अपने देश में विवाह केवल सामाजिक या वैधानिक प्रक्रिया नहीं है, यह स्त्री-पुरुष के बीच सह-संबंध के आजीवन निर्वहन का संकल्प है। एक-दूसरे के तन और मन से अपरिचित दो मनुष्यों का जब विवाह होता है तो विवाह सम्पन्न कराने वाले पुरोहित, ज्ञानी, मौलवी या पास्टर, नव-विवाहित दंपत्ति के लिए जीवन भर साथ निभाने के लिए कुछ संकल्प कहते हैं, वे शब्द उन्हें समझ में नहीं आते क्योंकि उस घड़ी में वे दोनों किसी सुखद कल्पना में डूबते-उतराते बेहोश से रहते हैं। दो भिन्न सोच और लिंगभेद वाले मनुष्य एक-दूसरे के तन से होकर मन की ऐसी जीवन-यात्रा आरंभ करते हैं जो दूर से रंगीन फूलों की सेज जैसा लुभावना आभास देता है लेकिन वह वस्तुतः काँटों का ताज़ होता है। क्या आज तक किसी स्त्री को पसंदीदा पति मिला है या, किसी पुरुष को सर्वगुणसंपन्न पत्नी मिली है? दोनों अधूरे होते हैं और एक-दूसरे से मिलकर उस अधूरेपन को दूर करने की ताउम्र कोशिश करते हैं।
अमीर खुसरो लिखते हैं : 'बहुत कठिन है डगर पनघट की...'
विवाह हमारा भी हुआ, हमारी जीवन कथा अब आपको भी मालूम हो गई, कितनी कठिन डगर थी! हमारे तीन बच्चे हुए। बच्चों का होना हमारे हाथ में नहीं था लेकिन रोकना हमारे हाथ में था इसलिए मैंने अपनी शल्यक्रिया करवाई और हमारी परिवारवृद्धि रुक गई। बच्चे का पिता होना कितना गौरवपूर्ण क्षण होता है उसे सभी पिता जानते हैं लेकिन गौरव क्यों महसूस होता है? आम तौर पर पिता बनना पुरुषत्व का प्रमाण माना जाता है और वंशानुक्रम को सुनिश्चित करने का उद्यम भी। बच्चे का जन्म माँ के मातृत्व की तुष्टि भी है जो माँ के लिए मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यह पुरस्कार हमें भी मिला लेकिन आर्थिक कष्टों से जूझते हुए बच्चों को बड़ा करना, उन्हें शिक्षित और व्यवस्थित करना हमारे लिए बड़ी चुनौती थी। बच्चों की आयु बढ़ती रही, हमारा जीवन घटता रहा। फिर भी खुशियाँ थी क्योंकि तमाम असुविधाओं के बावजूद तीनों बच्चों ने हमसे कभी कोई शिकायत नहीं की और अपनी क्षमता के अनुरूप योग्यता का प्रदर्शन करते रहे। हमें इस बात का ज़रूर अफसोस रहा कि यदि हम साधनसंपन्न होते तो उन्हें बेहतर शिक्षा के अवसर दे पाते लेकिन क्या बेहतर मनुष्य बना पाते?
देखते-देखते समय आगे बढ़ता गया, हमारे बाद की पीढ़ी विकसित हो गई। संगीता का ब्याह हो गया, कुंतल ने ब्रह्मचर्य का संकल्प ले लिया और कोयंबत्तुर स्थित ईशा योग सेंटर से जुड़ गए, हमारी छोटी बिटिया संज्ञा का भी विवाह हो गया। सामान्य माता-पिता की तरह हमें भी दायित्व-मुक्ति का बोध होने लगा किन्तु आर्थिक असुविधाएँ और अधिक बढ़ गई क्योंकि दोनों बेटियों के विवाह में हुए खर्च का ऋण हमारी पुरानी देनदारी में और जुड़ गया। मेरा जीवन ब्याज भरते-भरते और साहूकारों के सामने नज़रें झुकाते बीत रहा था। मुझे लगने लगा था कि यह ब्याज मेरे प्राण ले लेगा और अगर मेरे प्राण चले गए तो मेरे बाद जो बचेंगे, उनका क्या होगा? इस बीच यमदूत कई बार मुझ तक आए और न जाने क्यों, मेरे प्राण लिए बिना लौट गए!
