मुझे 'रेडियोथेरेपी' करने की जरूरत से मुक्त कर दिया और 1 अक्तूबर की सुबह अस्पताल से छुट्टी मिलने का संकेत दे दिया। 30 अगस्त की शाम को ही अस्पताल में 'डिस्चार्ज' की तैयारी शुरू हो गई। पूर्व में ही हमें 2,75,000/- सर्जरी का 'पैकेज' बताया गया था और हमने उस बीच पूरी राशि जमा कर दी थी। जब संगीता 'बिल काउंटर' में भुगतान करने गई तो हमारी सर्जरी का कुल 2.44,000/- का 'बिल' बना। आश्चर्यचकित संगीता ने पूछा- 'आप कुछ भूल तो नहीं रहे हैं ?'
'नहीं, 'पेशेंट' पर हास्पिटल का खर्च इतना ही हुआ है।' उन्होंने कहा और 31,000/- वापस कर दिए।
          जब संगीता ने मुझे इस बात को बताया तो कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल की ईमानदारी पर मैं विस्मित सा हो गया। चिकित्सा जगत में व्याप्त लूट-खसोट के विपरीत उनका व्यवहार अविश्वसनीय लगा। मैं अपने शहर बिलासपुर में अखिल भारतीय स्तर के एक ख्यातिलब्ध ग्रुप के हास्पिटल की कारस्तानी को याद कर रहा था जहां अधिकतर मरीजों की बीमारी के साथ घिनौना खिलवाड़ किया जाता है, मृत मरीज के परिवारजनों को जीवन की उम्मीद की लालच में 'वेंटिलेटर' पर रखकर बिल बढ़ाने के लिए जिंदा बताया जाता है। मरीज के गैर ज़रूरी मंहगे परीक्षण इसलिए करवाए जाते हैं ताकि अस्पताल की आय बढ़े ! इलाज का अनाप-शनाप बिल बढ़ा कर उनकी मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाया जाता है !
          महत्वपूर्ण यह है कि संगीता आश्चर्यचकित क्यों हुई, मैं विस्मित क्यों हुआ ? ईमानदारी तो हमारा स्वाभाविक व्यवहार होना चाहिए। यही ईमानदारी किसी संस्थान की ख्याति में वृद्धि करती है, यही ईमानदारी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है तो फिर यह भावना अब दुर्लभ क्यों होती जा रही है ? चिकित्सा का कार्य व्यापार नहीं, सेवा और सहानुभूति का कार्य है। इस 'मिशन' का तानाबाना मानवीय संवेदनाओं के धागों से बुना हुआ है, इन धागों का टूटना भविष्य के संभावित खतरों की दुखदायी आहट है।
          वहाँ से सुरक्षित वापस आने के दो वर्ष बाद पुनः कैंसर ने मुझपर आक्रमण किया लेकिन इस बार दाएँ नहीं, बाएँ गाल पर। फिर वही कष्टदायक सर्जरी, वही हास्पिटल नंबर वन, वही डाक्टर नंबर वन, वही नर्सिंग नंबर वन, वही देखरेख नंबर वन और वही साथ मेरी अर्धांगिनी माधुरी और मेरे बेटी-बेटे संगीता और केदारनाथ का।
          सन 1971 में मैंने एक फिल्म देखी थी- 'आनंद', जिंदगी और मौत से हँसता-गाता संघर्ष। फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने उस कथानक को ऐसा चित्रित किया था कि कैंसर जैसी भयावह बीमारी जैसे एक कविता बन गई जिसने सबको रुलाया और वह अविस्मरणीय बन गई।
          तब मुझे मालूम न था कि वह कहानी मेरे जीवन में यथार्थ के रूप में घटित होगी। आठ वर्षों के अंतराल में कैंसर के तीन तीव्र आक्रमण मुझ पर हुए। इस गंभीर बीमारी का मैंने किस तरह सामना किया, उसे मेरे डाक्टर, परिवारजन और कुछ अंतरंग जानते हैं।
