Tuesday, January 27, 2015

प्यारी दुल्हनियाँ चली

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          मैं बिलासपुर आ गया, घर आ गया। कैन्सर नामक गंभीर रोग से लड़-भिड़ कर वापस आ गया लेकिन घर में बैठकर आराम करने का समय मेरे पास नहीं था। हमारे समाज का व्यवहार है कि ऐसे 'युद्ध' से वापस लौटे सिपाही की ख़ैर-मकदम के लिए रिश्तेदार-मित्र-परिचित घर आते हैं, हाल-चाल पूछते हैं तो बीमार को भी 'फील गुड' होता है लेकिन मेरे पास इस तरह का मज़ा उठाने का गुंजाइश न थी। अगले दिन संगीता के विवाह के निमंत्रणपत्र लेकर अपनी स्कूटर में माधुरी के साथ निकाल पड़ा और मैं उन सबके पास खुद पहुँच गया। मुझे देखकर सब विस्मित हुए- 'अरे, तुम्हारा तो कैन्सर का आपरेशन हुआ है, न ?'
'हाँ, हो गया।' मैंने उन्हें बताया। वे अपना सिर खुजलाते, मेरे चेहरे पर सर्जरी के निशानों को घूरते,,मुझे अज़ीब निगाहों से देखते और विवाह के कार्यक्रम के बारे में बात करने लगते।
          बैंक से बिना रिश्वत दिए ऋण स्वीकृत हो गया। अत्यंत गाढ़े समय पर मिली आर्थिक मदद रमाकांत मिश्रा को वापस हो गई, छोटे भाई राजकुमार ने ढेर सारी मिठाइयाँ बनवाकर पैक करवा दी, बड़े भैया ने भावी दामाद को तिलक करने के लिए नगद राशि दी। मेरी अम्मा उन दिनों रायपुर में बड़े भैया के घर में थी, उनको अपने साथ इंदौर ले जाने के लिए मैंने छोटे भाई को कहा, वे तैयार हो गए लेकिन अम्मा जी के कमजोर स्वास्थ्य के कारण बड़े भैया उन्हें भेजने के लिए सहमत नहीं हुए इसलिए संगीता का विवाह दादी की अनुपस्थिति में ही होना नियत हो गया।
          ढेर सारे डिब्बों और बैग में सामान पैक करके हम लोग इंदौर के लिए ट्रेन से रवाना हुए, अगले दिन इंदौर पहुँच गए। वहाँ एक हॉटल में दोनों परिवारों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। विवाह की पूर्वरात्रि को शहर से बाहर स्थित 'चोखी ढाणी' में नृत्य उत्सव और राजस्थानी भोज आयोजित हुआ। हमारा पूरा परिवार आया, देश-विदेश से मित्रगण विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए पधारे। शाम के धुंधलके में दूल्हे राजा अपने परिवार के साथ हॉटल से नीचे उतरे, वरयात्रा आरम्भ हुई, समीप स्थित मंदिर में देवदर्शन के पश्चात बरात लग गई। न बैंड न बाजा, न आतिशबाज़ी और न ही नाच-गाना, एकदम 'सिंपल'। जब युगल एक दूसरे को पुष्पहार पहना रहे थे, मैं कुछ दूर खड़ा उस प्रक्रिया को प्यार से निहार रहा था, मेरा मन प्रफुल्लित था लेकिन आँखें सजल थी। इस प्रकार हमारी बिटिया संगीता का विवाह संपन्न हो गया. सब प्रसन्न थे लेकिन मैं और माधुरी एक-दूसरे को देखकर उदास हो जाते, हमें मालूम था कि कल सुबह हमारी बेटी पराई हो जाएगी, उसके बगैर हम कैसे रह पाएंगे ?
          अगली सुबह विदा हो गई, मन उदास था और शरीर थकान से टूट रहा था। कुछ प्रिय-अप्रिय घटनाएं भी हो गई लेकिन शादी-ब्याह में कुछ-न-कुछ ऊंचा-नीचा हो ही जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से भिड़ने का अभ्यास हो गया था इसलिए अजीब न लगा बल्कि ऐसा लगा जैसे भोजन करते समय अन्जाने में तेज हरी मिर्च का टुकड़ा चबा जाने पर आँखों से आंसू बह निकले हों। खैर, सब चलता है।
          परिवारजनों और मित्रों ने जो 'व्यवहार' दिया था, वह पूरी राशि लेकर मैं अपने दामाद केदारनाथ के कमरे में गया और उनसे कहा- 'ये रख लीजिए, आप घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे कलर टीवी, वाशिंग मशीन, आलमारी, पलंग-गद्दे आदि, या जो भी आवश्यक लगे, आप खरीद लीजिएगा।'
'इसे आप रख लीजिए, इसकी ज़रुरत नहीं है।' केदारनाथ ने कहा.
'क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, हम आपको सहृदय दे रहे हैं।'
'एक काम कीजिए, मैं इसमें से दस हजार ले लेता हूँ, आलमारी के लिए। बाकी चीजें जब हम कमाएंगे तो खरीद लेंगे।' केदारनाथ ने कहा और शेष रुपये वापस कर दिए।
