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कैंसर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2002 में हुई थी, छः वर्ष बाद फिर से हो गई। अब तक दोनों बेटियाँ ब्याह गई थी, कर्ज़ पट गए थे, माधुरी लाज का काम-काज सीख-समझ गई थी इसलिए मुझे अपने जीवन से विदा लेने में कोई दुविधा या असुविधा नहीं थी। रही बात कष्ट की, सो जितनी तम्बाखू खाई थी, उसका जो मज़ा लिया था तो फल भी मुझे ही भुगतना था। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी थी लेकिन 40-50 पृष्ठ ही लिखे गए थे, मैं चला भी जाता तो भी कुछ खास बात नहीं थी, करोड़ों आत्मकथाएँ अधलिखी या बिनालिखी चिता की अग्नि में स्वाहा हो गई, मेरी भी हो जाती।
असल में जून 2008 में ही मेरे मुंह में पनप रहे कैंसर ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। चौबीस घंटे कनपटी, दाढ़ और कान में तीखे दर्द का एहसास बना रहता था। मैंने दो माह तक होम्योपैथी दवा ली लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हो रहा था। 2 अगस्त को भोपाल के लायन्स क्लब में आयोजित 'केबिनेट मीटिंग' में मुझे 'संगठन प्रबंधन' पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था। मुँह में दर्द बहुत अधिक था, बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी आयोजक को किए गए वादे से मुकरना मुझे नापसंद था, मैं भोपाल गया और दो घंटे की प्रस्तुति दी। पूरे चेहरे में दर्द और बढ़ गया। भोपाल से मैं जबलपुर चला गया और अपने भांजे डा॰ विकेश अग्रवाल से सलाह ली। उन्होंने मुझे आंकोलाजिस्ट डा॰ अर्पण मिश्रा को दिखाया। डा॰ मिश्रा ने रोग के तेजी से बढ्ने की चेतावनी और तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? निर्णय लेने की किसी भी चूक का परिणाम घातक हो सकता था। मैं कैंसर से लड़ने की बजाय उसे तटस्थ भाव से देखना चाहता था जबकि संगीता और केदार मुझे यह आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने इंदौर में 21 अगस्त को सर्जरी निश्चित करवा ली। पहली सर्जरी में हुआ भयानक कष्ट मुझे याद था, अगली सर्जरी और भी गहरी और गंभीर होने वाली थी। संभावित पीड़ा की कल्पना से मैं रह-रहकर काँप उठता लेकिन मेरे सामने दो ही विकल्प थे, या तो सर्जरी का तात्कालीन कष्ट सहूँ या मृत्यु की प्रतीक्षा का अनिश्चितकालीन कष्ट। अंततः मैंने सर्जरी को चुना।
एक दिन मैंने बाज़ार से आधा किलो छेने का चमचम खरीदा, घर लाया और डब्बा खोलकर खाने बैठा गया। माधुरी जी मुझे मीठा खाते देखकर चौंक गयी क्योंकि पिछले कई वर्षों से मैं मीठा नहीं खा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा- 'अरे, मिठाई खा रहे हो?'
'हाँ.' मैंने ठंडा सा उत्तर दिया.
'कैसे? तुम तो चाय तक बिनां शक्कर की पीते हो, आज क्या हो गया?'
'मैंने देखा है कि जिसे भी दोबारा कैंसर होता है, वह नहीं बचता। मुझे लगता है कि मेरा समय भी पूरा हो चुका है।'
'तुम कैसी बातें कर रहे हो? कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा लेकिन आज यह मिठाई खाने की क्या सूझी?'
'मैंने सोचा, अब आखिरी समय है, सब सब खा-पी कर मरूं.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब मरने का समय आएगा तो अतृप्त इच्छाओं के कारण मेरी आँखों के सामने बालूशाही, जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन नृत्य करेंगे। संभव है कि इसी वज़ह से अगले जन्म में मैं फिर हलवाई बन जाऊं! यार, अगले जन्म में हलवाई नहीं बनना मुझे.'
'इसलिए मीठा शुरू?'
'यस, आज से मीठा शुरू.' मैंने हंसते हुए कहा.
18 अगस्त की शाम को संगीता का फोन आया और मुझसे अगली सुबह 'सेकेंड ओपीनियन' हेतु मुंबई चलने के लिए कहा। 19 अगस्त की सुबह की 'फ्लाइट' से हम मुंबई पहुँच गए और मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल के आंकोलाजी विभाग में डा॰ मंदार देशपांडे के सामने बैठे थे। अस्पताल नया था, हाल-हाल में शुरू हुआ था जबकि डाक्टर पुराने और अनुभवी लेकिन युवा थे। डा॰ मंदार देशपांडे को मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में मुँह की शल्यक्रिया का दीर्घ अनुभव था, अब वे इस अस्पताल में कार्यरत थे। डा॰ देशपांडे ने मेरी जांच की, इंदौर की रिपोर्ट देखी और कहा- 'अंकल आपकी सर्जरी करनी पड़ेगी, 'सुप्रा मेजर सर्जरी' होगी। गाल खोलकर हड्डी निकालनी होगी और फिर 'प्लास्टिक सर्जरी' से उसे आपकी जांघ से मांस का टुकड़ा निकालकर वहाँ जोड़ेंगे ताकि आपका चेहरा एक तरफ धंसा हुआ न दिखे। चेहरा एकदम जस का तस नहीं बन पाएगा, या तो एक तरफ थोड़ा दबेगा या बढ़ सकता है। '
'ठीक है।' मैंने कहा।
'सर्जरी के बाद आपको बारह से चौदह दिनों तक अस्पताल में रहना होगा और छुट्टी होने के बाद लगभग दो माह मुंबई में ही रुकना पड़ेगा ताकि आपकी रेडियोथेरेपी की जा सके।'
'मैं सर्जरी करवाने के लिए तैयार हूँ लेकिन रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करवाऊंगा।'
'मेरा अनुमान है कि सर्जरी के पश्चात रेडियोथेरेपी तो करनी पड़ेगी।'
'फिर मुझे न सर्जरी करवानी है न रेडियोथेरेपी, मैं चलता हूँ, आपको धन्यवाद।'
'मैं एक बात कहूँ अंकल ?'
