मेरी बात मेरी आत्मकथा का (संभवतः) यह अंतिम पुष्प आपको सौंपते हुए मुझे अपार आनंद की अनुभूति हो रही है। आत्मकथा का पहला खंड 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' 2014 में प्रकाशित हुआ और दूसरा खंड 'पल पल ये पल' 2015 में आया।
आत्मकथा निश्चयतः मेरी है लेकिन उसमें वर्णित कहानी घर-घर की है। मेरे जन्म से लेकर अब तक की यात्रा ने मुझे उन पुराने रास्तों की याद ताज़ा कर दी जिनमें सड़क कम हुआ करती थी, गड्ढे अधिक होते थे। बात सुविधा-असुविधा की नहीं है, बात खुशहाली की है, खुश होने की है, खुश रहने की है। मुझे लगता है कि बालपन की उम्र के बीत जाने के बाद जब मनुष्य का वैश्विक निर्माण आरंभ होता है तो कदम दर कदम प्रतिकूल परिस्थितियों से उसका आमना-सामना होता है और खुशियाँ काफ़ूर होने लगती हैं। मनुष्य के जीवन को गढ़ने में उसके परिवार की सोच सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है लिहाज़ा प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में उसका खुद का कम और परिस्थितियों का योगदान अधिक होता है। मैं एक ऐसे मनुष्य के रूप में विकसित हुआ जो जीवन भर दूसरों के द्वारा लिए गए निर्णयों से प्रभावित रहा और अपने जीवन को दूसरों की मर्ज़ी से जी लिया।
मेरे जीवन के अंतिम पड़ाव में जो कुछ सीखने में कसर रह गई थी, वह भी पूरी हो गई। आत्मकथा का यह तीसरा खंड 'दुनिया रंग बिरंगी' उन्हीं टूटती सांसों की आहट है जो किसी भी क्षण रुकने के लिए आतुर हैं। मेरा विश्वास है कि मेरे अनुभव आपको संयुक्त परिवार और अपने समाज की विसंगतियों से परिचित कराएंगे, आपको सतर्क करेंगे और जीवन-मार्ग में आने वाली संभावित बाधाओं का सामना करने के उपाय भी बताएँगे।
यह पुस्तक महज़ किस्सागोई नहीं है, जीवन प्रबंधन का रोचक दस्तावेज़ है जो आपके कानों में चुपके से कुछ ऐसे गुर बताएगा जो आने वाले समय में आपके बहुत काम आने वाले हैं।
ये जीवन है
उस समय की बात बता रहा हूँ जब हमारी बिटिया संगीता इंदौर के डेंटल कालेज़ में पढ़ रही थी, संज्ञा बिटिया बिलासपुर में माइक्रोबायोलाजी में बीएससी करने के बाद राज्य शासन की प्रतियोगी परीक्षा देने की तैयारी में व्यस्त हो गई और पुत्र कुंतल इलेक्ट्रिकल्स एंड इलेक्ट्रानिक्स में बी॰टेक॰ करने के लिए त्रिची में पढ़ रहे थे। उन दिनों के हालात अत्यंत व्याकुल करने वाले थे, आर्थिक स्थिति दयनीय थी। कुंतल का कालेज़ केम्पस बहुत बड़ा था, लिहाज़ा उसके हास्टल, विभिन्न विभागों और क्लासरूम के बीच अधिक दूरी होने के कारण आने-जाने में उनका बहुत समय बर्बाद होता था लेकिन हमारे पास उसे साइकल दे सकने की हैसियत भी न थी। हमारे तीनों बच्चे अत्यंत असुविधाओं में पढ़े-बढ़े, उन्हें ज़रूर शिकायत रही होगी लेकिन उन्हो कभी कुछ कहा नहीं।
किसी अवकाश पर संगीता घर आई, कुछ दिनों तक रुककर वे बिलासपुर से इंदौर जानेवाली नर्मदा एक्स्प्रेस ट्रेन से सुबह निकल गई। उनके जाने के कुछ देर बाद घर के 'लेंडलाइन' फोन पर किसी ने 'काल' किया- 'संगीता है क्या ?'
'नहीं, वह तो सुबह की ट्रेन से इंदौर निकल गई।' संगीता की मम्मी ने जवाब दिया।
'अरे !'
'आप कौन हैं।'
'मैं उसका दोस्त बोल रहा हूँ।'
'क्या नाम है आपका ?'
'उसने आपको मेरे बारे में नहीं बताया ?'
'क्या नहीं बताया, आप हैं कौन ?'
'आपको बताने में संकोच कर गई होगी।'
'क्या ?'
'यही कि हम दोनों प्यार करते हैं और संगीता 'प्रेग्नेंट' है।'
'अरे, उसने तो ऐसा कुछ नहीं बताया। वैसे मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुम उसके इतने गहरे मित्र हो और तुमको यह पता नहीं है कि वह आज सुबह की ट्रेन से इंदौर जाने वाली है ?'
'मेरी बात नहीं हो पाई।'
'चलो, कोई बात नहीं, आप कहाँ हैं ?'
'यहीं बिलासपुर में।'
'आज हमारे घर आ जाइए, साथ में 'लंच' लेंगे, उस समय संगीता के पापा भी रहेंगे और हम सब बैठकर आपसे बात करेंगे।'
'जी, ठीक है।'
'अपना नाम तो बता दीजिए।' माधुरी ने पूछा।
'मैं आपसे मिलकर बताऊंगा।' उसने कहा।
हम दोनों अपने 'भावी दामाद' की 'लंच' पर प्रतीक्षा करते रहे किन्तु वह नहीं आया ! हमने इस घटना की चर्चा संगीता से करना उचित नहीं समझा, वे अनभिज्ञ रही।
जब संगीता बी॰डी॰एस॰ के अंतिम वर्ष में थी, हमें उसके विवाह की फिक्र होने लगी क्योंकि वे 25 वर्ष पार कर चुकी थी। किसी अवकाश पर जब वे बिलासपुर आई, उनसे हमने विवाह की चर्चा की तो वह तैयार हो गई लेकिन शर्तों के साथ, 'लड़का ऐसा हो जो सिगरेट और शराब न पीता हो !' अब, आज के युग में ऐसा पवित्र लड़का कहाँ खोजा जाए, बहुत बड़ी झंझट थी। मैंने कहा- 'तुमको इतना पढ़ाया-लिखाया, तुम अपने लायक पति नहीं खोज पाई ?'
'मेरे कालेज़ के सब लड़के इन बुरी आदतों के शिकार हैं।'
'तो हम कहाँ खोजें ?'
'वह मैं नहीं जानती, आपका काम है।'
'कमाल है, तुमको पढ़ाएँ भी हम और तुम्हारे लिए पति भी हम खोजें !' मैंने कहा। संगीता मुस्कुरा दी।
घर-गृहस्थी चलाना हर समय एक बड़ी चुनौती रही है। मनुष्य खुद को तो साध नहीं पाता जबकि उसे परिवार के अन्य सदस्यों को साधने की जुगत बैठानी पड़ती है। परिवार के मुखिया को भगवान विष्णु के तरह अनेक अवतार लेने पड़ते हैं, महिषासुर-मर्दिनी दुर्गा की तरह कई हाथों से काम लेना होता है, राक्षस-श्रेष्ठ रावण की तरह दसाननमुखी रूप धारण कर दस दिशाओं में बुद्धि लगानी पड़ती है, तब कहीं जाकर थोड़ी-बहुत बात बनती है। बात क्या बनती है, भ्रम बना रहता है कि सब ठीक चल रहा है ! किसी को पुचकार दो तो उसका भेजा घूम जाता है, किसी को डांट दो तो उसका भेजा गरम हो जाता है। किसी की तारीफ कर दो तो सिर पर सवार होने लगता है, किसी की आलोचना कर दो तो वह सिर पटकने लगता है.
सबकी भिन्न सोच, नज़रिया और अपेक्षाएँ एक दूसरे को समझने की राह में गंभीर बाधाएँ हैं। परिवार में कोई अपने मन की बात खुलकर कह देता है, कोई नहीं कह पाता; कोई अपनी बात का प्रस्तुतीकरण प्रभावी ढंग से कर लेता है तो कोई नहीं कर पाता; कोई मुखर है तो कोई संकोची; ये बातें परिवार के आंतरिक सम्प्रेषण की वे समस्याएँ हैं जो हर समूह में पाई जाती हैं। यह स्थिति परिवार के संचालन की सबसे बड़ी मुसीबत है।
परिवार की व्यवस्था बनाने में मैंने अपने बब्बाजी (दादाजी) को जितना दुखी देखा, उतना ही दद्दाजी (पिताजी) को भी परेशान देखा। इन दोनों महानुभावों को भ्रम था कि वे अपने परिवार का भरपूर डांट-डपट के माध्यम से सुसंचालन कर रहे हैं लेकिन मैं आपको अंदर की बात बता रहा हूँ- उनकी नज़र के सामने ठीक-ठाक रहता था और पीठ-पीछे सब गड़बड़। मेरे दोनों पूर्वज स्थिति को अपने नियंत्रण में रखने का अनवरत प्रयास करते थे लेकिन वे अपने-अपने पुत्रों को साध पाने में सर्वथा असफल रहे, उनकी बेटियाँ बेचारी मजबूर थी, रोती-कलपती अपने-अपने ससुराल चली गई और उनका ससुराल उन्हें स्वर्ग जैसा लगा ! ससुराल भी आज जैसी नहीं जहां आधुनिक सासें अपनी बहू को 'बहूरानी, 'बहूरानी' कहती हैं, उस जमाने की सास- 'ललिता पवार' जैसी सास !
हम तीन भाई हैं, तीनों एक-दूसरे से लगभग दस वर्ष बड़े-छोटे। एक पिता की ऊर्जा से उत्पन्न, एक माँ की कोख से जन्मे, एक वातावरण में पले-बढ़े- तीनों में कुछ-एक ही समानताएँ हैं लेकिन अनेकों असमानताएँ है, खास तौर से तीनों के 'माइंड सेट' अलग-अलग हैं। प्रकृति ने कितनी दक्षता से समस्त मनुष्य प्रजाति को एक जैसे अंग-प्रत्यंग दिए लेकिन मुखाकृति, रंग और डील-डौल के अंतर को इस तरह विभाजित किया कि सब एक जैसे होकर भी एक जैसे नहीं हैं, सबकी अपनी-अपनी अलग पहचान है। ज़रा सोचिए, अगर ऐसा न होता तो कैसा होता ? समाज में कितनी अराजकता हो जाती ? कैसे किसी को व्यक्तिगत पहचान मिलती ?
बड़ों का नियंत्रण तब तक ही रहता है- जब तक उनकी बात मानी जाती रहे, उनकी बात तब तक मानी जाती रहेगी- जब तक बात मानने वाले को उनसे काम निकालना होगा। हाँ, काम निकल जाने के बाद भी यदि कोई बात मान रहा है तो समझिए उस माता-पिता के अहो-भाग्य हैं, उनके पिछले जन्मों का पुण्य प्रताप काम आ रहा है वरना बुद्धिमान संतानें अपने पिता से प्रश्न किया करती हैं- 'मैंने आपके यहाँ आने की 'एप्लिकेशन' लगाई थी क्या ?'
परिवार के प्रबन्धन में आर्थिक पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि घर धन-धान्य से परिपूर्ण है तो समस्याओं के निदान आसान होते हैं क्योंकि महात्मा गांधी के चित्र छपे कागज के डग बहुत लंबे होते हैं, वे एक डग में सारा संसार नाप लेते हैं। पंजाब की एक कहावत है- 'जिनांदे घर दांणें, वे कमले बी स्याणें'- (जिनकी जेब भरी रहती है वे अगर पगले भी हैं तो सयाने माने जाते हैं), वहीं पर यदि अर्थसंकट चल रहा हो तो अच्छे-अच्छे विद्वान भी त्राहिमाम करने लगते हैं।
हमारी देनदारी ही हमारी संपत्ति थी, वही जीवन था और वही जीने की जुगत थी। दरअसल मैं खुद से युद्ध लड़ रहा था, जो मैं हासिल नहीं कर पाया उस लकीर को मैं अपने बच्चों के हाथ से मिटाना चाहता था। हमने बच्चों में आगे बढ़ने की संभावना देखी इसलिए उन्हें हर स्थिति में प्रोत्साहित किया, आप तो जानते हैं कि 'केनवास' पर बनी 'पेंटिग' को रचने में रंगों को अपना अस्तित्व मिटाना पड़ता है।
सन 2001 में हमारी दोनों बेटियाँ विवाह योग्य हो गई थी लेकिन हम धनाभाव के कारण चुपचाप कुंडली मारे बैठे थे। गाँव का माहौल होता तो चर्चा गरम होने लगती है- 'बताओ, बांस जैसी बड़ी लड़कियां, घर में बिठाए हुए है, शादी-ब्याह की फिक्र नहीं...' लेकिन शहरों में ऐसी चर्चा नहीं होती। जब तक विवाह तय न हो, लड़की को पढ़ाते रहो और कोई कुछ कहे तो अपना जवाब तैयार- 'लड़की अभी पढ़ रही है...'।परिवार के प्रबन्धन में आर्थिक पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि घर धन-धान्य से परिपूर्ण है तो समस्याओं के निदान आसान होते हैं क्योंकि महात्मा गांधी के चित्र छपे कागज के डग बहुत लंबे होते हैं, वे एक डग में सारा संसार नाप लेते हैं। पंजाब की एक कहावत है- 'जिनांदे घर दांणें, वे कमले बी स्याणें'- (जिनकी जेब भरी रहती है वे अगर पगले भी हैं तो सयाने माने जाते हैं), वहीं पर यदि अर्थसंकट चल रहा हो तो अच्छे-अच्छे विद्वान भी त्राहिमाम करने लगते हैं।
हमारी देनदारी ही हमारी संपत्ति थी, वही जीवन था और वही जीने की जुगत थी। दरअसल मैं खुद से युद्ध लड़ रहा था, जो मैं हासिल नहीं कर पाया उस लकीर को मैं अपने बच्चों के हाथ से मिटाना चाहता था। हमने बच्चों में आगे बढ़ने की संभावना देखी इसलिए उन्हें हर स्थिति में प्रोत्साहित किया, आप तो जानते हैं कि 'केनवास' पर बनी 'पेंटिग' को रचने में रंगों को अपना अस्तित्व मिटाना पड़ता है।
लड़कियों की शादी होने में लड़की की खूबसूरती और उसके पिता का धन-संग्रह बहुत काम आता है। लड़की खूबसूरत है (यहाँ खूबसूरती का आशय लड़की के 'गोरेपन' से है) तो लड़के वाले ऐसी लड़कियों पर नज़र रखते हैं और आग्रह करके अपने लड़के के लिए मांग लेते हैं, दहेज मिले, न मिले। मुश्किल यह है कि सभी लड़कियां गोरी नहीं होती, गेहुएं रंग की होती है तो कुछ साँवली। भारत उष्णकटिबंधीय देश है जिसमें उत्तर भारत के लोग अपेक्षाकृत गोरे है लेकिन मध्य और दक्षिण भारत के रहवासी क्रमशः गेहुएँ और कृष्णवर्ण के हैं। सभी सन्तानें अपने पूर्वजों के रंग को 'इनहेरिट' करती हैं लेकिन सबको गोरी लड़की चाहिए इसलिए मांग और पूर्ति में बहुत बड़ा अंतर रहता है।
गोरेपन के अभाव में लड़की के पिता का धन काम आता है। धन के दबाव में लड़केवाले समझौता कर लेते हैं और मध्यम खूबसूरत लड़कियां ब्याह जाती हैं। अब शेष बची बच्चियाँ 'एक्सपाइरी डेट' वाले लड़कों से ब्याही जाती हैं। 'एक्सपाइरी डेट वाले लड़कों' का मतलब है- वे लड़के जो देखने में अच्छे हैं, अच्छी नौकरी में हैं, पैसे वाले घर के लड़के हैं लेकिन अनेक अच्छी-भली लड़कियों को 'रिजेक्ट' करने के बाद अंततः कुँवारे रह गए और उनके लिए रिश्ते आने बंद हो गए हों। इसी प्रकार मध्यम या कमजोर आर्थिक स्थिति वाले माता-पिता भी अपनी सुंदर लड़कियां तगड़ी कमाई वाले कृष्णवर्णी लड़कों से इसलिए ब्याह देते हैं कि 'लड़का सांवला है तो क्या होता है, लड़की तो धन-धान्य से भरपूर परिवार में रहेगी, झूला झूलेगी।' मेरे विवाह में संभवतः इसी सोच ने काम किया होगा अन्यथा माधुरी जैसी खूबसूरत कन्या मेरे भाग्य में कहाँ ? ये 'फार्मूले' अंतिम नहीं हैं, अपवाद भी होते हैं, पर आमतौर पर ऐसा ही चल रहा है।
मैं और माधुरी अक्सर चर्चा करते थे कि हमारी दोनों लड़कियों का विवाह कैसे होगा ? उन दिनों किसी साधारण घर में लड़की ब्याहने का बजट पाँच से दस लाख चल रहा था और असाधारण घर में दस लाख से अधिक। हमारे पास अंक तो लाखों के थे लेकिन थे देनदारी के ! माधुरी का अनुमान था कि दोनों पढ़-लिख रही है, नौकरी मिल जाएगी तो कोई-न-कोई जुगाड़ बन जाएगा, फिर भी, वैवाहिक खर्च तो लगेगा ही। वे मुझसे पूछती- 'तुम्हारी जो दशा है, तुम कैसा करोगे ?' मैं चुप रह जाता और बात बदल देता। मेरी दुर्दशा का माधुरी को पता था लेकिन उसकी गहराई का पता नहीं था। उसे अगर देनदारी का सही 'फीगर' मालूम पड़ जाता तो बेचारी की रातों की नींद उड़ जाती, मैं तो बेशर्म हो चुका था, रात को बेफिक्र सोता था।
हम अग्रवालों में जब लड़की की शादी की बात चलाई जाती है तो लड़के वाले अपने स्तर पर जासूसी करके पता लगा लेते हैं कि लड़की वाला कितना 'पोठ' है ! तसल्ली हो जाने पर बात इस तरह शुरू होती है- 'भाई जी, हमें तो कुछ नहीं चाहिए।' जब संबंध तय हो जाएगा तब कहेंगे- 'इतना तो करना पड़ेगा, हमारे रिश्तेदारों के सामने हमारी इज्ज़त का फालूदा न बने।' जब शादी हो जाएगी तब हर तीज-त्यौहार और कई अन्य बहानों से रक्त चूसने का निर्मम अभियान चलता रहेगा क्योंकि लड़की उनके हाथ में है। यदि लड़की के माता-पिता अपनी बच्ची को ससुराल में 'बने रहने' देना चाहते हैं तो सब सुनना पड़ेगा, मानना पड़ेगा।
लड़की का माँ-बाप होना कितना अपमानजनक होता है, यह उसके विवाह या उसके बाद में समझ आता है। किसी को भाग्य से भले लोग भी मिल जाते हैं अन्यथा सामान्यतया लड़की वालों को अत्यंत पीड़ादायक स्थिति से होकर गुजरना पड़ता है।
अपनी बिरादरी में ही संबंध करने का हमारा आग्रह कभी नहीं रहा, हम खुले दिमाग से रिश्ते बनाना चाहते थे, अच्छा लड़का या अच्छी लड़की होना हमारी प्राथमिकता थी। उनमें 'अच्छा' क्या- यह बच्चों को तय करना था। हमने यह भी तय किया कि अपने बेटे कुंतल के विवाह के बाद बहू केवल एक बार ही हमारे घर में आएगी, अगली बार उनकी अलग व्यवस्था बना दी जाएगी ताकि साथ रहकर विकसित होने वाली कड़ुवाहट से बचा जा सके और शेष जीवन में प्रेमपूर्ण संबंध बने रहें।लड़की का माँ-बाप होना कितना अपमानजनक होता है, यह उसके विवाह या उसके बाद में समझ आता है। किसी को भाग्य से भले लोग भी मिल जाते हैं अन्यथा सामान्यतया लड़की वालों को अत्यंत पीड़ादायक स्थिति से होकर गुजरना पड़ता है।
सन 2001 की एक शाम बीत रही थी, मैं अपने लाज के काउंटर में बैठा था, फोन की घंटी बजी- 'मैं डा॰ केदारनाथ अग्रवाल, इंदौर से बोल रहा हूँ।'
'जी, कहिए।' मैंने कहा।
'क्या मेरी बात द्वारिका प्रसाद जी से हो सकती है ?'
'जी, मैं बोल रहा हूँ।'
'आपसे एक पारिवारिक बात करनी है।'
'जी।'
'आपकी बेटी संगीता से मैं विवाह करना चाहता हूँ।'
'ओके, क्या आप दोनों एक दूसरे से परिचित हैं ?'
'जी नहीं।'
'फिर ?'
'मैं संगीता का 'सीनियर' हूँ, मैंने उसे देखा है लेकिन कभी मिला नहीं।'
'क्या संगीता आपको जानती है ?'
'शायद नहीं।'
'तो फिर ?'
'आप मेरे बारे में पता कर लीजिए, मेरा परिवार जबलपुर के पास गोटेगांव में रहता है, मैं आपको उनका विवरण और फोन नंबर बता रहा हूँ, साथ में अपना भी, आप नोट कर लीजिए और यदि उचित समझें तो आगे बढ़ें।' डा॰ केदारनाथ ने विवरण बताए और परस्पर नमस्कार के पश्चात फोन बंद हो गया।
मैंने संगीता को फोन करके पूरी बात बताई तो वे चकित रह गई। वे इस नाम से अनभिज्ञ थी फिर भी मैंने उन्हें डा॰ केदारनाथ की क्लीनिक का पता दिया और पतासाजी की सलाह भी दी। संगीता ने अपने दो सहपाठी मित्रों को पता करने भेजा, वे दोनों उनसे मिलकर आए तब इस बात की पुष्टि हुई कि 'फोन-काल' 'वेलिड' था। उसके बाद मैंने संगीता से कहा- 'तुम खुद जाकर देखो और अपनी राय दो।'
'आप हद करते हो पापा, मैं अपने लिए पति देखने जाऊंगी ?'
'तुमको जंचे तब तो बात आगे बढ़ाएँ।'
'ठीक है, आप बड़ी मुसीबत में फंसा रहे हो।' वे बोली।
'एक न एक दिन फंसना ही है बेटा ! मैंने समझाया।
संगीता अपनी 'कज़िन' ममता दीदी, जिनके संरक्षण में इंदौर में रहती थी, के साथ उनसे मिलने गई। वहाँ से लौट कर मुझे 'मेल' किया- 'I don't see any reason to reject him but the matter has to be finalised by you & mummy.'
हम इस विवाह प्रस्ताव से प्रसन्न थे लेकिन झिझक भी रहे थे क्योंकि विवाह की बात शुरू करने में बात फंस जाने का खतरा था, कड़की चल रही थी, 'अगर शादी तय हो गई तो कैसे होगा' का प्रश्न दिमाग को खदबदा रहा था लेकिन माधुरी ने महत्व की बात कही- 'वे खुद होकर विवाह का प्रस्ताव कर रहे हैं तो हमें उनकी बात को हल्के से नहीं लेना चाहिए बल्कि उनका मान करना चाहिए। तुम इंदौर जाकर उनसे मिलो, बातचीत करो, उनके बारे में पता करो, फिर आगे का देखेंगे।'
कुछ दिनों बाद मैं इंदौर पहुंचा और डा॰ केदारनाथ से मिलने के पहले उनके मित्र डा॰अनूप व्यास से मिला जो उनके सहपाठी थे और संगीता के 'सर' भी। मैंने डा॰अनूप व्यास से कहा- 'आपकी दोहरी ज़िम्मेदारी है, केदार आपके मित्र हैं, संगीता आपकी शिष्या !'
'मैंने ही संगीता के लिए केदार को 'सजेस्ट' किया था।'
'आप मुझे केदार जी के बारे में बताइए।'
'बहुत अच्छा है, हम दोनों चार साल तक हॉस्टल में एक साथ रहकर पढे हैं, मैं उसके बारे में सब कुछ जानता हूँ।'
'क्या जानते हैं ?'
'यही कि वह बहुत 'केल्कुलेटिव्ह' इंसान है लेकिन 'मेनिपुलेटिव्ह' बिलकुल नहीं।'
'और ?'
'वह गंदी आदतों से एकदम दूर है, सिगरेट- शराब बिलकुल नहीं लेता।'
'सच कह रहे हैं आप ?'
'यदि लेता होता तो मुझसे छुपता क्या ?'
'क्यों नहीं लेते, मेडिकल कालेज में तो यह सब आम है ?' मैंने पूछा।
'आप सही कह रहे हैं लेकिन केदारनाथ को ये सख्त नापसंद है, उसे कोई जबर्दस्ती करके भी नहीं पिला सकता।' डा॰ अनूप व्यास ने बताया।
डा॰ व्यास से अनुकूल सूचना मिलने के पश्चात मैं डा॰ केदारनाथ से मिलने उनकी क्लीनिक में पहुँच गया. मैंने उनसे बात की और अनुरोध किया कि विवाह के लिए वे दो वर्ष और रुक जाएं ताकि संगीता एम.डी.एस. कर ले और इस बीच विवाह में होने वाले खर्च की व्यवस्था भी बन जाएगी। उन्होंने कहा- 'रुकना संभव न हो सकेगा, हाँ, विवाह में खर्च की चिन्ता न करें, विवाह के सभी कार्यक्रम सादगी से होंगे, आप जो करेंगे, जितना करेंगे, ठीक है। '
उनसे मिलने के बाद मैं उनके गृहनगर गोटेगाँव गया, उनके परिवारजनों से मिलकर विवाह का प्रस्ताव किया, संगीता का फोटोग्राफ और कुंडली उन्हें सौंपी। उन्होंने 'विचार करके बाद में खबर करने' की बात कही. एक सप्ताह बाद संगीता के मामा मदनगोपाल जी (जबलपुर) के पास फोटोग्राफ और कुंडली वापस आ गई- 'कुण्डली का मिलान सही नहीं हो रहा है।' प्रकरण समाप्त हो गया, हम चुप बैठ गए लेकिन 'होनी' चुप नहीं बैठी !
जीवन का क्या है, चलते रहता है; घटनाओं का क्या है, होते रहती हैं। घटनाओं के साथ हम कर भी क्या सकते हैं, वे होने के लिए स्वतंत्र हैं ! हमारी चिंता केवल यह रहती है कि कैसे इनका सामना करें ?
एक दिन संगीता के मामा मदनगोपाल जी का फोन आया- 'क्या हुआ जीजाजी, संगीता की शादी का ?'
'कुछ नहीं।' मैंने बताया।
'कुछ नहीं ? आपने गोटेगांव वालों से फिर बाद में बात नहीं की क्या ?'
'क्यों, उन्होंने आपको कुंडली और फोटो वापस करके मना नहीं किया था क्या ?'
'तो क्या हुआ, उनका काम है मना करना, अपन लड़की वाले हैं, हमारा काम है फिर पूछना।'
'भाई साहब, बेइज्जती मत करवाइए। ये मुझसे न होगा ।'
'आप भी दद्दाजी के ऊपर गए हो ! एक बार फिर फोन लगाकर पूछिए, अब शायद उनका विचार बन गया हो।'
'जब कुंडली नहीं मिली तो अब क्या ग्रहों ने स्थिति बदल ली होगी ?'
'जीजाजी, कुंडली मिलान के लिए नहीं, मना करने के लिए होती है।'
'ऐसा क्या ?'
'जी हाँ।'
'फिर भी, मैं उनसे बात नहीं करूंगा, हाँ, डा॰ केदारनाथ से बात कर सकता हूँ।'
'ठीक है उन्हीं से करिए।' मदनगोपाल जी ने कहा और ठंडी सांस भरी। मैंने डा॰ केदारनाथ को फोन लगाया- 'क्या विचार बना डाक्टर साहब ?'
'मुझे कल तक का समय दीजिए।' डा॰ केदारनाथ ने कहा।
अगले दिन डा॰ केदारनाथ का फोन आया- 'घर में मेरी बात हो गई है, सब राजी हो गए हैं। आप वहाँ जाकर पिताजी से मिल लीजिए और विवाह की तिथि तय करने के लिए आपस में चर्चा कर लीजिए।'
'फौरन से पेस्तर' मैं मदनगोपाल जी के साथ गोटेगांव पहुंचा, विवाह की व्यवस्था पर चर्चा की और चांदी की थाली-कटोरी में परोसा गया भोजन ग्रहण करके खुशी-खुशी बिलासपुर वापस आ गया। सब भाइयों, बहनों व रिश्तेदारों को संगीता के विवाह तय होने की सूचना दी। विवाह की तिथि तय हुई- 15 फरवरी 2002 लेकिन उसी बीच संगीता की वार्षिक परीक्षा की तिथियाँ भी टकरा गई। हमने 8 मई के लिए विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन केदारनाथ जी की कुंडली के अनुसार 15 फरवरी ही शुभ तिथि थी अन्यथा एक वर्ष बाद ही शुभ-तिथि का योग था इसलिए मजबूरन संगीता की परीक्षा के बीच ही विवाह होना निश्चित हुआ। हमें संगीता की ससुराल से स्पष्ट आश्वासन मिला कि वैवाहिक कार्यक्रम में केवल तीन दिनों तक ही संगीता की पढ़ाई में व्यवधान होगा, विदा के अगले दिन उसे परीक्षा की तैयारी करने के लिए 'मुक्त' कर दिया जाएगा।
इस बीच, दिसंबर 2001 में मेरे दाहिने गाल में कुछ छाले हो गए जिनकी इंदौर में संगीता के प्रोफेसर डा॰ अनूप व्यास और डा॰ विलास नेवास्कर ने जांच की। कुछ संदेह होने पर कैंसर विशेषज्ञ डा॰ दीपक अग्रवाल से 'ओपीनियन' लेने की योजना बनी। डा॰ विलास नेवास्कर स्वयं डा॰अग्रवाल के पास मुझे लेकर गए और मेरी जांच करवाई। डा॰ अग्रवाल को भी मेरे गाल में कैंसर विकसित होने का संदेह हुआ इसलिए उन्होंने अगले दिन ही एक 'माइनर सर्जरी' करने का निर्णय लिया ताकि कैंसर से संभावित हिस्से को अलग करके उसे आगे बढ्ने से तुरंत रोका जा सके। गाल के अंदर एक बड़ा 'एक्सीजन' किया गया और उसके कुछ टुकड़े इंदौर की दो अलग-अलग 'लैब' में जांच के लिए भेजे गए। एक सप्ताह बाद एक लैब ने कैंसर होने की 'रिपोर्ट' दी तो दूसरी ने 'न' होने की !