          फिल्म 'आनंद' का नायक राजेश खन्ना उन संकट के घड़ियों में हर समय मेरे आस-पास रहा, मुझे संभालता रहा, मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा। प्रचंड पीड़ा के दौरान उनके मुसकुराते चेहरे ने मुझे कैंसर से जूझने में बहुत मदद की जो आज भी जारी है। धन्यवाद हृषिकेश मुखर्जी, आभार राजेश खन्ना। एक दिन सभी को जाना है लेकिन ज़िंदगी में संघर्ष किस तरह किया जाता है- आपने सिखाया है।
          असलम हसन की इस कविता पर गौर करें :

'कितना मुश्किल है
आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर बाहर रंग-बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है
फिक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिन्द मचल जाना
कितना सख्त है
नर्म होना
मोम होना
और पिघल जाना
कितना आसाँ है
दिल का जाना
दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना।'

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आगे और भी है > >

Friday, April 3, 2015

ठंडी हवाएँ

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          इस बीच एक भीनी-भीनी सी खुशबू 29 नवंबर 2004 को हमारे परिवार में प्रविष्ट हुई- 'मैना', केदारनाथ और संगीता की बिटिया। मैना के आगमन से हम दोनों नाना-नानी बन गए। कुछ दिनों बाद केदारनाथ और संगीता को रायपुर के शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिल गई तो दोनों अपने प्यारे शहर इंदौर को छोडकर रायपुर आ गए। रायपुर से बिलासपुर की दूरी महज़ 115 किलोमीटर है इसलिए उनके पास हमारा आना-जाना सुविधाजनक हो गया।
          जैसे-तैसे दिन बीतते जा रहे थे। कर्ज़ चुकाने में एक पुश्तैनी जमीन, दद्दाजी के द्वारा दिया गया भूखंड और माधुरी के आभूषण बिक गए। यद्यपि लाज का काम बढ़ रहा था लेकिन धीरे-धीरे, प्रशिक्षण कार्यक्रम भी हो रहे थे लेकिन यदा-कदा, जितनी आय होती थी वह देनदारी के आगे एकदम बौनी लगती, समुद्र के सामने नदी की क्या औकात ?
          कुंतल ईशा फाउंडेशन के आश्रम में ही रम गए, हम लोग समझ गए कि उनको अपने परिवार में वापस लाना संभव नहीं है। संज्ञा के विवाह का निमंत्रणपत्र सद्गुरु को देने के लिए हम लोग आश्रम गए थे, सद्गुरु से मिले। माधुरी ने सद्गुरु से कहा- 'कुंतल आपके पास आ गया है, मुझे अच्छा नहीं लगता।'
'ये बताओ, कुंतल नौकरी करता तो कितने दिन आपके पास रहता ? दो-चार दिन के लिए ही घर आता।' सद्गुरु ने प्रतिप्रश्न किया।
'जी, आप ठीक कह रहे हैं।'
'तो फिर ? जब भी आपका मिलने का मन हो, यहाँ आ जाओ और मिल लिया करो। जितने दिन चाहो, यहाँ रह सकती हो।'
'संज्ञा के विवाह के कार्यक्रम में उसे दो-चार दिन के लिए भेज दीजिए।'
'मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन वह जिस मार्ग पर आगे बढ़ रहा है, ऐसे कार्यक्रमों में जाने से उसे मदद नहीं मिलेगी।'
'मैं उसे आपको सौंप कर जा रही हूँ, आज से आप उसके पिता हैं।'
'ठीक है।' सद्गुरु ने कहा। हम लोगों ने सद्गुरु से आशीर्वाद लिया और घर वापस आ गए। संज्ञा का विवाह कुंतल की अनुपस्थिति में हुआ, कुंतल की कमी हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ ने पूरी कर दी। पूरे कार्यक्रम में उन्होंने घर के लड़के की तरह अपूर्व दायित्व और लगन के साथ हमारा साथ दिया।