                    मैं बिलासपुर आ गया, घर आ गया। कैन्सर नामक गंभीर रोग से लड़-भिड़ कर वापस आ गया लेकिन घर में बैठकर आराम करने का समय मेरे पास नहीं था। हमारे समाज का व्यवहार है कि ऐसे 'युद्ध' से वापस लौटे सिपाही की ख़ैर-मकदम के लिए रिश्तेदार-मित्र-परिचित घर आते हैं, हाल-चाल पूछते हैं तो बीमार को भी 'फील गुड' होता है लेकिन मेरे पास इस तरह का मज़ा उठाने का गुंजाइश न थी। अगले दिन संगीता के विवाह के निमंत्रणपत्र लेकर अपनी स्कूटर में माधुरी के साथ निकाल पड़ा और मैं उन सबके पास खुद पहुँच गया। मुझे देखकर सब विस्मित हुए- 'अरे, तुम्हारा तो कैन्सर का आपरेशन हुआ है, न ?'
'हाँ, हो गया।' मैंने उन्हें बताया। वे अपना सिर खुजलाते, मेरे चेहरे पर सर्जरी के निशानों को घूरते,,मुझे अज़ीब निगाहों से देखते और विवाह के कार्यक्रम के बारे में बात करने लगते।
          बैंक से बिना रिश्वत दिए ऋण स्वीकृत हो गया। अत्यंत गाढ़े समय पर मिली आर्थिक मदद रमाकांत मिश्रा को वापस हो गई, छोटे भाई राजकुमार ने ढेर सारी मिठाइयाँ बनवाकर पैक करवा दी, बड़े भैया ने भावी दामाद को तिलक करने के लिए नगद राशि दी। मेरी अम्मा उन दिनों रायपुर में बड़े भैया के घर में थी, उनको अपने साथ इंदौर ले जाने के लिए मैंने छोटे भाई को कहा, वे तैयार हो गए लेकिन अम्मा जी के कमजोर स्वास्थ्य के कारण बड़े भैया उन्हें भेजने के लिए सहमत नहीं हुए इसलिए संगीता का विवाह दादी की अनुपस्थिति में ही होना नियत हो गया।
          ढेर सारे डिब्बों और बैग में सामान पैक करके हम लोग इंदौर के लिए ट्रेन से रवाना हुए, अगले दिन इंदौर पहुँच गए। वहाँ एक हॉटल में दोनों परिवारों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। विवाह की पूर्वरात्रि को शहर से बाहर स्थित 'चोखी ढाणी' में नृत्य उत्सव और राजस्थानी भोज आयोजित हुआ। हमारा पूरा परिवार आया, देश-विदेश से मित्रगण विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए पधारे। शाम के धुंधलके में दूल्हे राजा अपने परिवार के साथ हॉटल से नीचे उतरे, वरयात्रा आरम्भ हुई, समीप स्थित मंदिर में देवदर्शन के पश्चात बरात लग गई। न बैंड न बाजा, न आतिशबाज़ी और न ही नाच-गाना, एकदम 'सिंपल'। जब युगल एक दूसरे को पुष्पहार पहना रहे थे, मैं कुछ दूर खड़ा उस प्रक्रिया को प्यार से निहार रहा था, मेरा मन प्रफुल्लित था लेकिन आँखें सजल थी। इस प्रकार हमारी बिटिया संगीता का विवाह संपन्न हो गया. सब प्रसन्न थे लेकिन मैं और माधुरी एक-दूसरे को देखकर उदास हो जाते, हमें मालूम था कि कल सुबह हमारी बेटी पराई हो जाएगी, उसके बगैर हम कैसे रह पाएंगे ?
          अगली सुबह विदा हो गई, मन उदास था और शरीर थकान से टूट रहा था। कुछ प्रिय-अप्रिय घटनाएं भी हो गई लेकिन शादी-ब्याह में कुछ-न-कुछ ऊंचा-नीचा हो ही जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से भिड़ने का अभ्यास हो गया था इसलिए अजीब न लगा बल्कि ऐसा लगा जैसे भोजन करते समय अन्जाने में तेज हरी मिर्च का टुकड़ा चबा जाने पर आँखों से आंसू बह निकले हों। खैर, सब चलता है।
          परिवारजनों और मित्रों ने जो 'व्यवहार' दिया था, वह पूरी राशि लेकर मैं अपने दामाद केदारनाथ के कमरे में गया और उनसे कहा- 'ये रख लीजिए, आप घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे कलर टीवी, वाशिंग मशीन, आलमारी, पलंग-गद्दे आदि, या जो भी आवश्यक लगे, आप खरीद लीजिएगा।'
'इसे आप रख लीजिए, इसकी ज़रुरत नहीं है।' केदारनाथ ने कहा.
'क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, हम आपको सहृदय दे रहे हैं।'
'एक काम कीजिए, मैं इसमें से दस हजार ले लेता हूँ, आलमारी के लिए। बाकी चीजें जब हम कमाएंगे तो खरीद लेंगे।' केदारनाथ ने कहा और शेष रुपये वापस कर दिए।