'जी कहिए।'
'आप अगर मेरे पापा होते तो मैं यह 'चांस' अवश्य लेता।'
'आपने बहुत गभीर बात कह दी।'
'जी, मैं अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे रहा हूँ कि आप सर्जरी और रेडियोथेरेपी के लिए खुद को तैयार करें।'
'तो फिर ठीक है, कर दीजिए, कब करेंगे ?'
'आज आपकी 'बायप्सी' ले लेते हैं, आठ दिनों में रिपोर्ट आ जाएगी, उसके तीन दिन बाद आपकी सर्जरी।'
'डाक्टर साहब, यह बताइए, बायप्सी क्यों करते हैं ?'
'कैंसर 'कंफर्म' करने के लिए।'
'आपने अभी मेरा गाल 'चेक' किया, आपको ऐसा लगता है कि कुछ 'कंफर्म' करने की ज़रूरत है ?'
'आपको कैंसर है, पक्का है, यह मुझे दिख रहा है लेकिन 'पेशेंट' की तसल्ली के लिए बायप्सी रिपोर्ट देखते हैं।'
क्यों आप आठ दिन का समय निरर्थक नष्ट कर रहे हैं ? आप कल मेरी सर्जरी कर दीजिए।'
'ऐसा क्या ?' डाक्टर ने पूछा।
'जी, शुभस्य शीघ्रम।' मैंने कहा।
डाक्टर देशपांडे ने कहा- 'आज आप 'एडमिट' हो जाइए, कल दिन में आपके कुछ 'टेस्ट' होंगे और यदि 'ओ टी' खाली होगा तो परसों सर्जरी। उन्होंने 'ऑपरेशन थियेटर इंचार्ज' को फोन लगाया, इंचार्ज ने बताया- '21 को 'ओ टी' खाली नहीं है।'
'कोशिश करो, शायद कोई सर्जरी 'शिफ्ट' हो।' डाक्टर ने उनसे कहा। हमसे कहा- 'ऑपरेशन 21 को न हो सका तो 22 को करेंगे, आप आज रात को भर्ती हो जाइए, कल से आपका 'प्रोसीजर' शुरू कर देंगे।'
'सही है।' मैंने कहा।
फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोरकुमार ने एक मज़ेदार गाना गाया था- 'जाते थे जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए न ?' इसी तरह मुझे सर्जरी के लिए इंदौर जाना था लेकिन मैं मुंबई पहुँच गया। रात को जब भर्ती होने के लिए काउंटर पर गए तो मालूम हुआ कि 'सुप्रा मेजर सर्जरी' का 'ट्विन शेयर' में पैकेज दो लाख पचहत्तर हजार का है और एक लाख अस्सी हजार रुपए अभी जमा करना है तब 'एडमिशन' होगा। हमने अस्पताल में स्थापित एटीएम से साठ हजार निकाल लिए लेकिन रात को दस बजे शेष एक लाख बीस हजार कहाँ से आते ? उस समय हमारे मित्र रमेश जोबनपुत्रा के बहनोई रजनीकान्त गढ़िया, जो मुंबई में रहते हैं, हमारे साथ थे, वे बोले- 'आधे घंटे रुकिए, मैं अपने घर से लेकर आता हूँ।'
रात को ग्यारह बजे मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था, लेटते ही 'प्रोसीजर' शुरू हो गया। 20 अगस्त को माधुरी और केदार मुंबई आ गए। दिन भर 'स्केन', 'एक्स-रे', खून-पेशाब-एड्स' आदि की जांच हुई। डाक्टर देशपांडे ने शाम को फोन किया- 'आपकी सारी रिपोर्ट मेरे कंप्यूटर पर आ गई है, सब 'नार्मल' है। कल सुबह जिस 'पेशेंट' की सर्जरी होनी थी, 'सुगर' बढ़ने के कारण 'पोस्टपोन' हो गई है। आपकी सर्जरी के लिए 'ओ टी' खाली मिल गई, कल सुबह सात बजे आपको तैयार रहना है। ऑल द बेस्ट।'
21 अगस्त की सुबह मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय सबने शुभकामना संकेत दिए, मैंने भी वापसी संकेत किए। मुझे 'स्ट्रेचर' पर लिटाकर 'प्री सर्जरी रूम' में ले जाया गया, वहाँ और भी मरीज थे। बहुत देर तक मैं वहाँ लेटा रहा, निर्विकार भाव से, बीच-बीच में उठकर अन्य मरीजों को देखता और फिर वापस लेट जाता। तब ही अनेस्थेटिस्ट डा॰ अपर्णा दाते मेरे समीप आई औए बोली- 'अंकल, चलें ?'
'मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूँ, चलिए।' मैंने उत्तर दिया। कुछ देर बाद मैं एक शानदार ऑपरेशन थिएटर की तेज रोशनी वाली लाइट के नीचे लेटा हुआ था। डा॰ दाते ने हाथ की नस में धीरे से एक 'इंजेक्शन' लगाया, उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या पता ! 'आंकोलाजिस्ट डा॰ मंदार देशपांडे और प्लास्टिक सर्जन डा॰ चारुदत्ता चौधरी ने मेरी सर्जरी की। हमारी बिटिया संगीता को भी ओटी में अपने पापा की सर्जरी देखने का सुअवसर मिला।
'हूँ, देखो, मैं हूँ।' मुझे आवाज सुनाई पड़ी। मैंने आंखे खोली, सामने माधुरी खड़ी थी। उनकी आँखों से प्रसन्नता उमड़ रही थी, होठों में मुस्कान और चेहरा आश्वस्त। मैंने अपने बाएँ हाथ से उनके गाल छुए, उन्होंने मेरे हाथ की गदेलियों को अपनी दोनों गदेलियों से लपेट लिया। मेरी आँखें भर आई, गला रूँध गया, हम दोनों के मध्य एक मौन संभाषण हुआ। उस संभाषण को शब्दों में कैसे बताऊं ? मेरे मुंह में रुई ठुँसी हुई थी, किसी तरह बुदबुदाते हुए मैंने उनसे पूछा- 'ऑपरेशन कब तक चला ?'