जो आपको बताना था, वो ये है कि हमारी दोनों लड़कियों का विवाह हो गया लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है कि विवाह हो गया, आपको कुछ खास बताना है इसलिए ज़रा 'फ्लेश बेक' में चलना होगा।
सन 1970 के आसपास की बात होगी, उस समय मैं युवा था, मेरा दिल कुछ खास तरह से धड़कता था। स्त्री-देह के प्रति उत्सुकता सदैव बनी रहती थी। हमारे जमाने में 'यू ट्यूब' जैसी कोई सुविधा नहीं थी इसलिए उस उत्सुकता को प्रत्यक्ष अनुभव से ही शांत किया जा सकता था इसीलिए मैं कभी-कभी 'मार्निंग शो' में इंगलिश पिक्चर देखने चला जाता और उस अटर-सटर भाषा को इसलिए डेढ़ घंटे तक भुगतता ताकि कुछ मनभावन दृश्यों को देख कर आँखों के ज़रिए मेरे युवा हृदय को ठंडक पहुंचे। उस अनुभव के लिए विवाह ज़रूरी था इसलिए उन दिनों लड़के-लड़कियों का सोलहवाँ साल लगते ही उनके विवाह की तैयारी शुरू हो जाती थी, बीस साल के होते-होते अमूमन सभी ब्याह दिए जाते थे।
मेरा ब्याह नहीं हो रहा था जिसकी कई वजहें थी, उनमें सबसे बड़ी वजह थी, मेरा हलवाई होना। कोई भी पिता अपनी कन्या किसी हलवाई को ब्याहने के लिए तैयार न था इसलिए मेरा कुंवारापन बहुत लंबा खिंच गया। वैसे, विवाह मेरा होना था लेकिन करना मेरे घरवालों को था। मेरे पिता बेहद कड़क स्वभाव के थे, उनकी मर्जी घर में सर्वोपरि थी इसलिए मेरा विवाह उनके निर्णय पर निर्भर था। यद्यपि उनका विवाह सोलह वर्ष की आयु में हो गया था लेकिन मेरी जरूरतों पर उनका ध्यान नहीं जा रहा था। कोई रिश्तेदार यदि उनका ध्यान आकर्षित करता तो वे कहते- 'अभी जल्दी नहीं है, हमारा लड़का बहुत सीधा है।'
मित्रगण, मेरा सीधापन मेरा शत्रु बन गया। जिसे वे सीधापन समझते थे वह उनका अज्ञान था और मेरी विवशता।
आप पूछेंगे- 'कैसी विवशता?'
तो विवशता यह थी कि किशोरावस्था में 'कल्याण' और 'अखंड ज्योति' का नियमित पाठक होने के नाते किसी क्षण में मैंने यह संकल्प ले लिया कि जिससे विवाह करूंगा उसी का हम-बिस्तर बनूँगा या, जिसका हम-बिस्तर बनूँगा उसी से विवाह करूंगा। पिता का मुझ पर इतना आतंक था कि मेरे लिए केवल पहले विकल्प के ही दरवाजे खुले थे और दूसरा विकल्प लक्ष्मण-रेखा के बाहर निकलने जैसा संकट था।
ऐसे घोर मानसिक झंझावात के दौर में मेरी मुलाक़ात एक पाँच-फुटिया कन्या से हो गई जो बिलासपुर में एक सरकारी नौकरी करने आई थी। वह खूबसूरत लड़की बेहद आकर्षक परिधान पहनती थी, अपने कामकाज में ईमानदार थी, बातचीत में सभ्य थी लेकिन किसी ने उसकी ओर ज़रा सा आगे बढ़ने की कोशिश की तो वह सफ़ेद बिच्छू की तरह डंक मारती थी।
संयोगवश मेरी उससे गहरी छनने लगी, हम लोग साथ-साथ पिक्चर देखने जाते, इधर-उधर घूमते, गप्पे मारते। हमारी गतिविधियां हमारे छोटे से प्यारे शहर की नज़रों में चुभने लगी, चर्चे होने लगे। एक दिन यह चर्चा मेरे पिता, याने 'दद्दा जी' के पास पहुँच गई।
जब मुझे मालूम पड़ा कि दद्दाजी को खबर लग गई है तो मेरी दशा चिंताजनक हो गई लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि छोटी-छोटी बातों में टोका-टाकी करने वाले दद्दाजी ने मुझे कुछ भी नहीं कहा। आप पूछेंगे कि क्यों नहीं कहा? तो, उनके मन की बात मुझे नहीं मालूम लेकिन यह ज़रूर है कि इस सूचना से मेरे 'सीधे लड़के' होने का उनका भ्रम अवश्य दूर हो गया होगा।
एक दिन उस कन्या ने मुझे अपने घर बुलाया। मेरे लिए उसने पातोड़ी बनाई थी, पातोड़ी, महाराष्ट्रीयन व्यंजन है जो हरी धनिया पत्ती की बहुलता से बनाया जाता है, समझ लीजिए, धनिया पत्ती का समोसा। वह जमीन पर बैठी केरोसीन स्टोव पर कड़ाही में पातोड़ी तल रही थी, मैं चटाई पर उसके सामने बैठा उसको काम करते देख रहा था। लोई बेलते-बेलते उसके ऊर्ध्व-वस्त्र ऐसे खिसके कि मैं उसे विस्मित हो कर देखता रह गया। वह अनुभूति इतनी सुखद थी कि उसको व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैंने चुपचाप अपनी नज़रें झुकाए हुए पातोड़ी खाई, उसकी प्रशंसा की और अपने घर वापस चला आया।
एक बार की बात है, उसके पिता उससे मिलने बिलासपुर आए, उन्हें रात आठ बजे की ट्रेन से वापस जाना था इसलिए उसने मुझसे कहा- 'वकील साहब, आप भी साथ में चलो, लौटते में रात हो जाएगी, मुझे स्टेशन से अकेले लौटने में डर लगेगा।'
उन्हें विदा करने के लिए मैं भी साथ में चला गया। स्टेशन पहुँचते ही बहुत तेज बारिश होने लगी, उसके पिता को ट्रेन में बिठाकर हमने एक रिक्शा किया और वापस लौटे। रिक्शे के अंदर तीन तरफ से पानी की बौछार घुस रही थी, हम दोनों बुरी तरह भीग गए। भयानक बारिश हो रही थी लेकिन मौसम मासूमियत लिए हुए था और छः किलोमीटर का लंबा सफर हम दोनों ने किसी तरह खुद को समेटते-संभालते पूरा हो गया। मैंने उसे उसके घर में छोड़ा और अपनी स्कूटर से वापस आ गया।
अगले दिन दोपहर को मैं उससे मिला, उसने कहा- 'मेरा कहा मानोगे?'