          हमें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि आखिर वह कौन सा आकर्षण है जिसने कुंतल को इस दुनियादारी से विमुख कर दिया ! उनका स्वभाव और व्यवहार आम युवाओं जैसा था। हमारे परिवार के जीने का तरीका फाँके-मस्ती का था, टीवी और सिनेमा देखना, हँसना-गाना-नाचना, चिढ़ना-चिढ़ाना- खुला-खुला सा। 'गंभीरता' जैसा कोई काम नहीं, कोई आध्यात्मिक या धार्मिक माहौल भी न था फिर कुंतल इतने गंभीर प्रयोजन के लिए कैसे उद्यत हो गए, यह हमारे लिए जिज्ञासा का कारण रहा। मैंने और माधुरी ने सोच-विचार कर तय किया कि इस प्रश्न का उत्तर आश्रम की गतिविधियों से जुड़कर ही मिल सकेगा इसलिए वहाँ हमने आना-जाना शुरू किया।
          उस आवागमन में एक अद्भुत कार्यक्रम में सहभागिता का अवसर मिला, उसका नाम था- 'Wholeness'. आठ दिवसीय इस कार्यक्रम में आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियाँ सिखाई गई। दिन भर में मुश्किल से छः घंटे का शयन, एक घंटा दैनिक क्रियाएँ , दो घंटे भोजन और पंद्रह घंटे का प्रशिक्षण।
          पहला दिन सामान्य रहा लेकिन अगले दिन मेरी कमर में असहनीय पीड़ा आरंभ हो गई। मेरी कमर में दर्द की शिकायत विगत दस वर्षों से चली आ रही थी, योगासन सीखते समय झुकने से उसमें झटका सा लगा और मैं अपूर्व पीड़ा के कारण त्राहिमाम करने लगा। न बैठते बने, न दो कदम चलते बने लेकिन प्रशिक्षक मेरी तकलीफ को समझने के लिए तैयार न थे। अपना दर्द बताया तो बोले- 'Carry on...no pain, no gain.' आप बताइए, एक इंसान दर्द के कारण हिल नहीं पा रहा है और वे कह रहे हैं-  'Carry on...'। प्रशिक्षक मुझे किसी क्रूर खलनायक जैसे लगने लगे, बताओ भला, यहाँ हिलते-डुलते नहीं बन रहा है और उधर से आदेश है- 'केरी ऑन' !

           योग प्रशिक्षण का कार्यक्रम कोयंबत्तुर के वेलियंगिरी पहाड़ की तलहटी में बसे पुंडी ग्राम में स्थापित ईशा योग केंद्र के स्पंद सभागार में चल रहा था जिसमें लगभग तीन सौ स्त्री-पुरुष योग की प्राचीन विधा को सद्गुरु जग्गी वासुदेव के मार्गनिर्देशन में अत्यंत मनोयोग से सीख रहे थे। उस समूह में मेरे साथ माधुरी भी थी। माधुरी भाषागत समस्या से जूझ रही थी क्योंकि कार्यक्रम अंग्रेजी भाषा में संचालित हो रहा था, अंग्रेजी से अनभिज्ञ माधुरी निर्देशों को समझ नहीं पा रही थी लेकिन अन्य प्रतिभागियों को देखकर अभ्यास कर रही थी। सद्गुरु के प्रवचन उन्हें समझ में नहीं आ रहे थे इसलिए वे हैरान थी। वहीं पर मैं अपने कमर के दर्द से हैरान था, मैं कामचलाऊ अंग्रेजी जानता हूँ, सभी निर्देश समझ रहा था लेकिन मेरा शरीर उस अंग्रेजी भाषा को न समझते हुए केवल मेरी कमर की पीड़ा को ही एकाग्रता से समझ रहा था।
          कार्यक्रम के मध्य में अवसर मिलने पर मैं सभागार से चुपचाप भाग कर आवासीय परिसर में अपने कमरे में जाकर लेट गया। मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा, 'कालबेल' बजी, मैंने दरवाजा खोला, एक विदेशी षोडशी कन्या बाहर खड़ी थी, उसने मुझसे कहा- 'प्रणाम।'
'प्रणाम।' मैंने उत्तर दिया।
'मैं योग कार्यक्रम की 'वालिंटियर' हूँ, लेबनान से आई हूँ।' उसने अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात शुरू की।
'जी ?'