'क्या पता, तुम दस घंटे बाद बाहर आए, कल की बात है, अब कैसा लग रहा है ?' माधुरी ने प्रश्न किया। मैंने अपने दाहिने अंगूठे से तर्जनी को जोड़कर इशारा किया जिसका अर्थ था- 'बढ़िया।' तीन-चार मिनट की इस छोटी सी मुलाक़ात को मैं अपने जीवन भर सँजोकर रखूँगा। यह पुनर्मिलन जैसा था। आई॰सी॰यू॰ में कुछ देर बाद संगीता आई- 'कैसे हो पापा ?' मैंने अपनी पलकें झपकाकर कुशल होने का संकेत दिया और एक हाथ उठाकर गाल को छू लिया। मेरे उस स्पर्श में उनके द्वारा किए गए अपूर्व प्रयासों के लिए आभार, शाबासी और न जाने क्या-क्या भाव थे !
'पापा, मैं तीन घंटे तक आपकी सर्जरी में खुद खड़ी रही, बहुत अच्छा ऑपरेशन हुआ है आपका, डा॰ देशपांडे और डा॰ चौधरी ने शानदार काम किया।' संगीता ने बताया। कुछ देर बाद हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ मुझे देखने आए, मुझे देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे।
हम सबने मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जम कर लोहा लिया। अभी तक सब अनुकूल था लेकिन सर्जरी के बाद होने वाली रेडियोथेरेपी का दैत्य मेरे सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था जिसकी डरावनी गूंज मुझे अनवरत सुनाई पड़ रही थी।
ऑपरेशन के पश्चात मुझे 'इंटेन्सिव केयर यूनिट' में रखा गया। उसी शाम मुझे होश आ गया। अपने बिस्तर पर मैं चित लेटा हुआ था, नाक और मूत्रनली में 'पाइप' लगे हुए थे। एक हाथ से 'ग्लूकोज़' दिया जा रहा था और दूसरे हाथ पर रक्तचाप मापने का यंत्र लगा हुआ था जो प्रत्येक तीस मिनट में अपने-आप चालू होता और उसे कंप्यूटर में अंकित कर लेता। हृदय की धड़कन नापने वाली मशीन के पाइप छाती से चिपके हुए थे। गाल और गर्दन में हुई सर्जरी के कारण मेरा सिर स्थिर था और शरीर के अन्य अंगों के हिलने-डुलने की भी गुंजाइश न थी। मुझे लगातार नींद आ रही थी, बीच-बीच में टूटती, फिर सो जाता। 'सर्जरी एरिया' में असुविधा थी लेकिन दर्द नहीं था। आधी रात के पश्चात मेरी नींद उचट गई क्योंकि रात्रिकालीन देखरेख के लिए नियुक्त डाक्टर और नर्स तेज आवाज में बातचीत कर रहे थे। बातचीत क्या, ही-ही, खी-खी चल रही थी। तंद्रा की अवस्था में मैं सोना चाहता था लेकिन उनकी आवाजें मुझे चुभती रही, मैं लाचार पड़ा रहा। मुझे यह भी नहीं मालूम था की 'कालबेल' बिस्तर में लगी है अन्यथा उन्हें बुलाकर मना करता। मेरे मुंह में रुई से 'पैक' था इसलिए बोल नहीं पा रहा था। नर्सें मुझे दूर से आती-जाती दिखती, मैं हाथ उठाकर बुलाने का इशारा करता लेकिन वे मेरी तरफ न देखकर सीधे निकल जाती, ऐसे में उन्हें कैसे बुलाता ? घंटों बेचैनी में बीत गए, रात को लगभग दो बजे एक नर्स मेरे पास आई, मैंने उसे अपनी समस्या बताई, उसने डाक्टर की सलाह से मुझे 'मार्फिन' की एक 'डोज़' दे दी लेकिन उनकी ही-ही खी-खी के आगे मार्फिन ने भी घुटने टेक दिए। वे सुबह होने तक बतियाते रहे, मैं रात भर बेचैन जागता रहा। जब सुबह हुई तो मेरी बायीं ओर लगे पारदर्शी काँच से सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट होने लगा, मैंने मन ही मन कहा- 'गुड मार्निंग।' मुझे उम्मीद थी कि उन बे-शऊर डाक्टरों और नर्सों की 'ड्यूटी' का समय खत्म होने वाला होगा, जब ये सब यहाँ से विदा हो जाएंगे तब मैं चैन से सो सकूँगा। कुछ देर बाद वैसा ही हुआ तब मैं सुख की नींद ले सका।