अब हम लोग 'कनफ्यूज' हो गए, दिल कहता था कि कैंसर न होने वाली रिपोर्ट को मान लें लेकिन बुद्धि कहती थी कि कैंसर के होने वाली रिपोर्ट पर गौर किया जाए। अंततः यह तय हुआ कि मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में 'सेम्पल' की जांच करवाई जाए। हमारे होने वाले दामाद डा॰ केदारनाथ सेम्पल लेकर मुंबई रवाना हो गए, सात दिन तक वहीं रहे। 1 जनवरी 2002 की रात रिपोर्ट लेकर इंदौर वापस आए और मुझे फोन किया- 'टाटा हास्पिटल में कैंसर होने की पुष्टि हो गई है। अब आपकी 'मेजर सर्जरी' होगी जो इंदौर के सुयश हास्पिटल में 12 जनवरी के लिए 'फिक्स' हो गई है, सर्जरी डा॰ दीपक अग्रवाल करेंगे।' फोन सुनकर मैं अवाक रहा गया। माधुरी ने पूछा- 'क्या हुआ ?'
'कैंसर 'कंफर्म' हो गया।' मैंने बताया। कुछ देर के लिए मैं अंदर तक हिल गया। मेरा जी धक्क रह गया। अपने अनेक परिचितों को मैंने मुंह के कैंसर हो जाने पर सर्जरी, रेडियो-थेरेपी और कीमो-थेरेपी की अत्यंत कष्टप्रद प्रक्रिया से होते हुए एक साल के अंदर बुरी दशा में मरते हुए देखा था, वे सभी चेहरे और उनकी तकलीफ़ें मेरे दिमाग में एकबारगी तैर गई। मुझे समझ में आ गया कि अब मेरी गिनती की सांसें बच गई हैं। मेरे तीनों अव्यवस्थित बच्चे, पत्नी और पहाड़ जैसी देनदारी के विचार ने मुझे उस समय इस तरह जकड़ा जैसे अजगर किसी शिकार को अपने फंदे में लपेटता है। मैंने खुद से पूछा- 'अब क्या होगा ?'
'मुझे एक गिलास पानी दो।' मैंने माधुरी से कहा। माधुरी दौड़ती गई, पानी लाई, मैंने पिया और अपने बिस्तर में मच्छरदानी को भलीभाँति दबाकर लेट गया। लेटते ही मेरे दिल ने मुझसे कहा- 'छोड़ यार, आज की रात सो लिया जाए, कल की कल देखेंगे।'
अगली सुबह मुझे माधुरी ने बताया- 'रात को बिस्तर पर लेटने के दो मिनट बाद तुम्हारे खर्राटे सुनाई पड़ने लगे थे.'
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डा. थामस फुलर ने लिखा है- 'Health is not valued till sickness comes.'- स्वस्थ होने की कीमत बीमार होने पर ही समझ में आती है. हमारे साथ एक दुर्गुण जीवन भर चलता है कि जिस शरीर में हमारे प्राण रहते हैं उसकी हिफाज़त पर हम बिलकुल ध्यान नहीं देते. ख़ास तौर से हमारा खान-पान अत्यंत दोषपूर्ण है लेकिन हम असावधानीवश सब-कुछ निगलते रहते हैं और अपने शरीर को खुद रोगग्रस्त कर लेते हैं. शरीर के प्रति जागरूकता के अभाव ने हमें दवाइयों और अस्पतालों पर निर्भर बना दिया है. बीमार शरीर को ढोते-ढोते सबका मन भी बीमार हो चला है. आखिर इतनी बेहोशी क्यों ?==========
ये क्या हुआ
प्रकृति ने हम मनुष्यों को मांसाहार और शाकाहार भोजन उपलब्ध कराया है जिसे हम विविध उपायों से स्वादिष्ट बनाकर अपने शरीर को भेजते हैं. हमारे शरीर को स्वाद से कुछ लेना-देना नहीं है, उसे तो भोजन के पोषक तत्वों से मतलब है लेकिन हमारी भोजन शैली की स्वाद की विविधता ने भोजन के अधिकतर पोषक तत्व छीन लिए और हम अपने शरीर को वह देते हैं जो उसे दूषित कर रहे हैं. हमें बचपन से जो खाने को मिला वही हमारा अभ्यास हो गया और उसे ही हम अपने पेट भरने का सही उपाय मानते हैं. धीरे-धीरे हम और हमारा भोजन स्वाद के अधीन हो गए और हमारा शरीर भांति-भांति की बीमारियों के.
स्वस्थ मन के लिए स्वस्थ शरीर की ज़रूरत है और स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन की. हमारे आस-पास के माहौल में इसे दूषित करने के चौतरफ़ा उपाय चल रहे हैं और सभी इनके चक्कर में फ़ंसते ही जा रहे हैं. जैसे, बचपन से मैंने जो खाया वही आज भी मुझे रुचता है, वही मुझे चाहिए, उदाहरण के लिए, हमारे घर में रात के भोजन में सदैव पूड़ी-सब्जी बनती थी इसलिए आज भी मुझे वह सर्वाधिक प्रिय है, भले ही वह गरिष्ठ होने के कारण शरीर के लिए हानिप्रद है, यह बात अलग है कि मेरी पत्नी ने इस परम्परा को तीस वर्ष पूर्व तोड़ दिया, अब पूड़ियों के दर्शन केवल त्योहारों में होते हैं.
दस वर्ष की उम्र से मैं मिठाई दूकान में बैठ रहा हूं इसलिए मीठा और नमकीन खाने का शौकीन हूं, भले ही ये सब शरीर की आवश्यकता न हो. बस, खाए जाओ - खाए जाओ. खान-पान का यह स्वछंद प्रयोग नित-दिन हमारे शरीर की आन्तरिक व्यवस्था को अव्यवस्थित करता है और हम उसके प्रति तनिक भी सचेत नहीं हैं. हम सब ऐसी ही खाद्य विसंगतियों के शिकार हैं. सबसे अधिक नुकसान पशु या पशुउत्पादित खाद्य पदार्थों से होता है क्योंकि इनमें मनुष्य के शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व सर्वाधिक होते हैं लेकिन जागरूकता की कमी या भ्रमपूर्ण प्रचलित सूचनाओं के कारण लोग इन्हें शरीर के लिए लाभप्रद समझकर खाते हैं.
मेरे परिवार के पुरुषों में धूम्रपान की आदत प्रायः सबको रही. मेरे दादाजी और चाचाजी बीड़ी फ़ूंकते थे, पिताजी और बड़े भैया सिगरेट पीते थे. मेरा बचपन इन लोगों के द्वारा नाक से छोड़े गए धुएं को सूंघते हुए गुजरा, इसलिए अप्रत्यक्ष ढंग से मुझे बीड़ी और सिगरेट की गन्ध का भान है लेकिन मैंने कभी इसका सेवन नहीं किया यद्यपि कुछ धूम्रपानप्रेमी मित्रों का दबाव रहता था. इसी प्रकार शराब पीने से भी बचा रहा जबकि जेसीज और रोटरी जैसे क्लबों में लम्बे समय तक जुड़ा रहा जहां ‘न पीने वाले’ मुझ जैसे बन्दे उंगलियों में गिनने लायक थे. पर पता नहीं क्यों, मैं स्वयं को तम्बाखू से नहीं बचा पाया! अपनी युवावस्था में मैं पान खाने का शौकीन था- मीठीपत्ती+चमनबहार लेकिन एक दिन मेरे एक अभिन्न मित्र ने मेरे पान में दो पत्ती ‘बाबा-१६०’ डाला और कहा- ‘खाकर तो देख.’ केशर की खुश्बू से ओतप्रोत उस तम्बाखू का स्वाद और ‘झूम’ मनमोहक थी, मैं उस फ़न्दे में फ़ंस गया. कुछ दिन तक बाबा खाया उसके बाद देशी तम्बाखू खाने लगा. तम्बाखू के साथ-साथ पान खाने की आवृत्ति बढ़्ती गई, एक दिन में पन्द्रह से बीस पान खपने लग गए. अनेक बार छोड़ने की कोशिश की लेकिन मुई छूटती ही न थी, छोड़ने के दो-चार दिन बाद पैर अपने-आप पान की दूकान की ओर बढ़ जाते और वह अल्पकालिक-संकल्प मोहक तम्बाखू के समक्ष धराशायी हो जाता.
सन १९७२ में मेरा मुंह अपेक्षाकृत कम खुलने लगा, मैंने अपने मित्र चिकित्सक डा. महेश कासलीवाल को दिखाया तो उन्होंने बताया कि यह ‘सब्म्यूकस फ़ाइब्रोसिस’ है जो मुंह के कैन्सर का प्रारम्भिक लक्षण है. उन्होंने उपचार के तौर पर एक ‘इन्जेक्शन’ लिखा जिसे मुझे हर सप्ताह में एक बार रायपुर जाकर डी.के. हास्पिटल के डेन्टिस्ट डा.पी.के.अग्रवाल से लगवाना पड़ता था. डाक्टर उस दवा को एक इंजेक्शन सिरिंज में भर लेते और मुंह के अन्दर निडिल से आठ-दस जगह ठूंस देते जैसे- ऊपर-नीचे तालु में, अगल-बगल गाल में, जीभ में, दोनों होठों में और न जाने कहां-कहां ! अपूर्व दर्द से मैं तड़प उठता, मुंह से खून बहता लेकिन इस तपस्या का भी कोई फ़ल न निकला. इसके बावज़ूद मैंने तम्बाखू वाला पान खाना नहीं छोड़ा. डा.महेश कासलीवाल मुझसे कहा करते थे- ‘पान-तम्बाखू खाना छोड़ दे, नहीं तो कैन्सर से मरेगा.’ लेकिन नशा तो नशा होता है. नशा करने वाले के पास नशा करने के कई कुतर्क होते हैं जिनके सहारे मैं लम्बे समय तक टिका रहा लेकिन अचानक २० अगस्त १९९३ को मैंने एक अत्यन्त कड़ा निर्णय लिया और पान, तम्बाखू और सुपारी को सदा के लिए छोड़ दिया लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी, रोग की जड़ें मेरे शरीर में पनप चुकी थी. अन्ततः २००२ में मैं कैन्सर की गिरफ़्त में आ गया।
कैन्सर का नाम सुनते ही इन्सान घबरा जाता है. घबराने की असल वज़ह होती है- डर. यह बीमारी ज़रा नखरीली है, मानी तो मानी और न मानी तो सता-सता कर मारती है. लोग इस बीमारी का नाम सुनकर ही सदमा खा जाते हैं, ‘साइलेन्ट हार्ट अटैक’ तो हो ही जाता है, आँखों के सामने मृत्यु का तांडव नृत्य आरम्भ हो जाता है. जैसे ही इस बीमारी के समाचार का आगमन होता है, अनेक विद्वान सलाहकारों का अपने-आप अभ्युदय हो जाता है. सब के सब कैन्सर ठीक होने का मुफ़ीद इलाज़ बताते हैं- एकदम ‘गेरेन्टेड’, न ठीक होने पर सलाह वापस ! जैसे, गौ-मूत्र, स्व-मूत्र का सेवन; गेहूँ के ज्वार का रस, आयुर्वैदिक या होम्योपैथिक उपचार आदि. इसके अतिरिक्त बस्तर के जंगल में रहने वाले किसी आदिवासी ओझा का इलाज़, बनारस के किसी वैद्य के द्वारा दी जा रही दवा जैसी अनेक उपचार विधाएं मेरी जानकारी में आई॰ मैं असमन्जस में था कि क्या करूं, किसकी शरण में जाऊं ? सबसे अधिक डर इस सूचना का था - ‘किसी हालत में ‘सर्जरी’ मत करवाना क्योंकि चाकू के लगते ही कैन्सर शरीर में बुरी तरह फ़ैलता है.’
दस वर्ष की उम्र से मैं मिठाई दूकान में बैठ रहा हूं इसलिए मीठा और नमकीन खाने का शौकीन हूं, भले ही ये सब शरीर की आवश्यकता न हो. बस, खाए जाओ - खाए जाओ. खान-पान का यह स्वछंद प्रयोग नित-दिन हमारे शरीर की आन्तरिक व्यवस्था को अव्यवस्थित करता है और हम उसके प्रति तनिक भी सचेत नहीं हैं. हम सब ऐसी ही खाद्य विसंगतियों के शिकार हैं. सबसे अधिक नुकसान पशु या पशुउत्पादित खाद्य पदार्थों से होता है क्योंकि इनमें मनुष्य के शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व सर्वाधिक होते हैं लेकिन जागरूकता की कमी या भ्रमपूर्ण प्रचलित सूचनाओं के कारण लोग इन्हें शरीर के लिए लाभप्रद समझकर खाते हैं.
मेरे परिवार के पुरुषों में धूम्रपान की आदत प्रायः सबको रही. मेरे दादाजी और चाचाजी बीड़ी फ़ूंकते थे, पिताजी और बड़े भैया सिगरेट पीते थे. मेरा बचपन इन लोगों के द्वारा नाक से छोड़े गए धुएं को सूंघते हुए गुजरा, इसलिए अप्रत्यक्ष ढंग से मुझे बीड़ी और सिगरेट की गन्ध का भान है लेकिन मैंने कभी इसका सेवन नहीं किया यद्यपि कुछ धूम्रपानप्रेमी मित्रों का दबाव रहता था. इसी प्रकार शराब पीने से भी बचा रहा जबकि जेसीज और रोटरी जैसे क्लबों में लम्बे समय तक जुड़ा रहा जहां ‘न पीने वाले’ मुझ जैसे बन्दे उंगलियों में गिनने लायक थे. पर पता नहीं क्यों, मैं स्वयं को तम्बाखू से नहीं बचा पाया! अपनी युवावस्था में मैं पान खाने का शौकीन था- मीठीपत्ती+चमनबहार लेकिन एक दिन मेरे एक अभिन्न मित्र ने मेरे पान में दो पत्ती ‘बाबा-१६०’ डाला और कहा- ‘खाकर तो देख.’ केशर की खुश्बू से ओतप्रोत उस तम्बाखू का स्वाद और ‘झूम’ मनमोहक थी, मैं उस फ़न्दे में फ़ंस गया. कुछ दिन तक बाबा खाया उसके बाद देशी तम्बाखू खाने लगा. तम्बाखू के साथ-साथ पान खाने की आवृत्ति बढ़्ती गई, एक दिन में पन्द्रह से बीस पान खपने लग गए. अनेक बार छोड़ने की कोशिश की लेकिन मुई छूटती ही न थी, छोड़ने के दो-चार दिन बाद पैर अपने-आप पान की दूकान की ओर बढ़ जाते और वह अल्पकालिक-संकल्प मोहक तम्बाखू के समक्ष धराशायी हो जाता.
सन १९७२ में मेरा मुंह अपेक्षाकृत कम खुलने लगा, मैंने अपने मित्र चिकित्सक डा. महेश कासलीवाल को दिखाया तो उन्होंने बताया कि यह ‘सब्म्यूकस फ़ाइब्रोसिस’ है जो मुंह के कैन्सर का प्रारम्भिक लक्षण है. उन्होंने उपचार के तौर पर एक ‘इन्जेक्शन’ लिखा जिसे मुझे हर सप्ताह में एक बार रायपुर जाकर डी.के. हास्पिटल के डेन्टिस्ट डा.पी.के.अग्रवाल से लगवाना पड़ता था. डाक्टर उस दवा को एक इंजेक्शन सिरिंज में भर लेते और मुंह के अन्दर निडिल से आठ-दस जगह ठूंस देते जैसे- ऊपर-नीचे तालु में, अगल-बगल गाल में, जीभ में, दोनों होठों में और न जाने कहां-कहां ! अपूर्व दर्द से मैं तड़प उठता, मुंह से खून बहता लेकिन इस तपस्या का भी कोई फ़ल न निकला. इसके बावज़ूद मैंने तम्बाखू वाला पान खाना नहीं छोड़ा. डा.महेश कासलीवाल मुझसे कहा करते थे- ‘पान-तम्बाखू खाना छोड़ दे, नहीं तो कैन्सर से मरेगा.’ लेकिन नशा तो नशा होता है. नशा करने वाले के पास नशा करने के कई कुतर्क होते हैं जिनके सहारे मैं लम्बे समय तक टिका रहा लेकिन अचानक २० अगस्त १९९३ को मैंने एक अत्यन्त कड़ा निर्णय लिया और पान, तम्बाखू और सुपारी को सदा के लिए छोड़ दिया लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी, रोग की जड़ें मेरे शरीर में पनप चुकी थी. अन्ततः २००२ में मैं कैन्सर की गिरफ़्त में आ गया।
कैन्सर का नाम सुनते ही इन्सान घबरा जाता है. घबराने की असल वज़ह होती है- डर. यह बीमारी ज़रा नखरीली है, मानी तो मानी और न मानी तो सता-सता कर मारती है. लोग इस बीमारी का नाम सुनकर ही सदमा खा जाते हैं, ‘साइलेन्ट हार्ट अटैक’ तो हो ही जाता है, आँखों के सामने मृत्यु का तांडव नृत्य आरम्भ हो जाता है. जैसे ही इस बीमारी के समाचार का आगमन होता है, अनेक विद्वान सलाहकारों का अपने-आप अभ्युदय हो जाता है. सब के सब कैन्सर ठीक होने का मुफ़ीद इलाज़ बताते हैं- एकदम ‘गेरेन्टेड’, न ठीक होने पर सलाह वापस ! जैसे, गौ-मूत्र, स्व-मूत्र का सेवन; गेहूँ के ज्वार का रस, आयुर्वैदिक या होम्योपैथिक उपचार आदि. इसके अतिरिक्त बस्तर के जंगल में रहने वाले किसी आदिवासी ओझा का इलाज़, बनारस के किसी वैद्य के द्वारा दी जा रही दवा जैसी अनेक उपचार विधाएं मेरी जानकारी में आई॰ मैं असमन्जस में था कि क्या करूं, किसकी शरण में जाऊं ? सबसे अधिक डर इस सूचना का था - ‘किसी हालत में ‘सर्जरी’ मत करवाना क्योंकि चाकू के लगते ही कैन्सर शरीर में बुरी तरह फ़ैलता है.’
मैंने इस क्षेत्र के नामी होम्योपैथ से दवा की एक ‘डोज़’ ले ली लेकिन मेरा जी घबरायमान हो रहा था. हमारी बिटिया संगीता और भावी दामाद डा, केदारनाथ सर्जरी के पक्ष में थे और वह भी तुरन्त क्योंकि देर करने से कैन्सर के शरीर के अन्य अंगों में फ़ैलने का डर था लेकिन मैं तो त्रिकोणीय समस्या से जूझ रहा था. पहला कोण था- १५ फ़रवरी को संगीता का विवाह, दूसरा कोण- विवाह के एक माह पूर्व कैन्सर की सर्जरी और तीसरा कोण- देर हो जाने पर कैन्सर के फ़ैलने का डर. अब, आपको तो मालूम है ही कि इस संसार में बिना पैसे कुछ होता नहीं है और मेरी माली हालत इतनी खराब थी कि ‘क्या नहाएं, क्या निचोड़े !’
मेरे मोहल्ले में एक सज्जन रहते हैं श्री के.के.बिश्वास जो एक राष्ट्रीयकृत बैंक के ‘लोन सेक्शन’ में कार्यरत थे. मैं उनसे मिला और अपनी समस्या बताई. उन्होंने बताया- ‘पर्सनल लोन का प्रावधान नहीं है लेकिन कान को पीछे से पकड़ना पड़ेगा, आपको कितना चाहिए ?’
‘सर्जरी और बिटिया के विवाह में कम से कम चार लाख लगेगा.’ मैंने कहा.
‘एक लाख का केस होता तो यहीं ‘सेंक्शन’ हो जाता लेकिन उससे अधिक के लिए ‘रीजनल आफ़िस’ से सेंक्शन लेना होगा. समस्या यह है कि वहां का साहब आपका बिरादर है और एक नम्बर का खाऊ है, बिना पैसा लिए काम नहीं करता.’
‘रिश्वत नहीं दूंगा.’
‘ठीक है, आपका केस तैयार करके मैं खुद वहां ले जाता हूँ, शायद आपकी समस्या सुनकर उसे दया आ जाए लेकिन महीने-डेढ़ महीने ज़रूर लगेंगे.’
‘ठीक है, कोशिश करिए.’ मैंने कहा.
सर्जरी की तारीख नज़दीक आते जा रही थी और अपनी जेब खाली थी, मैं निरुपाय था, चुपचाप अपनी बीमारी के डर को सीने में छुपाए सहज बने रहने की कोशिश करता. मेरा दिमाग दिनोंदिन सुन्न पड़ते जा रहा था, हर दिन मेरे लिए कठिन होता जा रहा था. उसी दौरान एक दिन जब मैं अपनी लाज में बैठा था, मेरे अभिन्न मित्र रमाकान्त मिश्रा (राजा) जो भारतीय स्टेट बैंक से स्वैच्छिक अवकाश ले चुके थे, आए. हम दोनों ने साथ-साथ चाय पी. उन्होंने पूछा- ‘कब निकल रहे हो, इन्दौर के लिए ?’
‘अभी तो कोई प्रोग्राम नहीं बना.’ मैंने कहा.
‘अरे, तुझे सर्जरी के लिए जाना था न ?’
‘सर्जरी मुफ़्त में होती है क्या ?’
‘कितना लगेगा ?’
‘क्या पता, लेकिन एक लाख से कम क्या लगेगा ?’
‘फ़िर ?’
‘फ़िर क्या...चुपचाप बैठा हूँ.’ मैंने बताया. बैठक समाप्त हो गई. रमाकान्त चले गए. लगभग दो घंटे बाद आए और मुझे एक बन्डल दिया और कहा- ‘ये बहत्तर हजार हैं, इसे लेकर कल सुबह इन्दौर के लिए निकल जा, एक दिन की भी देर नहीं करना. मेरे खाते में अभी इतना ही था. और पैसे की ज़रूरत होगी तो मुझे वहां से फ़ोन करना, मैं खुद लेकर आऊंगा.’ उन्होंने मुझे आदेश जैसा दिया और चले गए. उन रुपयों को देखकर मेरी आंखे डबडबा गई, मैं सोच रहा था- मौत की ओर तेजी से कदम बढ़ाते इन्सान की भला कौन ऐसी मदद करता है !
मैं और माधुरी इन्दौर पहुंच गए. उसी शाम सर्जन डा. दीपक अग्रवाल से मिले. मैंने उनसे निवेदन किया- ‘बिटिया की शादी आज से ठीक एक महीने बाद है, अगर आप उचित समझें तो इस सर्जरी को अभी टाल दें. मैं विदाई के अगले दिन आपके पास हाज़िर हो जाऊंगा.’
मैं और माधुरी इन्दौर पहुंच गए. उसी शाम सर्जन डा. दीपक अग्रवाल से मिले. मैंने उनसे निवेदन किया- ‘बिटिया की शादी आज से ठीक एक महीने बाद है, अगर आप उचित समझें तो इस सर्जरी को अभी टाल दें. मैं विदाई के अगले दिन आपके पास हाज़िर हो जाऊंगा.’
‘द्वारिका प्रसाद जी, बिटिया के विवाह की चिन्ता आप मत करें, हम लोग हैं, सब हो जाएगा. आप अभी जाकर सुयश हास्पिटल में भर्ती हो जाइए, परसों सुबह आपकी सर्जरी होगी.’ डा. दीपक अग्रवाल ने समझाया.
‘क्या इतना ‘अर्जेंट’ है ?’
‘जी, तब ही ऐसा कह रहा हूं.’
‘फ़िर जैसा आप उचित समझें.’ मैंने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया.
वहां से हम लोग अस्पताल पहुंचे. अगले दिन आवश्यक जांच-पड़ताल हुई. १७ जनवरी २००२ की सुबह ७ बजे नर्स आई, सर्जरी करने के पूर्व सहमति लेने वाला प्रपत्र लाई और माधुरी से उस पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा. माधुरी मेरी ओर देखकर मुस्कुराई और बोली- ‘आज तो मेरा हस्ताक्षर चलेगा.’
‘हां, हां, क्यों नहीं, धन्यवाद.’ मैंने कहा और हम दोनों ठहाका मार कर हंस पड़े. नर्स हम दोनों का चेहरा देखती ही रह गई.
कुछ देर बाद दो वार्डब्वाय स्ट्रेचर-ट्राली लेकर आए, मुझे उसपर लिटाया और ‘ओ.टी.’ की ओर ले चले. मैं लेटे-लेटे ऊपर दिख रही ‘सीलिंग’ को आगे बढ़ता देख रहा था. दाएं-बाएं घूमते हुए ट्राली शल्यकक्ष में प्रविष्ट हो गई. मुझे आपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया. थोड़ी देर बाद डाक्टर और नर्सों ने मुझे घेर लिया. ओ.टी. में लगे साउन्डबाक्स में से मोहम्मद रफ़ी साहब का गाया गीत हम सब को सुनाई दे रहा था- ‘आज मौसम बड़ा बेईमान है, आने वाला कोई तूफ़ान है, आज मौसम....’ किसी ने मुझसे धीरे से कहा- ‘आपके हाथ में एक इन्जेक्शन दे रहे हैं, थोड़ा दर्द होगा, ठीक है ?’ उसके बाद वह गीत वातावरण से जैसे गुम हो गया. फिर, मुझे डा. अग्रवाल की आवाज सुनाई पड़ी- ‘द्वारिका प्रसाद जी, जागिए, आपका आपरेशन हो गया, आप मुझे सुन रहे हैं न ?’ मैंने उन्हें देखा, अपनी पलकें झपकाई और मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन मुस्कुराता कैसे, मुंह के अंदर तो रुई ठुंसी हुई थी !
मुझे बताया गया कि सर्जरी तीन घंटे चली. सर्जरी के बाद मुझे ‘पोस्ट आपरेटिव्ह केयर रूम’ में रखा गया. वहां मुझे एक विचित्र समस्या का सामना करना पड़ा. जब डाक्टर ‘विजिट’ पर आए, उन्होंने मुझसे पूछा-
‘यूरिन पास हुई ?’
‘नहीं.’
‘अरे, इनको तुरंत टायलेट ले जाओ.’ उन्होंने नर्स को आदेश दिया. मेरे शरीर में अनेक पाइप लगे हुए थे, उस समय मुझे बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी. नर्स मेरी बाहों को पकड़कर मुझे टायलेट ले गई और मेरे साथ अन्दर तक गई क्योंकि कमोड जरा अन्दर था. मुझे बहुत जोर की लगी थी, मैंने बहुत कोशिश की लेकिन झिझक के कारण मामला नहीं सधा तो मैंने नर्स से बाहर जाने के लिए कहा तो उसने मुझसे कहा- ‘आपको इस हालत में छोड़कर कैसे जाऊं, आप कहीं गिर पड़े तो ?’
‘आप बाहर जाइए, माधुरी को भेज दीजिए.’ पर वे मुझे छोड़कर नहीं गई और वहीं से आवाज़ देकर माधुरी को बुलाया. माधुरी ने जब मुझे सम्हाला तब वे बाहर गई. तब भी यूरिन नहीं उतरी तब मैंने माधुरी को भी बाहर जाने के लिए कहा. जब वे भी बाहर निकल गई तब एकदम अकेले होने के बाद बमुश्किल काम बना. कभी-कभी इंसान को अत्यंत विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ता है.
मुंह से खाना-पीना बंद था, नाक में एक पाइप डाला गया था जिसकी मदद से पानी, दूध, फ़लों का रस जैसे पेय पदार्थों से तीन सप्ताह तक शरीर को पोषण देना था. मुंह में रुई भरी हुई थी इसलिए बोलना भी बन्द था. मैं उन दिनों इन्हीं वज़हों से इशारेबाजी में दक्ष हो गया था. आप उस व्यक्ति की मनोदशा की कल्पना कर सकते हैं जिसका बोलना, खाना-पीना बाधित हो लेकिन क्या करोगे मित्र, जब सिर पर आती है तो सब सहना पड़ता है !
अगली सुबह डाक्टर आए और उन्होंने पूछा- ‘कैसे हैं आप ?’ मैंने अपने ठीक होने का इशारा किया. ‘रिकवरी’ तेज थी इसलिए पांचवें दिन अस्पताल से छुट्टी हो गई. अस्पताल के भुगतान के लिए हमारी बिटिया संगीता ने जब बिल देखा तो वह विस्मित रह गई- बाइस हज़ार रुपए मात्र जो अस्पताली खर्च और दवाइयों का मूल्य था. सर्जन डा. दीपक अग्रवाल और उनके सहयोगी डा. विलास नेवास्कर ने कोई फ़ीस नहीं ली थी जबकि हमने अस्पताल में पता किया कि इन दोनों डाक्टरों की फ़ीस नब्बे हजार के आस-पास होती थी. उसी शाम हम लोग डा. दीपक अग्रवाल के चेम्बर में उनसे मिलने गए और सर्जरी की फ़ीस न लेने की वज़ह पूछी तो उन्होंने कहा- ‘आपसे फ़ीस लेने का मेरा हक नहीं बनता.’
‘क्यों ?’
‘आपकी बिटिया और दामाद दोनों डाक्टर हैं, हम आपसे कैसे फ़ीस ले सकते हैं, बस, आप अपना आशीर्वाद दीजिए ?’
‘क्या इतना ‘अर्जेंट’ है ?’
‘जी, तब ही ऐसा कह रहा हूं.’
‘फ़िर जैसा आप उचित समझें.’ मैंने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया.
वहां से हम लोग अस्पताल पहुंचे. अगले दिन आवश्यक जांच-पड़ताल हुई. १७ जनवरी २००२ की सुबह ७ बजे नर्स आई, सर्जरी करने के पूर्व सहमति लेने वाला प्रपत्र लाई और माधुरी से उस पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा. माधुरी मेरी ओर देखकर मुस्कुराई और बोली- ‘आज तो मेरा हस्ताक्षर चलेगा.’
‘हां, हां, क्यों नहीं, धन्यवाद.’ मैंने कहा और हम दोनों ठहाका मार कर हंस पड़े. नर्स हम दोनों का चेहरा देखती ही रह गई.