'आप कार्यक्रम छोड़कर 'स्पंद' सभागार से यहाँ क्यों आ गए ?'
'पहले आप अंदर आइये, बैठिए। दरअसल, मैं कमर के दर्द से परेशान होकर यहाँ आ गया, मुझसे योगासन करते नहीं बन रहा था।' मैंने बिस्तर पर लेटते हुए बताया।
'क्या बहुत दर्द है ?'
'हाँ, बहुत अधिक।'
'क्या मैं आपके कमर में दवा लगा दूँ ?' वह अपने साथ 'वोलिनी आइंटमेंट' और दर्दनाशक गोलियां लेकर आई थी।
'ठीक है, लगा दीजिए।' मैंने कहा और अपने अधोवस्त्र ढीले करके पेट के बल लेट गया। उसने दवा लगाई, दस मिनट रुक कर पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'पहले से बेहतर।'
'एक 'टेबलेट' खा लीजिए, मैं पानी लेकर आती हूँ ।' उसने मुझे दवा खिलाई, पुनः दस मिनट शांत बैठी रही फिर उसने पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'और अच्छा।'
'तो फिर उठिए, खड़े हो जाइए और मेरे साथ सभागार में चलिए।'
'पर मैं नहीं चल पाऊँगा!'
'आप मेरे साथ चलिए तो, मैं आपको सहारा देकर ले चलूँगी, कोशिश कीजिए, बन जाएगा।' उसने आग्रह किया, मेरे पास उसके साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैं उसके कंधे का सहारा लेकर दर्द से कराहता सभागार की ओर चल पड़ा।
          सभागार में मैं अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गया और वहाँ फिर वही किस्सा- 'केरी ऑन.....।'

          मैं योग कार्यक्रम से जुड़ा रहा, जैसा भी बना, करता रहा। योगासन करने में असुविधा थी लेकिन प्राणायाम और ध्यान सीखने में कोई परेशानी न थी। दिनोंदिन वातावरण समृद्ध होता जा रहा था, इतने सारे लोग मिलजुलकर जब किसी विधा को सीखते हैं तो सब एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं और ऊर्जा को परस्पर संचरित भी करते हैं। हमने हठयोग, शक्तिचलन क्रिया और शून्य ध्यान का क्रमबद्ध अभ्यास किया। उस दौरान इस बात का एहसास होता रहा कि उम्र अधिक हो जाने के कारण हमारे शरीर का लोच कम हो गया है इसलिए योगासन करना कठिन लगता है, हमारा शरीर साथ नहीं देता। वैसे, कार्यक्रम के दौरान हमारा आहार इस विधि से नियोजित किया गया ताकि शरीर हल्का रहे और योगासन करना सुविधाजनक हो।
          यौगिक क्रियाओं के अतिरिक्त प्रतिदिन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के आध्यात्मिक प्रवचन होते थे जिन्हें सुनना मेरे लिए अपूर्व अवसर था। प्रवचन के पश्चात जिज्ञासु प्रश्न करते थे जिनके उत्तर सद्गुरु के उत्तर हास्यबोध से आरंभ होते और सरल उदाहरणों के सहारे गंभीर निष्कर्ष तक पहुँचते। उनकी बातों में आध्यात्म के साथ ब्रह्माण्ड, विज्ञान, धर्म, और मानवीय व्यवहार की परत-दर-परत चर्चा होती जिसे सुनकर मुझे जीवन शैली और व्यवहार की नई दिशाएँ समझ में आई। उनका विस्तृत ज्ञान, अँग्रेजी भाषा का अद्भुत प्रयोग और उनकी वाणी का प्रभाव मेरे जीवन के अहोभाग्य अवसर जैसा था।
          पांचवे दिन सुबह 9 बजे वेलियंगिरी पर्वत के शिखर तक पैदल चढ़ाई करनी थी। हमें तीन विकल्प दिए गए थे, एक- पर्वतारोहण करना है, दो- जो पर्वतारोहण न  करना चाहें वे आश्रम की चतुर्दिक पदयात्रा करें, और तीन- जो दोनों के लिए तैयार न हों वे अपने कमरे में आराम करें। तीसरे विकल्प ने मुझे प्रसन्न कर दिया और उस बड़े समूह में मैं अकेला मानुष था जिसने कमरे में आराम करने वाला विकल्प चुना ! 