'बोलो।' मैंने कहा।
'मुझसे राखी बंधवाओगे?'
'लो, बांधो।' मैंने अपनी कलाई बढ़ाई। दौड़कर अंदर गई, थाली में अबीर, चाँवल, नारियल और राखी लेकर वापस आई और मुझे राखी बांधी।
मैं अपने पुराने संकल्प को निभा रहा था और उस कन्या ने भी अपने लिए एक मानसिक अवरोधक विकसित कर लिया। सारा खेल दिमाग का ही तो है!
इस घटना की गहराई में जाएंगे तो कई बातें उभरकर आएंगी। पचास साल पहले के किस्से को आज के चश्मे से देखेंगे तो पूरा दृश्य धुंधला नज़र आएगा। उस युग में भी प्यार-मोहब्बत के जज़्बात होते थे किन्तु प्यार करने की सख़्त मनाही थी। आम तौर प्यार इकतरफा हुआ करता था और यदि संयोगवश दोतरफा हो जाए तो दोनों के घर में हिंदुस्तान-पाकिस्तान जैसी विकट स्थिति बन जाती थी। इसका असर हिन्दी फिल्मों में बहुत ज़ोरों पर था, इसीलिए वह रोमांटिक और दर्द भरे गीतों का स्वर्णकाल था। मोहब्बत हो जाती थी, फिर उसकी ऐसी की तैसी होती थी, रोना-गाना होता था, उसके बाद कहानी का दुखांत हो जाता था। नायिका का किसी अंजाने व्यक्ति से विवाह हो जाता और नायक बरातियों के स्वागत में अपने दाँत निपोरते खड़ा रहता या खाना परोसता या विदाई के समय गुनगुनाता- 'चल री सजनी अब क्या सोचे, कजरा न बह जाए रोते-रोते...।'
उस जमाने में जितने भाई-बहन वाले संबंध विकसित हुए, उनमें से अधिकांश इसी तरह मोहब्बत के मारे हुए थे और भाई-बहन के रिश्ते का सुरक्षा-कवच धारण किए हुए थे ताकि इस संबंध के आधार पर उन्हें लड़की के घर में आवागमन का निर्बाध 'वीसा' प्राप्त हो सके।
एक और संकट था, मान लीजिए, दोनों बहुत करीब आ गए और सफलतापूर्वक काया प्रवेश हो गया तो गर्भाधान की संभावना का संकट हर समय मँडराते रहता था। संभव है कि विवाह के पश्चात पति कई वर्षों तक परिश्रम करे और कुछ न हो लेकिन विवाहपूर्व मधुर सम्बन्धों में अक्सर प्रथम प्रयास में मुसीबत आ खड़ी होती थी। आज जैसे गर्भ-निरोधक उपाय उन दिनों सहज उपलब्ध न थे और न ही आज जैसे मुलायमचंद माता-पिता जिनसे वे अपने प्रणय प्रसंग को साझा कर लें और उन्हें आसन्न संकट बता दें। जैसा कि अक्सर हुआ करता था, ऐसे संकट के बाद प्रेमी अदृश्य हो जाता था और गर्भवती प्रेमिका के पास अग्नि-स्नान, कीटनाशक सेवन या जल समाधि जैसे प्राणघातक विकल्प ही बच जाते थे। उन दिनों असंख्य किशोरियों ने अपने असमय प्राण त्यागे या उनका बेमेल विवाह हुआ या जीवन भर अपने प्रेमी को कोसते हुए उन्हें किसी विधुर का बिस्तर गर्म करना पड़ा।
एक बात और, उस युग का पारिवारिक ताना-बाना अत्यंत कठोर नियमों के अधीन था। विवाह के लिए धन और सौन्दर्य का विशेष आग्रह न था लेकिन कुल, गोत्र, जाति, कुंडली का मिलान होना अनिवार्य प्रक्रिया थी। हर विवाह के साथ परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई थी और उस परिवार का भविष्य भी। एक विवाह यदि कुजात में हो जाता तो शेष बच्चों का संबंध होना अत्यंत कठिन हो जाता था, माता-पिता का घर से निकलना मुश्किल हो जाता था। कई अभिभावक सदमे में असमय गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते या दिवंगत हो जाते थे।
लेकिन प्यार-मुहब्बत न तो जात-पांत देखे, न रंग-रूप। नैन मिले, चैन कहाँ ! मैं ऐसे कई पुरुषों और स्त्रियों को जानता हूँ जिन्होंने अपने प्यार को हासिल न कर पाने के अफसोस में आजीवन अविवाहित रहने का कठिन निर्णय लिया है। उनके लिए तो सलाम बनता है।