कुछ देर बाद दो वार्डब्वाय स्ट्रेचर-ट्राली लेकर आए, मुझे उसपर लिटाया और ‘ओ.टी.’ की ओर ले चले. मैं लेटे-लेटे ऊपर दिख रही ‘सीलिंग’ को आगे बढ़ता देख रहा था. दाएं-बाएं घूमते हुए ट्राली शल्यकक्ष में प्रविष्ट हो गई. मुझे आपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया. थोड़ी देर बाद डाक्टर और नर्सों ने मुझे घेर लिया. ओ.टी. में लगे साउन्डबाक्स में से मोहम्मद रफ़ी साहब का गाया गीत हम सब को सुनाई दे रहा था- ‘आज मौसम बड़ा बेईमान है, आने वाला कोई तूफ़ान है, आज मौसम....’ किसी ने मुझसे धीरे से कहा- ‘आपके हाथ में एक इन्जेक्शन दे रहे हैं, थोड़ा दर्द होगा, ठीक है ?’ उसके बाद वह गीत वातावरण से जैसे गुम हो गया. फिर, मुझे डा. अग्रवाल की आवाज सुनाई पड़ी- ‘द्वारिका प्रसाद जी, जागिए, आपका आपरेशन हो गया, आप मुझे सुन रहे हैं न ?’ मैंने उन्हें देखा, अपनी पलकें झपकाई और मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन मुस्कुराता कैसे, मुंह के अंदर तो रुई ठुंसी हुई थी !
मुझे बताया गया कि सर्जरी तीन घंटे चली. सर्जरी के बाद मुझे ‘पोस्ट आपरेटिव्ह केयर रूम’ में रखा गया. वहां मुझे एक विचित्र समस्या का सामना करना पड़ा. जब डाक्टर ‘विजिट’ पर आए, उन्होंने मुझसे पूछा-
‘यूरिन पास हुई ?’
‘नहीं.’
‘अरे, इनको तुरंत टायलेट ले जाओ.’ उन्होंने नर्स को आदेश दिया. मेरे शरीर में अनेक पाइप लगे हुए थे, उस समय मुझे बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी. नर्स मेरी बाहों को पकड़कर मुझे टायलेट ले गई और मेरे साथ अन्दर तक गई क्योंकि कमोड जरा अन्दर था. मुझे बहुत जोर की लगी थी, मैंने बहुत कोशिश की लेकिन झिझक के कारण मामला नहीं सधा तो मैंने नर्स से बाहर जाने के लिए कहा तो उसने मुझसे कहा- ‘आपको इस हालत में छोड़कर कैसे जाऊं, आप कहीं गिर पड़े तो ?’
‘आप बाहर जाइए, माधुरी को भेज दीजिए.’ पर वे मुझे छोड़कर नहीं गई और वहीं से आवाज़ देकर माधुरी को बुलाया. माधुरी ने जब मुझे सम्हाला तब वे बाहर गई. तब भी यूरिन नहीं उतरी तब मैंने माधुरी को भी बाहर जाने के लिए कहा. जब वे भी बाहर निकल गई तब एकदम अकेले होने के बाद बमुश्किल काम बना. कभी-कभी इंसान को अत्यंत विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ता है.
मुंह से खाना-पीना बंद था, नाक में एक पाइप डाला गया था जिसकी मदद से पानी, दूध, फ़लों का रस जैसे पेय पदार्थों से तीन सप्ताह तक शरीर को पोषण देना था. मुंह में रुई भरी हुई थी इसलिए बोलना भी बन्द था. मैं उन दिनों इन्हीं वज़हों से इशारेबाजी में दक्ष हो गया था. आप उस व्यक्ति की मनोदशा की कल्पना कर सकते हैं जिसका बोलना, खाना-पीना बाधित हो लेकिन क्या करोगे मित्र, जब सिर पर आती है तो सब सहना पड़ता है !
अगली सुबह डाक्टर आए और उन्होंने पूछा- ‘कैसे हैं आप ?’ मैंने अपने ठीक होने का इशारा किया. ‘रिकवरी’ तेज थी इसलिए पांचवें दिन अस्पताल से छुट्टी हो गई. अस्पताल के भुगतान के लिए हमारी बिटिया संगीता ने जब बिल देखा तो वह विस्मित रह गई- बाइस हज़ार रुपए मात्र जो अस्पताली खर्च और दवाइयों का मूल्य था. सर्जन डा. दीपक अग्रवाल और उनके सहयोगी डा. विलास नेवास्कर ने कोई फ़ीस नहीं ली थी जबकि हमने अस्पताल में पता किया कि इन दोनों डाक्टरों की फ़ीस नब्बे हजार के आस-पास होती थी. उसी शाम हम लोग डा. दीपक अग्रवाल के चेम्बर में उनसे मिलने गए और सर्जरी की फ़ीस न लेने की वज़ह पूछी तो उन्होंने कहा- ‘आपसे फ़ीस लेने का मेरा हक नहीं बनता.’
‘क्यों ?’
‘आपकी बिटिया और दामाद दोनों डाक्टर हैं, हम आपसे कैसे फ़ीस ले सकते हैं, बस, आप अपना आशीर्वाद दीजिए ?’
सर्जरी के जरिये गाल से निकाले गए टुकड़ों को जांच के लिए लैब भेजा गया ताकि कैंसर का अन्दरूनी विस्तार पता करके उसके अनुरूप रेडियो-थेरेपी या कीमो-थेरेपी उपचार हेतु अगला कदम तय किया जा सके. मेरे कान के नीचे से होठों तक सिलाई इस तरह दिख रही थी जैसे बोरे को सुतली से सिला जाता है, नियमित जांच हो सके और सूख जाने पर टांके खोले जा सकें इसलिए डाक्टर ने एक सप्ताह तक इन्दौर में ही रुकने का निर्देश दिया॰
सर्जरी के बारह दिन बाद डाक्टर ने मेरी जांच की और संतुष्ट दिखे, टांके खोल दिए और मुसकुराते हुए कहा- `द्वारिका प्रसाद जी, आप जैसा मरीज मिलना सौभाग्य की बात है॰'
'ऐसी क्या बात है डाक्टर साहब ?' मैंने पूछा॰
'मैंने आपसे जब भी पूछा कि आप कैसे हो, कैसा 'फील' कर रहे हो, आपने बताया- 'पहले से बेहतर॰' इतनी बड़ी सर्जरी हो गई, आपने एक बार भी दर्द होने की शिकायत नहीं की॰ आम तौर पर मरीज बहुत हल्ला मचाते हैं॰'
'सच बताऊँ डाक्टर साहब॰'
'हाँ, बताइये॰'
'दर्द तो बहुत हुआ लेकिन आपको देखते ही उड़न-छू हो जाता था, आपकी दर्द-निवारक दवा में वह बात नहीं जो आपकी मुस्कान में है॰' मैंने कहा॰
इस बीच पैथालाजी रिपोर्ट आ गई, भेजे गए नमूने निरापद निकले जिससे रेडियो-थेरेपी और कीमो-थेरेपी की ज़रूरत न रही॰ मन प्रसन्न हो गया, लगा, सस्ते में छूटे॰ नाक से पाइप निकाल दिया गया, मुंह से भोजन करने और घर वापस जाने की इजाज़त मिल गई, मुझे लगा जैसे लंबी सज़ा काट रहे कैदी को उसके अच्छे व्यवहार के कारण उसकी सज़ा की अवधि कम करके समय-पूर्व रिहा कर दिया गया हो॰
संगीता के विवाह के लिए कम समय बचा था. आभूषण, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएं बाज़ार से खरीदना, आमन्त्रितों की सूची तैयार करना, निमन्त्रणपत्र तैयार करके वितरित करना, रिश्तेदारों को फ़ोन के माध्यम से मनुहार करना और अपनी तबीयत का ख्याल रखते हुए आवश्यक सावधानी रखना- ये सब एक साथ करना था. समय का भरपूर उपयोग किया जाए इसलिए इन्दौर में जो भी सम्भव था, घूम-घूम कर निबटा लिया. डाक्टर ने फ़ीस नहीं ली, मित्र रमाकांत मिश्रा और छोटे भाई राजकुमार ने इन्दौर रवाना होते समय जो रुपए मुझे दिए थे अतः जेब गर्म थी॰ सब जानते हैं कि यदि जेब भरी हो तो 'सब सम्भव हो जाता, जी नहीं घबराता, जय लक्ष्मी माता.'
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साथ के सब लोग स्वादिष्ट भोजन करते, नास्ता करते और मैं उन्हें ललचाई नज़र से देखता, खुश्बू का अहसास करता और मन ही मन कुढ़ता. खास तौर से जब लोग वहां की मशहूर आलू-कचौड़ी-चटनी खाते तो मेरी जान जल जाती लेकिन मैं अपनी नाक में घुसे पाइप के द्वारा जूस, दूध और दाल का पानी पीने के लिए अभिशप्त था. मैंने अपने जीवन में जितनी तम्बाखू खाई थी उसके मज़े की सज़ा भुगत रहा था. जितने भी तम्बाखू-सिगरेट के शौकीन हैं, वे कैंसर के खतरे से परिचित हैं, वैधानिक चेतावनी पढ़ते भी हैं लेकिन वे भी मेरी तरह भ्रम में रहते हैं कि दूसरों को कैंसर हो सकता है उन्हें नहीं होने वाला. न हो, अच्छा है लेकिन यदि हो गया तो कैंसर की बातें करना अलग बात है और कैंसर को भुगतना अलग बात. जब परिवार में यह बीमारी किसी एक व्यक्ति को होती है तो उसे पूरा परिवार भुगतता है !
बुरी आदतें जोंक की तरह होती हैं, चिपक गई तो फिर अलग नहीं होती॰ मेरे कैंसर और उसकी सर्जरी को देखकर मेरे बड़े भाई साहब और छोटे भाई साहब का दिल भी ज़रूर दहला होगा, उनके मन में भी भय समाया होगा क्योंकि दोनों तम्बाखू वाले गुटखा के प्रबल शौकीन हैं पर मेरी दुर्दशा को इतने करीब से देखने के बावजूद वे इस लत से मुक्त न हो सके॰ इन दोनों ने अलग-अलग अवसरों पर इस नशे से मुक्त न होने का एक अभूतपूर्व तर्क दिया जिसे सुनकर मैं नतमस्तक हो गया- 'एक बार तम्बाखू खाना शुरू कर दिया तो फिर छोड़ना नहीं चाहिए, तुमको इसलिए कैंसर हुआ क्योंकि तुमने तम्बाखू खाना छोड़ दिया॰' चरण-वंदन है !सर्जरी के बारह दिन बाद डाक्टर ने मेरी जांच की और संतुष्ट दिखे, टांके खोल दिए और मुसकुराते हुए कहा- `द्वारिका प्रसाद जी, आप जैसा मरीज मिलना सौभाग्य की बात है॰'
'ऐसी क्या बात है डाक्टर साहब ?' मैंने पूछा॰
'मैंने आपसे जब भी पूछा कि आप कैसे हो, कैसा 'फील' कर रहे हो, आपने बताया- 'पहले से बेहतर॰' इतनी बड़ी सर्जरी हो गई, आपने एक बार भी दर्द होने की शिकायत नहीं की॰ आम तौर पर मरीज बहुत हल्ला मचाते हैं॰'
'सच बताऊँ डाक्टर साहब॰'
'हाँ, बताइये॰'
'दर्द तो बहुत हुआ लेकिन आपको देखते ही उड़न-छू हो जाता था, आपकी दर्द-निवारक दवा में वह बात नहीं जो आपकी मुस्कान में है॰' मैंने कहा॰
इस बीच पैथालाजी रिपोर्ट आ गई, भेजे गए नमूने निरापद निकले जिससे रेडियो-थेरेपी और कीमो-थेरेपी की ज़रूरत न रही॰ मन प्रसन्न हो गया, लगा, सस्ते में छूटे॰ नाक से पाइप निकाल दिया गया, मुंह से भोजन करने और घर वापस जाने की इजाज़त मिल गई, मुझे लगा जैसे लंबी सज़ा काट रहे कैदी को उसके अच्छे व्यवहार के कारण उसकी सज़ा की अवधि कम करके समय-पूर्व रिहा कर दिया गया हो॰
संगीता के विवाह के लिए कम समय बचा था. आभूषण, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएं बाज़ार से खरीदना, आमन्त्रितों की सूची तैयार करना, निमन्त्रणपत्र तैयार करके वितरित करना, रिश्तेदारों को फ़ोन के माध्यम से मनुहार करना और अपनी तबीयत का ख्याल रखते हुए आवश्यक सावधानी रखना- ये सब एक साथ करना था. समय का भरपूर उपयोग किया जाए इसलिए इन्दौर में जो भी सम्भव था, घूम-घूम कर निबटा लिया. डाक्टर ने फ़ीस नहीं ली, मित्र रमाकांत मिश्रा और छोटे भाई राजकुमार ने इन्दौर रवाना होते समय जो रुपए मुझे दिए थे अतः जेब गर्म थी॰ सब जानते हैं कि यदि जेब भरी हो तो 'सब सम्भव हो जाता, जी नहीं घबराता, जय लक्ष्मी माता.'
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प्यारी दुल्हनिया चली
मैं बिलासपुर आ गया, घर आ गया। कैन्सर जैसे गंभीर रोग से लड़-भिड़ कर वापस आ गया लेकिन घर में बैठकर आराम करने का समय मेरे पास नहीं था। हमारे समाज का व्यवहार है कि ऐसे 'युद्ध' से वापस लौटे सिपाही की ख़ैर-मकदम के लिए रिश्तेदार-मित्र-परिचित घर आते हैं, हाल-चाल पूछते हैं तो बीमार को भी 'फील गुड' होता है लेकिन मेरे पास इस तरह का मज़ा उठाने की गुंजाइश न थी। अगले दिन संगीता के विवाह के निमंत्रणपत्र लेकर माधुरी के साथ अपनी स्कूटर में निकल पड़ा। मुझे देखकर सब विस्मित हुए- 'अरे, तुम्हारा तो कैन्सर का आपरेशन हुआ है, न ?'
'हाँ, हो गया।' मैंने उन्हें बताया। वे अपना सिर खुजलाते, मेरे चेहरे पर सर्जरी के निशानों को घूरते,,मुझे अज़ीब निगाहों से देखते और विवाह के कार्यक्रम के बारे में बात करने लगते।
बैंक से बिना रिश्वत दिए ऋण स्वीकृत हो गया। अत्यंत गाढ़े समय पर मिली आर्थिक मदद रमाकांत मिश्रा को वापस हो गई, छोटे भाई राजकुमार ने ढेर सारी मिठाइयाँ बनवाकर पैक करवा दी, बड़े भैया ने भावी दामाद को तिलक करने के लिए नगद राशि दी। मेरी अम्मा उन दिनों रायपुर में बड़े भैया के घर में थी, उनको अपने साथ इंदौर ले जाने के लिए मैंने छोटे भाई को कहा, वे तैयार हो गए लेकिन अम्मा जी के कमजोर स्वास्थ्य के कारण बड़े भैया उन्हें भेजने के लिए सहमत नहीं हुए इसलिए संगीता का विवाह दादी की अनुपस्थिति मेँ ही हुआ।
ढेर सारे डिब्बों और बैग में सामान पैक करके हम लोग इंदौर के लिए ट्रेन से रवाना हुए, अगले दिन इंदौर पहुँच गए। वहाँ एक हॉटल में दोनों पक्ष के परिवारों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। विवाह की पूर्वरात्रि को शहर से बाहर स्थित 'चोखी ढाणी' में नृत्य उत्सव और राजस्थानी भोज आयोजित हुआ। हमारा पूरा परिवार आया, देश-विदेश से मित्रगण विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए पधारे। शाम के धुंधलके में दूल्हे राजा अपने परिवार के साथ हॉटल से नीचे उतरे, वरयात्रा आरम्भ हुई, समीप स्थित मंदिर में देवदर्शन के पश्चात बरात लग गई। न बैंड न बाजा, न आतिशबाज़ी और न ही नाच-गाना, एकदम 'सिंपल'। जब युगल एक दूसरे को पुष्पहार पहना रहे थे, मैं कुछ दूर खड़ा उस प्रक्रिया को प्यार से निहार रहा था, मेरा मन प्रफुल्लित था लेकिन आँखें सजल थी। इस प्रकार हमारी बिटिया संगीता का विवाह संपन्न हो गया. सब प्रसन्न थे लेकिन मैं और माधुरी एक-दूसरे को देखकर उदास हो जाते, हमें मालूम था कि कल सुबह हमारी बेटी पराई हो जाएगी, उसके बगैर हम कैसे रह पाएंगे ?
अगली सुबह विदाई हो गई, मन उदास था और शरीर थकान से टूट रहा था। कुछ प्रिय-अप्रिय घटनाएं भी हो गई लेकिन शादी-ब्याह में कुछ-न-कुछ ऊंचा-नीचा हो ही जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से भिड़ने का अभ्यास हो गया था इसलिए अजीब न लगा बल्कि ऐसा लगा जैसे भोजन करते समय अन्जाने में तेज हरी मिर्च का टुकड़ा चबा जाने पर आँखों से आंसू बह निकले हों। खैर, सब चलता है।
परिवारजनों और मित्रों ने जो 'व्यवहार' दिया था, वह पूरी राशि लेकर मैं अपने दामाद केदारनाथ के कमरे में गया और उनसे कहा- 'ये रखिए, आप घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे कलर टीवी, वाशिंग मशीन, आलमारी, पलंग-गद्दे आदि, या जो भी आवश्यक लगे, खरीद लीजिएगा।'
'इसे आप रखिए, इसकी ज़रुरत नहीं है।' केदारनाथ ने कहा.
'क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, हम आपको सहृदय दे रहे हैं।'
'एक काम कीजिए, मैं इसमें से दस हजार ले लेता हूँ, आलमारी के लिए। बाकी चीजें जब हम कमाएंगे तो खरीद लेंगे।' केदारनाथ ने कहा और शेष रुपये वापस कर दिए।
बेटी का पिता होना बेहद सुखद होता है लेकिन उसे विदा करना उतना ही दुखद होता है। 'उसकी ससुराल कैसी होगी', 'नए परिवेश में वह खुद को कैसे ढालेगी' जैसे सवाल माँ-बाप के दिमाग में हर पल टकराते हैं और अनुत्तरित ही वापस लौट जाते हैं। हर पल प्रतीक्षा बनी रहती है कि कब बिटिया का फोन आएगा और वह कहेगी- 'मैं अच्छी हूँ मम्मी, ....मज़े में हूँ पापा।' आम तौर पर हिन्दुस्तानी लड़कियां ससुराल में तकलीफ होने पर भी अपने माता-पिता से सच नहीं बताती ताकि वे दुखी न हों इसलिए कई बार वैसा संदेह भी बना रहता है, 'क्या पता, सच बता रही है या नहीं !'
विवाह कार्यक्रम के पश्चात इंदौर से लौटते समय जो बेचैनी मेरे मन में थी, वह अवर्णनीय है। ऐसा लगे- ये क्या हो गया ? क्या हमारी बेटी हम पर बोझ थी कि हमने इतनी हड़बड़ी में उसे ब्याह दिया ? क्या हमें उसे और अधिक पढ़ने का अवसर नहीं देना था ? इतनी पढ़ी-लिखी लड़की छोटी-सी बस्ती में ब्याह कर जा रही है, उसे वहाँ कैसा लगेगा ? आदि अनेक प्रश्न बार-बार मस्तिष्क में घुमड़ते और मुझे डांटते। पूरी राह मेरे अन्तःमन में के॰एल॰ सहगल का गाया गीत गूँजता रहा- 'बाबुल मोरा नैहर छूटहि जाए...चार कहार मोरी डोलिया उठाए, मोरा अपना बेगाना हुआ जाए....बाबुल मोरा नैहर छूटहि जाए...'।
बिलासपुर पहुँचकर हम लोग अपने-अपने काम से लग गए, विषाद कम होता गया, समय सब कुछ भुला देता है। एक सुबह संगीता की बहुत याद आई। जो याद आया उसे लिपिबद्ध कर लिया... वह इस तरह था-
'तू क्यों चली गई ?
खिलखिलाता बचपन
मुस्कुराती चितवन
तोड़ नेह का बंधन
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
आँगन की छम-छम
चौके की सिहरन
पूरे घर की धड़कन
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
मेज पर करती पढ़ाई
घर में सबसे लड़ाई
लेकर सबकी बड़ाई
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
सहमी सी मेज
सिसकती कुर्सी
सुबकती किताबें
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
कोने से घूरती
धूल भरी सायकल
भौंचक मोपेड
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
पुरानी चप्पलें
तह लगे कपड़े
चुप आलमारियाँ
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
वो उछलकूद
वो गहमागहमी
वो रूठना मनाना
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
हर बात पे गुस्सा
हर बात से आहत
हर बात की चिन्ता
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
बहना से भिड़ंत
लड़ाई-झगड़े अनंत
इस तरह करके अंत
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
ढूंढती सुबह
बेचैन दोपहर
सवालिया शाम
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
खिड़कियाँ सिसकती
दरवाजे चिहुंकते
परदे फड़कते
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
दरकते फर्श
सूनी दीवारें
उदास गलियारे
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
बेचैन हवाएँ
वीरान सा घर
सिसकता आँगन
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
मुरझाई पत्तियाँ
उदास कलियाँ
हैरान अमियाँ
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
बग़ीचे में बढ़ी तुलसी
मोंगरे की सुगंध सी
फागुन की बयार सी
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
पापा के सखा
मम्मी की सखियाँ
सबकी भीगी अँखियाँ
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
तेरा आना पुरवाई जैसा
तेरा रहना शहनाई जैसा
तेरा जाना रुसवाई जैसा
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
अपने भाई को देख
सूनी कलाई को देख
उसकी रुलाई को देख
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
क्या बस इतना ही साथ
स्वप्न सा छोटा सा साथ
इससे तो न होता साथ
तू क्यों चली गई ?'
तू क्यों चली गई ?'
अब क्या रह गया इस घर में
मम्मी-पापा के जीवन में
सब कुछ सूना एक पल में
तू क्यों चली गई ?'
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सपना सलोना था
12-5-2003
प्रिय पापा और मम्मी,
आप लोगों के आशीर्वाद और अनथक सतत प्रयास से अंततः ये हमारा स्वप्न पूर्ण हुआ और आपकी आलसी बेटी एक उपाधि-प्राप्त चिकित्सक बन गई है।
आगे भी यही प्रयास रहेगा कि इतने परिश्रम से जो कार्य की उत्कृष्टता प्राप्त की है उसका फायदा अपने पास आने वाले हर मरीज़ को दूँ। ये मेरी डिग्री पूरी तरह से आप लोगों को समर्पित है।
जैसे मैं और कम्मू एक रास्ते पर चल पड़े हैं, संज्ञा भी जल्दी ही एक राह पकड़ लेगी। अपना परिवार एक मिसाल बनने की राह पर है, आमीन ! !
आपकी बेटी
संगीता
'बिलासपुर
16-9-1999
प्रिय कम्मू,
नए परिवेश में एक आल्हादकारी भविष्य के लिए मिले सुअवसर की बधाई। निश्चिन्त और सुरक्षित व्यवस्था से दूर, एक स्वतंत्र तथा जिम्मेदार युग में तुमने प्रवेश किया है। मैं तुम्हारी मानसिक स्थिति का अनुमान लगा सकता हूँ, तुम्हारे रोमांच और उत्सुकता की कल्पना मुझे है। इसे समग्र रूप से जीना, अपने व्यक्तित्व को विकसित करना और समय का सुनियोजित उपयोग करना- ये सब कैसे होगा- इसे तुम देखो, समझो और करो। तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हें ऐसे संस्थान में पढ़ने का, स्वयं को विकसित करने का अवसर मिला जिसमें देश के सर्वश्रेष्ठ युवा मिलजुल कर अपने भविष्य की कहानी लिख रहे हैं।
तुमने मुझसे चर्चा में कहा था कि इन श्रेष्ठ छात्रों के साथ तुम्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक है लेकिन यदि गौर करो तो वास्तविक प्रतिस्पर्धा तुम्हारी स्वयं से है। प्रति-क्षण, तुम बीते क्षण के मुक़ाबले अब कैसे हो ? बताओ, मुख्य प्रतिस्पर्धी कौन है ? निश्चयतः व्यवस्थित परिश्रम के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। तुम योग्य हो और समझदार भी। हम सब, तुम पर, तुम्हारी प्रतिभा पर भरोसा करते हैं।
तुमने मुझसे चर्चा में कहा था कि इन श्रेष्ठ छात्रों के साथ तुम्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक है लेकिन यदि गौर करो तो वास्तविक प्रतिस्पर्धा तुम्हारी स्वयं से है। प्रति-क्षण, तुम बीते क्षण के मुक़ाबले अब कैसे हो ? बताओ, मुख्य प्रतिस्पर्धी कौन है ? निश्चयतः व्यवस्थित परिश्रम के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। तुम योग्य हो और समझदार भी। हम सब, तुम पर, तुम्हारी प्रतिभा पर भरोसा करते हैं।
मम्मी तुम्हें खूब याद करती है, कभी बहुत खुश हो जाती है, कभी आँखें गीली हो जाती हैं, आखिर माँ हैं। संज्ञा की पढ़ाई तेजी से शुरू हो गई है, आसार अच्छे नज़र आते हैं। अपना ख्याल रखना।
पापा॰'
त्रिची इंजीनियरिंग कालेज तमिलनाडु में है जहां अंग्रेज़ी और तमिल भाषा का बोलबाला है। तमिलनाडु की अँग्रेजी भी तमिल भाषा के लहज़े से प्रभावित रहती है इसलिए कुंतल को शुरुआती दिनों में भाषा संबंधी असुविधा रही जिसके कारण उन्हें वहाँ के माहौल से स्वयं को अनुकूलित करना कठिन लगा लेकिन समय बीतता गया और कुंतल बी॰टेक॰ के अंतिम सेमेस्टर में पहुँच गए। उन्हीं दिनों देश के अनेक प्रतिष्ठित व्यापारिक संस्थान कालेज में 'केम्पस इंटरव्यू' के लिए पहुंचे। कुंतल ने पुणे के संस्थान 'टेल्को आटोमोबाइल्स' के लिए साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार पूरा हो जाने के बाद कुंतल ने उठते-उठते उनसे कहा- 'मैं आपकी कंपनी में केवल 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' विभाग में ही काम करूंगा, अन्य कार्यों में मेरी रुचि नहीं है।'
'हम ऐसा वादा नहीं कर सकते।' उन्होंने उत्तर दिया।
'तो फिर, यदि आपने मेरा चयन किया हो तो बेहतर है यह 'जाब' किसी दूसरे को दे दीजिए।'
'हम ऐसा कर सकते हैं कि 'प्रोबेशन पीरियड' में आपका काम देखेंगे, अगर उचित समझ में आया तो 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' दे देंगे।'
'मुझे मंजूर है।' कुंतल ने सहमति दी। इस प्रकार कुंतल को अंतिम सेमेस्टर के दौरान 25 फरवरी 2003 को 'आफ़र लेटर' आ गया। नियुक्ति की शर्त यह थी कि 'ग्रेजुएट डिग्री' न्यूनतम 60% अंक लेकर उत्तीर्ण होना अनिवार्य था जबकि कुंतल ने 82% अंक हासिल किए। इसी कुंतल को बिलासपुर के हिन्दी माध्यम स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' के प्राचार्य ने परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका को कोरा छोड़ देने और उस पर आचार्य जी का कार्टून बनाने के अपराध में कड़ी चेतावनी दी थी. पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह कुंतल की जब आँख खुली तब उसने वह हासिल किया जो सच में किसी अजूबे से कम न था।
26 मार्च 2003 को त्रिची से कुंतल ने एक पत्र हमें भेजा, उसके पूर्वार्द्ध अंश को आप पढिए :
'डीयर पापा, मम्मी और दीदी,
मैं यहाँ एकदम ठीक हूँ और आप लोग भी मज़े में होंगे ऐसी कामना करता हूँ।
अब बस, कालेज के कुछ आखिरी दिन बचे हैं। आज भी उस दिन की यादें एकदम सजीव हैं जिस दिन घर से निकला था यहाँ आने के लिए। पता ही नहीं चला कब समय निकल गया। चार साल तो बस यूं ही निकल गए। इन चार सालों में बहुत कुछ सीखा, कुछ पाया, कुछ खोया, अच्छा समय देखा। दोस्त बनाए, तमिल नहीं सीख पाया। काम किया, सोया, ज़्यादा पढ़ाई नहीं की पर एक अच्छी नौकरी लग गई। English improve हो गई, हिन्दी खराब हो गई, और भी बहुत कुछ ! बिना उम्मीद किए एक मौका भी मिला, इन सब चीजों से ऊपर उठकर ( या फिर नीचे जाकर) अपने आपको पहचानने का। एक गुरु, जिन्होंने जीवन को एक नई दिशा दी है। समझ में आया कि अभी तक जो कुछ भी कर रहा था- पता नहीं क्यों कर रहा था ? अभी भी लक्ष्य एकदम स्पष्ट नहीं है, पर atleast, एक दिशा है। मार्ग पर चलना अभी भी कठिन है। ढेर सारे दुश्मन हैं, बाहर नहीं, अंदर हैं। जब तक खुद पर काबू नहीं कर पाता, लक्ष्य तक पहुँचना असंभव रहेगा।
आप लोगों को अज़ीब लग रहा होगा की छोटा सा कम्मू कैसी-कैसी बातें कर रहा है पर पता नहीं, कुछ तो परिवर्तन आया है। बाहर से शायद अभी भी वैसा दिखूँ, पर अंदर ही अंदर, जीवन के लिए पूरा दृष्टिकोण ही बदल गया है। शुरू-शुरू में बहुत कठिनाई हुई, अभी भी होती है क्योंकि आस-पास रहनेवाले लोग इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाते पर धीर-धीरे इन चीजों से निपटना भी आने लगा है। एक बात तो है, जीवन पहले जैसा नहीं रहा। अब यह कहीं ज़्यादा रोमांचक, अर्थपूर्ण और मज़ेदार होता जा रहा है।.....
कंपनी से offer/joining letter आ गया है। उसकी जेरोक्स कापी भेज रहा हूँ, उसमें ढेर सारी बातें लिखी हैं। पता नहीं क्या मिलेगा...कितना मिलेगा ? पर, अनुमानतः दस-बारह हजार के आसपास हाथ में आना चाहिए। खैर, वहाँ जाकर ही पता चलेगा कि क्या होने वाला है। I am absolutely ready and very excited. पर उसके पहले घर में बीतनेवाली छुट्टियों का लालच आ रहा है। मैं इस बार भी घर से कहीं नहीं निकलने वाला। उम्मीद है आप लोग मुझे ज़्यादा नहीं हड़काएंगे।.....