दोपहर को 'प्लास्टिक सर्जरी' विशेषज्ञ डा॰ चारुदत्ता मुझे देखने आए, मेरी जांच की और मुझे बताया- 'आपकी जांघ से निकाले गए मांस के जिस टुकड़े को चेहरे में 'ग्राफ्ट' किया गया था, वह सक्रिय हो गया है।' शाम को डा॰ मंदार देशपांडे मुझे देखने आए, उन्होंने मेरे मुंह के अंदर की रुई को बाहर निकाल दिया और पूछा- 'अंकल, कैसे हो।' मैंने इशारे से अपने ठीक होने का संकेत दिया तो उन्होंने कहा- 'बोलकर बताइए।' कुछ अस्फुट आवाज मेरे गले से निकली, वे मुझे और अधिक बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। मेरी प्रगति से वे संतुष्ट दिखे, उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ, आपकी 'रिकवरी' भी ठीक है, आज रात आपको आई॰सी॰यू॰ में रखेंगे, कल सुबह रूम में शिफ्ट करेंगे।' मैंने उनसे बीती रात का हाल बताया और हाथ जोड़कर कहा- 'डाक्टर साहब, मैं इस यातनागृह में अब और नहीं रहना चाहता, मुझे आज ही कमरे में शिफ्ट कर दीजिए ताकि मैं रात को आराम से सो सकूँ।' सहृदय डाक्टर ने मेरी बात मान ली और रात को नौ बजे मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
आई॰सी॰यू॰ की रात वाली बात को छोड़ दिया जाए तो बारह दिनों के उस अस्पताली आवास को भुलाया नहीं जा सकता। डाक्टरों की लगातार देखरेख, आत्मीयतापूर्ण बातचीत, नर्स और अन्य स्टाफ का अनथक परिश्रम, उत्कृष्ट साफ-सफाई और स्वादिष्ट भोजन और पेय की जितनी प्रशंसा के जाए, कम है। सब काम एकदम समय पर, किसी से कुछ कहने या याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, मुझे वहाँ सम्पूर्ण व्यवस्थित प्रबंधन का व्यावहारिक रूप देखने के लिए मिला। सभी लोग अच्छे थे लेकिन नगालैंड से आई एक नर्स जिसका नाम था- बेबी, उसका व्यवहार और सरोकार आज भी याद आता है।
मेरे आई॰सी॰यू॰ से बाहर आने के बाद माधुरी और केदारनाथ घर वापस चले गए। संगीता मेरी देखरेख के लिए मेरे साथ रही। इस बीमारी की पहचान से उपचार तक संगीता ने जिस सक्रियता से मेरी सेवा-सुश्रूषा की, मुझे लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, बेटा है।
29 अगस्त को सर्जरी के दौरान गाल से निकाले गए अंदरूनी टुकड़ों की जांच के परिणाम आ गए। कैंसर का प्रभाव आरंभिक और एक ही स्थान पर केन्द्रित था इसलिए डाक्टर ने मुझे 'रेडियोथेरेपी' करने की जरूरत से मुक्त कर दिया और 1 अक्तूबर की सुबह अस्पताल से छुट्टी मिलने का संकेत दे दिया। 30 अगस्त की शाम को ही अस्पताल में 'डिस्चार्ज' की तैयारी शुरू हो गई। पूर्व में ही हमें 2,75,000/- सर्जरी का 'पैकेज' बताया गया था और हमने उस बीच पूरी राशि जमा कर दी थी। जब संगीता 'बिल काउंटर' में भुगतान करने गई तो हमारी सर्जरी का कुल 2.44,000/- का 'बिल' बना। आश्चर्यचकित संगीता ने पूछा- 'आप कुछ भूल तो नहीं रहे हैं ?'
'नहीं, 'पेशेंट' पर हास्पिटल का खर्च इतना ही हुआ है।' उन्होंने कहा और 31,000/- वापस कर दिए।
जब संगीता ने मुझे इस बात को बताया तो कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल की ईमानदारी पर मैं विस्मित सा हो गया। चिकित्सा जगत में व्याप्त लूट-खसोट के विपरीत उनका व्यवहार अविश्वसनीय लगा। मैं अपने शहर बिलासपुर में अखिल भारतीय स्तर के एक ख्यातिलब्ध ग्रुप के हास्पिटल की कारस्तानी को याद कर रहा था जहां अधिकतर मरीजों की बीमारी के साथ घिनौना खिलवाड़ किया जाता है, मृत मरीज के परिवारजनों को जीवन की उम्मीद की लालच में 'वेंटिलेटर' पर रखकर बिल बढ़ाने के लिए जिंदा बताया जाता है। मरीज के गैर ज़रूरी मंहगे परीक्षण इसलिए करवाए जाते हैं ताकि अस्पताल की आय बढ़े ! इलाज का अनाप-शनाप बिल बढ़ा कर उनकी मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाया जाता है !