          उस दिन सुबह नित्य की भांति छः बजे से अभ्यास आरंभ हुए। तीन घंटे बाद नौ बजा, सब लोग पर्वतारोहण के लिए उत्सुक थे और मैं उनके चेहरे की प्रसन्नता को देखकर कुढ़ रहा था- 'ये लोग वहाँ जा रहे हैं और मैं नहीं जा पा रहा हूँ।' अनायास मेरे मन ने कहा- 'चल, चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।' मैंने माधुरी से कहा- 'मैं भी चलूँगा। 
'कैसे चढ़ोगे तुम ? तुम्हारी कमर का दर्द ?' माधुरी ने पूछा। 
'दर्द तो है, लेकिन तुम सब लोग पर्वत-शिखर पर जाओगे, मस्ती करोगे और मैं यहाँ बिस्तर पर पड़ा रहूँगा !'
'रास्ते में तुम्हारी परेशानी बढ़ गई तो ?' 
'वह मेरी नहीं, सद्गुरु की समस्या है, वे करेंगे व्यवस्था।'
'तो, फिर चलो।' वे बोली।
          मैंने पर्वतारोहण के लिए खास तौर से उपलब्ध कराए गए जूते पहने और सबके साथ निकल पड़ा। शिखर तक पहुँचने के लिए कोई सड़क न थी, पगडंडियाँ थी, अगल-बगल झाड़-झंखाड़ थे, छोटे-बड़े टीले थे, तीखी चढ़ाई थी, सब एक के पीछे एक ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे थे। एक युवा 'वालेंटियर' मुझे सहारा देने के लिए  मेरे आसपास अनवरत चलते रहे। कुछ देर बाद तेज बारिश शुरू हो गई, राह में फिसलन हो गई, कपड़े भीग गए लेकिन किसी प्रकार अपने दर्द को दरकिनार करते हुए मैं चढ़ता ही रहा। लगभग साढ़े तीन घंटे की पगयात्रा के बाद मैं पर्वत के शिखर पर पहुँच ही गया जबकि माधुरी और अन्य कई लोग मेरे वहाँ पहुँचने के पंद्रह-बीस मिनट बाद वहाँ पहुँचे। उस दिन मैंने अपनी शारीरिक पीड़ा से भिड़कर संघर्ष किया और यह जाना कि कुछ भी असंभव नहीं और यह भी समझ आया कि हौसले की कभी हार नहीं होती। 
          पर्वत-शिखर पर पहुँच कर मैं जी भर कर नाचा, वे मेरे लिए खुशी के क्षण थे...आप बताइये, थे कि नहीं ? शिखर पर हमारे भोजन की व्यवस्था थी, सद्गुरु का प्रवचन भी हुआ। तीन घंटे रुक कर हम लोग वापस लौटे, वही पथरीला-फिसलन भरा रास्ता, वही हिम्मत, वही 'वालेंटियर' का सहारा, ढाई घंटे में तलहटी पर उतार आए। वहाँ से हम सब स्पंद सभागार में प्रविष्ट हुए, मैं थक कर चूर हो चुका था, चुपचाप पैर फैलाकर लेटने का मन हो रहा था लेकिन प्रशिक्षक ने निर्देश दिया- 'सब लोग आसन करना आरंभ करें।' फिर वही- 'केरी ऑन !' 