अब पत्र बंद करता हूँ। ढेर सारा प्यार।
आपका - कम्मू '
दद्दाजी के निधन के पश्चात अम्माजी अकेली पड़ गई। दद्दाजी उन्हें आदतन डांटते रहते थे, वे उनकी डांट की इतनी आदी हो गई थी कि उन पर उसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। दद्दाजी कहा करते थे- 'ये मेरे ज़िन्दा रहते, मेरे सामने चली जाएँ तो अच्छा है' लेकिन ऐसा होते-होते रह गया। इस धरती पर आना या वापस जाना किसी के हाथ में तो है नहीं!
हुआ यह कि सन १९९६ में अम्माजी को एक शाम 'माइनर हार्ट अटैक' आया, उन्हें शासकीय अस्पताल में भरती किया गया। आई॰सी॰सी॰यू॰ में उन्हें सघन देखभाल और चिकित्सा के लिए रखा गया। वहाँ के 'मेडिकल स्पेशलिस्ट' डा॰एस॰के॰निगम की देखरेख में इलाज़ चल रहा था। दूसरे दिन की बात है, एक बढ़ई आई॰सी॰यू॰ में आया और रोशनदान की 'रिपेयरिंग' करने लगा। हथौड़े से चल रही तोड़फोड़ के कारण तेज आवाज हो रही थी, इस कारण अम्माजी को सोने में व्यवधान हो रहा था। मैंने बढ़ई को टोका और काम करने से रोका। बढ़ई चला गया और थोड़ी देर बाद डाक्टर को अपने साथ ले आया। डाक्टर मुझ पर भड़क गए और कहा- 'आपने बढ़ई को काम करने से क्यों रोका ?'
'बहुत तेज आवाज़ के कारण मरीज को तकलीफ हो रही थी, इसलिए।' मैंने जवाब दिया।'आपको मालूम है कि बढ़ई मिलना कितना कठिन है, बड़ी मुश्किल से यह आया है तो आपने इसे भगा दिया।'
'मरीज की तकलीफ भी तो देखिए, डाक्टर साहब!'
'मरीज तो अभी ठीक है, क्या हुआ है, आप हमारे काम में रोक-टोक मत करें, मरीज को कुछ होगा तो हम देखेंगे।' डाक्टर ने मुझे धमकाया। मुझे उन पर इतना गुस्सा आया कि मैं क्या बताऊँ लेकिन गुस्से को पी गया क्योंकि वह शहर का इकलौता अस्पताल था जहां अम्माजी का उपचार हो सकता था। बढ़ई का काम फिर शुरू हो गया। मुझे लग रहा था, जैसे बढ़ई नहीं, डाक्टर खुद मेरे सीने में खील ठोक रहा हो॰ क्या करोगे, जिसने भी भारतवर्ष में जन्म लिया है, सबको इसी तरह की परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है और सब की भलाई इसी में रहती है कि वह चुप रहे !
खैर, किसी प्रकार बढ़ई जी का काम पूरा हुआ और वे चले गए। उस रात, छोटे भाई राजकुमार अम्माजी के पास सोए। अगली सुबह लगभग आठ बजे जब मैं कमरे में पहुंचा तो अम्माजी और राजकुमार दोनों गहरी निद्रा में लीन थे। मैंने अम्माजी को जगाने के लिए आवाज़ दी लेकिन वे नहीं जागी, उन्हें हिलाया लेकिन वे नहीं हिली तो मैंने नर्स को बुलाया। नर्स ने उनकी नब्ज चेक की, नब्ज गायब, धड़कन सुनी तो उसे कुछ समझ में न आया तो फटाफट ब्लड-प्रेशर नापा और घबरा कर बोली- 'सब कुछ गड़बड़ है, डाक्टर साहब ही कुछ बताएंगे लेकिन उनको आने में अभी एक घंटे की देर है वे नौ बजे के बाद अस्पताल आते हैं।' मुझे ऐसा लगा कि अम्माजी शांत हो चुकी हैं फिर भी मैंने राजकुमार से कहा- 'डाक्टर के क्वार्टर में जाओ और उन्हें तुरंत लेकर आओ।' राजकुमार डाक्टर को लेने चले गए और मैं अम्माजी के निश्चेष्ट पड़े शरीर को एकटक देखता खड़ा रहा। अचानक मुझे उनके एक घुटने में हल्की सी हरकत दिखी, उसी समय डाक्टर आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'इन्हें 'हाइपो-ग्लायसीमिया' हो गया है, नब्ज और धड़कन नहीं के बराबर है, सांस भी नहीं चल रही है। जब मैंने डाक्टर को घुटने में हरकत होने की बात बताई तो वे बोले- 'कोशिश करता हूँ।' उन्होंने नर्स को एक गिलास पानी में शक्कर घोलकर तुरंत लाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में नर्स दौड़ती हुई पानी लेकर आई। डाक्टर ने पानी पिलाने की कोशिश की लेकिन अम्माजी के दाँत एक दूसरे से इस तरह भिंचे हुए थे कि पानी को मुंह में डालना संभव न था। डाक्टर ने ज़ोर लगाकर किसी प्रकार जबड़े को इतना खोला कि पानी जाने की जगह बन गई। कुछ पानी अंदर चला गया, कुछ बाहर बह गया। हम लोग सांस रोके वह सब देखते रहे। दो मिनट बाद नब्ज, सांस और धड़कन वापस आने लगी, दस मिनट बाद उनके शरीर में हरकत होने लगी, उन्होंने आँखें खोल दी। चमत्कार हो गया। कल दोपहर को वह डाक्टर मुझे दैत्य लग रहा था, आज वह देवता-तुल्य लगने लगा।
इस प्रकार दद्दाजी की अम्माजी को अपने सामने विदा करने की इच्छा फलीभूत न हो पाई और इस घटना के चार वर्ष बाद दद्दाजी स्वयं विदा हो गए और अम्माजी को अकेला छोड़ गए। दद्दाजी के महाप्रयाण के बाद अम्माजी चार वर्ष और जीवित रही, 80+ की आयु, हाई-ब्लड प्रेशर, हाई-डायबिटीज़, संक्रमित किडनी, बेतरह कमर का दर्द, बेकार दोनों घुटने, कमजोर आँखें और हर तरह से निर्बल शरीर ओढ़े अम्माजी ने जिस तरह अपना वैधव्य बिताया, मैं आपको क्या बताऊँ ! नौ बच्चों की माँ पेड़ से गिरे सूखे पत्ते की तरह इधर से उधर भटकती रही, उपेक्षित जीवन जीती रही, न जाने क्यों जीती रही ? मुझे इस बात का अफसोस होता था कि अम्माजी 1996 की उस सुबह क्यों पुनर्जीवित हो गई ?
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इस बीच कुन्तल की पढ़ाई पूरी हो गई, त्रिची से वापस लौटना था. कुन्तल ने मुझे सूचित किया वे मुझे कोयम्बत्तुर में मिलेंगे, वहां एक दिन रूककर त्रिची जाएंगे फिर सब सामान लेकर वापस बिलासपुर. निश्चित तिथि पर मैं कोयम्बत्तुर पहुँच गया. वहां से हम लोग कोई ३५ किलोमीटर दूर वेलियंगिरी पर्वत श्रंखला की तलहटी पर बसे एक आश्रम में पहुंचे. अत्यंत मनोरम वातावरण, 'ध्यान लिंग' का भव्य मंदिर, शांत माहौल वाली यह जगह मनमोहक लगी। वहाँ से हम दोनों सड़क परिवहन से त्रिची के लिए रवाना हुए। बस में कुंतल ने मुझसे कहा- 'पापा, मैं नौकरी नहीं करूंगा।'
'अरे, फिर क्या, व्यापार करोगे ?' मैंने पूछा।'नहीं।'
'तो ?'
'मैंने कुछ और सोचा है।'
'क्या ?'
'पापा, इस दौरान मैंने देखा कि हमारे आसपास के लोग बहुत दुखी हैं, कष्टों से जूझ रहे हैं, अपने जीवन को सही ढंग से नहीं जी पा रहे हैं।'
'यह सच है, मैं भी ऐसा ही देख रहा हूँ।'
'मैं इस दिशा में कुछ करना चाहता हूँ।'
'क्या करना चाहते हो ?'
'मुझे एक गुरु मिल गए हैं, सद्गुरु जग्गी वासुदेव। मैं उनके साथ काम करना चाहता हूँ।'
'क्या काम ?'
'लोगों को योग-साधना से जोड़ने का। मैंने स्वयं गौर किया, कई ढंग से समझने की कोशिश की तब इस निर्णय पर पहुंचा कि केवल अपने लिए जीने का कोई अर्थ नहीं, मुझे कष्टों से जूझ रहे लोगों के लिए जनजागरण करना चाहिए। योग को अपनाकर वे अपने मन और शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सद्गुरु अद्भुत व्यक्ति हैं, मैं उनके साथ इसी काम को करना चाहता हूँ।' कुंतल ने अपना निर्णय बताया। मैं चुप रह गया। ऐसा समझिए जैसे किसी अनजान सन्नाटे ने मुझे अपने आगोश में समेट लिया हो। हमारी बस तेजी से आगे बढ़ रही थी, मैंने बाहर की ओर देखा, हरे-भरे खेतों की फस्लें पीछे की ओर भागती जा रही थी, सड़क के किनारे लगे ताड़ और नारियल के वृक्ष भी जैसे उल्टे पैर दौड़ रहे थे।
हवा के झोकें आ रहे थे और मैं बस में बैठ-बैठे न जाने कब सो गया। मैंने अनुभव किया है कि जब मेरा दिमाग सुन्न होने लगता है तो नींद मेरी मदद के लिए उपस्थित हो जाती है। त्रिची पहुंचने के बाद हम एक हॉटल में पहुँचे। मेरा दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि कुंतल के इस निर्णय को किन शब्दों में उनकी माँ को बताऊँ ? कैसे संगीता और संज्ञा को बताऊँ ? उस बात को अकेले सह लेने की ताकत मुझमें न थी इसलिए मैंने संगीता को ही बताना तय किया। उन दिनों संगीता इंदौर में रहती थी, मैंने फोन पर जब सब जानकारी दी, वह भी आश्चर्यचकित रह गई। संगीता ने कहा- 'आने दो कम्मू को वापस, फिर बात करेंगे।'
हॉस्टल पहुँच कर सारा सामान पैक किया और कुंतल के विभागाध्यक्ष से मिलने के लिए मैं कुंतल के साथ 'इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेन्ट' पहुँचा। विभाग-प्रमुख मुझसे बेहद गर्मजोशी से मिले और कहा- 'मिस्टर अग्रवाल, यू शेल बी प्राउड ऑफ योर सन, ही इज़ अ मेग्नीफिसेंट एंड डीसेंट ब्वाय।' मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और त्रिची शहर को प्रणाम करके बिलासपुर अपने घर के लिए रवाना हो गया।
डेढ़ दिन का त्रिची से बिलासपुर तक का रेल-सफर एकदम चुप रहा। कभी कुंतल मुझे हौले से देखकर मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता, कभी मैं उसे देखकर कुछ समझने की। ढेर सारी पुरानी यादें दिमाग में घुमड़ने लगी, बचपन का मोटा-ताज़ा कम्मू, बालों में दो चोटी वाला कम्मू, सर्कस में शेर की दहाड़ सुनकर 'पापा, सू-सू लगी है'- कहने वाला कम्मू, सबका प्यारा-दुलारा कम्मू आज कितना बड़ा हो गया ! इतना बड़ा हो गया कि उसे समझना तक मुश्किल हो गया।
कुंतल घर आए, कुल उन्नीस दिन हमारे साथ रहे। सबसे खुलकर बातें की, सबकी बातें धैर्य से सुनी। कठोर और कड़वी बातों को भी सहज भाव से लिया। अत्यंत धीमे स्वर में अपनी बात बताने और समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन उनकी बात किसी को समझ में नहीं आ रही थी। असल में, उनकी बातों के सूत्र कठिन थे, प्रचलित परिपाटी से भिन्न थे इसलिए सहज स्वीकार नहीं हो पा रहे थे। मुझे ऐसा भी लगा कि हम सबके कुछ प्रश्नों के उत्तर जब उन्हें नहीं सूझते थे तो गले से थूक निगल कर चुप हो जाते और मौन साध लेते थे। यह बताना कठिन है कि हम उन्हें नहीं समझा पा रहे थे या हम उन्हें समझ नहीं रहे थे, फिर भी हम सब आश्वस्त थे कि देर-सबेर वे हमारी भावनाओं को अवश्य समझेंगे और अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगे। हमारी चर्चा के अनेक दौर चले, उनकी माँ ने रात-रात भर जागकर उनसे बात की, उनको समझाने की कोशिश की लेकिन कुंतल निरंतर प्रबल होते गए और उनके उत्साह के सामने हम लोग कमजोर पड़ते गए।
अब, माधुरी और मैं अपना मन बनाने में लगे थे लेकिन सांसारिक मनुष्य या तो अतीत में जीता है या भविष्य की योजनाओं में, वर्तमान तो उसकी परिधि से बाहर रहता है इसलिए अनेक विचार-कुविचार दिमाग में आते- जैसे, 'क्या हो गया है इस लड़के को ?' 'इसे सम्मोहित कर लिया गया है क्या ?' 'इसका दिमाग बहक गया है क्या ?' 'इसकी तबियत ठीक नहीं है क्या ?' 'इसे त्रिची पढ़ने के लिए भेजना क्या हमारा गलत निर्णय था ?' 'यह कोयम्बत्तूर के आश्रम में क्यों गया और वहां कैसे अरझ गया ?' 'इसके गुरु का नाम हमने आज तक नहीं सुना, यह कहीं गलत-सलत बाबा जी के चक्कर में तो नहीं पड़ गया ?' 'इसका भविष्य क्या होगा ?' 'क्या इसको परिवार की जिम्मेदारियां समझ में नहीं आती ?'- इस प्रकार के अनंत अनुत्तरित प्रश्न उमड़ते थे। सच बताऊँ, हम लोगों की बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया था। उसी समय कुंतल अपनी बड़ी बहन संगीता से मिलने इंदौर गए, साथ में संज्ञा भी गई। संगीता, संज्ञा और हमारे दामाद केदार जी के साथ उनकी सुदीर्घ वार्ता हुई। संगीता ने मुझे फोन किया और बताया- 'कुंतल निर्णय कर चुका है, उसे कुछ समझाना असंभव है, मेरे ख्याल से उसे रोकना उचित नहीं होगा, जाने दीजिए।' संगीता के निष्कर्ष से मुझे एक बोध-कथा का स्मरण हो आया- भगवान महावीर एक राजपुत्र थे। किशोरावस्था में भी वे सामान्यतया मौन रहा करते थे। राज्य की गतिविधियों और आमोद-प्रमोद में उनकी रुचि न थी। उनके इस व्यवहार से उनके माता-पिता चिन्तित रहा करते थे क्योंकि महावीर उनके वरिष्ठ पुत्र थे, आगे चलकर राज-काज का काम उन्हें ही सम्हालना था। अचानक पिता की मृत्यु हो गई तब माँ ने राज्य की बागडोर सम्हालने के लिए महावीर से कहा तो वे बोले- 'मेरी राज-काज में रुचि नहीं है, छोटे भाई को राजा बना दीजिए, मैं तपस्या के लिए वन जाना चाहता हूँ, मुझे अनुमति दीजिए।' माँ ने महावीर के स्थान पर छोटे भाई का राजतिलक कर दिया लेकिन महावीर को वन-गमन की अनुमति नहीं दी। महावीर चुप रहे और माँ की बात मान गए लेकिन वे हर समय अपने कक्ष में सिमटे रहते और नितांत एकाकी जीवन बिताने लगे। कई वर्ष बीत गए, महावीर यथावत रहे। जब उनकी माँ ने देखा कि महावीर के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं है तो एक दिन उनसे कहा- 'पुत्र, हमें लगता है कि हमने तुम्हें यहाँ निरर्थक रोक रखा है, तुम वन प्रस्थान कर सकते हो।'
'माँ, मैं तो कब का जा चुका !' महावीर ने उत्तर दिया।
कुंतल इंदौर से वापस आ गए। अब मेरे लिए केवल इतनी उत्सुकता शेष रह गई थी कि कुंतल के सन्यास-संकल्प में कितनी मज़बूती है ! शायद उनका भी मन तनिक डगमगाया इसलिए उन्होंने सद्गुरु को 'मेल' से संदेश भेजा, अपनी भावना बताई और मार्गदर्शन माँगा। उत्तर में सद्गुरु ने उन्हें आश्रम पहुँचने के लिए कहा और अपने पास बुला लिया। कुंतल ने सद्गुरु की बात मानी, हमारी नहीं। इस प्रकार कुंतल के द्वारा लिया गया निर्णय पुष्ट हो गया और उनका आश्रम में प्रविष्ट होना तय हो गया। हमारे पास उन्हें अनुमति देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहा। कुंतल ने हमसे कहा- 'इस राह में जाने वाले आम तौर से अपने परिवार को बिना बताए निकल जाते हैं, उनका पता भी नहीं लगता क्योंकि वे जानते हैं कि परिवार के लोग इसके लिए कभी सहमत नहीं होंगे लेकिन मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया। मुझे आप लोगों पर भरोसा है कि आप मेरी बात समझेंगे और इस राह पर आगे बढ्ने की सहर्ष अनुमति देंगे।' हम समझ गए कि उन्हें गुरु मिल गए, वैराग्य घट चुका, संसारिक मोह छूट गया।
ओशो ने पतंजलि योग सूत्र में कहा है - 'सद्गुरु एक 'केटलिटिक एजेंट' है; वह कुछ करता नहीं फिर भी उसके द्वारा बहुत कुछ होता है। वह कर्ता नहीं होता बल्कि एक मौजूदगी होता है जिसके आसपास चीजें घटित होती हैं। ....मात्र उसकी मौजूदगी- यदि तुम प्रवेश करने दो उसकी मौजूदगी को। यह शिष्य पर निर्भर करता है और शिष्य होने का अर्थ यही है कि तुम प्रवेश करने देते हो, कि तुम सहयोग करते हो, कि तुम ग्रहणशील होते हो, कि अब तुम कोई बाधा खड़ी नहीं करते मौजूदगी को प्रवेश करने में। गुरु स्वयं कुछ नहीं करता है, उसकी मौजूदगी ही काम करती है- कुछ होने लगता है।....गुरु और कुछ नहीं है सिवाय एक गर्भ के; उसके द्वारा तुम दोबारा जन्म लेते हो।'
१९ जून २००४ की शाम हमने उन्हें आदर के साथ आसन पर बिठाया, उनका तिलक किया, नारियल और पुष्प भेंट किए और उन्हें जाने की अनुमति देते हुए उन्हें छोड़ने रेलवे स्टेशन गए, उन्हें विदा किया और जाते-जाते कहा- 'हम दोनों इस बात पर विश्वास रखते हैं कि मनुष्य जिस काम को दिल से करता है, उसे ही अच्छे से करता है। तुम जो करना चाहते हो करो, अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ करना, जाओ बेटे, हम तुम्हारे साथ हैं। कभी भी हमारी ज़रूरत हो, हमें ज़रूर याद करना।'
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एक और प्रस्थान
कुन्तल के आश्रम चले जाने के बाद जो सूनापन हमारे परिवार में पसरा उसे किन शब्दों में बाँधा जाए ! कुन्तल की माँ टूट सी गई। हर समय चुप रहने लगी, वे कई रात आंसुओं से भीगती हुई जागती रहती. उनकी बेचैनी को मैं भला कैसे समझ पाता ? मैंने कुंतल को अपनी कोख में रखा नहीं था, मैंने उन्हें अपना दूध पिलाया नहीं था, मैंने उनकी तरह 'होनेवाली बहू' की पायल की छम-छम सुनने की आशा नहीं की थी, मैंने पोते-पोतियों की उनकी जैसी कल्पना और आनंदानुभूति नहीं की थी। वे मुझसे नाराज़ भी रहने लगी, उन्हें बहुत समय तक मुझसे शिकायत बनी रही कि कुन्तल को विदा करने का निर्णय अचानक मैंने खुद क्यों ले लिया, उनको विश्वास में क्यों नहीं लिया ? उन्हें लगता था कि कुन्तल यदि कुछ दिन और रोक लिए जाते तो शायद रुक जाते। उन्नीस दिनों के प्रवास में कुन्तल से हम सबका जो भी वार्तालाप हुआ और उनकी जो भाव-भंगिमा दिखी, मुझे उनको शीघ्र मुक्त कर देना उचित लगा क्योकि वे वैराग्य के भावातिरेक से परिपूर्ण थे। उन्हें और अधिक रोकना उनके साथ अन्याय हो जाता और जैसे-जैसे समय बीतता, हम सब और अधिक तनावग्रस्त होते जाते।यद्यपि मैं उस निर्णय के पक्ष में नहीं था, बहुत क्षुब्ध था, लेकिन यह मैं जानता था कि यह कठिन निर्णय मुझे ही लेना होगा, उनकी माँ उतना कठिन निर्णय नहीं ले पाएगी इसीलिए अचानक ही मैंने उनका विदाई कार्यक्रम बनाया और उन्हें सहज विधि से विदा कर दिया।
कम्मू का इस तरह परिवार से विमुख हो जाना हम सबको अखर गया। उन्होंने अपने जीवन की नई राह ऐसी विचित्र सी चुनी थी कि हमारा भरोसा नहीं बन पा रहा था कि वे आश्रम के जीवन की कठिन डगर पर चल पाएंगे या नहीं ! कहीं बीच राह से वापस लौट आए तो न यहाँ के रहेंगे, न वहाँ के ! प्रतिदिन मेरा मन ऐसे उपायों की तलाश में लगा रहता जिसके माध्यम से उन्हें घर-परिवार में वापस बुलाया जा सके।
एक रेलयात्रा के दौरान अकेले बैठे-बैठे मेरे मन में सारा घटनाक्रम घुमड़ता रहा और मुझे लगा, 'सद्गुरु ने मेरे पुत्र का 'अपहरण' कर लिया।' उस समय मैं इस कदर 'वाइल्ड' हो गया कि मेरे सिर पर खून सवार हो गया और सद्गुरु को राह से हटा देने तक की बात तक मन में आई। मेरे जैसा संकोची मनुष्य जो जरा सा खून देखकर विचलित हो जाता है, वह किसी का खून करने-कराने की बात सोच रहा था। आप अनुमान लगाइए, मैं कितना दग्ध था ? उन क्षणों में तात्कालीन भावावेश के वशीभूत होकर मुझसे वह वैचारिक जघन्य अपराध हो गया। अपराध इसलिए हो गया क्योंकि भगवान महावीर ने कहा है- 'हिंसा का केवल भाव ही हृदय में आ गया तो समझ लो हिंसा हो गई।' वैसे, मेरी उत्तेजना क्षणिक थी, शांत हो गई। मैंने उस विचार को जब माधुरी को बताया तो वे भी हिल गई, उन्होंने मुझे अपने ढंग से शांत किया।
सच पूछिए तो मेरा हाल भी बेहाल था। मुश्किल यह है कि हम पुरुष चाहकर भी रो नहीं पाते। सूने में भले ही आँखें भर आती थी लेकिन सबके सामने संयत रहना पड़ता है। मैं रोता तो कुंतल की माँ को कैसे समझाता ? दिल को पत्थर बना लिया, मन उदास रहने लगा लेकिन मुझे यह भलीभांति समझ में आ गया कि परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने और अपनी गंभीर बीमारी से लड़ने का मेरा कार्यकाल बढ़ गया है। मैंने स्वयं को और अधिक मजबूत बनाने का निर्णय लिया और उसकी आंतरिक तैयारी में भिड़ गया। मेरा दिल तो मजबूत था लेकिन 57 वर्ष के कैन्सरग्रस्त मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा कम होती जा रही थी। मैंने प्रत्येक सुबह 'जिम' जाना शुरू कर दिया। दो वर्ष तक नियमित रूप से जिम जाता रहा परिणामस्वरूप मेरा वजन 99 किलो से घटकर 90 किलो हो गया, मेरा मोटापा छंट गया और युवाओं के साथ व्यायाम करने का मुझे मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिला, हाँ, कुछ युवा जिम में मुझे अभ्यास करता देखकर हँसते तो कुछ विस्मित होते थे।
इस बीच एक और घटना हो गई। मैंने आपको बताया था कि अम्माजी की दशा उनकी बढ़ती उम्र और अव्यवस्थित जीवन के कारण दयनीय होती जा रही थी। वृद्धावस्था की समस्याएँ भी कठिन होती हैं, शिकायतें बनी रहती हैं जैसे- 'कोई पास बैठकर बातें करता नहीं', 'कोई मुझे पूछता नहीं'। इस उम्र में शरीर निष्क्रिय हो जाता है, अनेक रोग घेर लेते हैं, अंट-शंट खाने का मन करता है लेकिन पचता नहीं, जब भूख लगती रहती है तो कोई ध्यान नहीं देता, रात को ठीक से नींद नहीं आती, सुबह पेट साफ नहीं होता, गर्मी के दिनों में गर्मी बहुत लगती है, ठंड के दिनों में जाड़ा अधिक लगता है आदि। दरअसल, उनके तीनों पुत्र उनके साथ 'खो-खो' खेल रहे थे। ऐसा नहीं था कि उनकी उपेक्षा हो रही थी, वे जिसके घर में रहती थी, उनके खान-पान और इलाज़ का ध्यान रखा जाता था लेकिन पुत्रत्व का अभाव था।
उन दिनों अम्माजी रायपुर में बड़े भैया के घर में रहती थी, एक शाम वे मेरी छोटी बहन आशा के साथ कार में बिलासपुर आई और सीधे श्री जगदीश लाज़ में उतरी। मैंने उन्हें कार से उतारा, उनका सामान उतरवाया, उन्हें बैठाया। कुछ देर सुस्ताकर वे बोली- 'भैया, मैं यहीं लाज़ में रहूँगी, अब किसी के घर नहीं जाऊँगी।'
अम्माजी ने अपनी लॉज के एक कमरे को अपना आवास बना लिया। लॉज के सहायकगण सुबह से लेकर रात तक उनकी सेवा-सुश्रुषा में लगे रहते। सुबह के समय मैं उनको बाथरूम में सहारा देकर ले जाता और उनकी दैनिक क्रिया संपन्न करवाने के पश्चात कपड़े पहनाकर आराम से लिटा देता। लॉज की प्रबन्धक-द्वय हेमा कपूर और मंजू ठाकुर उनको नास्ता-भोजन करवाती, समय-समय पर दवा देती, सिर-हाथ-पैर दबा देती और उनके पास घंटों बैठकर उनके अतीत के संस्मरण सुनती। अम्माजी शाम के समय 'रिसेप्शन' के पास आराम कुर्सी में घंटे-दो घंटे बैठी रहती और बाज़ार की चहल-पहल बड़े कौतूहल से देखती क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के विगत 85 वर्ष घर की चारदीवारी के भीतर ही गुजारे थे ! मेरे कुछ मित्र और ग्राहक जब उनका परिचय जानते तो उन्हें चरण-स्पर्श या प्रणाम करते तो वे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती। प्रत्येक शाम को वे आदेश देती- 'भैया आइसक्रीम मँगवाओ।'
एक रेलयात्रा के दौरान अकेले बैठे-बैठे मेरे मन में सारा घटनाक्रम घुमड़ता रहा और मुझे लगा, 'सद्गुरु ने मेरे पुत्र का 'अपहरण' कर लिया।' उस समय मैं इस कदर 'वाइल्ड' हो गया कि मेरे सिर पर खून सवार हो गया और सद्गुरु को राह से हटा देने तक की बात तक मन में आई। मेरे जैसा संकोची मनुष्य जो जरा सा खून देखकर विचलित हो जाता है, वह किसी का खून करने-कराने की बात सोच रहा था। आप अनुमान लगाइए, मैं कितना दग्ध था ? उन क्षणों में तात्कालीन भावावेश के वशीभूत होकर मुझसे वह वैचारिक जघन्य अपराध हो गया। अपराध इसलिए हो गया क्योंकि भगवान महावीर ने कहा है- 'हिंसा का केवल भाव ही हृदय में आ गया तो समझ लो हिंसा हो गई।' वैसे, मेरी उत्तेजना क्षणिक थी, शांत हो गई। मैंने उस विचार को जब माधुरी को बताया तो वे भी हिल गई, उन्होंने मुझे अपने ढंग से शांत किया।
सच पूछिए तो मेरा हाल भी बेहाल था। मुश्किल यह है कि हम पुरुष चाहकर भी रो नहीं पाते। सूने में भले ही आँखें भर आती थी लेकिन सबके सामने संयत रहना पड़ता है। मैं रोता तो कुंतल की माँ को कैसे समझाता ? दिल को पत्थर बना लिया, मन उदास रहने लगा लेकिन मुझे यह भलीभांति समझ में आ गया कि परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने और अपनी गंभीर बीमारी से लड़ने का मेरा कार्यकाल बढ़ गया है। मैंने स्वयं को और अधिक मजबूत बनाने का निर्णय लिया और उसकी आंतरिक तैयारी में भिड़ गया। मेरा दिल तो मजबूत था लेकिन 57 वर्ष के कैन्सरग्रस्त मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा कम होती जा रही थी। मैंने प्रत्येक सुबह 'जिम' जाना शुरू कर दिया। दो वर्ष तक नियमित रूप से जिम जाता रहा परिणामस्वरूप मेरा वजन 99 किलो से घटकर 90 किलो हो गया, मेरा मोटापा छंट गया और युवाओं के साथ व्यायाम करने का मुझे मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिला, हाँ, कुछ युवा जिम में मुझे अभ्यास करता देखकर हँसते तो कुछ विस्मित होते थे।
इस बीच एक और घटना हो गई। मैंने आपको बताया था कि अम्माजी की दशा उनकी बढ़ती उम्र और अव्यवस्थित जीवन के कारण दयनीय होती जा रही थी। वृद्धावस्था की समस्याएँ भी कठिन होती हैं, शिकायतें बनी रहती हैं जैसे- 'कोई पास बैठकर बातें करता नहीं', 'कोई मुझे पूछता नहीं'। इस उम्र में शरीर निष्क्रिय हो जाता है, अनेक रोग घेर लेते हैं, अंट-शंट खाने का मन करता है लेकिन पचता नहीं, जब भूख लगती रहती है तो कोई ध्यान नहीं देता, रात को ठीक से नींद नहीं आती, सुबह पेट साफ नहीं होता, गर्मी के दिनों में गर्मी बहुत लगती है, ठंड के दिनों में जाड़ा अधिक लगता है आदि। दरअसल, उनके तीनों पुत्र उनके साथ 'खो-खो' खेल रहे थे। ऐसा नहीं था कि उनकी उपेक्षा हो रही थी, वे जिसके घर में रहती थी, उनके खान-पान और इलाज़ का ध्यान रखा जाता था लेकिन पुत्रत्व का अभाव था।
उन दिनों अम्माजी रायपुर में बड़े भैया के घर में रहती थी, एक शाम वे मेरी छोटी बहन आशा के साथ कार में बिलासपुर आई और सीधे श्री जगदीश लाज़ में उतरी। मैंने उन्हें कार से उतारा, उनका सामान उतरवाया, उन्हें बैठाया। कुछ देर सुस्ताकर वे बोली- 'भैया, मैं यहीं लाज़ में रहूँगी, अब किसी के घर नहीं जाऊँगी।'
अम्माजी ने अपनी लॉज के एक कमरे को अपना आवास बना लिया। लॉज के सहायकगण सुबह से लेकर रात तक उनकी सेवा-सुश्रुषा में लगे रहते। सुबह के समय मैं उनको बाथरूम में सहारा देकर ले जाता और उनकी दैनिक क्रिया संपन्न करवाने के पश्चात कपड़े पहनाकर आराम से लिटा देता। लॉज की प्रबन्धक-द्वय हेमा कपूर और मंजू ठाकुर उनको नास्ता-भोजन करवाती, समय-समय पर दवा देती, सिर-हाथ-पैर दबा देती और उनके पास घंटों बैठकर उनके अतीत के संस्मरण सुनती। अम्माजी शाम के समय 'रिसेप्शन' के पास आराम कुर्सी में घंटे-दो घंटे बैठी रहती और बाज़ार की चहल-पहल बड़े कौतूहल से देखती क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के विगत 85 वर्ष घर की चारदीवारी के भीतर ही गुजारे थे ! मेरे कुछ मित्र और ग्राहक जब उनका परिचय जानते तो उन्हें चरण-स्पर्श या प्रणाम करते तो वे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती। प्रत्येक शाम को वे आदेश देती- 'भैया आइसक्रीम मँगवाओ।'
रात को आठ बजे के आसपास हमारी हॉटल में 'डिनर' के लिए ग्राहकों का आना शुरू हो जाता। कई पारिवारिक समूह आते जिन्हें आते-जाते अम्माजी बड़े गौर से देखती। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा- 'ये सब के सब खाना खाने यहाँ आते हैं, इनके घर में खाना नहीं बनता क्या ?'