कभी आपकी पत्नी आपकी मुलाक़ात अपने किसी राखी भाई से करवाए तो इस बात की सम्भावना अधिक है कि वह व्यक्ति आपके घर में गुलज़ार गुलशन का हठात-अवकाशप्राप्त माली हो। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि वह 'एडहाक' में था और आप 'परमानेंट' हैं।
जहां तक मेरा प्रश्न है, मैंने अपनी किशोरावस्था में एक उपन्यास पढ़ा था, 'गुनाहों का देवता' जिसमें बर्टी नामक पात्र (उपन्यास के नायक चंदर से) कहता है- " मैं इतनी सलाह तुम्हें दे रहा हूँ कि अगर तुम किसी लड़की से प्यार करते हो तो ईश्वर के वास्ते उससे शादी मत करना।.... अगर दिल से प्यार करना चाहते हो और चाहते हो कि वह लड़की जीवन भर तुम्हारी कृतज्ञ रहे तो तुम उसकी (किसी से) शादी करा देना ...।"
मुझे डा॰धर्मवीर भारती द्वारा लिखित उक्त संवाद बहुत पसंद आया, मैंने इसी सूत्रवाक्य को अपने जीवन में अंगीकार किया। मैंने जिनसे भी प्यार किया उन सबके ब्याह में मुस्कुराते हुए 'इंतजाम अली' की सक्रिय भूमिका निभाई और उन्हें उनके पति को सहर्ष सौंप दिया। मेरा परम विश्वास है कि वे सब मुझे आज भी प्यार करती होंगी लेकिन यदि उनकी मुझसे शादी हुई होती तो हमारे प्यार की धज्जियां उड़ चुकी होती क्योंकि पति जैसा भी हो, उससे जाने-अंजाने दुष्टता हो ही जाती है।
इन प्रणय प्रसंगों के बाद मेरा विवाह 8 मई 1975 को माधुरी जी से हो गया। यह सही है कि मैंने जिनसे प्यार किया, उनसे (बहुवचन) विवाह नहीं कर पाया लेकिन जिनसे (आदरसूचक) मेरा विवाह हुआ, उनसे प्यार हो गया। हमारे विवाह के अब 42 वर्ष पूरे होने को हैं, यद्यपि इस बीच हमारा प्यार कम हुआ है लेकिन अब हम दोनों पति-पत्नी कम, दोस्त अधिक हो गए हैं। बना रहे याराना हमारा।
अपने जीवन का इतना सारा ढंका-छुपा खोलकर आपको इसलिए बताया ताकि आप समझ सकें कि मेरी प्रेम कहानियों के साथ किस तरह का अत्याचार हुआ और मैं अपनी पसंद के साथी को जीवनसाथी बनाने में असमर्थ रहा।
जब हमारी छोटी बिटिया संज्ञा ने अपने प्रेम को वैवाहिक रिश्ते में जोड़ने का प्रस्ताव हमारे समक्ष रखा तो हम खुशी-खुशी तैयार हो गए। इस खुशी की एक वज़ह मेरी अतीत की यादें भी थी। हमने अपने बच्चों को युवा होते ही उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने की आज़ादी दे दी ताकि वे अपनी वयस्क बुद्धि का उपयोग करके निर्णय लें और खुश रहें। बच्चों की खुशी, माँ-बाप की खुशी।
संज्ञा के विवाह की खुशियाँ अपनी राह पर चल पड़ी लेकिन राह पथरीली थी, संयुक्त परिवार की विवशताएँ उभरने लगी और उसके मानसिक कष्ट बढ़ने लगे। हालात दिनों-दिन बिगड़ते गए और गाड़ी पटरी से उतरने लगी। जो उसके साथ जो व्यवहार हो रहा था वह किसी पढ़े-लिखे परिवार द्वारा किया जा रहा क्षोभजनक व्यवहार था लेकिन जो था, सो था। शादी हो चुकी थी।
दुखदायक घटनाओं के सिलसिले बहुत लंबे चले, उसके बाद दस वर्ष तक अदालत में मुकदमा चलता रहा और एक तथाकथित न्यायालय के निर्मम निर्णय के बाद थम गए। संज्ञा की असहमति के बावजूद संबंध-विच्छेद का न्यायलयीन आदेश हो गया। अनन्या अपने पिता की देखरेख के स्वाभाविक अधिकार से वंचित हो गई।
संज्ञा अपने वर्तमान से जूझ रही है और अपनी स्वयं की शक्ति पर खड़ी होने के लिए जमीन की तलाश कर रही है। हम अपनी बूढ़ी नज़रों से उसका दर्द और अनिश्चित भविष्य की चिंतातुर मुखाकृति को रोज सुबह-शाम देखते हैं। हम यह भी देखते हैं कि उसकी हम पर निर्भरता कम हो रही है, आत्मविश्वास बढ़ रहा है। अनन्या दिन-ब-दिन बड़ी हो रही है, कुछ दिनों में जब वह सब कुछ समझने लगेगी तो इन घटनाओं को किस नजरिए से देखेगी?