महत्वपूर्ण यह है कि संगीता आश्चर्यचकित क्यों हुई, मैं विस्मित क्यों हुआ ? ईमानदारी तो हमारा स्वाभाविक व्यवहार होना चाहिए। यही ईमानदारी किसी संस्थान की ख्याति में वृद्धि करती है, यही ईमानदारी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है तो फिर यह भावना अब दुर्लभ क्यों होती जा रही है ? चिकित्सा का कार्य व्यापार नहीं, सेवा और सहानुभूति का कार्य है। इस 'मिशन' का तानाबाना मानवीय संवेदनाओं के धागों से बुना हुआ है, इन धागों का टूटना भविष्य के संभावित खतरों की दुखदायी आहट है।
वहाँ से सुरक्षित वापस आने के दो वर्ष बाद पुनः कैंसर ने मुझपर आक्रमण किया लेकिन इस बार दाएँ नहीं, बाएँ गाल पर। फिर वही कष्टदायक सर्जरी, वही हास्पिटल नंबर वन, वही डाक्टर नंबर वन, वही नर्सिंग नंबर वन, वही देखरेख नंबर वन और वही साथ मेरी अर्धांगिनी माधुरी और मेरे बेटी-बेटे संगीता और केदारनाथ का।
सन 1971 में मैंने एक फिल्म देखी थी- 'आनंद', जिंदगी और मौत से हँसता-गाता संघर्ष। फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने उस कथानक को ऐसा चित्रित किया था कि कैंसर जैसी भयावह बीमारी जैसे एक कविता बन गई जिसने सबको रुलाया और वह अविस्मरणीय बन गई।
तब मुझे मालूम न था कि वह कहानी मेरे जीवन में यथार्थ के रूप में घटित होगी। आठ वर्षों के अंतराल में कैंसर के तीन तीव्र आक्रमण मुझ पर हुए। इस गंभीर बीमारी का मैंने किस तरह सामना किया, उसे मेरे डाक्टर, परिवारजन और कुछ अंतरंग जानते हैं।
फिल्म 'आनंद' का नायक राजेश खन्ना उन संकट के घड़ियों में हर समय मेरे आस-पास रहा, मुझे संभालता रहा, मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा। प्रचंड पीड़ा के दौरान उनके मुसकुराते चेहरे ने मुझे कैंसर से जूझने में बहुत मदद की जो आज भी जारी है। धन्यवाद हृषिकेश मुखर्जी, आभार राजेश खन्ना। एक दिन सभी को जाना है लेकिन ज़िंदगी में संघर्ष किस तरह किया जाता है- आपने सिखाया है।
असलम हसन की इस कविता पर गौर करें :
'कितना मुश्किल है
आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर बाहर रंग-बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है
फिक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिन्द मचल जाना
कितना सख्त है
नर्म होना
मोम होना
और पिघल जाना
कितना आसाँ है
दिल का जाना
दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना।'
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आगे और भी है > >
कैंसर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2002 में हुई थी, छः वर्ष बाद फिर से हो गई। अब तक दोनों बेटियाँ ब्याह गई थी, कर्ज़ पट गए थे, माधुरी लाज का काम-काज सीख-समझ गई थी इसलिए मुझे अपने जीवन से विदा लेने में कोई दुविधा या असुविधा नहीं थी। रही बात कष्ट की, सो जितनी तम्बाखू खाई थी, उसका जो मज़ा लिया था तो फल भी मुझे ही भुगतना था। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी थी लेकिन 40-50 पृष्ठ ही लिखे गए थे, मैं चला भी जाता तो भी कुछ खास बात नहीं थी, करोड़ों आत्मकथाएँ अधलिखी या बिनालिखी चिता की अग्नि में स्वाहा हो गई, मेरी भी हो जाती।
असल में जून 2008 में ही मेरे मुंह में पनप रहे कैंसर ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। चौबीस घंटे कनपटी, दाढ़ और कान में तीखे दर्द का एहसास बना रहता था। मैंने दो माह तक होम्योपैथी दवा ली लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हो रहा था। 2 अगस्त को भोपाल के लायन्स क्लब में आयोजित 'केबिनेट मीटिंग' में मुझे 'संगठन प्रबंधन' पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था। मुँह में दर्द बहुत अधिक था, बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी आयोजक को किए गए वादे से मुकरना मुझे नापसंद था, मैं भोपाल गया और दो घंटे की प्रस्तुति दी। पूरे चेहरे में दर्द और बढ़ गया। भोपाल से मैं जबलपुर चला गया और अपने भांजे डा॰ विकेश अग्रवाल से सलाह ली। उन्होंने मुझे आंकोलाजिस्ट डा॰ अर्पण मिश्रा को दिखाया। डा॰ मिश्रा ने रोग के तेजी से बढ्ने की चेतावनी और तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? निर्णय लेने की किसी भी चूक का परिणाम घातक हो सकता था। मैं कैंसर से लड़ने की बजाय उसे तटस्थ भाव से देखना चाहता था जबकि संगीता और केदार मुझे यह आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने इंदौर में 21 अगस्त को सर्जरी निश्चित करवा ली। पहली सर्जरी में हुआ भयानक कष्ट मुझे याद था, अगली सर्जरी और भी गहरी और गंभीर होने वाली थी। संभावित पीड़ा की कल्पना से मैं रह-रहकर काँप उठता लेकिन मेरे सामने दो ही विकल्प थे, या तो सर्जरी का तात्कालीन कष्ट सहूँ या मृत्यु की प्रतीक्षा का अनिश्चितकालीन कष्ट। अंततः मैंने सर्जरी को चुना।
एक दिन मैंने बाज़ार से आधा किलो छेने का चमचम खरीदा, घर लाया और डब्बा खोलकर खाने बैठा गया। माधुरी जी मुझे मीठा खाते देखकर चौंक गयी क्योंकि पिछले कई वर्षों से मैं मीठा नहीं खा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा- 'अरे, मिठाई खा रहे हो?'
'हाँ.' मैंने ठंडा सा उत्तर दिया.
'कैसे? तुम तो चाय तक बिनां शक्कर की पीते हो, आज क्या हो गया?'
'मैंने देखा है कि जिसे भी दोबारा कैंसर होता है, वह नहीं बचता। मुझे लगता है कि मेरा समय भी पूरा हो चुका है।'
'तुम कैसी बातें कर रहे हो? कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा लेकिन आज यह मिठाई खाने की क्या सूझी?'
'मैंने सोचा, अब आखिरी समय है, सब सब खा-पी कर मरूं.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब मरने का समय आएगा तो अतृप्त इच्छाओं के कारण मेरी आँखों के सामने बालूशाही, जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन नृत्य करेंगे। संभव है कि इसी वज़ह से अगले जन्म में मैं फिर हलवाई बन जाऊं! यार, अगले जन्म में हलवाई नहीं बनना मुझे.'
'इसलिए मीठा शुरू?'
'यस, आज से मीठा शुरू.' मैंने हंसते हुए कहा.