'बनता है, क्यों नहीं बनता लेकिन कभी-कभार खाना बनाने से छुट्टी भी तो मिलनी चाहिए !' मैंने कहा।
'हमको तो कभी छुट्टी नहीं मिली, हमको कभी किसी ने नहीं कहा कि चलो बाहर खा लो।'
'आजकल कभी-कभी कहना पड़ता है अम्मा, तब बाकी दिन घर में खाना बनता है।'
'पर घर जैसा अच्छा खाना बाहर तो नहीं मिलता होगा ?'
'तो क्या हम लोग रद्दी खाना बनाते हैं ?'
'नहीं, वैसा नहीं कह रही हूँ, घर जैसा स्वादिष्ट भला और कौन बना सकता है ?'
'अम्मा, स्वाद की बात नहीं है, बात कुछ और है।'
'क्या है, घर में काम न करना पड़े, यही न ?' अम्माजी ने पूछा, मैं उनकी बात का जवाब नहीं दे पाया।
'बनता है, क्यों नहीं बनता लेकिन कभी-कभार खाना बनाने से छुट्टी भी तो मिलनी चाहिए !' मैंने कहा।
'हमको तो कभी छुट्टी नहीं मिली, हमको कभी किसी ने नहीं कहा कि चलो बाहर खा लो।'
'आजकल कभी-कभी कहना पड़ता है अम्मा, तब बाकी दिन घर में खाना बनता है।'
'पर घर जैसा अच्छा खाना बाहर तो नहीं मिलता होगा ?'
'तो क्या हम लोग रद्दी खाना बनाते हैं ?'
'नहीं, वैसा नहीं कह रही हूँ, घर जैसा स्वादिष्ट भला और कौन बना सकता है ?'
'अम्मा, स्वाद की बात नहीं है, बात कुछ और है।'
'क्या है, घर में काम न करना पड़े, यही न ?' अम्माजी ने पूछा, मैं उनकी बात का जवाब नहीं दे पाया।
कुछ समय बाद अचानक उनके स्वास्थ्य में गिरावट शुरू हो गई, कमजोरी तेजी से बढ़ने लगी, वे बहुत बेचैन रहने लगी। उसी बीच कुंतल भी बिलासपुर आए हुए थे। वे दोपहर के समय उनके पास घंटों बैठे रहते। एक दिन कुंतल ने अपनी माँ से पूछा- 'माँ, बुढ़ापा क्या इतना कष्टप्रद होता है, मैं तो अम्माजी की हालत देख कर दहल गया ?'
'हाँ, ऐसा ही होता है।' माधुरी ने उत्तर दिया।
'तो अभी से शान्त रहने की तैयारी करो माँ, बुढ़ापे में शान्ति नहीं सधेगी।' कुंतल ने सुझाव दिया।
अचानक अम्माजी के मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव दिखने लगे, वे कमरे से बाहर निकलकर चीखने लगती, असंगत बातें करती, पूरी रात जागती और दिन में कुछ देर के लिए ही सो पाती। 30 जून 2004 की सुबह उन्होंने मुझसे कहा- 'आज मेरी तबीयत बहुत खराब है, मैं अब नहीं बचूँगी, मुझे अस्पताल ले चल।'
'मैं डाक्टर को यहीं बुलवाता हूँ, अम्मा।' मैंने कहा, डाक्टर आए, उनकी जांच की और बताया- 'एज़ फेक्टर' है, अस्पताल में चाहें तो इन्हें भर्ती कर दीजिए, वहाँ 'ग्लूकोस' चढ़ाया जा सकता है परंतु अब तकलीफ कम नहीं हो सकती बल्कि बढ़नी ही है।'
उनके कमरे से अपने काउंटर तक आते-आते मैं सोच रहा था- 'क्या करूँ ?' मैंने निर्णय लिया- 'अस्पताल में यदि इनकी तबियत थोड़ा सुधर गई तो और कष्ट पाने के लिए जीवित रहेंगी इसलिए बेहतर है कि अब इन्हें जाने दिया जाए.…।' मैं उन्हें अस्पताल नहीं ले गया। उसी शाम मैं बड़े भाई साहब के साथ 'अपोलो हास्पिटल' में अपने एक रिश्तेदार को देखने गया। शाम को सात बजे के आसपास जब मैं लॉज लौटा तो मुझे बताया गया कि अम्माजी की तबीयत और अधिक बिगड़ गई है, मैं दौड़कर उनके कमरे में गया, वे अपनी अंतिम सांसें ले रही थी। मैंने अपने हाथों से उनका माथा सहलाया, कुछ मिनटों में ही मेरे देखते-देखते उनका शरीर शांत हो गया। तीन लड़कों-बहुओं और छः लड़कियों की माँ ८४ वर्षीया सुंदरबाई ने श्री जगदीश लॉज के कमरा नंबर ४०१ में अपने प्राण त्यागे !
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उस जमाने में किसी औरत का ब्याह कैसा होता रहा होगा, आप कल्पना करिए। तेरह-चौदह वर्ष की कच्ची उम्र, एक हाथ लम्बा घूँघट, भरे-पूरे घर का 'पूरा' कामकाज, पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में गर्भाधान, हर साल बच्चे का प्रसव, न अस्पताल, न डाक्टर ! पति के सामने घूँघट ओढ़कर संतान उत्पन्न करने का वह अद्भुत कारनामा आज की पीढ़ी को कैसे समझाया जा सकता है ? संतानों की संख्या भी कोई कम नहीं, आम तौर पर एक दंपति एक दर्जन का आंकड़ा छू लिया करता था। कुछ बच्चे जन्म के समय या बाल्यावस्था में इलाज के अभाव में मर-खप जाते थे या कुछ प्रसूता प्रसव के दौरान ही दिवंगत हो जाती। ऐसा होने पर विधुर पुरुष का नया विवाह हो जाता लेकिन विधवा स्त्री का पुनर्विवाह निषिद्ध था। कवि प्रदीप ने तात्कालीन नारी विवशता पर यह मार्मिक गीत लिखा था :
'पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोय
बाहर से तो खामोश रहे तू भीतर-भीतर रोय।
तेरा दर्द न जाने कोय।
कह न सके तू अपनी कहानी, तेरी भी पंछी क्या ज़िंदगानी
विधि ने तेरी कथा लिखी, आँसू में कलम डुबोय।
तेरा दर्द न जाने कोय।
चुपके-चुपके रोने वाले, रखना छुपाकर दिल के छाले
ये पत्थर का लेख पगले, कोई न तेरा होय।
तेरा दर्द न जाने कोय।'
हमारी अम्माजी बेहद जीवट किस्म की महिला थी। जितना मैंने उनसे उनके बारे में सुना और जो मैंने देखा, उसका विवरण आपको बताया जाए तो उस जमाने की गृहस्थन का सम्पूर्ण स्वरुप आपके समक्ष प्रगट हो जाएगा। तेरह वर्ष की आयु में वे मेरे पिता के पास ब्याह कर आई थी, तब से ६७ वर्ष तक दोनों का साथ रहा।अम्माजी गरीब परिवार की लड़की थी, ब्याह कर आई तो फिर गरीब घर ही मिला, आसमान से गिरी तो खजूर में अटक गई। रात-रात भर जागकर दिये की रोशनी में गेहूं की सफाई करती तो उनको एक बोरे ( लगभग नब्बे किलो) का मेहनताना एक रुपया मिलता जिसे वे जतन से बचाकर रखती ताकि वक्त-जरूरत पर परिवार के काम आए। कुछ अधिक जुड़ जाता तो उसका सोना खरीद लेती जो उन दिनों 20/- से 25/- तोला (लगभग 12 ग्राम) मिल जाया करता था। यही सोना उनके बच्चों के ब्याह में काम आया, जो बच गया वह उनके अंतिम दिनों में विलुप्त हो गया। कहाँ गया, क्या पता ?
उनके पति और श्वसुर दोनों अद्भुत प्राणी थे। अम्माजी भोजन बनाने में अपने प्राण भी लगा दे तो भी उनको स्वाद नहीं आता था, खाते जाते थे, दांत पीसते जाते थे और थाली-गिलास पटक कर अपना क्रोध प्रगट करते रहते, बेचारी अम्मा चुपचाप सुनती-सहती रहती। हमारे घर में रोज दो-चार मेहमानों का भोज होता था, समाज में दोनों बाप-बेटे की मेहमाननवाज़ी की तारीफ हुआ करती थी, अम्माजी की बदौलत। बेचारी चूल्हे की आग में तपती भोजन बनाती, अकेले परोसती-खिलाती और सब खानेवाले मुंह पोछते हुए बिना कुछ बोले चले जाते। जिस भोजन के स्वाद पर दोनों बाप-बेटे अम्माजी को गरियाते थे, उस भोजन को याद करके आज हम तरसते हैं।
अम्माजी अत्यंत स्वादिष्ट भोजन बनाती थी। चूल्हे में लकड़ी जलाकर बटुवे में पकी दाल और भात का स्वाद मुझे आज भी याद है। रोटी हो या पूरी, ऐसा गोल बेलती कि 'सर्कुलेटर' से 'चेक' कर लो। उनमें गजब की फुर्ती थी, रोटी सेंकते हर समय उनकी एक रोटी तवे पर होती, दूसरी अंगार पर और तीसरी पटे पर ! उनके हाथ से सिंकी हुई रोटियों की मुलायमियत अब स्मृति-शेष होकर रह गई। फूली हुई पूरियां और रसीली आलू या लौकी की सब्जी आज भी बहुत याद आती हैं। उनके हाथ से बने पापड़, बिजौरा, बड़ी, कचरिया, अथान (अचार) अब कहाँ ? मूंग और बेसन के लड्डू का वह सोंधापन, गुझिया और इन्दरसा की मिठास और प्रसव के पश्चात प्रसूता को खिलाए जाने वाले मेवा-मसालेदार 'सोंठइला लड्डू' का स्वाद न जाने कहाँ विलीन हो गया !
अम्माजी की याद में कितनी घटनाएँ मेरे ज़ेहन में उमड़ रही हैं, उन सब यादों को जोड़कर यदि उनका व्यक्तित्व परिभाषित किया जाए तो वे अत्यंत परिश्रमी और सरल स्वभाव की महिला थी। उनकी सरलता ने उनको बहुत सताया और जिस मान-सम्मान की वे हकदार थी, वह उन्हें नहीं मिला।
मुझे याद है कि अपने विवाह-समारोह के पश्चात जब हम पति-पत्नी सड़क मार्ग से जबलपुर से बिलासपुर आ रहे थे, मैंने अपनी पत्नी को अपने परिवार के बारे में बताते हुए उनसे कहा था- 'अम्माजी को जीवन में कभी सुख नहीं मिला, तुम उनके दुख को कम करने की कोशिश करना।' बेचारी माधुरी को पता ही नहीं था कि वह किस बीहड़ की बहू बनकर जा रही है। हमारे घर के कंटीले-पथरीले रास्तों ने उनको अवश्य निराश किया होगा लेकिन विपरीत स्थितियों का सामना करने का उनका साहस कभी कमजोर नहीं हुआ बल्कि उन्होंने इन कठिनाइयों को चुनौती के रूप में लिया और मेरा कहा मानने की यथासंभव कोशिश की।
अम्माजी और दद्दाजी विपरीत स्वभाव वाले युगल थे, एक आग का गोला तो दूसरा बर्फ की चट्टान ! लेकिन दद्दाजी तो दद्दाजी थे, उनके स्वभाव का क्या कहने ? एक दिन की बात है, हम पिता-पुत्र रसोईघर में चटाई पर बैठकर भोजन कर रहे थे, अचानक किसी बात पर दद्दाजी भड़क गए और मुझसे बोले- 'देखो भैया, बहू ने आजतक एक दिन भी न अच्छा खाना बनाया और न प्रेम से खिलाया।' माधुरी सिगड़ी में रोटियाँ सेंक रही थी, हरदम चुप रहनेवाली बहू भड़क गई और घूँघट के अंदर से बोली- 'और आपने कभी अपने मुंह से बोला कि बहू आज तुमने अच्छा खाना बनाया ?' दद्दाजी ने गुस्से में आकर भोजन की थाली दोनों हाथ से उठाई और जमीन पर पटक दी और बोले- 'देखो, देखो अब मुंह भी लड़ाने लगी है।' मैं और अम्माजी सकते में आ गए, दद्दाजी को तो कोई कुछ कह नहीं सकता था मैं माधुरी को चुप रहने के लिए कहता रहा। दद्दाजी उठकर चले गए, माधुरी रोने लगी तो अम्माजी बोली- 'चुप हो जा बहू, इनकी तो आदत है, चाहे जितना अच्छा बना दो, इनको पसंद नहीं आता।' मैंने अम्माजी से कहा- 'अम्मा, तुम जब इस घर में बहू बनकर आई थी, उसी समय यदि आज जैसा जवाब दद्दाजी को मिल गया होता तो दद्दाजी कब के सुधर गए होते !'
'हमारे जमाने में हम लोग मुंह खोलना नहीं जानते थे।' अम्माजी उदास होकर बोली।
मैंने देखा है कि सीधे-सरल स्वभाव के व्यक्ति के साथ हमेशा अन्याय होता है। मनुष्य को फुफकारने वाले नाग की तरह जीवनशैली अपनानी चाहिए ताकि लोग उससे भयभीत रहें, यदि आप पिटपिटिया साँप के तरह अपना बचाव करते रहेंगे तो लोग आपको पैरों से कुचलते रहेंगे, आपको अपने अनुभव की बात बता रहा हूँ।
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अपनी माँ और पिता को उनके जीते-जी समझ पाना कठिन है लेकिन उनके चले जाने के बाद उन्हें समझना आसान हो जाता है। जो हमें हासिल है, उसकी बेकद्री है लेकिन जो साथ छोड़कर दूर हो गया या बहुत दूर हो गया तब उसकी कद्र होती है। वैसे तो संसार के सभी रिश्ते इसी तरह बनते-निभते हैं लेकिन मेरे देखने में आया कि माँ का बेटे के साथ, पिता का बेटी के साथ कुछ अधिक ही नेह रहता है। मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रायड के मतानुसार यह विपरीतलिंगी प्रभाव है, वैसा हो सकता है लेकिन भारतीय परिवेश में इसे समझने के लिए हमारी परिवारिक व्यवस्था के मनोविज्ञान पर गौर करना होगा।
आम तौर पर किसी बालिका से प्रश्न किया जाए कि बड़ी होकर वह किसके जैसी बनना चाहेगी तो उसका संभावित उत्तर होगा- 'अपनी मम्मी जैसी' और यही प्रश्न किसी बालक से पूछा जाए तो जवाब होगा- 'अपने पापा जैसा।' उन दोनों को बड़ा होने दीजिए, पढ़ने-लिखने दीजिए, अक़्लमंद होने दीजिए, जैसे ही ये किशोर-वय को प्राप्त होंगे, दोनों 'यू टर्न' ले लेंगे। लड़की कहेगी- 'कैसी भी लेकिन माँ जैसी नहीं' और लड़का बोलेगा- 'कैसा भी लेकिन अपने बाप जैसा नहीं।' विचारणीय प्रश्न यह है कि बचपन से किशोरावस्था के मध्य उन दस वर्षों में इस तरह का 'पेराडाइम शिफ्ट' क्यों हो जाता है ?
डा॰ एरिक बर्न ने 'ट्रांजेक्सनल एनालिसिस' नामक अद्भुत मनोवैज्ञानिक शोध किया है जिसमें वे मनुष्य के व्यवहार को गहराई से समझने में मदद करते हैं। इस अध्ययन में उन्होंने 'I am okay, you are okay.' की मनःस्थिति को विकसित करने के सूत्र बताए हैं। इसे आप समझने का प्रयत्न कीजिए, आपको मैं सरल ढंग से संक्षिप्त रूप में बताने का यत्न करता हूँ। सबसे पहले 'I am okay, you are okay.' का हिन्दी अनुवाद कर लिया जाए- 'मैं सही, तुम भी सही'।
मनुष्य के जीवन-व्यवहार में चार मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ बनती हैं-
मनुष्य के जीवन-व्यवहार में चार मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ बनती हैं-
1 : मैं सही नहीं, तुम सही॰ (I am not okay, you are okay.)
2 : मैं सही नहीं, तुम भी सही नहीं॰ (I am not okay, you are not okay.)
3 : मैं सही, तुम सही नहीं॰ (I am okay, you are not okay.)
4 : मैं सही, तुम भी सही॰ (I am okay, you are okay.)
1 : मैं सही नहीं, तुम सही : मनुष्य के जन्म से बचपन तक का समय दूसरों पर आश्रित रहता है। कदम-कदम पर उसे ऐसा महसूस होता है कि बहुत से कार्य ऐसे हैं जिसे वह नहीं कर पाता लेकिन जो उम्र में बड़े हैं- वे कर सकते हैं। इस वज़ह से उसमें हीनभावना विकसित हो जाती है और उसे लगता है- 'मैं अक्षम हूँ लेकिन अन्य लोग सक्षम हैं।'
1 : मैं सही नहीं, तुम सही : मनुष्य के जन्म से बचपन तक का समय दूसरों पर आश्रित रहता है। कदम-कदम पर उसे ऐसा महसूस होता है कि बहुत से कार्य ऐसे हैं जिसे वह नहीं कर पाता लेकिन जो उम्र में बड़े हैं- वे कर सकते हैं। इस वज़ह से उसमें हीनभावना विकसित हो जाती है और उसे लगता है- 'मैं अक्षम हूँ लेकिन अन्य लोग सक्षम हैं।'
2 : मैं सही नहीं, तुम भी सही नहीं : बच्चा जब थोड़ा समझदार होता है तो वह अनुभव करता है कि गलतियां केवल उससे ही नहीं होती, दूसरे भी करते हैं तब वह अपनी गलतियों को 'जस्टिफाई' करने के लिए दूसरों पर उंगली उठाता है- 'अगर मैं गलत हूँ तो वह भी तो गलत है।'
3 : मैं सही, तुम सही नहीं : वयस्क होने के बाद जब शारीरिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो जाती है तब उसे लगता कि वह सही है, सक्षम है, बुद्धिमान है और दूसरे गलत हैं। स्वयं के दोष उसे नहीं दिखते और अन्य के दोष उसे दिखाई देने लगते हैं, इस प्रकार उसे लगता है- 'मैं सही हूँ, दूसरे गलत हैं।'
4 : मैं सही, तुम भी सही : मनुष्य के लिए आदर्श और सकारात्मक सोच है- मैं सही, तुम भी सही।उपरोक्त 1, 2 और 3 मनस्थितियाँ नकारात्मक हैं। स्वयं को अक्षम समझना मनुष्य को हीन, कमजोर और लाचार बनाता है जबकि दूसरों में दोष देखना हमें परछिद्रान्वेषी, घमंडी, ईर्ष्यालु, बहानेबाज और गैरजिम्मेदार बनाता है।
डा॰ एरिक बर्न की उक्त कसौटी पर माता-पिता और उनके बच्चों के मध्य विकसित होने वाले मनोभावों को आसानी से समझा जा सकता है। बचपन में माता-पिता पर निर्भरता बच्चे पर उनके प्रति अनुकूल प्रभाव रखती है लेकिन उस निर्भरता के समाप्त होते ही वह आत्म-स्वतन्त्रता की ओर उन्मुख होने लगता है। माता-पिता का मार्गदर्शन और आदेश उसे नहीं सुहाता। दरअसल, वयस्क मन स्वयं समझ विकसित करके निर्णय लेना चाहता है जिसमें माता-पिता उसे बाधक समझ आते हैं। इसी कारण उनके मध्य मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं जो धीरे-धीरे मनभेद की ओर बढ़ जाते हैं और कालांतर में संघर्ष का रूप ले लेते हैं।
हमारे परिवारों में लड़कियों को प्रशिक्षित करने की ज़िम्मेदारी माँ के कंधों पर होती है और लड़कों की पिता पर। मनुष्य स्वभाव से आलसी होता है इसलिए उसे काम करना नापसंद होता है और यदि कोई काम करने के लिए दबाव डालता है तो वह अप्रिय लगने लगता है। इस प्रकार माँ अपनी लड़की की 'फ्रेंड लिस्ट' से बाहर हो जाती है और पिता अपने बेटे की। घर में जब ये विसंगतियाँ बड़ा रूप लेने लगती है और वाक्युद्ध में परिवर्तित होने लगती हैं तब लड़की की रक्षा करने के लिए पिता अवतरित हो जाते हैं और माँ को समझाते हैं- 'धीरे-धीरे सीख लेगी, क्यों पीछे पड़े रहती हो ?' वहीं पर लड़के की तरफदारी करने के लिए उसकी माँ सामने खड़ी हो जाती है- 'बच्चे की जान लोगे क्या ?' संभवतः इसीलिए माँ का बेटे के साथ और पिता का बेटी के साथ अधिक ही नेह विकसित हो जाता है। फ्रायड इसे विपरीतलिंगी आकर्षण ठहरा सकते हैं लेकिन मुझे तो यह सुविधा-असुविधा से जुड़ा मामला लगता है।
मेरी गृहस्थी में भी इसी तरह से अनेक घटनाएँ हुई और ये ही हम पति-पत्नी के बीच मतभेद के कारण बने। परिवार में सभी कडक हो जाएँ, यह अनुचित है। 'एक कड़क तो दूसरा नरम' की नीति सही रहती है लेकिन मेरी पत्नी की मुझसे शिकायत रहती है कि जब वे बच्चों के साथ कड़क हों तो मुझे उनका साथ देना चाहिए वरना डांट का असर कमजोर पड़ जाता है और अपेक्षित परिणाम नहीं आते। इस मुद्दे पर अनंत बहस की जा सकती है लेकिन मुझे लगता है कि घर-परिवार में किसी प्राणी का जन्म निरर्थक तनाव झेलने के लिए नहीं हुआ है, घर में शांति होनी चाहिए, परस्पर प्रेम होना चाहिए, आपस में मदद और देखरेख का भाव होना चाहिए और यह सब तब हो सकता है जब बच्चों को समझा जाए और उन्हें प्रेम से समझाया जाए। मेरे दद्दाजी बहुत कड़क इंसान थे लेकिन मैंने अनुभव किया कि वे न तो अपने बच्चों को सुधार पाए और न ही अपने अनुरूप बना पाए, हाँ, उन्होंने अपने जीते-जी हमारा जीना हराम करके रखा।
मेरे बचपन में तीन तानाशाह मुझे सुधारने में लगे रहते थे- बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया। उस त्रिभुज के मध्य मैं इधर से उधर टकराता रहता, किसी से डाँट, किसी से घुड़की तो किसी से मार। इन तीनों आततायियों के आतंक से मुझे बचा पाने में अम्माजी असमर्थ थी क्योंकि वे विरोध नहीं करती थी लेकिन रोज ही मेरी हिम्मत बँधाते रहती और अगली यातना सहने के लिए मुझे तैयार करती। इन तीनों के प्रहारों पर नियंत्रण करना असंभव था क्योंकि इनका घर में विकट खौफ था, इनसे कोई कुछ नहीं कह सकता था और हमारी अम्माजी तो नरमदल वाली थी। अम्माजी के नरम होने की वजह से वे घर में इतनी महत्वहीन हो गई थी कि 'उनके' बच्चों का विवाह-संबंध तय करने के पूर्व उनकी राय लेना तो बहुत दूर की बात है, उनको बताया तक नहीं जाता था। ऐसे महत्व के निर्णय घर के पुरुषगण आपस में ले लेते थे, अम्माजी को हम लोग सुनी-सुनाई बातें बताया करते थे जिसे वे चुपचाप सुन लेती थी और धीरे से सिर हिला देती थी ! आज के समय में ऐसा सम्भव है क्या ?