इस घटनाक्रम से मुझे यह समझ आया कि जिसे प्यार कहा जाता है वह दरअसल प्यार नहीं, मानसिक आकर्षण है जो शारीरिक अपेक्षा तुष्ट होने के बाद अपना चुबकत्व खोने लगता है। 'तेरे संग जीना, तेरे संग मरना' ये गीत फिल्मी हैं, फिल्म में ही शोभित होते है।
जीवन के कठिन रास्तों में प्यार का बोझ ढोना सबके वश की बात नहीं।
अमीर खुसरो लिखते हैं : 'बहुत कठिन है डगर पनघट की...'
विवाह हमारा भी हुआ, हमारी जीवन कथा अब आपको भी मालूम हो गई, कितनी कठिन डगर थी! हमारे तीन बच्चे हुए। बच्चों का होना हमारे हाथ में नहीं था लेकिन रोकना हमारे हाथ में था इसलिए मैंने अपनी शल्यक्रिया करवाई और हमारी परिवारवृद्धि रुक गई। बच्चे का पिता होना कितना गौरवपूर्ण क्षण होता है उसे सभी पिता जानते हैं लेकिन गौरव क्यों महसूस होता है? आम तौर पर पिता बनना पुरुषत्व का प्रमाण माना जाता है और वंशानुक्रम को सुनिश्चित करने का उद्यम भी। बच्चे का जन्म माँ के मातृत्व की तुष्टि भी है जो माँ के लिए मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यह पुरस्कार हमें भी मिला लेकिन आर्थिक कष्टों से जूझते हुए बच्चों को बड़ा करना, उन्हें शिक्षित और व्यवस्थित करना हमारे लिए बड़ी चुनौती थी। बच्चों की आयु बढ़ती रही, हमारा जीवन घटता रहा। फिर भी खुशियाँ थी क्योंकि तमाम असुविधाओं के बावजूद तीनों बच्चों ने हमसे कभी कोई शिकायत नहीं की और अपनी क्षमता के अनुरूप योग्यता का प्रदर्शन करते रहे। हमें इस बात का ज़रूर अफसोस रहा कि यदि हम साधनसंपन्न होते तो उन्हें बेहतर शिक्षा के अवसर दे पाते लेकिन क्या बेहतर मनुष्य बना पाते?
देखते-देखते समय आगे बढ़ता गया, हमारे बाद की पीढ़ी विकसित हो गई। संगीता का ब्याह हो गया, कुंतल ने ब्रह्मचर्य का संकल्प ले लिया और कोयंबत्तुर स्थित ईशा योग सेंटर से जुड़ गए, हमारी छोटी बिटिया संज्ञा का भी विवाह हो गया। सामान्य माता-पिता की तरह हमें भी दायित्व-मुक्ति का बोध होने लगा किन्तु आर्थिक असुविधाएँ और अधिक बढ़ गई क्योंकि दोनों बेटियों के विवाह में हुए खर्च का ऋण हमारी पुरानी देनदारी में और जुड़ गया। मेरा जीवन ब्याज भरते-भरते और साहूकारों के सामने नज़रें झुकाते बीत रहा था। मुझे लगने लगा था कि यह ब्याज मेरे प्राण ले लेगा और अगर मेरे प्राण चले गए तो मेरे बाद जो बचेंगे, उनका क्या होगा? इस बीच यमदूत कई बार मुझ तक आए और न जाने क्यों, मेरे प्राण लिए बिना लौट गए!
जो आपको बताना था, वो ये है कि हमारी दोनों लड़कियों का विवाह हो गया लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है कि विवाह हो गया, आपको कुछ खास बताना है इसलिए ज़रा 'फ्लेश बेक' में चलना होगा।
सन 1970 के आसपास की बात होगी, उस समय मैं युवा था, मेरा दिल कुछ खास तरह से धड़कता था। स्त्री-देह के प्रति उत्सुकता सदैव बनी रहती थी। हमारे जमाने में 'यू ट्यूब' जैसी कोई सुविधा नहीं थी इसलिए उस उत्सुकता को प्रत्यक्ष अनुभव से ही शांत किया जा सकता था इसीलिए मैं कभी-कभी 'मार्निंग शो' में इंगलिश पिक्चर देखने चला जाता और उस अटर-सटर भाषा को इसलिए डेढ़ घंटे तक भुगतता ताकि कुछ मनभावन दृश्यों को देख कर आँखों के ज़रिए मेरे युवा हृदय को ठंडक पहुंचे। उस अनुभव के लिए विवाह ज़रूरी था इसलिए उन दिनों लड़के-लड़कियों का सोलहवाँ साल लगते ही उनके विवाह की तैयारी शुरू हो जाती थी, बीस साल के होते-होते अमूमन सभी ब्याह दिए जाते थे।
मेरा ब्याह नहीं हो रहा था जिसकी कई वजहें थी, उनमें सबसे बड़ी वजह थी, मेरा हलवाई होना। कोई भी पिता अपनी कन्या किसी हलवाई को ब्याहने के लिए तैयार न था इसलिए मेरा कुंवारापन बहुत लंबा खिंच गया। वैसे, विवाह मेरा होना था लेकिन करना मेरे घरवालों को था। मेरे पिता बेहद कड़क स्वभाव के थे, उनकी मर्जी घर में सर्वोपरि थी इसलिए मेरा विवाह उनके निर्णय पर निर्भर था। यद्यपि उनका विवाह सोलह वर्ष की आयु में हो गया था लेकिन मेरी जरूरतों पर उनका ध्यान नहीं जा रहा था। कोई रिश्तेदार यदि उनका ध्यान आकर्षित करता तो वे कहते- 'अभी जल्दी नहीं है, हमारा लड़का बहुत सीधा है।'
मित्रगण, मेरा सीधापन मेरा शत्रु बन गया। जिसे वे सीधापन समझते थे वह उनका अज्ञान था और मेरी विवशता।
आप पूछेंगे- 'कैसी विवशता?'