   
          इस कार्यक्रम के पहले इधर-उधर से योगासन करना सीखा था, अनियमित था किन्तु करता था लेकिन कोयंबत्तुर के ईशा फाउंडेशन में हुए इस कार्यक्रम में मुझे सतर्क प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में अनेक आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियां सीखने को मिली, अपने शरीर और मन को व्यवस्थित रखने के उपाय ज्ञात हुए। क्रमबद्ध ढंग से शरीर को तैयार करते हुए जो अभ्यास करवाया गया उससे समस्त क्रियाएँ शुरुआती तकलीफ़ों से होते हुए क्रमशः सुविधाजनक होती गई और स्मृति में संरक्षित भी हो गई। कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात हमें निर्देश दिए गए- 'छः माह तक इसे नियमित रूप से करना है, यदि किसी वज़ह एक दिन भी अभ्यास न हो पाया तो अगले दिन से छः माह के लिए अभ्यास फिर से आरंभ करना होगा।' परिणामस्वरूप बिना नागा छः माह तक अभ्यास चला और उसके बाद शरीर इतना अभ्यस्त हो गया कि कि अब आठ वर्ष होने को आए, वह सब बिना किए अब जी नहीं मानता ! यहाँ तक कि रेलयात्रा में भी जैसी जगह मिली, शुरू हो गए, लोग स्वयं ही खिसक कर समुचित जगह बना देते हैं और अपना काम सध जाता है। यदि किसी दिन व्यस्ततावश अभ्यास न कर पाए तो दिन भर बेचैनी सी होती है। हाँ, एक महत्वपूर्ण बात आपको बतानी रह गई, मेरा दस वर्ष पुराना कमर दर्द अब इतिहास की बात हो गई !
           यह बात जुलाई 2007 की है, उसके बाद कुछ और आध्यात्मिक अनुभवों से मुलाक़ात हुई, बीच-बीच में बताता रहूंगा। मैं प्रतिदिन दो घंटे का समय पदयात्रा, योगासन और प्राणायाम को देता हूँ यद्यपि मेरा शरीर दिन में चौबीस घंटे मेरा साथ देता है। योग से जुड़ने के कारण दवाओं से दूरी बन गई है, कैंसर का मरीज हूँ इसलिए उससे भी लड़ने-भिड़ने में मदद मिलती है लेकिन कैंसर तो कैंसर है, कहने को इसे राजरोग कहा जाता है पर इसे राजा हो रंक, सबको लपेटना आता है ! जिसे भी बीमारी के प्रारम्भिक काल में समुचित उपचार नहीं मिला फिर समझिए उसका अंतकाल आ गया।
          कैंसर ने मुझ पर फिर से हमला किया। सन 2008 में उसी गाल के अंदर पुनः कैंसर के लक्षण उभरे जिस गाल की 2002 में 'सर्जरी' हुई थी। इस बीच मैं अपनी जांच करवाते रहता था, डाक्टर कहते थे- 'चार साल बीत गए, अब आप 'सेफ' हैं' लेकिन फिर मुसीबत आ खड़ी हुई। मेरे सर्जन डा॰ दीपक अग्रवाल ने कहा- 'द्वारिका प्रसाद जी, इस बार आपकी गहरी सर्जरी होगी, दाढ़ निकाली जाएगी और 'मेंडिबल' काटकर निकाला जाएगा। हड्डी काटकर अलग करने के कारण आपका चेहरा अजीब सा हो सकता है और उसके बाद आपकी 'रेडियोथेरेपी' भी करनी पड़ेगी।'
          मेरे देखने में आया था कि जिस व्यक्ति की भी कैंसर की दोबारा सर्जरी हुई, वह अधिक दिनों तक नहीं जी पाया। मुझे समझ में आ रहा था कि मेरा बचना अब मुश्किल है, केवल दुर्दशा बची है इसलिए मैंने परिवारजनों को अपना निर्णय सुनाया- 'जब तक चलूँगा, तब तक चलूँगा, अब सर्जरी और रेडियो थेरेपी नहीं करवाऊँगा।' मुझे छोड़ कर घर में सब चिंतित थे लेकिन संगीता और केदार मेरी बात मनाने वालों में से नहीं थे, दोनों ने इंदौर में मेरी सर्जरी 'फिक्स' कर दी और मुझे अंग-भंग के लिए पुनः मजबूर कर दिया गया।

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