दद्दाजी सवा छः फीट ऊंचे-पूरे व्यक्ति थे, धोती-कुरता-जाकिट-टोपी पहनते थे और जब हाथ में बेंत लेकर उसे लहराते हुए सड़क पर निकलते तो हर आने-जाने वाले की नजर उन पर ज़रूर पड़ती। यह बेंत सहारे के लिए नहीं, 'लुक' के लिए उनके साथ चलती थी। उनके पास दो बेंत थी जिसे उन्होंने बनारस से मंगवाया थी, एक बेंत ऊपर से नीचे तक चिकनी थी और दूसरी अनानास के छिलके की तरह उभरी हुई नोकदार।
एक शाम की बात है, मैं अपने घर के बाहर कबड्डी खेल रहा था। उसी समय मेरे बड़े भैया का आगमन हुआ, उनकी उम्र उस समय 18 वर्ष की रही होगी और मैं लगभग आठ-नौ वर्ष का रहा हूंगा, उन्होंने गुस्से में मुझे बांह से पकड़कर घसीटते हुए घर के अंदर किया और दद्दाजी की उसी नुकीली बेंत से मेरी जमकर कुटाई की। न जाने क्यों, वे मेरे धूल में खेलने के सख्त खिलाफ थे, अक्सर झपड़ियाते रहते थे लेकिन उस शाम उनका पारा अधिक चढ़ा हुआ था इसलिए बेंत के माध्यम से उन्होंने अपना रोष व्यक्त किया। मेरी दाहिनी बांह और पीठ पर चोट के निशान उभर आए, सूजन आ गई। अम्माजी ने देखा और भड़क गई और बड़े भैया को डांटा- 'अरे, ऐसा जानवरों की तरह मारा जाता है ?' मैंने अपने जीवन में केवल एक बार ही उन्हें नाराज़ होते देखा, फिर कभी नहीं। अम्माजी दया और करुणा की साक्षात अनुकृति थी, मैं उनकी निर्जीव देह के समक्ष खड़ा अनेक पुरानी बातें याद कर रहा था और सोच रहा था कि विपरीत स्थितियों को अनुकूल बनाने वाली यह अद्भुत स्त्री अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों से अंततः मुक्त हो ही गई।
अपने अंतिम दिनों में अम्माजी ने मुझसे कहा था- 'मुझे मेरे घर ले चल, एक बार दिखा दे मुझे।'
'वहाँ जाने के लिए मुन्ना भैया (छोटे भाई राजकुमार का घरेलू नाम) आएंगे तो उनसे कहना।' मैंने कहा। उन दोनों के बीच क्या बात हुई, मुझे नहीं मालूम लेकिन अम्माजी की यह इच्छा उनकी मृत्यु के पश्चात पूरी हो गई। उनकी पार्थिव देह को उसी रात 'उनके' घर ले जाया गया। सुबह तक सब परिवारजन और नागरिक एकत्रित हुए और अंतिम संस्कार किया गया। न जाने क्यों, मेरी आँखों से एक बूंद आँसू न गिरा। विदा अम्मा।
निदा फ़ाजली की यह गजल अम्माजी के बहुत करीब है :
'बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ।
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3 : मैं सही, तुम सही नहीं : वयस्क होने के बाद जब शारीरिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो जाती है तब उसे लगता कि वह सही है, सक्षम है, बुद्धिमान है और दूसरे गलत हैं। स्वयं के दोष उसे नहीं दिखते और अन्य के दोष उसे दिखाई देने लगते हैं, इस प्रकार उसे लगता है- 'मैं सही हूँ, दूसरे गलत हैं।'
4 : मैं सही, तुम भी सही : मनुष्य के लिए आदर्श और सकारात्मक सोच है- मैं सही, तुम भी सही।उपरोक्त 1, 2 और 3 मनस्थितियाँ नकारात्मक हैं। स्वयं को अक्षम समझना मनुष्य को हीन, कमजोर और लाचार बनाता है जबकि दूसरों में दोष देखना हमें परछिद्रान्वेषी, घमंडी, ईर्ष्यालु, बहानेबाज और गैरजिम्मेदार बनाता है।
डा॰ एरिक बर्न की उक्त कसौटी पर माता-पिता और उनके बच्चों के मध्य विकसित होने वाले मनोभावों को आसानी से समझा जा सकता है। बचपन में माता-पिता पर निर्भरता बच्चे पर उनके प्रति अनुकूल प्रभाव रखती है लेकिन उस निर्भरता के समाप्त होते ही वह आत्म-स्वतन्त्रता की ओर उन्मुख होने लगता है। माता-पिता का मार्गदर्शन और आदेश उसे नहीं सुहाता। दरअसल, वयस्क मन स्वयं समझ विकसित करके निर्णय लेना चाहता है जिसमें माता-पिता उसे बाधक समझ आते हैं। इसी कारण उनके मध्य मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं जो धीरे-धीरे मनभेद की ओर बढ़ जाते हैं और कालांतर में संघर्ष का रूप ले लेते हैं।
हमारे परिवारों में लड़कियों को प्रशिक्षित करने की ज़िम्मेदारी माँ के कंधों पर होती है और लड़कों की पिता पर। मनुष्य स्वभाव से आलसी होता है इसलिए उसे काम करना नापसंद होता है और यदि कोई काम करने के लिए दबाव डालता है तो वह अप्रिय लगने लगता है। इस प्रकार माँ अपनी लड़की की 'फ्रेंड लिस्ट' से बाहर हो जाती है और पिता अपने बेटे की। घर में जब ये विसंगतियाँ बड़ा रूप लेने लगती है और वाक्युद्ध में परिवर्तित होने लगती हैं तब लड़की की रक्षा करने के लिए पिता अवतरित हो जाते हैं और माँ को समझाते हैं- 'धीरे-धीरे सीख लेगी, क्यों पीछे पड़े रहती हो ?' वहीं पर लड़के की तरफदारी करने के लिए उसकी माँ सामने खड़ी हो जाती है- 'बच्चे की जान लोगे क्या ?' संभवतः इसीलिए माँ का बेटे के साथ और पिता का बेटी के साथ अधिक ही नेह विकसित हो जाता है। फ्रायड इसे विपरीतलिंगी आकर्षण ठहरा सकते हैं लेकिन मुझे तो यह सुविधा-असुविधा से जुड़ा मामला लगता है।
मेरी गृहस्थी में भी इसी तरह से अनेक घटनाएँ हुई और ये ही हम पति-पत्नी के बीच मतभेद के कारण बने। परिवार में सभी कडक हो जाएँ, यह अनुचित है। 'एक कड़क तो दूसरा नरम' की नीति सही रहती है लेकिन मेरी पत्नी की मुझसे शिकायत रहती है कि जब वे बच्चों के साथ कड़क हों तो मुझे उनका साथ देना चाहिए वरना डांट का असर कमजोर पड़ जाता है और अपेक्षित परिणाम नहीं आते। इस मुद्दे पर अनंत बहस की जा सकती है लेकिन मुझे लगता है कि घर-परिवार में किसी प्राणी का जन्म निरर्थक तनाव झेलने के लिए नहीं हुआ है, घर में शांति होनी चाहिए, परस्पर प्रेम होना चाहिए, आपस में मदद और देखरेख का भाव होना चाहिए और यह सब तब हो सकता है जब बच्चों को समझा जाए और उन्हें प्रेम से समझाया जाए। मेरे दद्दाजी बहुत कड़क इंसान थे लेकिन मैंने अनुभव किया कि वे न तो अपने बच्चों को सुधार पाए और न ही अपने अनुरूप बना पाए, हाँ, उन्होंने अपने जीते-जी हमारा जीना हराम करके रखा।
मेरे बचपन में तीन तानाशाह मुझे सुधारने में लगे रहते थे- बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया। उस त्रिभुज के मध्य मैं इधर से उधर टकराता रहता, किसी से डाँट, किसी से घुड़की तो किसी से मार। इन तीनों आततायियों के आतंक से मुझे बचा पाने में अम्माजी असमर्थ थी क्योंकि वे विरोध नहीं करती थी लेकिन रोज ही मेरी हिम्मत बँधाते रहती और अगली यातना सहने के लिए मुझे तैयार करती। इन तीनों के प्रहारों पर नियंत्रण करना असंभव था क्योंकि इनका घर में विकट खौफ था, इनसे कोई कुछ नहीं कह सकता था और हमारी अम्माजी तो नरमदल वाली थी। अम्माजी के नरम होने की वजह से वे घर में इतनी महत्वहीन हो गई थी कि 'उनके' बच्चों का विवाह-संबंध तय करने के पूर्व उनकी राय लेना तो बहुत दूर की बात है, उनको बताया तक नहीं जाता था। ऐसे महत्व के निर्णय घर के पुरुषगण आपस में ले लेते थे, अम्माजी को हम लोग सुनी-सुनाई बातें बताया करते थे जिसे वे चुपचाप सुन लेती थी और धीरे से सिर हिला देती थी ! आज के समय में ऐसा सम्भव है क्या ?
दद्दाजी सवा छः फीट ऊंचे-पूरे व्यक्ति थे, धोती-कुरता-जाकिट-टोपी पहनते थे और जब हाथ में बेंत लेकर उसे लहराते हुए सड़क पर निकलते तो हर आने-जाने वाले की नजर उन पर ज़रूर पड़ती। यह बेंत सहारे के लिए नहीं, 'लुक' के लिए उनके साथ चलती थी। उनके पास दो बेंत थी जिसे उन्होंने बनारस से मंगवाया थी, एक बेंत ऊपर से नीचे तक चिकनी थी और दूसरी अनानास के छिलके की तरह उभरी हुई नोकदार।
एक शाम की बात है, मैं अपने घर के बाहर कबड्डी खेल रहा था। उसी समय मेरे बड़े भैया का आगमन हुआ, उनकी उम्र उस समय 18 वर्ष की रही होगी और मैं लगभग आठ-नौ वर्ष का रहा हूंगा, उन्होंने गुस्से में मुझे बांह से पकड़कर घसीटते हुए घर के अंदर किया और दद्दाजी की उसी नुकीली बेंत से मेरी जमकर कुटाई की। न जाने क्यों, वे मेरे धूल में खेलने के सख्त खिलाफ थे, अक्सर झपड़ियाते रहते थे लेकिन उस शाम उनका पारा अधिक चढ़ा हुआ था इसलिए बेंत के माध्यम से उन्होंने अपना रोष व्यक्त किया। मेरी दाहिनी बांह और पीठ पर चोट के निशान उभर आए, सूजन आ गई। अम्माजी ने देखा और भड़क गई और बड़े भैया को डांटा- 'अरे, ऐसा जानवरों की तरह मारा जाता है ?' मैंने अपने जीवन में केवल एक बार ही उन्हें नाराज़ होते देखा, फिर कभी नहीं। अम्माजी दया और करुणा की साक्षात अनुकृति थी, मैं उनकी निर्जीव देह के समक्ष खड़ा अनेक पुरानी बातें याद कर रहा था और सोच रहा था कि विपरीत स्थितियों को अनुकूल बनाने वाली यह अद्भुत स्त्री अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों से अंततः मुक्त हो ही गई।
अपने अंतिम दिनों में अम्माजी ने मुझसे कहा था- 'मुझे मेरे घर ले चल, एक बार दिखा दे मुझे।'
'वहाँ जाने के लिए मुन्ना भैया (छोटे भाई राजकुमार का घरेलू नाम) आएंगे तो उनसे कहना।' मैंने कहा। उन दोनों के बीच क्या बात हुई, मुझे नहीं मालूम लेकिन अम्माजी की यह इच्छा उनकी मृत्यु के पश्चात पूरी हो गई। उनकी पार्थिव देह को उसी रात 'उनके' घर ले जाया गया। सुबह तक सब परिवारजन और नागरिक एकत्रित हुए और अंतिम संस्कार किया गया। न जाने क्यों, मेरी आँखों से एक बूंद आँसू न गिरा। विदा अम्मा।
निदा फ़ाजली की यह गजल अम्माजी के बहुत करीब है :
'बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ।
बान की खुरीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ।
चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसे माँ।
बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ।
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ।'
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ।
चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसे माँ।
बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ।
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ।'
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पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई
अम्माजी के निधन के पश्चात गोलबाजार वाले घर में मृत्योपरांत होनेवाले कार्यक्रम तेरह दिन गहमागहमी के साथ चले, समस्त परिवारजन और रिश्तेदार एकत्रित हुए। कुछ देर तो अम्माजी की चर्चा चलती और फिर कुंतल के आश्रम-गमन पर चर्चा होने लगती और वह चर्चा बढ़ती ही जाती। कुंतल के आश्रम जाने के 11 दिन बाद ही अम्माजी का निधन हुआ था इसलिए सब उसी 'विचित्र किन्तु सत्य' घटना की तह तक पहुँचना चाहते थे। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो गया ? हमसे प्रश्न किए गए :
'क्यों चला गया ?'
'क्या बात हो गई ?'
'आपने समझाया नहीं ?'
'आपने रोका नहीं ?'
'ऐसे कैसे जाने दिया ?'
तीसरे दिन अम्माजी की अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मैं इलाहाबाद निकल गया, इधर पुत्र-विछोह से दग्ध माधुरी पूछे जा रहे सवालों से अकेले जूझती रही और सबको समझाते-बताते खुद भी कुंतल के उस अबूझ निर्णय को समझने का असफल प्रयास करती रही। उन चर्चाओं से उनका दुख और अधिक गहरा गया, वे बेचैन हो गई, उनकी रातों की नींद उड़ गई। 'लोगों का सामना न करना पड़े' इसलिए उन्होंने खुद को अपने घर में सीमित कर लिया और गोलबाजार वाले घर में जाना कम कर दिया। मैं अस्थि-विसर्जन करके वापस लौटा तो वे मेरे कंधे में सिर रखकर रोने लगी और बोली- 'बताओ, क्या जवाब दूँ, सबको ?' मैं उनको क्या बताता, मैं खुद ही निरुत्तर था ! उन दिनों हम दोनों अपने आंसुओं को थामे एक-दूसरे को सम्हालते हुए किसी तरह जी रहे थे। सच में, हम बेसहारा से हो गए थे; ऐसा लगे, कम्मू वापस आ जाए तो हमारी ज़िंदगी वापस आए।
13 जुलाई 2004 को सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप विधि-विधान से अम्माजी की तेरहवी का पूजन और भोज का कार्यक्रम हुआ। रात को हम लोग थके-मांदे अपने घर वापस आए और सो गए। उस रात माधुरी की तबीयत खराब हुई लेकिन उन्होंने मुझे जगाया-बताया नहीं। अगली सुबह जब मैं उठा, मैंने उन्हें देखा, वे गहरी नींद में सो रही थी। लगभग सात बजे वे जगी और बाथरूम जाने के लिए निकली। रास्ते में उन्हें संभवतः चक्कर आया और वे गलियारे में धम्म से बैठ गई, फिर जमीन पर निश्चेष्ट पसर गई। मैं बाहर बरामदे में अखबार पढ़ रहा था, मुझे कुछ आहट मिली, अंदर जाकर देखा तो माधुरी पसीने से लथपथ फर्श पर पड़ी हुई थी। मैंने उन्हें नाम लेकर पुकारा लेकिन कोई उत्तर नहीं आया, वे अचेत हो चुकी थी, शरीर ठंडा पड़ गया था। मैं बुरी तरह घबरा गया, उनकी हालत देखकर मेरी हालत खराब होने लगी, मेरे कपड़े पसीने से तर-बतर हो गए। मैं उसे पुकार रहा था- 'माधुरी...माधुरी' और वह कुछ बोल नहीं रही थी, आंखे बंद और शरीर ठंडा पड़ गया था। एकबारगी मुझे ऐसा लगा- यह एक और अनहोनी है जो आज होने जा रही है। मैं दौड़ते हुए अपने पड़ोसी डाक्टर अशोक दीक्षित के घर गया और उन्हें माधुरी का हाल बताया, वे बोले- 'आप घर पहुंचिए, मैं तुरंत आता हूँ।' वहाँ से लौट कर मैंने माधुरी की मित्र सोनू सिहारे को फोन किया और उनसे तुरंत घर आने के लिए कहा। इस बीच डा॰ दीक्षित आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'शी इज़ सिंकिंग, 'ब्लड प्रेशर' और 'हार्टबीट' दोनों गड़बड़ है, इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाइए, यहाँ कुछ नहीं हो सकता।'
इस बीच सोनू भाभी अपने पति डा॰ प्रदीप सिहारे को लेकर घर आ गई। डा॰ प्रदीप सिहारे अपने साथ 'ग्लूकोज़' के 'पाउच' लेकर आए थे, उन्होंने हाथ की नस टटोलकर सुई घुसेड़ी और 'ग्लूकोज़' चढ़ाने लगे। 'पाउच' को वे अपने हाथ की गदेलियों से दबाकर 'ग्लूकोज़' को शरीर के भीतर जल्दी-जल्दी भेजने का प्रयास कर रहे थे। मैं अपनी सांस रोके चुपचाप अपनी जीवनसंगिनी की डूबती काया को किंकर्तव्यविमूढ़ होकर निहार रहा था।
पंद्रह मिनट की मशक्कत के बाद माधुरी के शरीर में कुछ हरकत शुरू हुई, थोड़ी देर बाद डा॰ सिहारे उन्हें कार में बिठाकर अपने हास्पिटल ले गए और वहाँ भर्ती कर लिया। दो दिनों तक उन्हें लगातार ग्लूकोज़ और दवा दी गई। डा॰ सिहारे तब तक लगातार उनकी देखरेख करते रहे जब तक माधुरी सामान्य नहीं हो गई। चूंकि डा॰ प्रदीप सिहारे शिशुरोग विशेषज्ञ हैं, उनके हास्पिटल में केवल बच्चों का इलाज़ होता है इसलिए वहाँ पर भर्ती अन्य बच्चों के परिजन इनती बड़ी 'साइज' की बच्ची को देखकर विस्मित हो रहे थे और हल्के-हल्के मुस्कुरा भी रहे थे। । माधुरी का और मेरा नास्ता, भोजन, चाय-दूध का जिम्मा सोनू सिहारे ने अपने ऊपर ले लिया था, सच में, उन्होने हमारी बहुत देखरेख की। हमारे घर-परिवार के लोग भी माधुरी को देखने पहुंचे, आए, देखे और चले गए। सोनू भाभी और डा॰ प्रदीप ने उस दिन माधुरी के प्राण बचाए और हमारा परिवार तहस-नहस होने से बच गया। धन्यवाद सिहारे दंपति, आप दोनों की जोड़ी सदा बनी रहे।
माधुरी घर वापस आ गई लेकिन उनका मन बहुत बेचैन रहता था। उन्हें मानसिक आघात लगा था वे गुमसुम रहने लगी, मैं भी उदास रहता था और कुंतल को वापस बुलाने के उपाय खोजता रहता था लेकिन कुछ न सूझता। एक दिन मेरे मित्र रमाकांत मिश्रा ने मुझे बताया कि तमिलनाडु के राज्यपाल श्री पी॰ राममोहन राव अपनी बहन से मिलने बिलासपुर आए हुए हैं, क्यों न उनकी मदद ली जाए ! हम दोनों उनसे मिलने उनके बहनोई श्री अशोक राव के घर गए और अपनी व्यथा बताई। श्री राव ने कहा- 'मैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव को जानता हूँ, उन्होंने मुझे अपने आश्रम के कार्यक्रम में बुलाया भी था लेकिन मैं नहीं जा पाया। सद्गुरु जग्गी वासुदेव की निकटतम सहयोगी भारती जी के पति मुझसे मिलते रहते हैं, उनकी मदद से सद्गुरु तक आपकी बात पहुंचाई जा सकती है।'
'यह ठीक रहेगा, आपके कहने से यदि बात बन जाए तो आपकी बहुत कृपा होगी। कुंतल का आश्रम जाने का निर्णय हम पर बहुत भारी पड़ गया, उनकी माँ बेचैन हैं। हम यह चाहते हैं कि कुंतल योग प्रशिक्षक के रूप में काम करते रहें और अपनी पारिवारिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे।' मैंने कहा।
'आप एक कागज पर लिखकर दीजिए, मैं वहाँ बात करता हूँ।' राज्यपाल महोदय ने कहा।
ऐसे प्रभावशाली सूत्र और राज्यपाल महोदय के सहयोगी रुख से हमारी हिम्मत बंधी लेकिन आप तो जानते हैं कि जब विपरीत समय आता है तो अनुकूल प्रयास भी प्रतिकूल परिणाम देने लगते है। राज्यपाल महोदय को न जाने क्या सूझी उन्होने मेरे पत्र को कोयंबत्तुर के कलेक्टर को टीप लगाकर भेज दिया, कलेक्टर ने पुलिस अधीक्षक को और पुलिस अधीक्षक ने थाना-प्रभारी को। आश्रम में जांच के लिए पुलिसबल पहुँच गया और वहाँ के ब्रह्मचारियों, सन्यासियों और संचालकों से गहन पूछताछ करने लगा। अब, पुलिस कैसे जांच करती है, इसका अनुमान आपको होगा ही।
उस दिन कुंतल संभवतः चेन्नई में थे। आश्रम से जब उन्हें पुलिस-कार्यवाई की खबर मिली तो उन्होने मुझे फोन किया- 'पापा, आपने राज्यपाल से आश्रम के बारे में शिकायत की क्या ?'
'नहीं तो।' मैंने उत्तर दिया।
'पुलिस आश्रम में आई हुई है, मुझे अभी खबर मिली है। पुलिसवाले बता रहे हैं कि वे आपकी ही शिकायत पर जांच करने आए हैं।'
'मैं राज्यपाल महोदय से मिला था और उनसे निवेदन किया था कि मध्यस्थता करके तुम्हें वहाँ से मुक्त करवाएँ, परंतु मेरे पत्र में आश्रम के विरुद्ध शिकायत का एक भी शब्द नहीं है।'
'पर वहाँ तो तमाशा बन गया, मेरा भी।'
'ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।'
'जो हो गया सो हो गया लेकिन इसके बाद अगर इस ढंग की कोई बात हुई तो याद रखिए आपसे मेरा संपर्क हमेशा के लिए टूट जाएगा, आपको पता भी नहीं लगेगा कि मैं कहाँ हूँ।'
'जी, मैं समझ गया।' मैंने पिता होने के अहंकार को तिरोहित करते हुए कहा।
जांच के बाद कलेक्टर ने कुंतल को अपने कार्यालय में बुलाया। कलेक्टर ने पूछा- 'क्या आप अपनी मर्जी से यहाँ आए हैं या आप पर कोई दबाव है ?'
'मैं अपनी मर्जी से यहाँ आया हूँ।' कुंतल ने उत्तर दिया।
'आप माता-पिता के इकलौते पुत्र हो, इस तरह उन्हें छोडकर आश्रम क्यों आ गए ?'
'घर में रहता तो केवल माता-पिता की सेवा करता, यहाँ मुझे बहुत सारे माता-पिता की सेवा करने का अवसर मिला है। मुझे सब में अपने माता-पिता ही दिखते हैं।' कुंतल ने बताया।
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हमारे तीन में से दो बच्चे व्यवस्थित हो गए, संगीता बिटिया का विवाह हो गया, कुंतल आश्रम चले गए, अब घर में हमारे साथ छोटी बिटिया संज्ञा बची जो अपना भविष्य सँवारने में लगी हुई थी। संज्ञा का बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में दिल नहीं लगता था लेकिन 'सिविल सर्विस' प्रतियोगिता से जुडने के बाद उनमें पढ़ाई के प्रति अभूतपूर्व लगन जगी। अपने तेज दिमाग का समुचित प्रयोग करती संज्ञा को देख कर हम लोगों को बहुत खुशी होती थी। संज्ञा काम-काज करने में भले धीमी थी लेकिन किसी से काम लेने में उसे महारत हासिल थी, यदि वे किसी प्रशासनिक सेवा में प्रविष्ट हो जाती तो उनका स्वभाव और प्रभाव बहुत अनुकूल रहता। सन 2003 की छत्तीसगढ़ शासन की सेवाओं हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षा में भरपूर उम्मीद के बावजूद सफलता नहीं मिली, वे दोषपूर्ण 'स्केलिंग' की शिकार हो गई। फिर यह तय हुआ कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रयत्न किया जाए इसलिए उन्होंने इलाहाबाद और दिल्ली जाकर मार्गदर्शन लिया। इसी दौरान उन्हें दिल्ली में कोचिंग करते समय एक साथी मिल गया जिसे जीवनसाथी बनाने का मन बनाया और प्रतियोगिताओं से दूर एक गृहस्थन की परीक्षा देने का निर्णय ले लिया।
संज्ञा विवाह-योग्य हो गई थी, लड़का भी उन्होने खुद ही खोज लिया, चार्टर्ड एकाउंटेंट था। बच्चे अपनी पसंद का विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है, यह बात ठीक थी लेकिन विवाह फोकट में तो होते नहीं। मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार न था इसलिए विवाह को टालने में ही भलाई समझ आई। यद्यपि खबर यह थी कि लड़के ने अपने परिवार वालों को अपनी पसंद की लड़की से विवाह के लिए राजी कर लिया है लेकिन हड़बड़ी का कुछ गलत मतलब न निकल जाए इसलिए मैं उस ओर से किसी गंभीर संकेत की प्रतीक्षा में था और वे लोग संभवतः 'लड़के वाले' होने के कारण पहल करने में हिचक रहे थे, परिणामस्वरूप मामला लटका रहा। इधर दोनों प्रेमी रोज रात घंटों तक मोबाइल में लटके रहते और मैं सोचता कि ये लोग सब बातें अभी कर लेंगे तो शादी के बाद बात करने के लिए भला क्या बचेगा !
हमारा होटल कुछ आगे बढ़ा लेकिन देनदारी इतनी अधिक थी कि घर का खर्च और ब्याज पटाने में ही खप जाता। कई बार बैंक की किश्त अनियमित हो जाती तो सेंट्रल बैंक के शाखा प्रबंधक का फोन आता जिसमे उसके अपमानजनक उद्गार को सुनकर चुप रह जाना पड़ता और 'फोन पटक कर' रखने की आवाज़ भी सुनता जो आज भी मेरे कानों में गूँजती है। जेब में पैसा न हो तो इंसान को बहुत सहना पड़ता है, चुप रहना पड़ता है।
संज्ञा के जन्मदिन के अवसर पर संज्ञा के संभावी श्वसुर ने एक रिस्टवाच भेजी जिससे हमें संबंध की बातचीत आगे बढ़ाने का संकेत मिल गया लेकिन फिर भी हमारी हिम्मत न पड़े। मेरे भय के दो कारण थे, एक तो मैं आपको बता चुका, हमारा घनघोर धनाभाव और दूसरा हमारे संभावी समधी पुलिस सेवा में थे। हम व्यापारी वर्ग के लोग पुलिस आफिसर और इन्कम टैक्स आफिसर से थर-थर कांपते हैं क्योंकि न जाने कब इनके दिमाग का बिगुल बज उठे और इनकी तलवार म्यान के बाहर निकल जाए ! आप आश्चर्य करेंगे, खरबूजा प्रजाति का यह व्यापारी समुदाय इन लोगों को अपने पारिवारिक उत्सव में निमंत्रण देने तक में हिचकिचाता है। दीवाली के अवसर पर 'लिफाफा' और मिठाई देने इनके घर जाएगा लेकिन शादी-ब्याह की निमंत्रण-सूची में इनका नाम नहीं लिखता, हाँ, कुछ बहुत पुरानी जान-पहचान या 'सेटिंग' हो तो अलग बात है। 'इनसे दूरी बनी रहे, उसी में भलाई है'- यह सोच कर उनके यहाँ संबंध की बात आगे बढ़ाने में मेरा जी घबरा रहा था।
मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि फोन पर दोनों प्रेमी इतनी अधिक बातें कर रहे हैं, कुछ दिनों में ऊब जाएंगे तो किस्सा अपने-आप फुस्स हो जाएगा लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला।
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मेरी होटल की जिस छत पर प्रतिदिन धूप आती थी, कभी-कभी पानी भी बरसता था, इस बीच 'किरपा' भी बरसी। छत पर 'एयरटेल' की 'सेटेलाइट टावर' की स्थापना हो गई जिसके किराये से प्रत्येक माह बैंक की किश्त देने की स्थायी व्यवस्था बन गई और उस अशिष्ट शाखाप्रबंधक का तगादा आना बंद हो गया।
दिन बीतते जा रहे थे या यूं कहें, गुजरते जा रहे थे। रोज सुबह जागना, हॉटल जाना, रात में सो जाना, बस, ऐसी ही ज़िन्दगी चल रही थी। कोई चमत्कार होने से रहा जो ज़िन्दगी को चमका दे, यह मनगणित ज़रूर चलता था कि संज्ञा के विवाह के खर्च की व्यवस्था कैसे बनेगी ! इसी चक्कर में लगभग एक साल टल गया लेकिन न मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आया और न हमने विवाह की बात आगे बढ़ाई। उनसे फोन पर हुई बातचीत के अनुसार एक दिन मैं संज्ञा और उनकी मम्मी के साथ संभावी दामाद के घर पहुँच गया। स्वागत-सत्कार हुआ, कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान हुआ, उन्होंने हमें और हमने उन्हें देखा। वहाँ संभावी दामाद के वयोवृद्ध दादाजी भी मिले जो बेहद रोचक और खूब सारी बातें करने वाले मज़ेदार इंसान थे। वे मूल रूप से हरियाणा के थे, उन्होंने मुझे अपने बचपन और युवावस्था की वे बातें बताई जिन्हें सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने यह भी कहा- 'आप लड़की वाले हो, आपको तो हमने अपने बगल में कुर्सी पर बैठाया है, हमारे हरियाणा में लड़की वाले को जूते के पास बैठाते हैं।' उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ क्षणों के लिए सन्नाटे में आ गया फिर ठहाका मारकर हंस पड़ा, लड़की का बाप जो ठहरा !
लौटते समय संज्ञा को संभावी सास ने कान के बुंदे दिए। हम सब प्रसन्न-मन लौट आए और समझ गए कि इस संबंध को अब और अधिक टाला नहीं जा सकता। मैंने लिखित प्रस्ताव भेज दिया। कुछ दिनों बाद मुझे समधी जी का फोन आया कि वे सपरिवार रतनपुर की महामाया के दर्शन के लिए बिलासपुर होकर जाएंगे इसलिए हम भी सपरिवार उनके साथ चलें। साथ बन गया, सबने महामाया के दर्शन किए और जब वापस लौटे तब मैं और समधी जी मेरी 'मारुति 800' में आए और शेष परिवार उनकी शासकीय गाड़ी में। रास्ते में समधी जी ने बातों-बातों में मुझसे कहा- 'आपसे एक बात कहनी है।'
'जी, कहिए।' मैंने कहा।
'आप लड़की के पिता हैं, लड़कियां अपने पिता के दिल के करीब होती हैं और कहा भी मानती हैं।'
'जी।'
'आप संज्ञा को समझाएँ कि वह हमेशा हमारे संयुक्त परिवार से जुड़कर रहे, अलग घर बसाने की बात मन में न लाए। अगर हमारा बेटा कभी कहे, तब भी।' वे बोले। कुछ देर के लिए मैं चुप रह गया, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दूँ ? उनकी बात को नकारा नहीं जा सकता था, उनकी अपेक्षा उचित थी लेकिन बच्चों के पारिवारिक भविष्य के बारे में मैं 'कमिटमेंट' कैसे कर सकता था ?
'भाई साहब, 2 + 2 = कितना होता है ?' मैंने उनसे पूछा।
'चार।' वे आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे।
'आप सही हैं लेकिन 2 + 2 = 22 हो सकता है और 0 भी।'
'मैं समझा नहीं।'
'जीवन गणित के नियमों से नहीं चलता। कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। कौन साथ देगा, कौन साथ छोड़ देगा, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। मेरे बेटे कुंतल का उदाहरण देखें, वह त्रिची में इंजीनियर बनने गया और पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबाजी बन गया, आश्रम चला गया। कल का क्या पता ?
'यह 'एक्सेप्नल केस' है।'
'जी, आप सही हैं लेकिन मैं यह मानता हूँ कि किसी से उम्मीद करने का कोई लाभ नहीं। आपने केदार शर्मा की फिल्म 'चित्रलेखा' में साहिर लुधियानवी का लिखा गीत सुना होगा- "उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे, जन्म मरण का संग है सपना ये सपना बिसरा दे, कोई न संग मरे, मन रे, तू काहे न धीर धरे।" मैंने उन्हें समझाया। बात करते-करते बिलासपुर आ गया, वे सब कुछ देर के लिए हमारी लाज में पधारे, फिर अपने घर के लिए रवाना हो गए।
कुछ दिनों बाद भावी समधी जी का फोन आया- 'आइए, विवाह के बारे में बातें करनी है।' अगले दिन मैं उनसे मिलने निकल पड़ा और सुबह साढ़े नौ बजे ट्रेन से उनके शहर पहुँच गया। स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने इधर-उधर अपनी नज़र घुमाई, उनकी गाड़ी मुझे लेने के लिए आने वाली थी, नहीं दिखी इसलिए मैं एक आटो में बैठकर उनके गेस्ट हाउस में पहुँच गया जहां वे अस्थाई रूप से निवास कर रहे थे। नमस्कार की औपचारिकता के पश्चात उन्होंने पूछा- 'आपको 'रिसीव' करने के लिए गाड़ी भेजी थी, मिल गई ?'
'मैंने खोजा लेकिन मुझे दिखी नहीं।' मैंने कहा।
'अरे, मैंने ड्राइवर से गाड़ी लगाने के लिए कहा था !'
'कोई बात नहीं, ड्रायवर भूल गया होगा। मैं आटो से आ गया।' मैंने कहा।
विवाह के कार्यक्रम पर विस्तार से विचारों का आदान-प्रदान हुआ फिर उन्होंने पूछा- 'आपका बजट क्या है ?'