तो विवशता यह थी कि किशोरावस्था में 'कल्याण' और 'अखंड ज्योति' का नियमित पाठक होने के नाते किसी क्षण में मैंने यह संकल्प ले लिया कि जिससे विवाह करूंगा उसी का हम-बिस्तर बनूँगा या, जिसका हम-बिस्तर बनूँगा उसी से विवाह करूंगा। पिता का मुझ पर इतना आतंक था कि मेरे लिए केवल पहले विकल्प के ही दरवाजे खुले थे और दूसरा विकल्प लक्ष्मण-रेखा के बाहर निकलने जैसा संकट था।
ऐसे घोर मानसिक झंझावात के दौर में मेरी मुलाक़ात एक पाँच-फुटिया कन्या से हो गई जो बिलासपुर में एक सरकारी नौकरी करने आई थी। वह खूबसूरत लड़की बेहद आकर्षक परिधान पहनती थी, अपने कामकाज में ईमानदार थी, बातचीत में सभ्य थी लेकिन किसी ने उसकी ओर ज़रा सा आगे बढ़ने की कोशिश की तो वह सफ़ेद बिच्छू की तरह डंक मारती थी।
संयोगवश मेरी उससे गहरी छनने लगी, हम लोग साथ-साथ पिक्चर देखने जाते, इधर-उधर घूमते, गप्पे मारते। हमारी गतिविधियां हमारे छोटे से प्यारे शहर की नज़रों में चुभने लगी, चर्चे होने लगे। एक दिन यह चर्चा मेरे पिता, याने 'दद्दा जी' के पास पहुँच गई।
जब मुझे मालूम पड़ा कि दद्दाजी को खबर लग गई है तो मेरी दशा चिंताजनक हो गई लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि छोटी-छोटी बातों में टोका-टाकी करने वाले दद्दाजी ने मुझे कुछ भी नहीं कहा। आप पूछेंगे कि क्यों नहीं कहा? तो, उनके मन की बात मुझे नहीं मालूम लेकिन यह ज़रूर है कि इस सूचना से मेरे 'सीधे लड़के' होने का उनका भ्रम अवश्य दूर हो गया होगा।
एक दिन उस कन्या ने मुझे अपने घर बुलाया। मेरे लिए उसने पातोड़ी बनाई थी, पातोड़ी, महाराष्ट्रीयन व्यंजन है जो हरी धनिया पत्ती की बहुलता से बनाया जाता है, समझ लीजिए, धनिया पत्ती का समोसा। वह जमीन पर बैठी केरोसीन स्टोव पर कड़ाही में पातोड़ी तल रही थी, मैं चटाई पर उसके सामने बैठा उसको काम करते देख रहा था। लोई बेलते-बेलते उसके ऊर्ध्व-वस्त्र ऐसे खिसके कि मैं उसे विस्मित हो कर देखता रह गया। वह अनुभूति इतनी सुखद थी कि उसको व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैंने चुपचाप अपनी नज़रें झुकाए हुए पातोड़ी खाई, उसकी प्रशंसा की और अपने घर वापस चला आया।
एक बार की बात है, उसके पिता उससे मिलने बिलासपुर आए, उन्हें रात आठ बजे की ट्रेन से वापस जाना था इसलिए उसने मुझसे कहा- 'वकील साहब, आप भी साथ में चलो, लौटते में रात हो जाएगी, मुझे स्टेशन से अकेले लौटने में डर लगेगा।'
उन्हें विदा करने के लिए मैं भी साथ में चला गया। स्टेशन पहुँचते ही बहुत तेज बारिश होने लगी, उसके पिता को ट्रेन में बिठाकर हमने एक रिक्शा किया और वापस लौटे। रिक्शे के अंदर तीन तरफ से पानी की बौछार घुस रही थी, हम दोनों बुरी तरह भीग गए। भयानक बारिश हो रही थी लेकिन मौसम मासूमियत लिए हुए था और छः किलोमीटर का लंबा सफर हम दोनों ने किसी तरह खुद को समेटते-संभालते पूरा हो गया। मैंने उसे उसके घर में छोड़ा और अपनी स्कूटर से वापस आ गया।
अगले दिन दोपहर को मैं उससे मिला, उसने कहा- 'मेरा कहा मानोगे?'