18 अगस्त की शाम को संगीता का फोन आया और मुझसे अगली सुबह 'सेकेंड ओपीनियन' हेतु मुंबई चलने के लिए कहा। 19 अगस्त की सुबह की 'फ्लाइट' से हम मुंबई पहुँच गए और मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल के आंकोलाजी विभाग में डा॰ मंदार देशपांडे के सामने बैठे थे। अस्पताल नया था, हाल-हाल में शुरू हुआ था जबकि डाक्टर पुराने और अनुभवी लेकिन युवा थे। डा॰ मंदार देशपांडे को मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में मुँह की शल्यक्रिया का दीर्घ अनुभव था, अब वे इस अस्पताल में कार्यरत थे। डा॰ देशपांडे ने मेरी जांच की, इंदौर की रिपोर्ट देखी और कहा- 'अंकल आपकी सर्जरी करनी पड़ेगी, 'सुप्रा मेजर सर्जरी' होगी। गाल खोलकर हड्डी निकालनी होगी और फिर 'प्लास्टिक सर्जरी' से उसे आपकी जांघ से मांस का टुकड़ा निकालकर वहाँ जोड़ेंगे ताकि आपका चेहरा एक तरफ धंसा हुआ न दिखे। चेहरा एकदम जस का तस नहीं बन पाएगा, या तो एक तरफ थोड़ा दबेगा या बढ़ सकता है। '
'ठीक है।' मैंने कहा।
'सर्जरी के बाद आपको बारह से चौदह दिनों तक अस्पताल में रहना होगा और छुट्टी होने के बाद लगभग दो माह मुंबई में ही रुकना पड़ेगा ताकि आपकी रेडियोथेरेपी की जा सके।'
'मैं सर्जरी करवाने के लिए तैयार हूँ लेकिन रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करवाऊंगा।'
'मेरा अनुमान है कि सर्जरी के पश्चात रेडियोथेरेपी तो करनी पड़ेगी।'
'फिर मुझे न सर्जरी करवानी है न रेडियोथेरेपी, मैं चलता हूँ, आपको धन्यवाद।'
'मैं एक बात कहूँ अंकल ?'
'जी कहिए।'
'आप अगर मेरे पापा होते तो मैं यह 'चांस' अवश्य लेता।'
'आपने बहुत गभीर बात कह दी।'
'जी, मैं अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे रहा हूँ कि आप सर्जरी और रेडियोथेरेपी के लिए खुद को तैयार करें।'
'तो फिर ठीक है, कर दीजिए, कब करेंगे ?'
'आज आपकी 'बायप्सी' ले लेते हैं, आठ दिनों में रिपोर्ट आ जाएगी, उसके तीन दिन बाद आपकी सर्जरी।'
'डाक्टर साहब, यह बताइए, बायप्सी क्यों करते हैं ?'
'कैंसर 'कंफर्म' करने के लिए।'
'आपने अभी मेरा गाल 'चेक' किया, आपको ऐसा लगता है कि कुछ 'कंफर्म' करने की ज़रूरत है ?'
'आपको कैंसर है, पक्का है, यह मुझे दिख रहा है लेकिन 'पेशेंट' की तसल्ली के लिए बायप्सी रिपोर्ट देखते हैं।'
क्यों आप आठ दिन का समय निरर्थक नष्ट कर रहे हैं ? आप कल मेरी सर्जरी कर दीजिए।'
'ऐसा क्या ?' डाक्टर ने पूछा।
'जी, शुभस्य शीघ्रम।' मैंने कहा।
डाक्टर देशपांडे ने कहा- 'आज आप 'एडमिट' हो जाइए, कल दिन में आपके कुछ 'टेस्ट' होंगे और यदि 'ओ टी' खाली होगा तो परसों सर्जरी। उन्होंने 'ऑपरेशन थियेटर इंचार्ज' को फोन लगाया, इंचार्ज ने बताया- '21 को 'ओ टी' खाली नहीं है।'
'कोशिश करो, शायद कोई सर्जरी 'शिफ्ट' हो।' डाक्टर ने उनसे कहा। हमसे कहा- 'ऑपरेशन 21 को न हो सका तो 22 को करेंगे, आप आज रात को भर्ती हो जाइए, कल से आपका 'प्रोसीजर' शुरू कर देंगे।'
'सही है।' मैंने कहा।
फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोरकुमार ने एक मज़ेदार गाना गाया था- 'जाते थे जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए न ?' इसी तरह मुझे सर्जरी के लिए इंदौर जाना था लेकिन मैं मुंबई पहुँच गया। रात को जब भर्ती होने के लिए काउंटर पर गए तो मालूम हुआ कि 'सुप्रा मेजर सर्जरी' का 'ट्विन शेयर' में पैकेज दो लाख पचहत्तर हजार का है और एक लाख अस्सी हजार रुपए अभी जमा करना है तब 'एडमिशन' होगा। हमने अस्पताल में स्थापित एटीएम से साठ हजार निकाल लिए लेकिन रात को दस बजे शेष एक लाख बीस हजार कहाँ से आते ? उस समय हमारे मित्र रमेश जोबनपुत्रा के बहनोई रजनीकान्त गढ़िया, जो मुंबई में रहते हैं, हमारे साथ थे, वे बोले- 'आधे घंटे रुकिए, मैं अपने घर से लेकर आता हूँ।'
रात को ग्यारह बजे मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था, लेटते ही 'प्रोसीजर' शुरू हो गया। 20 अगस्त को माधुरी और केदार मुंबई आ गए। दिन भर 'स्केन', 'एक्स-रे', खून-पेशाब-एड्स' आदि की जांच हुई। डाक्टर देशपांडे ने शाम को फोन किया- 'आपकी सारी रिपोर्ट मेरे कंप्यूटर पर आ गई है, सब 'नार्मल' है। कल सुबह जिस 'पेशेंट' की सर्जरी होनी थी, 'सुगर' बढ़ने के कारण 'पोस्टपोन' हो गई है। आपकी सर्जरी के लिए 'ओ टी' खाली मिल गई, कल सुबह सात बजे आपको तैयार रहना है। ऑल द बेस्ट।'
21 अगस्त की सुबह मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय सबने शुभकामना संकेत दिए, मैंने भी वापसी संकेत किए। मुझे 'स्ट्रेचर' पर लिटाकर 'प्री सर्जरी रूम' में ले जाया गया, वहाँ और भी मरीज थे। बहुत देर तक मैं वहाँ लेटा रहा, निर्विकार भाव से, बीच-बीच में उठकर अन्य मरीजों को देखता और फिर वापस लेट जाता। तब ही अनेस्थेटिस्ट डा॰ अपर्णा दाते मेरे समीप आई औए बोली- 'अंकल, चलें ?'
'मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूँ, चलिए।' मैंने उत्तर दिया। कुछ देर बाद मैं एक शानदार ऑपरेशन थिएटर की तेज रोशनी वाली लाइट के नीचे लेटा हुआ था। डा॰ दाते ने हाथ की नस में धीरे से एक 'इंजेक्शन' लगाया, उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या पता ! 'आंकोलाजिस्ट डा॰ मंदार देशपांडे और प्लास्टिक सर्जन डा॰ चारुदत्ता चौधरी ने मेरी सर्जरी की। हमारी बिटिया संगीता को भी ओटी में अपने पापा की सर्जरी देखने का सुअवसर मिला।
'हूँ, देखो, मैं हूँ।' मुझे आवाज सुनाई पड़ी। मैंने आंखे खोली, सामने माधुरी खड़ी थी। उनकी आँखों से प्रसन्नता उमड़ रही थी, होठों में मुस्कान और चेहरा आश्वस्त। मैंने अपने बाएँ हाथ से उनके गाल छुए, उन्होंने मेरे हाथ की गदेलियों को अपनी दोनों गदेलियों से लपेट लिया। मेरी आँखें भर आई, गला रूँध गया, हम दोनों के मध्य एक मौन संभाषण हुआ। उस संभाषण को शब्दों में कैसे बताऊं ? मेरे मुंह में रुई ठुँसी हुई थी, किसी तरह बुदबुदाते हुए मैंने उनसे पूछा- 'ऑपरेशन कब तक चला ?'
'क्या पता, तुम दस घंटे बाद बाहर आए, कल की बात है, अब कैसा लग रहा है ?' माधुरी ने प्रश्न किया। मैंने अपने दाहिने अंगूठे से तर्जनी को जोड़कर इशारा किया जिसका अर्थ था- 'बढ़िया।' तीन-चार मिनट की इस छोटी सी मुलाक़ात को मैं अपने जीवन भर सँजोकर रखूँगा। यह पुनर्मिलन जैसा था। आई॰सी॰यू॰ में कुछ देर बाद संगीता आई- 'कैसे हो पापा ?' मैंने अपनी पलकें झपकाकर कुशल होने का संकेत दिया और एक हाथ उठाकर गाल को छू लिया। मेरे उस स्पर्श में उनके द्वारा किए गए अपूर्व प्रयासों के लिए आभार, शाबासी और न जाने क्या-क्या भाव थे !
'पापा, मैं तीन घंटे तक आपकी सर्जरी में खुद खड़ी रही, बहुत अच्छा ऑपरेशन हुआ है आपका, डा॰ देशपांडे और डा॰ चौधरी ने शानदार काम किया।' संगीता ने बताया। कुछ देर बाद हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ मुझे देखने आए, मुझे देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे।
हम सबने मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जम कर लोहा लिया। अभी तक सब अनुकूल था लेकिन सर्जरी के बाद होने वाली रेडियोथेरेपी का दैत्य मेरे सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था जिसकी डरावनी गूंज मुझे अनवरत सुनाई पड़ रही थी।
दोपहर को 'प्लास्टिक सर्जरी' विशेषज्ञ डा॰ चारुदत्ता मुझे देखने आए, मेरी जांच की और मुझे बताया- 'आपकी जांघ से निकाले गए मांस के जिस टुकड़े को चेहरे में 'ग्राफ्ट' किया गया था, वह सक्रिय हो गया है।' शाम को डा॰ मंदार देशपांडे मुझे देखने आए, उन्होंने मेरे मुंह के अंदर की रुई को बाहर निकाल दिया और पूछा- 'अंकल, कैसे हो।' मैंने इशारे से अपने ठीक होने का संकेत दिया तो उन्होंने कहा- 'बोलकर बताइए।' कुछ अस्फुट आवाज मेरे गले से निकली, वे मुझे और अधिक बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। मेरी प्रगति से वे संतुष्ट दिखे, उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ, आपकी 'रिकवरी' भी ठीक है, आज रात आपको आई॰सी॰यू॰ में रखेंगे, कल सुबह रूम में शिफ्ट करेंगे।' मैंने उनसे बीती रात का हाल बताया और हाथ जोड़कर कहा- 'डाक्टर साहब, मैं इस यातनागृह में अब और नहीं रहना चाहता, मुझे आज ही कमरे में शिफ्ट कर दीजिए ताकि मैं रात को आराम से सो सकूँ।' सहृदय डाक्टर ने मेरी बात मान ली और रात को नौ बजे मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
आई॰सी॰यू॰ की रात वाली बात को छोड़ दिया जाए तो बारह दिनों के उस अस्पताली आवास को भुलाया नहीं जा सकता। डाक्टरों की लगातार देखरेख, आत्मीयतापूर्ण बातचीत, नर्स और अन्य स्टाफ का अनथक परिश्रम, उत्कृष्ट साफ-सफाई और स्वादिष्ट भोजन और पेय की जितनी प्रशंसा के जाए, कम है। सब काम एकदम समय पर, किसी से कुछ कहने या याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, मुझे वहाँ सम्पूर्ण व्यवस्थित प्रबंधन का व्यावहारिक रूप देखने के लिए मिला। सभी लोग अच्छे थे लेकिन नगालैंड से आई एक नर्स जिसका नाम था- बेबी, उसका व्यवहार और सरोकार आज भी याद आता है।
मेरे आई॰सी॰यू॰ से बाहर आने के बाद माधुरी और केदारनाथ घर वापस चले गए। संगीता मेरी देखरेख के लिए मेरे साथ रही। इस बीमारी की पहचान से उपचार तक संगीता ने जिस सक्रियता से मेरी सेवा-सुश्रूषा की, मुझे लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, बेटा है।
29 अगस्त को सर्जरी के दौरान गाल से निकाले गए अंदरूनी टुकड़ों की जांच के परिणाम आ गए। कैंसर का प्रभाव आरंभिक और एक ही स्थान पर केन्द्रित था इसलिए डाक्टर ने मुझे 'रेडियोथेरेपी' करने की जरूरत से मुक्त कर दिया और 1 अक्तूबर की सुबह अस्पताल से छुट्टी मिलने का संकेत दे दिया। 30 अगस्त की शाम को ही अस्पताल में 'डिस्चार्ज' की तैयारी शुरू हो गई। पूर्व में ही हमें 2,75,000/- सर्जरी का 'पैकेज' बताया गया था और हमने उस बीच पूरी राशि जमा कर दी थी। जब संगीता 'बिल काउंटर' में भुगतान करने गई तो हमारी सर्जरी का कुल 2.44,000/- का 'बिल' बना। आश्चर्यचकित संगीता ने पूछा- 'आप कुछ भूल तो नहीं रहे हैं ?'