'पाँच लाख।' मैंने घबराते हुए उत्तर दिया।
'ठीक है, आप 'चार' हमें 'कैश' दे दीजिए, 'एक' आप अपने खर्च के लिए रख लीजिए।' उन्होंने कहा।
'ठीक है।' मैंने कहा।
बात करते-करते दोपहर का एक बज गया। मैंने पूछा- 'तो मैं चलूँ, मुझे अनुमति दीजिए।'
'ओह, अब तो खाने का समय हो गया ! असल में, यहाँ मेरे लिए 'मेस' से खाना आता है, अतिरिक्त खाने के लिए किचन में बताना पड़ता है लेकिन मैं तो वहाँ खबर करना भूल गया। सुबह हमारे बेटे ने मुझसे पूछा भी था लेकिन मुझे आपके लिए खाना बोलने का ध्यान ही न रहा।' उन्होंने कहा।
'तो क्या हो गया, आपका खाना आएगा न ? उसी में हम दोनों खा लेंगे।' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। हम दोनों ने मिलकर भोजन किया और उनसे विदा ली। लौटते वक्त ट्रेन में बैठे-बैठे मैं अपने बारे में सोच रहा था- 'लड़की का बाप....बेचारा।'
घर वापस आकर मैंने माधुरी को पूरा वार्तालाप बताया तो वे मुझ पर भड़क गई- 'तुम्हारे पास भूँजी-भांग खरीदने के लिए पैसा नहीं है, इतना कहाँ से लाओगे ?'
'यार 'सी.ए॰' लड़कों का 'रेट' पंद्रह लाख चल रहा है, मैं तो केवल पाँच बोल कर आया।' मैंने अपने बचाव में कहा।
'वो ठीक है, वादा कर आए हो तो कब भेजोगे ?'
'जब इंतजाम हो जाएगा।'
'कब होगा ?'
'क्या पता !'
'अजीब आदमी हो तुम, 'क्या पता' बोलने से हो जाएगा ?'
'हो जाएगा।'
'कैसे ?'
'देखो, जब मैं छोटा था, 'पेंड्रावाला' मिठाई दूकान में बैठता था तब दो फकीर सड़क के बीचों-बीच अपने हाथों में तासा लिए खैरात मांगते थे। उनमें से एक फकीर ज़ोर से आवाज़ लगाता- 'दे दे मौला।' दूसरा फकीर धीरे से बोलता- 'अल्लई (अल्लाह ही) देगा।' मैंने उन दोनों को कभी भी किसी की दूकान में जाकर या रुककर मांगते नहीं देखा। जिसको देना होता, वह खुद चलकर उनके पास जाता और उनके तासा में सिक्के डालता।'
'तुम्हारे कहने का क्या मतलब ?'
'अल्लई देगा।' मैंने हँसते हुए कहा, वे मेरे चेहरे को बड़ी देर तक घूरती रही।
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ज़िंदगी का सफर है ये कैसा सफर
भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन है, ये सभी रस साहित्य, नृत्य और सामान्य भावाभिव्यक्ति में इस तरह रच-बस गए हैं कि इनके गूढ़ार्थ सहज ही सबको समझ आ जाते हैं। एक और रस है जो इन उल्लेखित रसों में उद्घाटित नहीं हो पाया है- वह है- 'बतरस।' आदि-काल से बतरस का प्रभाव हमारे जनजीवन में अति-व्यापक रहा है। बतरस गंभीर वार्तालाप है, भाषण देना-सुनना है, प्रवचन-सत्संग है, निःशुल्क मनोरंजन है और मनुष्य के पेट में उठे दर्द को दूर करने की दवा भी है।
मेरे बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया की गद्दी में अधिकतर समय उनके मित्रों और परिचितों की बैठक चलती जिसमें भाग लेने के लिए लोग पैदल या साइकल-स्कूटर चलाते या कार में बैठकर नियमित रूप से आते, घंटों विविध विषयों पर बातचीत होती, बहस होती, कहा-सुनी होती और उस बीच में चाय-नास्ता का दौर चलता। अपने विचार सभी लोग व्यक्त करते लेकिन स्वाभाविक रूप से स्थल व चाय-नास्ता मुहय्या करवाने वाले को बोलने का अवसर अधिक मिलता और उसकी बात का वजन अधिक होता। हमारे परिवार के पुरुषों को इस रस का निर्मल आनंद उठाते मैंने बचपन से युवावस्था तक नियमित देखा तो उसका असर मुझ पर भी पड़ा। यद्यपि बड़ी महफिल सजाने का चस्का नहीं लगा लेकिन आपसी संवाद करने का शौक लगातार बढ़ता गया। बचपन में बातचीत के विषय थे- हमारे मास्साब और पढ़ाई, किशोरावस्था में फिल्में, युवावस्था में लड़कियां और प्रौढ़ावस्था में राजनीति और साहित्य।
यूं तो बतरस वाली दोस्ती असंख्य लोगों से रही है लेकिन कुछ लोग मेरे जीवन में ऐसे रहे जिनके साथ बातें करते मेरे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता जिसमें सर्वोच्च हैं मेरी 'बेस्टेस्ट फ्रेंड' माधुरी। उनके अतिरिक्त किशोरावस्था के मित्र- (स्व॰) लक्ष्मीनारायण शर्मा; और सुधीर खंडेलवाल; वयस्क-प्रौढ़ वय के मित्र- (स्व॰) पंडित मुरलीधर मिश्र, (स्व॰) प्रोफेसर बी॰के॰ श्रीवास्तव, (स्व॰) भागवत प्रसाद दुबे, (स्व॰) राम किशन खंडेलवाल, (स्व॰) कुतुबुद्दीन भारमल, (स्व॰) महेश भट्ट, (स्व॰) इंदर सोंथलिया, (स्व॰) रमाकांत मिश्र; और बजरंग लोहिया, जगत नारायण तिवारी, सतीश जायसवाल, कान्तिलाल जोबनपुत्रा, वी॰एस॰तैलंग, डा॰ महेश कासलीवाल, चन्द्रशेखर जालान, सुभाष दुबे, जगदीश दुआ, बजरंग केडिया, विनोद मिश्र, विवेक जोगलेकर आदि कुछ और भी। मित्रों के इस समूह के साथ बैठकर आपस में विभिन्न विषयों पर होती चर्चा से प्राप्त परम-आनंद के क्या कहने ! वह जीवंनदायी बतरस था जो बहुत कुछ सिखाता, व्यक्तित्व विकसित करता, प्रतिकूल परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत देता, मार्ग दर्शन देता, दुख कम करता और कभी-कभी हँसाता भी था। जब भी प्रतिकूल मनस्थिति में मेरे दिमाग को लकवा लगने जैसा लगता तब ये लोग मेरे विवेक-रक्षक-साथी थे। मैंने इतने बुरे दिन देखे कि यदि इन मित्रों का साथ न होता तो मैं किसी पागलखाने में होता या किसी तेजी से आती ट्रेन के आगे खड़ा होकर अपने प्राण दे चुका होता।
कठिन समय में इनका साथ बहुत साथ देता था, इनकी बातें भी साथ देती थी। बातें करने से दिल बहल जाता था, थोड़ा 'डायवर्सन' हो जाता था और दिल को दिलासा भी। कुछ मित्र तो मुझसे इतनी दूर चले गए कि अब उनसे मिलना न होगा लेकिन कुछ का साथ अभी भी बना हुआ है।
श्री बजरंग केडिया मुझसे दस वर्ष बड़े हैं, सौभाग्य से मित्रवत है। उनसे दिल की बातें निःसंकोच की जा सकती हैं, वे मुझे 'प्रेक्टिकल' सलाहकार से लगते हैं। एक दिन अपनी चिन्ता का बोझ लिए मैं उनके घर पहुंचा, मेरी समस्या को वे गौर से सुने और बोले- 'देखो द्वारिका, मैं तुमको एक बात बताता हूँ, किसी लड़की की शादी आज तक पैसों की कमी के कारण नहीं रुकी। सब इंतजाम हो जाता है, कैसे हो जाता है, पता नहीं ! तुम मानो, हर लड़की इस संसार में अपना भाग्य लेकर आती है।'
एक दिन भावी समधी जी का एसएमएस आया- 'मेरा तालाब सूख गया है उसमें जल भरें।' मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। अब मैं क्या जवाब देता ? मेरे नल से तो पानी की जगह हवा निकल रही थी, उसमें से 'सूँ-सूँ' की आवाज़ आ रही थी, इस आवाज़ से तो समधी जी का सूखा तालाब भरने से रहा। और तो और, एक दिन भावी दामाद का भी फोन पर तगादा आ गया- 'क्या हुआ ?'
उधर वे हमसे हलाकान थे और इधर हम खुद से परेशान। विवाह की तिथि जितनी नजदीक आती जा रही थी, चिन्ता उतनी बढ़ती जा रही थी। हमारी हालत उस किसान की तरह थी जो अपनी सूखती फ़सल को बचाने के लिए बारिश के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहा हो और बादलों का कोई अता-पता न हो। मुझे निष्क्रिय और निश्चिंत देखकर माधुरी झल्ला उठती- 'क्या कर रहे हो तुम ?'
'कुछ नहीं।' मेरा बुझा सा उत्तर उसे और बुझा देता। उन्होंने मुझसे कहा- 'मेरे गहने 'बैंक लाकर' से निकाल लो, बेचो और झंझट खत्म करो।'
'उतने से भी काम नहीं बनने वाला।'
'फिर ?'
'देखते हैं।' मैंने तथागत गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठे-बैठे उत्तर दिया।
एक दिन सुबह दस बजे मैं अपने एक पुराने सहपाठी के घर पहुँच गया। हम दोनों हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे। मुझे देख उसने पूछा- 'आओ द्वारिका, आज अचानक, इतनी सुबह ?' मैंने अपनी समस्या बताई तो उसने कहा- 'फिक्र मत कर, तेरा काम हो जाएगा, रुक तेरे लिए चाय बनवाता हूँ। कैसी चाय पिएगा, शक्कर वाली या बिना शक्कर वाली ?'
'शक्कर वाली, ज़रा कडक।' मैंने कहा। हम दोनों के लिए चाय आई, मेरे लिए कड़ी-मीठी और उसके लिए बिना शक्कर वाली।
घर आकर मैंने माधुरी को बताया- 'पैसे का इंतज़ाम हो गया।'
'अरे वाह, किसने दिया ?'
'फकीरों ने।'
'फकीरों ने ?'
'हूँ, फकीरों ने कहा था न, 'अल्लई देगा', उसी ने दिया।' मैंने बताया।
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इसके कुछ दिनों बाद हमारी लाज़ में एक ग्राहक आए, रीवा (मध्यप्रदेश) से, पंडित अखंड प्रताप नारायण मिश्र, अपनी बेटी को राज्य सेवा की परीक्षा दिलवाने। दो-तीन दिन रुके, परिचय बढ़ा, उनकी बातचीत की शैली प्रभावित करने वाली थी। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अगले माह बेटी का विवाह है। उन्होंने मुझसे पूछा- 'कुंडली मिलवा ली है न ?'
'हमें लड़के की कुंडली नहीं दी गई, लेकिन उनका जन्म समय और स्थान मालूम था इसलिए उस आधार पर कंप्यूटर से मिलान करवाया था, कुछ दोष हैं, पर चलता है।' मैंने बताया।
'एक बार मुझे दिखाएंगे क्या, अगर आप उचित समझें ?'
'क्यों नहीं।' मैंने उन्हें दोनों कुंडली दी, उन्होंने कुछ देर दोनों का अध्ययन किया और मुझसे बोले- 'अग्रवाल जी, मेरी राय है कि आप यह संबंध न करें।'
'क्यों ?' मैंने प्रश्न किया। उन्होंने संज्ञा के वैवाहिक भविष्य और ससुराल के बारे में कई ऐसी बातें बताई जो चिंताजनक थी, नकारात्मक दिशा में जा रही थी। मैं सोच में पड़ गया। दुविधा अज़ब थी, एक तरफ हमारी बेटी का प्यार और दूसरी तरफ हमारा अपनी बिटिया से प्यार !
'जो होगा, सो होगा पंडित जी, अब इस विवाह को रोकना हमारे लिए असंभव है।' मैंने कहा।
'तो जैसा प्रभु ने रच रखा है, होने दीजिए, सब उनकी माया है।' वे गंभीर होकर बोले।
नियत तिथि पर दोनों परिवार एकत्रित हुए, वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए और हमने अपनी बिटिया को विदा किया। हमें खुशी थी कि हम अपनी बेटी के प्यार को सुखद परिणिति तक ले जाने में सहयोग कर सके।
पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म 'नीलकमल' (1968) में रफी साहब ने साहिर लुधियानवी का लिखा यह मार्मिक गीत गाया था, इसे सरसरी निगाह से नहीं, जरा डूब कर पढिए:
'बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰
नाज़ों से तुझे पाला मैंने
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको
बाहों में मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की ऐ नाज़ुक डाली
तुझे हर पल नई बहार मिले॰
जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों में हंसी की धूप खिले
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी ज्योति न हो फीकी
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले॰
बीते तेरे जीवन की घड़ियाँ
आराम की ठंडी छांव में,
कांटा भी न चुभने पाए कभी
मेरी लाडली तेरे पाँव में,
उस द्वार से सब दुख दूर रहे
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले॰
बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰'
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जीवन की घटनाएँ क्या हमारे अनुमान के अनुरूप घटती हैं ? अनुमान से थोड़ा कम या ज़्यादा तो ठीक है लेकिन जब सब एकदम विपरीत हो तो अपनी ही अक्ल और समझदारी पर संदेह होने लगता है। अगर अक्ल पर दोष देने की हिम्मत न हो तो फिर 'भाग्य का लिखा' तो है ही। जिस छोटे से संसार में हम रहते हैं, उसी छोटी सी सीमा में लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, जानने-समझने की कोशिश करते हैं, सम्बन्धों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह सब अनुमान ही रहता है, इन अनुमानों का सटीक निकलना 'मेरी होशियारी' है और यदि अनुमान गलत निकल गए तो 'मैं नहीं, वह गलत' है।
खुशी-खुशी विदा हुई संज्ञा की खुशियाँ अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। उसके बाद हमें ऐसा लगने लगा कि हमारे अनेक जन्मों के पाप के फल हमारे जीवन में दौड़ते चले आ रहे हैं। इतना कष्ट, इतना अपमान, इतना डर, इतनी लाचारी, इतनी उपेक्षा, इतनी बेहूदगी, इतनी नासमझी, इतनी गाली-गलौच मेरे इतने लंबे जीवन में न देखी, न सुनी और न जानी। वह सब देख लिया जो पुरानी पारिवारिक फिल्मों में देखा करता था, आश्चर्य है, आज की पढ़ी-लिखी दुनिया में वैसा ही चल रहा है ! उस दौरान जो नरक-यातना हमने भुगती, उसे आपको कैसे बताऊँ ?
न बता पाने की एक वैधानिक मजबूरी भी है, विवाह के तीन वर्ष बाद हमारे दामाद जी ने हमारी बेटी पर 'घरेलू क्रूरता' का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी और कुछ दिनों बाद उन्होंने कुटुंब न्यायालय में संज्ञा के विरुद्ध तलाक़ हेतु केस दायर कर दिया। चूंकि प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए विवाह के बाद की घटनाएँ बताना न्यायोचित नहीं है। वैसे, आपके लिए आगे की कथा बुनने के लिए विकल्प खुला है, आप दो तरीके से कहानी को आगे बढ़ा सकते हैं- एक- 'हमारी बेटी ने ससुराल वालों को सताया' या दो- 'ससुराल वालों ने हमारी बेटी को सताया'। प्रकरण दायर किए हुए अब लगभग सात वर्ष हो चुके हैं। आप जानते हैं कि समय की गति तेज होती है और न्याय की गति धीमी, न जाने कितना और समय लगेगा क्योंकि अभी इस न्यायालय के बाद उच्च न्यायालय है, फिर सर्वोच्च न्यायालय है ! जिस अदालत में हत्यारों और चोर-उचक्कों की भीड़ खड़ी रहती है वहाँ उनके इर्दगिर्द मेरी बेटी अपनी छोटी सी बेटी के साथ जज की होने वाली पुकार की प्रतीक्षा करते खड़ी रहती है क्योंकि उसने किसी से प्रेम करने का अपराध किया था। आज भी वे उसी पति से प्रेम करती हैं, उसी के साथ रहना चाहती हैं लेकिन उनका प्रेमी अब ऐसा पति बना दिया गया है जो उनके साथ नहीं रह सकता। हमारी नातिन अनन्या अब बड़ी हो गई है और इतना समझने लग गई है कि 'कुछ गड़बड़ है' लेकिन वह संभवतः यह नहीं समझ पा रही होगी कि 'मम्मी-पापा के बीच यह कैसी कट्टी है जो अगले दिन मिट्ठी में नहीं बदलती, हम बच्चे तो अगली मुलाक़ात में सुलह कर लेते हैं ?'
जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं चुपचाप अपने जीवन की लहरों के उतार-चढ़ाव को देख रहा हूँ, सच बताऊँ, अब मुझ पर बाह्य परिस्थितियों का असर कम ही होता है। वैसे, बहुत से लोगों से तबीयत के साथ जिरह करने की तमन्ना है लेकिन इस अदालत में नहीं, 'उस' अदालत में करूंगा।
हमें खुशी है कि हमारी बेटी हमारे साथ है, हमारी आँखों के सामने है और साथ में उनकी हँसती-खेलती बेटी अनन्या भी जो अब नौ वर्ष की होने जा रही है। इन वृद्ध कंधों में अभी भी इतनी शक्ति है कि अपनी बेटी और उनकी बेटी का भार, निर्भार समझ कर उठा सकता है। इस खुशी के साथ-साथ हमारे हृदय में एक अदृश्य पीड़ा भी समानान्तर में चल रही है जिसे वे माता-पिता आसानी से समझ सकते हैं जिनकी बेटी ससुराल में मर-खप गई हो या उनसे बचकर उनके घर वापस आ गई हो। आप भी इस अनुभूति को महसूस कर सकते हैं, बशर्ते, आप हमारी बेटी को अपनी बेटी मान लें तो उस अकथनीय पीड़ा के शब्द आप तक अपने-आप पहुँचने लगेंगे।
राजिन्दर किशन ने इस गीत में मेरी व्यथा को कम शब्दों में ही पिरो दिया :
'कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !
मुझको बर्बादी का कोई गम नहीं
गम है बर्बादी का क्यूँ चर्चा हुआ !
देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ !
कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !'
ठंडी हवाएँ
इस बीच एक भीनी-भीनी सी खुशबू 29 नवंबर 2004 को हमारे परिवार में प्रविष्ट हुई- 'मैना', केदारनाथ और संगीता की बिटिया। मैना के आगमन से हम दोनों नाना-नानी बन गए। कुछ दिनों बाद केदारनाथ और संगीता को रायपुर के शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिल गई तो इंदौर को छोडकर रायपुर आ गए। रायपुर से बिलासपुर की दूरी महज़ 115 किलोमीटर है इसलिए उनके पास हमारा आना-जाना सुविधाजनक हो गया।
जैसे-तैसे दिन बीतते जा रहे थे। कर्ज़ चुकाने में एक पुश्तैनी जमीन, दद्दाजी के द्वारा दिया गया भूखंड और माधुरी के आभूषण बिक गए। यद्यपि लाज का काम बढ़ रहा था लेकिन धीरे-धीरे, प्रशिक्षण कार्यक्रम भी हो रहे थे लेकिन यदा-कदा, जितनी आय होती थी वह देनदारी के आगे एकदम बौनी लगती, समुद्र के सामने नदी की क्या औकात ?
कुंतल ईशा फाउंडेशन के आश्रम में ही रम गए, हम लोग समझ गए कि उनको अपने परिवार में वापस लाना संभव नहीं है। संज्ञा के विवाह का निमंत्रणपत्र सद्गुरु को देने के लिए हम लोग कोयंबत्तुर स्थित आश्रम गए, सद्गुरु जग्गी वासुदेव से मिले। माधुरी ने सद्गुरु से कहा- 'कुंतल आपके पास आ गया है, मुझे अच्छा नहीं लगता।'
'ये बताओ, कुंतल नौकरी करता तो कितने दिन आपके पास रहता ? दो-चार दिन के लिए ही घर आता।' सद्गुरु ने प्रश्न किया।
'जी, आप ठीक कह रहे हैं।'
'तो फिर ? जब भी आपका मिलने का मन हो, यहाँ आ जाओ और मिल लिया करो। जितने दिन चाहो, यहाँ रह सकती हो।'
'संज्ञा के विवाह के कार्यक्रम में उसे दो-चार दिन के लिए भेज दीजिए।'
'मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन वह जिस मार्ग पर आगे बढ़ रहा है, ऐसे कार्यक्रमों में जाने से उसे मदद नहीं मिलेगी।' उन्होंने समझाया।
'ठीक है, मैं उसे आपको सौंप कर जा रही हूँ, आज से आप उसके पिता हैं।' माधुरी ने कहा। सद्गुरु मुस्कुराए। हम लोगों ने उनका आशीर्वाद लिया और घर वापस आ गए। संज्ञा का विवाह कुंतल की अनुपस्थिति में हुआ, कुंतल की कमी हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ ने पूरी कर दी। पूरे कार्यक्रम में उन्होंने घर के लड़के की तरह अपूर्व दायित्व और लगन के साथ हमारा साथ दिया।
हमें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि आखिर वह कौन सा आकर्षण है जिसने कुंतल को इस दुनियादारी से विमुख कर दिया ! उनका स्वभाव और व्यवहार आम युवाओं जैसा था। हमारे परिवार के जीने का तरीका फाँके-मस्ती का था, टीवी और सिनेमा देखना, हँसना-गाना-नाचना, चिढ़ना-चिढ़ाना- खुला-खुला सा। 'गंभीरता' जैसा कोई काम नहीं, कोई आध्यात्मिक या धार्मिक माहौल भी न था फिर कुंतल इतने गंभीर प्रयोजन के लिए कैसे उद्यत हो गए, यह हमारे लिए जिज्ञासा का कारण रहा। मैंने और माधुरी ने सोच-विचार कर तय किया कि इस प्रश्न का उत्तर आश्रम की गतिविधियों से जुड़कर ही मिल सकेगा इसलिए वहाँ हमने आना-जाना शुरू किया।
उस आवागमन में एक अद्भुत कार्यक्रम में सहभागिता का अवसर मिला, उसका नाम था- 'Wholeness'. आठ दिवसीय इस कार्यक्रम में आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियाँ सिखाई गई। दिन भर में मुश्किल से छः घंटे का शयन, एक घंटा दैनिक क्रियाएँ , दो घंटे भोजन और पंद्रह घंटे का प्रशिक्षण।
पहला दिन सामान्य रहा लेकिन अगले दिन मेरी कमर में असहनीय पीड़ा आरंभ हो गई। मेरी कमर में दर्द की शिकायत विगत दस वर्षों से चली आ रही थी, योगासन सीखते समय झुकने से उसमें झटका लगा और मैं अपूर्व पीड़ा के कारण बेचैन हो गया। न बैठते बने, न चलते बने लेकिन प्रशिक्षक मेरी तकलीफ को समझने के लिए तैयार न थे। अपना दर्द बताया तो बोले- 'Carry on...no pain, no gain.' आप बताइए, एक इंसान दर्द के कारण हिल नहीं पा रहा है और वे कह रहे हैं- 'Carry on...'। प्रशिक्षक मुझे किसी क्रूर खलनायक जैसे लगने लगे, बताओ भला, यहाँ हिलते-डुलते नहीं बन रहा है और उधर से आदेश है- 'केरी ऑन' !
योग प्रशिक्षण का कार्यक्रम कोयंबत्तुर के वेलियंगिरी पहाड़ की तलहटी में बसे पुंडी ग्राम में स्थापित ईशा योग केंद्र के स्पंद सभागार में चल रहा था जिसमें लगभग तीन सौ स्त्री-पुरुष योग की प्राचीन विधा को सद्गुरु जग्गी वासुदेव के मार्गनिर्देशन में मनोयोग से सीख रहे थे। उस समूह में मेरे साथ माधुरी भी थी। माधुरी भाषागत समस्या से जूझ रही थी क्योंकि कार्यक्रम अंग्रेजी भाषा में संचालित हो रहा था, अंग्रेजी से अनभिज्ञ माधुरी निर्देशों को समझ नहीं पा रही थी लेकिन अन्य प्रतिभागियों को देखकर अभ्यास कर रही थी। सद्गुरु के प्रवचन उन्हें समझ में नहीं आ रहे थे इसलिए वे परेशान थी। वहीं पर मैं अपने कमर के दर्द से हैरान था, मैं कामचलाऊ अंग्रेजी जानता हूँ, सभी निर्देश समझ रहा था लेकिन मेरा शरीर उस अंग्रेजी भाषा को नहीं, केवल कमर की पीड़ा को ही समझ रहा था।
कार्यक्रम के मध्य में अवसर मिलने पर मैं सभागार से चुपचाप भाग कर आवासीय परिसर में अपने कमरे में जाकर लेट गया। मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा, 'कालबेल' बजी, मैंने दरवाजा खोला, एक विदेशी षोडशी कन्या बाहर खड़ी थी, उसने मुझसे कहा- 'प्रणाम।'
'प्रणाम।' मैंने उत्तर दिया।
'मैं योग कार्यक्रम की 'वालिंटियर' हूँ, लेबनान से आई हूँ।' उसने अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात शुरू की।
'जी ?'
'आप कार्यक्रम छोड़कर 'स्पंद' सभागार से यहाँ क्यों आ गए ?'
'पहले आप अंदर आइये, बैठिए। दरअसल, मैं कमर के दर्द से परेशान होकर यहाँ आ गया, मुझसे योगासन करते नहीं बन रहा था।' मैंने बिस्तर पर लेटते हुए बताया।
'क्या बहुत दर्द है ?'
'हाँ, बहुत अधिक।'
'क्या मैं आपके कमर में दवा लगा दूँ ?' वह अपने साथ 'वोलिनी आइंटमेंट' और दर्दनाशक गोलियां लेकर आई थी।
'ठीक है, लगा दीजिए।' मैंने कहा और अपने अधोवस्त्र ढीले करके पेट के बल लेट गया। उसने दवा लगाई, दस मिनट रुक कर पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'पहले से बेहतर।'
'एक 'टेबलेट' खा लीजिए, मैं पानी लेकर आती हूँ ।' उसने मुझे दवा खिलाई, पुनः दस मिनट शांत बैठी रही फिर उसने पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'थोड़ा और अच्छा।'
'तो फिर उठिए, खड़े हो जाइए और मेरे साथ सभागार में चलिए।'
'पर मैं नहीं चल पाऊँगा!'
'आप मेरे साथ चलिए तो, मैं आपको सहारा देकर ले चलूँगी, कोशिश कीजिए, बन जाएगा।' उसने आग्रह किया, मेरे पास उसके साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैं उसके कंधे का सहारा लेकर दर्द से कराहता सभागार की ओर चल पड़ा।
सभागार में मैं अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गया और वहाँ फिर वही किस्सा- 'केरी ऑन.....।'
मैं योग कार्यक्रम से जुड़ा रहा, जैसा भी बना, करता रहा। योगासन करने में असुविधा थी लेकिन प्राणायाम और ध्यान सीखने में कोई परेशानी न थी। दिनोंदिन वातावरण समृद्ध होता जा रहा था, इतने सारे लोग मिलजुलकर जब किसी विधा को सीखते हैं तो सब एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं और ऊर्जा को परस्पर संचरित भी करते हैं। हमने हठयोग, शक्तिचलन क्रिया और शून्य ध्यान का क्रमबद्ध अभ्यास किया। उस दौरान इस बात का एहसास होता रहा कि उम्र अधिक हो जाने के कारण हमारे शरीर का लोच कम हो गया है इसलिए योगासन करना कठिन लगता है, हमारा शरीर साथ नहीं देता। वैसे, कार्यक्रम के दौरान हमारा आहार इस विधि से नियोजित किया गया ताकि शरीर हल्का रहे और योगासन करना सुविधाजनक हो।
यौगिक क्रियाओं के अतिरिक्त प्रतिदिन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के आध्यात्मिक प्रवचन होते थे जिन्हें सुनना मेरे लिए अपूर्व अवसर था। प्रवचन के पश्चात जिज्ञासु प्रश्न करते थे जिनके उत्तर सद्गुरु के उत्तर हास्यबोध से आरंभ होते और सरल उदाहरणों के सहारे गंभीर निष्कर्ष तक पहुँचते। उनकी बातों में आध्यात्म के साथ ब्रह्माण्ड, विज्ञान, धर्म, और मानवीय व्यवहार की परत-दर-परत चर्चा होती जिसे सुनकर मुझे जीवन शैली और व्यवहार की नई दिशाएँ समझ में आई। उनका विस्तृत ज्ञान, अँग्रेजी भाषा का अद्भुत प्रयोग और उनकी वाणी का प्रभाव मेरे जीवन के लिए अहोभाग्य जैसा था।
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पांचवे दिन सुबह 9 बजे वेलियंगिरी पर्वत के शिखर तक पैदल चढ़ाई करनी थी। हमें तीन विकल्प दिए गए थे, एक- पर्वतारोहण करना है, दो- जो पर्वतारोहण न करना चाहें वे आश्रम की चतुर्दिक पदयात्रा करें, और तीन- जो दोनों के लिए तैयार न हों वे अपने कमरे में आराम करें। तीसरे विकल्प ने मुझे प्रसन्न कर दिया और उस बड़े समूह में मैं अकेला व्यक्ति था जिसने कमरे में आराम करने वाला विकल्प चुना !
उस दिन सुबह नित्य की भांति छः बजे से अभ्यास आरंभ हुए। तीन घंटे बाद नौ बजा, सब लोग पर्वतारोहण के लिए उत्सुक थे और मैं उनके चेहरे की प्रसन्नता को देखकर कुढ़ रहा था- 'ये लोग वहाँ जा रहे हैं और मैं नहीं जा पा रहा हूँ।' अनायास मेरे मन ने कहा- 'चल, चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।' मैंने माधुरी से कहा- 'मैं भी चलूँगा।
'कैसे चढ़ोगे तुम ? तुम्हारी कमर का दर्द ?' माधुरी ने पूछा।
'दर्द तो है, लेकिन तुम सब लोग पर्वत-शिखर पर जाओगे, मस्ती करोगे और मैं यहाँ बिस्तर पर पड़ा रहूँगा !'
'रास्ते में तुम्हारी परेशानी बढ़ गई तो ?'