'बोलो।' मैंने कहा।
'मुझसे राखी बंधवाओगे?'
'लो, बांधो।' मैंने अपनी कलाई बढ़ाई। दौड़कर अंदर गई, थाली में अबीर, चाँवल, नारियल और राखी लेकर वापस आई और मुझे राखी बांधी।
मैं अपने पुराने संकल्प को निभा रहा था और उस कन्या ने भी अपने लिए एक मानसिक अवरोधक विकसित कर लिया। सारा खेल दिमाग का ही तो है!
इस घटना की गहराई में जाएंगे तो कई बातें उभरकर आएंगी। पचास साल पहले के किस्से को आज के चश्मे से देखेंगे तो पूरा दृश्य धुंधला नज़र आएगा। उस युग में भी प्यार-मोहब्बत के जज़्बात होते थे किन्तु प्यार करने की सख़्त मनाही थी। आम तौर प्यार इकतरफा हुआ करता था और यदि संयोगवश दोतरफा हो जाए तो दोनों के घर में हिंदुस्तान-पाकिस्तान जैसी विकट स्थिति बन जाती थी। इसका असर हिन्दी फिल्मों में बहुत ज़ोरों पर था, इसीलिए वह रोमांटिक और दर्द भरे गीतों का स्वर्णकाल था। मोहब्बत हो जाती थी, फिर उसकी ऐसी की तैसी होती थी, रोना-गाना होता था, उसके बाद कहानी का दुखांत हो जाता था। नायिका का किसी अंजाने व्यक्ति से विवाह हो जाता और नायक बरातियों के स्वागत में अपने दाँत निपोरते खड़ा रहता या खाना परोसता या विदाई के समय गुनगुनाता- 'चल री सजनी अब क्या सोचे, कजरा न बह जाए रोते-रोते...।'
उस जमाने में जितने भाई-बहन वाले संबंध विकसित हुए, उनमें से अधिकांश इसी तरह मोहब्बत के मारे हुए थे और भाई-बहन के रिश्ते का सुरक्षा-कवच धारण किए हुए थे ताकि इस संबंध के आधार पर उन्हें लड़की के घर में आवागमन का निर्बाध 'वीसा' प्राप्त हो सके।
एक और संकट था, मान लीजिए, दोनों बहुत करीब आ गए और सफलतापूर्वक काया प्रवेश हो गया तो गर्भाधान की संभावना का संकट हर समय मँडराते रहता था। संभव है कि विवाह के पश्चात पति कई वर्षों तक परिश्रम करे और कुछ न हो लेकिन विवाहपूर्व मधुर सम्बन्धों में अक्सर प्रथम प्रयास में मुसीबत आ खड़ी होती थी। आज जैसे गर्भ-निरोधक उपाय उन दिनों सहज उपलब्ध न थे और न ही आज जैसे मुलायमचंद माता-पिता जिनसे वे अपने प्रणय प्रसंग को साझा कर लें और उन्हें आसन्न संकट बता दें। जैसा कि अक्सर हुआ करता था, ऐसे संकट के बाद प्रेमी अदृश्य हो जाता था और गर्भवती प्रेमिका के पास अग्नि-स्नान, कीटनाशक सेवन या जल समाधि जैसे प्राणघातक विकल्प ही बच जाते थे। उन दिनों असंख्य किशोरियों ने अपने असमय प्राण त्यागे या उनका बेमेल विवाह हुआ या जीवन भर अपने प्रेमी को कोसते हुए उन्हें किसी विधुर का बिस्तर गर्म करना पड़ा।
एक बात और, उस युग का पारिवारिक ताना-बाना अत्यंत कठोर नियमों के अधीन था। विवाह के लिए धन और सौन्दर्य का विशेष आग्रह न था लेकिन कुल, गोत्र, जाति, कुंडली का मिलान होना अनिवार्य प्रक्रिया थी। हर विवाह के साथ परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई थी और उस परिवार का भविष्य भी। एक विवाह यदि कुजात में हो जाता तो शेष बच्चों का संबंध होना अत्यंत कठिन हो जाता था, माता-पिता का घर से निकलना मुश्किल हो जाता था। कई अभिभावक सदमे में असमय गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते या दिवंगत हो जाते थे।
लेकिन प्यार-मुहब्बत न तो जात-पांत देखे, न रंग-रूप। नैन मिले, चैन कहाँ ! मैं ऐसे कई पुरुषों और स्त्रियों को जानता हूँ जिन्होंने अपने प्यार को हासिल न कर पाने के अफसोस में आजीवन अविवाहित रहने का कठिन निर्णय लिया है। उनके लिए तो सलाम बनता है।
कभी आपकी पत्नी आपकी मुलाक़ात अपने किसी राखी भाई से करवाए तो इस बात की सम्भावना अधिक है कि वह व्यक्ति आपके घर में गुलज़ार गुलशन का हठात-अवकाशप्राप्त माली हो। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि वह 'एडहाक' में था और आप 'परमानेंट' हैं।