'नहीं, 'पेशेंट' पर हास्पिटल का खर्च इतना ही हुआ है।' उन्होंने कहा और 31,000/- वापस कर दिए।
जब संगीता ने मुझे इस बात को बताया तो कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल की ईमानदारी पर मैं विस्मित सा हो गया। चिकित्सा जगत में व्याप्त लूट-खसोट के विपरीत उनका व्यवहार अविश्वसनीय लगा। मैं अपने शहर बिलासपुर में अखिल भारतीय स्तर के एक ख्यातिलब्ध ग्रुप के हास्पिटल की कारस्तानी को याद कर रहा था जहां अधिकतर मरीजों की बीमारी के साथ घिनौना खिलवाड़ किया जाता है, मृत मरीज के परिवारजनों को जीवन की उम्मीद की लालच में 'वेंटिलेटर' पर रखकर बिल बढ़ाने के लिए जिंदा बताया जाता है। मरीज के गैर ज़रूरी मंहगे परीक्षण इसलिए करवाए जाते हैं ताकि अस्पताल की आय बढ़े ! इलाज का अनाप-शनाप बिल बढ़ा कर उनकी मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाया जाता है !
महत्वपूर्ण यह है कि संगीता आश्चर्यचकित क्यों हुई, मैं विस्मित क्यों हुआ ? ईमानदारी तो हमारा स्वाभाविक व्यवहार होना चाहिए। यही ईमानदारी किसी संस्थान की ख्याति में वृद्धि करती है, यही ईमानदारी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है तो फिर यह भावना अब दुर्लभ क्यों होती जा रही है ? चिकित्सा का कार्य व्यापार नहीं, सेवा और सहानुभूति का कार्य है। इस 'मिशन' का तानाबाना मानवीय संवेदनाओं के धागों से बुना हुआ है, इन धागों का टूटना भविष्य के संभावित खतरों की दुखदायी आहट है।
वहाँ से सुरक्षित वापस आने के दो वर्ष बाद पुनः कैंसर ने मुझपर आक्रमण किया लेकिन इस बार दाएँ नहीं, बाएँ गाल पर। फिर वही कष्टदायक सर्जरी, वही हास्पिटल नंबर वन, वही डाक्टर नंबर वन, वही नर्सिंग नंबर वन, वही देखरेख नंबर वन और वही साथ मेरी अर्धांगिनी माधुरी और मेरे बेटी-बेटे संगीता और केदारनाथ का।
सन 1971 में मैंने एक फिल्म देखी थी- 'आनंद', जिंदगी और मौत से हँसता-गाता संघर्ष। फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने उस कथानक को ऐसा चित्रित किया था कि कैंसर जैसी भयावह बीमारी जैसे एक कविता बन गई जिसने सबको रुलाया और वह अविस्मरणीय बन गई।
तब मुझे मालूम न था कि वह कहानी मेरे जीवन में यथार्थ के रूप में घटित होगी। आठ वर्षों के अंतराल में कैंसर के तीन तीव्र आक्रमण मुझ पर हुए। इस गंभीर बीमारी का मैंने किस तरह सामना किया, उसे मेरे डाक्टर, परिवारजन और कुछ अंतरंग जानते हैं।
फिल्म 'आनंद' का नायक राजेश खन्ना उन संकट के घड़ियों में हर समय मेरे आस-पास रहा, मुझे संभालता रहा, मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा। प्रचंड पीड़ा के दौरान उनके मुसकुराते चेहरे ने मुझे कैंसर से जूझने में बहुत मदद की जो आज भी जारी है। धन्यवाद हृषिकेश मुखर्जी, आभार राजेश खन्ना। एक दिन सभी को जाना है लेकिन ज़िंदगी में संघर्ष किस तरह किया जाता है- आपने सिखाया है।
असलम हसन की इस कविता पर गौर करें :
'कितना मुश्किल है
आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर बाहर रंग-बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है
फिक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिन्द मचल जाना
कितना सख्त है
नर्म होना
मोम होना
और पिघल जाना
कितना आसाँ है
दिल का जाना
दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना।'
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आगे और भी है > >
बिल्कुल सही किया आपने ।
ReplyDeleteHimmat-e-Mardan Madad-e-Khuda.... aapne himmat ki aur ishwar ne aapki madad ki..
ReplyDeleteजीवन चलने का नाम............
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