                    बेटी का पिता होना बेहद सुखद होता है लेकिन उसे विदा करना उतना ही दुखद होता है। 'उसकी ससुराल कैसी होगी', 'नए परिवेश में वह खुद को कैसे ढालेगी' जैसे सवाल माँ-बाप के दिमाग में हर पल टकराते हैं और उत्तर दिए बिना वापस लौट जाते हैं। हर पल प्रतीक्षा बनी रहती है कि कब बिटिया का फोन आएगा और वह कहेगी- 'मैं अच्छी हूँ मम्मी, ....मज़े में हूँ पापा।' आम तौर पर हिन्दुस्तानी लड़कियां ससुराल में तकलीफ होने पर भी अपने माता-पिता से झूठ बोल देती हैं ताकि वे दुखी न हों इसलिए कई बार वैसा संदेह भी बना रहता है, 'क्या पता, सच बता रही है या नहीं !'
          विवाह कार्यक्रम के पश्चात इंदौर से लौटते समय जो बेचैनी मेरे मन में थी वह अवर्णनीय है। ऐसा लगे- ये क्या हो गया ? क्या हमारी बेटी हम पर बोझ थी कि हमने इतनी हड़बड़ी में उसे ब्याह दिया ? क्या हमें उसे और अधिक पढ़ने का अवसर नहीं देना था ? इतनी पढ़ी-लिखी लड़की छोटी सी बस्ती में ब्याह कर जा रही है, उसे वहाँ कैसा लगेगा ? आदि प्रश्न बार-बार मस्तिष्क में घुमड़ते और मुझे डांटते। पूरी राह मेरे अन्तःमन में के॰एल॰ सहगल का गाया गीत गूँजता रहा और मैं गुनगुनाता रहा- 'बाबुल मोरा नैहर छूटहि जाए...चार कहार मोरी डोलिया उठाए, मोरा अपना बेगाना हुआ जाए....बाबुल मोरा नैहर छूटहि जाए...'।
          बिलासपुर पहुँचकर हम लोग अपने-अपने काम से लग गए, विषाद कम होता गया, समय सब कुछ भुला ले जाता है। एक सुबह संगीता की बहुत याद आई। जो याद आया उसे लिपिबद्ध कर लिया... वह इस तरह था-

'तू क्यों चली गई ?

खिलखिलाता बचपन
मुस्कुराती चितवन
तोड़ नेह का बंधन

आँगन की छम-छम
चौके की सिहरन
पूरे घर की धड़कन

मेज पर करती पढ़ाई
घर में सबसे लड़ाई
लेकर सबकी बड़ाई

सहमी सी मेज
सिसकती कुर्सी
सुबकती किताबें

कोने से घूरती
धूल भरी सायकल
भौंचक मोपेड

पुरानी चप्पलें
तह लगे कपड़े
चुप आलमारियाँ

वो उछलकूद
वो गहमागहमी
वो रूठना मनाना

हर बात पे गुस्सा
हर बात से आहत
हर बात की चिन्ता

बहना से भिड़ंत
लड़ाई-झगड़े अनंत
इस तरह करके अंत

ढूंढती सुबह
बेचैन दोपहर
सवालिया शाम

खिड़कियाँ सिसकती
दरवाजे चिहुंकते
परदे फड़कते

दरकते फर्श
सूनी दीवारें
उदास गलियारे

बेचैन हवाएँ
वीरान सा घर
सिसकता आँगन

मुरझाई पत्तियाँ
उदास कलियाँ
हैरान अमियाँ

बग़ीचे में बढ़ी तुलसी
मोंगरे की सुगंध सी
फागुन की बयार सी

पापा के सखा
मम्मी की सखियाँ
सबकी भीगी अँखियाँ

तेरा आना पुरवाई जैसा
तेरा रहना शहनाई जैसा
तेरा जाना रुसवाई जैसा

अपने भाई को देख
सूनी कलाई को देख
उसकी रुलाई को देख

क्या बस इतना ही साथ
स्वप्न सा छोटा सा साथ
इससे तो न होता साथ

अब क्या रह गया इस घर में
मम्मी-पापा के जीवन में
सब कुछ सूना एक पल में

तू क्यों चली गई ?'

3 comments:

  1. इस प्रसंग का काफी इन्तजार था पर लगता है आपने इसे कम में ही समेट लिया । यहाँ शायद आपके 5 लाख वाले फकीरों का जिक्र ही नहीं आया । शायद वो आपकी दूसरी पुत्री के विवाह की बात हो ।

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  2. नवीन प्रकाशजी , 'विवाह के प्रसंग को कम में समेट लिया' > बहुत तेज नज़र है...हा हा॥ न जाने क्यों >जिस घटना को विस्तार देना चाहता हूँ वह संक्षिप्त हो जाती है ! कुछ बातें बताना ज़रूरी है वहीं पर कुछ बताना उचित नहीं है, शायद इसलिए ऐसा हो रहा है !

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