जहां तक मेरा प्रश्न है, मैंने अपनी किशोरावस्था में एक उपन्यास पढ़ा था, 'गुनाहों का देवता' जिसमें बर्टी नामक पात्र (उपन्यास के नायक चंदर से) कहता है- " मैं इतनी सलाह तुम्हें दे रहा हूँ कि अगर तुम किसी लड़की से प्यार करते हो तो ईश्वर के वास्ते उससे शादी मत करना।.... अगर दिल से प्यार करना चाहते हो और चाहते हो कि वह लड़की जीवन भर तुम्हारी कृतज्ञ रहे तो तुम उसकी (किसी से) शादी करा देना ...।"
मुझे डा॰धर्मवीर भारती द्वारा लिखित उक्त संवाद बहुत पसंद आया, मैंने इसी सूत्रवाक्य को अपने जीवन में अंगीकार किया। मैंने जिनसे भी प्यार किया उन सबके ब्याह में मुस्कुराते हुए 'इंतजाम अली' की सक्रिय भूमिका निभाई और उन्हें उनके पति को सहर्ष सौंप दिया। मेरा परम विश्वास है कि वे सब मुझे आज भी प्यार करती होंगी लेकिन यदि उनकी मुझसे शादी हुई होती तो हमारे प्यार की धज्जियां उड़ चुकी होती क्योंकि पति जैसा भी हो, उससे जाने-अंजाने दुष्टता हो ही जाती है।
इन प्रणय प्रसंगों के बाद मेरा विवाह 8 मई 1975 को माधुरी जी से हो गया। यह सही है कि मैंने जिनसे प्यार किया, उनसे (बहुवचन) विवाह नहीं कर पाया लेकिन जिनसे (आदरसूचक) मेरा विवाह हुआ, उनसे प्यार हो गया। हमारे विवाह के अब 42 वर्ष पूरे होने को हैं, यद्यपि इस बीच हमारा प्यार कम हुआ है लेकिन अब हम दोनों पति-पत्नी कम, दोस्त अधिक हो गए हैं। बना रहे याराना हमारा।
अपने जीवन का इतना सारा ढंका-छुपा खोलकर आपको इसलिए बताया ताकि आप समझ सकें कि मेरी प्रेम कहानियों के साथ किस तरह का अत्याचार हुआ और मैं अपनी पसंद के साथी को जीवनसाथी बनाने में असमर्थ रहा।
जब हमारी छोटी बिटिया संज्ञा ने अपने प्रेम को वैवाहिक रिश्ते में जोड़ने का प्रस्ताव हमारे समक्ष रखा तो हम खुशी-खुशी तैयार हो गए। इस खुशी की एक वज़ह मेरी अतीत की यादें भी थी। हमने अपने बच्चों को युवा होते ही उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने की आज़ादी दे दी ताकि वे अपनी वयस्क बुद्धि का उपयोग करके निर्णय लें और खुश रहें। बच्चों की खुशी, माँ-बाप की खुशी।
संज्ञा के विवाह की खुशियाँ अपनी राह पर चल पड़ी लेकिन राह पथरीली थी, संयुक्त परिवार की विवशताएँ उभरने लगी और उसके मानसिक कष्ट बढ़ने लगे। हालात दिनों-दिन बिगड़ते गए और गाड़ी पटरी से उतरने लगी। जो उसके साथ जो व्यवहार हो रहा था वह किसी पढ़े-लिखे परिवार द्वारा किया जा रहा क्षोभजनक व्यवहार था लेकिन जो था, सो था। शादी हो चुकी थी।
दुखदायक घटनाओं के सिलसिले बहुत लंबे चले, उसके बाद दस वर्ष तक अदालत में मुकदमा चलता रहा और एक तथाकथित न्यायालय के निर्मम निर्णय के बाद थम गए। संज्ञा की असहमति के बावजूद संबंध-विच्छेद का न्यायलयीन आदेश हो गया। अनन्या अपने पिता की देखरेख के स्वाभाविक अधिकार से वंचित हो गई।
संज्ञा अपने वर्तमान से जूझ रही है और अपनी स्वयं की शक्ति पर खड़ी होने के लिए जमीन की तलाश कर रही है। हम अपनी बूढ़ी नज़रों से उसका दर्द और अनिश्चित भविष्य की चिंतातुर मुखाकृति को रोज सुबह-शाम देखते हैं। हम यह भी देखते हैं कि उसकी हम पर निर्भरता कम हो रही है, आत्मविश्वास बढ़ रहा है। अनन्या दिन-ब-दिन बड़ी हो रही है, कुछ दिनों में जब वह सब कुछ समझने लगेगी तो इन घटनाओं को किस नजरिए से देखेगी?
इस घटनाक्रम से मुझे यह समझ आया कि जिसे प्यार कहा जाता है वह दरअसल प्यार नहीं, मानसिक आकर्षण है जो शारीरिक अपेक्षा तुष्ट होने के बाद अपना चुबकत्व खोने लगता है। 'तेरे संग जीना, तेरे संग मरना' ये गीत फिल्मी हैं, फिल्म में ही शोभित होते है।
जीवन के कठिन रास्तों में प्यार का बोझ ढोना सबके वश की बात नहीं।
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