'वह मेरी नहीं, सद्गुरु की समस्या है, वे करेंगे व्यवस्था।'
'तो, फिर चलो।' वे बोली।
मैंने पर्वतारोहण के लिए खास तौर से उपलब्ध कराए गए जूते पहने और सबके साथ निकल पड़ा। शिखर तक पहुँचने के लिए कोई सड़क न थी, पगडंडियाँ थी, अगल-बगल झाड़-झंखाड़ थे, छोटे-बड़े टीले थे, तीखी चढ़ाई थी, सब एक के पीछे एक ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे थे। एक युवा 'वालेंटियर' मुझे सहारा देने के लिए मेरे आसपास अनवरत चलते रहे। कुछ देर बाद तेज बारिश शुरू हो गई, राह में फिसलन हो गई, कपड़े भीग गए लेकिन किसी प्रकार अपने दर्द को दरकिनार करते हुए मैं चढ़ता ही रहा। लगभग साढ़े तीन घंटे की पदयात्रा के बाद मैं पर्वत के शिखर पर पहुँच ही गया जबकि माधुरी और अन्य कई लोग मेरे वहाँ पहुँचने के पंद्रह-बीस मिनट बाद वहाँ पहुँचे। उस दिन मैंने अपनी शारीरिक पीड़ा से भिड़कर संघर्ष किया और यह जाना कि कुछ भी असंभव नहीं और यह भी समझ आया कि हौसले की कभी हार नहीं होती। पर्वत-शिखर पर पहुँच कर मैं जी भर कर नाचा, वे मेरे लिए खुशी के क्षण थे...आप बताइये, थे कि नहीं ?
शिखर पर हमारे भोजन की व्यवस्था थी, सद्गुरु का प्रवचन भी हुआ। तीन घंटे रुक कर हम लोग वापस लौटे, वही पथरीला-फिसलन भरा रास्ता, वही हिम्मत, वही 'वालेंटियर' का सहारा, ढाई घंटे में तलहटी पर उतर आए। वहाँ से हम सब स्पंद सभागार में प्रविष्ट हुए, मैं थक कर चूर हो चुका था, चुपचाप पैर फैलाकर लेटने का मन हो रहा था लेकिन प्रशिक्षक ने निर्देश दिया- 'सब लोग आसन करना आरंभ करें।' फिर वही- 'केरी ऑन !'
शिखर पर हमारे भोजन की व्यवस्था थी, सद्गुरु का प्रवचन भी हुआ। तीन घंटे रुक कर हम लोग वापस लौटे, वही पथरीला-फिसलन भरा रास्ता, वही हिम्मत, वही 'वालेंटियर' का सहारा, ढाई घंटे में तलहटी पर उतर आए। वहाँ से हम सब स्पंद सभागार में प्रविष्ट हुए, मैं थक कर चूर हो चुका था, चुपचाप पैर फैलाकर लेटने का मन हो रहा था लेकिन प्रशिक्षक ने निर्देश दिया- 'सब लोग आसन करना आरंभ करें।' फिर वही- 'केरी ऑन !'
यह बात जुलाई 2007 की है, उसके बाद कुछ और आध्यात्मिक अनुभवों से मुलाक़ात हुई जिसे आगे बताता रहूंगा। मैं प्रतिदिन दो घंटे का समय पदयात्रा, योगासन और प्राणायाम को देता हूँ। योग से जुड़ने के कारण दवाओं से दूरी बन गई है। कैंसर का मरीज हूँ इसलिए उससे भी लड़ने-भिड़ने में मदद मिलती है लेकिन कैंसर तो कैंसर है, कहने को इसे राजरोग कहा जाता है पर इसे राजा हो रंक, सबको लपेटना आता है ! जिसे भी बीमारी के प्रारम्भिक काल में समुचित उपचार नहीं मिला फिर समझिए उसका अंतकाल आ पहुंचा।
कैंसर ने मुझ पर फिर से हमला किया। सन 2008 में उसी गाल के अंदर पुनः कैंसर के लक्षण उभरे जिस गाल की 2002 में 'सर्जरी' हुई थी। यद्यपि मैं बीच-बीच में अपनी जांच करवाते रहता था, डाक्टर कहते थे- 'चार साल बीत गए, अब आप 'सेफ' हैं', लेकिन फिर मुसीबत आ खड़ी हुई। मेरे सर्जन डा॰ दीपक अग्रवाल ने कहा- 'द्वारिका प्रसाद जी, इस बार आपकी गहरी सर्जरी होगी, दाढ़ निकाली जाएगी और 'मेंडिबल' भी काटकर निकाला जाएगा। हड्डी काटकर अलग करने के कारण आपका चेहरा अजीब सा हो सकता है और उसके बाद आपकी 'रेडियोथेरेपी' भी करनी पड़ेगी।'
मेरे देखने में आया था कि जिस व्यक्ति की भी कैंसर की दोबारा सर्जरी हुई, वह अधिक दिनों तक नहीं जी पाया। मुझे समझ में आ रहा था कि मेरा बचना अब मुश्किल है, केवल दुर्दशा बची है इसलिए मैंने परिवारजनों को अपना निर्णय सुनाया- 'जब तक चलूँगा, तब तक चलूँगा, अब सर्जरी और रेडियो थेरेपी नहीं करवाऊँगा।' मुझे छोड़ कर घर में सब चिंतित थे लेकिन संगीता और केदार मेरी बात मनाने वालों में से नहीं थे, दोनों ने इंदौर में मेरी सर्जरी 'फिक्स' कर दी और मुझे शल्यक्रिया के लिए पुनः मजबूर कर दिया गया।
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जीवन चलने का नाम
कैंसर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2002 में हुई थी, छः वर्ष बाद फिर हो गई। अब तक दोनों बेटियाँ ब्याह गई थी, कर्ज़ पट गए थे, माधुरी लाज का काम-काज सीख-समझ गई थी इसलिए मुझे अपने जीवन से विदा लेने में कोई असुविधा नहीं थी। रही बात कष्ट की, सो जितनी तम्बाखू खाई थी, उसका जो मज़ा लिया था तो फल भी मुझे ही भुगतना था। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी थी लेकिन 40-50 पृष्ठ ही लिखे गए थे, मैं चला भी जाता तो भी कुछ खास बात नहीं थी, करोड़ों आत्मकथाएँ अधलिखी या बिनालिखी चिता की अग्नि में स्वाहा हो गई, मेरी भी हो जाती।
असल में जून 2008 में ही मेरे मुंह में पनप रहे कैंसर ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। चौबीस घंटे कनपटी, दाढ़ और कान में तीखे दर्द का एहसास बना रहता था। मैंने दो माह तक होम्योपैथी दवा ली लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हो रहा था। 2 अगस्त को भोपाल के लायन्स क्लब में आयोजित 'केबिनेट मीटिंग' में मुझे 'संगठन प्रबंधन' पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था। मुँह में दर्द बहुत अधिक था, बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी आयोजक को किए गए वादे से मुकरना मुझे नापसंद था इसलिए दर्द की दशा में मैं भोपाल गया और दो घंटे की प्रस्तुति दी। पूरे चेहरे में दर्द और बढ़ गया। भोपाल से मैं जबलपुर चला गया और अपने भांजे डा॰ विकेश अग्रवाल से सलाह ली। उन्होंने मुझे आंकोलाजिस्ट डा॰ अर्पण मिश्रा को दिखाया। डा॰ मिश्रा ने रोग के तेजी से बढ्ने की चेतावनी और तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? निर्णय लेने की किसी भी चूक का परिणाम घातक हो सकता था। मैं कैंसर से लड़ने की बजाय उसे तटस्थ भाव से देखना चाहता था जबकि संगीता और केदार मुझे यह आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने इंदौर में 21 अगस्त को सर्जरी निश्चित करवा ली। पहली सर्जरी में हुआ भयानक कष्ट मुझे याद था, अगली सर्जरी और भी गहरी और गंभीर होने वाली थी। संभावित पीड़ा की कल्पना से मैं रह-रहकर काँप उठता लेकिन मेरे सामने दो ही विकल्प थे, या तो सर्जरी का तात्कालीन कष्ट सहूँ या मृत्यु की प्रतीक्षा का अनिश्चितकालीन कष्ट। अंततः मैंने सर्जरी को चुना।
एक दिन मैंने बाज़ार से आधा किलो छेने का चमचम खरीदा, घर लाया और डब्बा खोलकर खाने बैठा गया। माधुरी जी मुझे मीठा खाते देखकर चौंक गयी क्योंकि पिछले कई वर्षों से मैं मीठा नहीं खा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा- 'अरे, मिठाई खा रहे हो?'
'हाँ.' मैंने ठंडा सा उत्तर दिया.
'कैसे? तुम तो चाय तक बिनां शक्कर की पीते हो, आज क्या हो गया?'
'मैंने देखा है कि जिसे भी दोबारा कैंसर होता है, वह नहीं बचता। मुझे लगता है कि मेरा समय भी पूरा हो चुका है।'
'तुम कैसी बातें कर रहे हो? कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा लेकिन आज यह मिठाई खाने की क्या सूझी?'
'मैंने सोचा, अब आखिरी समय है, सब सब खा-पी कर मरूं.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब मरने का समय आएगा तो अतृप्त इच्छाओं के कारण मेरी आँखों के सामने बालूशाही, जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन नृत्य करेंगे। संभव है कि इसी वज़ह से अगले जन्म में मैं फिर हलवाई बन जाऊं! यार, अगले जन्म में हलवाई नहीं बनना मुझे.'
'इसलिए मीठा शुरू?'
'यस, आज से मीठा शुरू.' मैंने हंसते हुए कहा.
18 अगस्त की शाम को संगीता का फोन आया और उसने मुझे अगली सुबह 'सेकेंड ओपीनियन' हेतु मुंबई चलने के लिए कहा। 19 अगस्त की सुबह की 'फ्लाइट' से हम मुंबई पहुँच गए और मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल के आंकोलाजी विभाग में डा॰ मंदार देशपांडे के सामने बैठे थे। अस्पताल नया था, हाल-हाल में शुरू हुआ था जबकि डाक्टर पुराने और अनुभवी किन्तु युवा थे। डा॰ मंदार देशपांडे को मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में मुँह की शल्यक्रिया का दीर्घ अनुभव था, अब वे इस अस्पताल में कार्यरत थे। डा॰ देशपांडे ने मेरी जांच की, इंदौर की रिपोर्ट देखी और कहा- 'अंकल, आपकी सर्जरी करनी पड़ेगी, 'सुप्रा मेजर सर्जरी' होगी। गाल खोलकर हड्डी निकालनी होगी और फिर 'प्लास्टिक सर्जरी' से उसे आपकी जांघ से मांस का टुकड़ा निकालकर वहाँ जोड़ेंगे ताकि आपका चेहरा एक तरफ धंसा हुआ न दिखे। चेहरा एकदम जस का तस नहीं बन पाएगा, या तो एक तरफ थोड़ा दबेगा या बढ़ सकता है। '
'ठीक है।' मैंने कहा।
'सर्जरी के बाद आपको बारह से चौदह दिनों तक अस्पताल में रहना होगा और छुट्टी होने के बाद लगभग दो माह मुंबई में ही रुकना पड़ेगा ताकि आपकी रेडियोथेरेपी की जा सके।'
'मैं सर्जरी करवाने के लिए तैयार हूँ लेकिन रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करवाऊंगा।'
'मेरा अनुमान है कि सर्जरी के पश्चात रेडियोथेरेपी तो करनी पड़ेगी।'
'फिर मुझे न सर्जरी करवानी है न रेडियोथेरेपी, मैं चलता हूँ, आपको धन्यवाद।'
'मैं एक बात कहूँ अंकल ?'
'जी कहिए।'
'आप अगर मेरे पापा होते तो मैं यह 'चांस' अवश्य लेता।'
'आपने बहुत गभीर बात कह दी।'
'जी, मैं अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे रहा हूँ कि आप सर्जरी और रेडियोथेरेपी के लिए खुद को तैयार करें।'
'तो फिर ठीक है, कर दीजिए, कब करेंगे ?'
'आज आपकी 'बायप्सी' ले लेते हैं, आठ दिनों में रिपोर्ट आ जाएगी, उसके तीन दिन बाद आपकी सर्जरी।'
'डाक्टर साहब, अच्छा, यह बताइए, बायप्सी क्यों करते हैं ?'
'कैंसर 'कंफर्म' करने के लिए।'
'आपने अभी मेरा गाल 'चेक' किया, आपको ऐसा लगता है कि कुछ 'कंफर्म' करने की ज़रूरत है ?'
'आपको कैंसर है, पक्का है, यह मुझे दिख रहा है लेकिन 'पेशेंट' की और अपनी तसल्ली के लिए बायप्सी करवाते हैं।'
'क्यों आप आठ दिन का समय निरर्थक नष्ट कर रहे हैं ? आप कल मेरी सर्जरी कर दीजिए।'
'ऐसा क्या ?' डाक्टर ने पूछा।
'जी, शुभस्य शीघ्रम।' मैंने कहा।
डाक्टर देशपांडे ने कहा- 'आज आप 'एडमिट' हो जाइए, कल दिन में आपके कुछ 'टेस्ट' होंगे और यदि 'ओ टी' खाली होगा तो परसों सर्जरी। उन्होंने 'ऑपरेशन थियेटर इंचार्ज' को फोन लगाया, इंचार्ज ने बताया- '21 को 'ओ टी' खाली नहीं है।'
'कोशिश करो, शायद कोई सर्जरी 'शिफ्ट' हो।' डाक्टर ने उनसे कहा। हमसे कहा- 'ऑपरेशन 21 को न हो सका तो 22 को करेंगे, आप आज रात को भर्ती हो जाइए, कल से आपका 'प्रोसीजर' शुरू कर देंगे।'
'सही है।' मैंने कहा।
फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोरकुमार ने एक मज़ेदार गाना गाया था- 'जाते थे जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए न ?' इसी तरह मुझे सर्जरी के लिए इंदौर जाना था लेकिन मैं मुंबई पहुँच गया। रात को जब भर्ती होने के लिए काउंटर पर गए तो मालूम हुआ कि 'सुप्रा मेजर सर्जरी' का 'ट्विन शेयर' में पैकेज दो लाख पचहत्तर हजार का है और एक लाख अस्सी हजार रुपए अभी जमा करना है तब 'एडमिशन' होगा। हमने अस्पताल में स्थापित एटीएम से साठ हजार निकाल लिए लेकिन रात को दस बजे शेष एक लाख बीस हजार कहाँ से आते ? उस समय हमारे मित्र रमेश जोबनपुत्रा के बहनोई रजनीकान्त गढ़िया, जो मुंबई में रहते हैं, हमारे साथ थे, वे बोले- 'आधे घंटे रुकिए, मैं अपने घर से लेकर आता हूँ।'
रात को ग्यारह बजे मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था, लेटते ही 'प्रोसीजर' शुरू हो गया। 20 अगस्त को माधुरी और केदार मुंबई आ गए। दिन भर 'स्केन', 'एक्स-रे', खून-पेशाब-एड्स' आदि की जांच हुई। डाक्टर देशपांडे ने शाम को फोन किया- 'आपकी सारी रिपोर्ट मेरे कंप्यूटर पर आ गई है, सब 'नार्मल' है। कल सुबह जिस 'पेशेंट' की सर्जरी होनी थी, 'सुगर' बढ़ने के कारण 'पोस्टपोन' हो गई है। आपकी सर्जरी के लिए 'ओ टी' खाली मिल गई, कल सुबह सात बजे आपको तैयार रहना है। ऑल द बेस्ट।'
21 अगस्त की सुबह मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय माधुरी, संगीता और केदारनाथ ने शुभकामना संकेत दिए, मैंने भी मुस्कुराकर वापसी संकेत किए। 'स्ट्रेचर' पर लिटाकर मुझे 'प्री सर्जरी रूम' में ले जाया गया, वहाँ और भी कई मरीज लेटे हुए जो अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। बहुत देर तक मैं वहाँ लेटा रहा, निर्विकार भाव से, बीच-बीच में उठकर अन्य मरीजों को देखता और फिर वापस लेट जाता। तब ही अनेस्थेटिस्ट डा॰ अपर्णा दाते मेरे समीप आई औए बोली- 'अंकल, चलें ?'
'मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूँ, चलिए।' मैंने उत्तर दिया। कुछ देर बाद मैं एक शानदार ऑपरेशन थिएटर की तेज रोशनी वाली लाइट के नीचे लेटा हुआ था। डा॰ दाते ने हाथ की नस में धीरे से एक 'इंजेक्शन' लगाया, उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या पता ! 'आंकोलाजिस्ट डा॰ मंदार देशपांडे और प्लास्टिक सर्जन डा॰ चारुदत्ता चौधरी ने मेरी सर्जरी की। हमारी बिटिया संगीता को भी ओटी में अपने पापा की सर्जरी देखने का अवसर मिला।
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'हूँ, देखो, मैं हूँ।' मुझे आवाज सुनाई पड़ी। मैंने आंखे खोली, सामने माधुरी खड़ी थी। उनकी आँखों से प्रसन्नता उमड़ रही थी, होठों में मुस्कान और चेहरा आश्वस्त। मैंने अपने बाएँ हाथ से उनके गाल छुए, उन्होंने मेरे हाथ की गदेलियों को अपनी दोनों गदेलियों से लपेट लिया। मेरी आँखें भर आई, गला रूँध गया, हम दोनों के मध्य एक मौन संभाषण हुआ। उस संभाषण को शब्दों में कैसे बताऊं ? मेरे मुंह में रुई ठुँसी हुई थी, किसी तरह बुदबुदाते हुए मैंने उनसे पूछा- 'ऑपरेशन कब तक चला ?'
'क्या पता, तुम दस घंटे बाद बाहर आए, कल की बात है, अब कैसा लग रहा है ?' माधुरी ने प्रश्न किया। मैंने अपने दाहिने अंगूठे से तर्जनी को जोड़कर इशारा किया जिसका अर्थ था- 'बढ़िया।' तीन-चार मिनट की इस छोटी सी मुलाक़ात को मैं अपने जीवन भर सँजोकर रखूँगा। यह हम दोनों के पुनर्मिलन जैसा था। कुछ देर बाद आई॰सी॰यू॰ में संगीता आई, उसने पूछा- 'कैसे हो पापा ?' मैंने अपनी पलकें झपकाकर कुशल होने का संकेत दिया और एक हाथ उठाकर गाल को छू लिया। मेरे उस स्पर्श में उनके द्वारा किए गए अपूर्व प्रयासों के लिए आभार, शाबासी और न जाने क्या-क्या भाव थे !
'पापा, मैं तीन घंटे तक आपकी सर्जरी में खुद खड़ी रही, बहुत अच्छा ऑपरेशन हुआ है आपका, डा॰ देशपांडे और डा॰ चौधरी ने शानदार काम किया।' संगीता ने बताया। कुछ देर बाद हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ मुझे देखने आए, मुझे देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे।
हम सबने मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जम कर लोहा लिया। अभी तक सब अनुकूल था लेकिन सर्जरी के बाद होने वाली रेडियोथेरेपी का दैत्य मेरे सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था जिसकी डरावनी गूंज मुझे अनवरत सुनाई पड़ रही थी।
दोपहर को 'प्लास्टिक सर्जरी' विशेषज्ञ डा॰ चारुदत्ता मुझे देखने आए, मेरी जांच की और मुझे बताया- 'आपकी जांघ से निकाले गए मांस के जिस टुकड़े को चेहरे में 'ग्राफ्ट' किया गया था, वह सक्रिय हो गया है।' शाम को डा॰ मंदार देशपांडे मुझे देखने आए, उन्होंने मेरे मुंह के अंदर की रुई को बाहर निकाल दिया और पूछा- 'अंकल, कैसे हो।' मैंने इशारे से अपने ठीक होने का संकेत दिया तो उन्होंने कहा- 'बोलकर बताइए।' कुछ अस्फुट आवाज मेरे गले से निकली, वे मुझे और अधिक बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। मेरी प्रगति से वे संतुष्ट दिखे, उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ, आपकी 'रिकवरी' भी ठीक है, आज रात आपको आई॰सी॰यू॰ में रखेंगे, कल सुबह रूम में शिफ्ट करेंगे।' मैंने उनसे बीती रात का हाल बताया और हाथ जोड़कर कहा- 'डाक्टर साहब, मैं इस यातनागृह में अब और नहीं रहना चाहता, मुझे आज ही कमरे में शिफ्ट कर दीजिए ताकि मैं रात को आराम से सो सकूँ।' सहृदय डाक्टर ने मेरी बात मान ली और रात को नौ बजे मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
आई॰सी॰यू॰ की रात वाली बात को छोड़ दिया जाए तो बारह दिनों के उस अस्पताली आवास को भुलाया नहीं जा सकता। डाक्टरों की लगातार देखरेख, आत्मीयतापूर्ण बातचीत, नर्स और अन्य स्टाफ का अनथक परिश्रम, उत्कृष्ट साफ-सफाई और स्वादिष्ट भोजन और पेय की जितनी प्रशंसा के जाए, कम है। सब काम एकदम समय पर, किसी से कुछ कहने या याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, मुझे वहाँ सम्पूर्ण व्यवस्थित प्रबंधन का व्यावहारिक रूप देखने के लिए मिला। सभी लोग अच्छे थे। नगालैंड से आई एक नर्स जिसका नाम था- बेबी, उसका व्यवहार और सरोकार आज भी याद आता है।
मेरे आई॰सी॰यू॰ से बाहर आने के बाद माधुरी और केदारनाथ घर वापस चले गए। संगीता मेरी देखरेख के लिए मेरे साथ रही। इस बीमारी की पहचान से उपचार तक संगीता ने जिस सक्रियता से मेरी सेवा-सुश्रूषा की, मुझे लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, बेटा है।
29 अगस्त को सर्जरी के दौरान गाल से निकाले गए अंदरूनी टुकड़ों की जांच के परिणाम आ गए। कैंसर का प्रभाव आरंभिक और एक ही स्थान पर केन्द्रित था इसलिए डाक्टर ने मुझे 'रेडियोथेरेपी' करने की जरूरत से मुक्त कर दिया और 1 अक्तूबर की सुबह अस्पताल से छुट्टी मिलने का संकेत दे दिया। 30 अगस्त की शाम को ही अस्पताल में 'डिस्चार्ज' की तैयारी शुरू हो गई। पूर्व में ही हमें 2,75,000/- सर्जरी का 'पैकेज' बताया गया था और हमने उस बीच पूरी राशि जमा कर दी थी। जब संगीता 'बिल काउंटर' में भुगतान करने गई तो हमारी सर्जरी का कुल 2.44,000/- का 'बिल' बना। आश्चर्यचकित संगीता ने पूछा- 'आप कुछ भूल तो नहीं रहे हैं ?'
'नहीं, 'पेशेंट' पर हास्पिटल का खर्च इतना ही हुआ है।' उन्होंने कहा और 31,000/- वापस कर दिए।
जब संगीता ने मुझे इस बात को बताया तो कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल की ईमानदारी पर मैं विस्मित सा हो गया। चिकित्सा जगत में व्याप्त लूट-खसोट के विपरीत उनका व्यवहार अविश्वसनीय लगा। मैं अपने शहर बिलासपुर में अखिल भारतीय स्तर के एक ख्यातिलब्ध ग्रुप के हास्पिटल की कारस्तानी को याद कर रहा था जहां अधिकतर मरीजों की बीमारी के साथ घिनौना खिलवाड़ किया जाता है, मृत मरीज के परिवारजनों को जीवन की उम्मीद की लालच में 'वेंटिलेटर' पर रखकर बिल बढ़ाने के लिए जिंदा बताया जाता है। मरीज के गैर ज़रूरी मंहगे परीक्षण इसलिए करवाए जाते हैं ताकि अस्पताल की आय बढ़े ! इलाज का अनाप-शनाप बिल बढ़ा कर उनकी मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाया जाता है !
महत्वपूर्ण यह है कि संगीता आश्चर्यचकित क्यों हुई, मैं विस्मित क्यों हुआ ? ईमानदारी तो हमारा स्वाभाविक व्यवहार होना चाहिए। यही ईमानदारी किसी संस्थान की ख्याति में वृद्धि करती है, यही ईमानदारी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है तो फिर यह भावना अब दुर्लभ क्यों होती जा रही है ? चिकित्सा का कार्य व्यापार नहीं, सेवा और सहानुभूति का कार्य है। इस 'मिशन' का तानाबाना मानवीय संवेदनाओं के धागों से बुना हुआ है, इन धागों का टूटना भविष्य के संभावित खतरों की दुखदायी आहट है।
वहाँ से सुरक्षित वापस आने के दो वर्ष बाद पुनः कैंसर ने मुझपर आक्रमण किया लेकिन इस बार दाएँ नहीं, बाएँ गाल पर। फिर वही कष्टदायक सर्जरी, वही हास्पिटल नंबर वन, वही डाक्टर नंबर वन, वही नर्सिंग नंबर वन, वही देखरेख नंबर वन और वही साथ मेरी अर्धांगिनी माधुरी और मेरे बेटी संगीता और दामाद केदारनाथ का।
सन 1971 में मैंने एक फिल्म देखी थी- 'आनंद', जिंदगी और मौत से हँसता-गाता संघर्ष। फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने उस कथानक को ऐसा चित्रित किया था कि कैंसर जैसी भयावह बीमारी जैसे एक कविता बन गई जिसने सबको रुलाया और वह अविस्मरणीय बन गई।
तब मुझे मालूम न था कि वह कहानी मेरे जीवन में यथार्थ के रूप में घटित होगी। आठ वर्षों के अंतराल में कैंसर के तीन तीव्र आक्रमण मुझ पर हुए। इस गंभीर बीमारी का मैंने किस तरह सामना किया, उसे मेरे डाक्टर, परिवारजन और कुछ अंतरंग जानते हैं।
फिल्म 'आनंद' का नायक राजेश खन्ना उन संकट के घड़ियों में हर समय मेरे आस-पास रहा, मुझे संभालता रहा, मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा। प्रचंड पीड़ा के दौरान उनके मुसकुराते चेहरे ने मुझे कैंसर से जूझने में बहुत मदद की जो आज भी जारी है। धन्यवाद हृषिकेश मुखर्जी, आभार राजेश खन्ना। एक दिन सभी को जाना है लेकिन ज़िंदगी में संघर्ष किस तरह किया जाता है- आपने सिखाया है।
असलम हसन की इस कविता पर गौर करें :
'कितना मुश्किल है
आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है॰
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर बाहर रंग-बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है
फिक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिन्द मचल जाना॰
कितना सख्त है
नर्म होना
मोम होना
और पिघल जाना॰
कितना आसाँ है
दिल का जाना
दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना।'
==========
सब कुछ सीखा हमने
'मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के...' इस चेतावनी के बाद भी मैंने अपने अतीत को मुड़ कर देखा। बहुत मज़ा आया जैसे कोई पुरानी फिल्म लंबे अर्से के बाद देखने को मिली हो। पीछे मुड़कर देखने में कोई खतरा न था लेकिन उसे लिपिबद्ध करके सार्वजनिक करने में कई खतरे थे। मैंने इस खतरे को उठाने का खतरा लिया, यह प्रयास अतीत के व्यतीत को समझने में सहायक सिद्ध हुआ।
उम्मीदों की जमीन पर परिवार बने है, रिश्ते-रिश्तेदारी है, दोस्ती और जान-पहचान है, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारा, मस्जिद व अन्य प्रार्थना गृह निर्मित किए गए हैं। इन्हीं उम्मीदों को हासिल करने के लिए गुरु की खोज की जाती है, ईश्वर की कल्पना की गई और भगवत्ता की अवधारणा का आधार भी। ये उम्मीदें ही इन्सान की ज़िंदगी को थामने वाली डोर हैं। मनुष्य को सुख चाहिए, सुख को महसूस करने के लिए दुख भी ज़रूरी हैं जबकि हम सब जानते हैं कि दुख की वज़ह उम्मीदें हैं और उम्मीदें तो रहती ही हैं। ये सब भ्रम है, जीने के बहाने हैं।
'निकले थे घर से हम तो खुशी की तलाश में
गम राह में खड़े थे वो ही साथ हो लिए
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए।'
बचपन से अब तक की घटनाएँ जो हुई, वही तो होनी थी ! ज़्यादा कुछ तो जन्म से पहले तय हो जाता है, माँ का गर्भ, पिता, भाई-बहन और हमारा जन्मस्थान, क्या इन्हें बदलना हमारे हाथ में है ?
हमारे आसपास के सभी लोग अपनी सोच और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार करते हैं, हमारी उम्मीदों के अनुरूप नहीं। सच पूछें तो हमारी मदद और हमारी रुकावट, दोनों आसपास के लोग ही हैं। यह हमारी दक्षता है कि हम उनकी मदद ले पाते हैं या रुकावट शिरोधार्य करते हैं। यहाँ पर हमारा स्वभाव सक्रिय भूमिका निभाता है, हमारा स्वभाव यदि 'अपना काम निकालने' वाला है तो येन-केन-प्रकारेण अपने लिए मदद हासिल कर लेंगे, उसके लिए खुशामद कर लेंगे, गाली खा लेंगे, चरणचुंबन कर लेंगे, मान-मनव्वल कर लेंगे या फिर धमका भी सकते हैं पर अपना काम करवा लेंगे। वहीं पर हमारा स्वभाव यदि संकोची है तो मदद लेना बहुत दूर की बात है, मदद के लिए किसी से कहने में भी लज्जा आती है। वह सोचता है- 'हमारे कष्ट को सामने वाला समझे तो अच्छी बात है अन्यथा जो है वह सही है।' इस प्रकार संकोची व्यक्ति अपने मान-अपमान के चक्कर में चुप रह जाता है, अपनी तकलीफ नहीं बताता परिणामस्वरूप उसके कष्ट स्वकेंद्रित हो जाते हैं और उन्हें वह अकेले भुगतता है।परिवार में संवाद की कमी से व्यवस्था बिगड़ती है। हमारे जमाने में एकांगी संवाद का प्रचलन था, अर्थात बोलता वही था जिसे बोलने का स्वाभाविक अधिकार था, मसलन, घर का मुखिया या जिसके हाथ में तिजोरी की चाबी है, या जो आक्रामक स्वभाव का है, शेष सब श्रोता थे। इस वज़ह से घर में तानाशाही का वातावरण होने के कारण चर्चा या विमर्श का अभाव था, केवल कथन और श्रवण होता था। जब तक बातचीत का अनुकूल वातावरण विकसित नहीं होता, कैसे एक-दूसरे की समस्या को समझा जाएगा और उनका समाधान खोजा जाएगा ?
जिन परिवारों में बातचीत का लोकतान्त्रिक माहौल है, वहाँ सब लोग मिलजुल कर आगे बढ़ते हैं और एक दूसरे से सरोकार रखते हैं। किसी एक व्यक्ति का विकास सबका उत्तरदायित्व होता है और किसी व्यक्ति की समस्या पूरे परिवार का सरोकार। आधुनिक युग में परिवारों में बेहतर माहौल विकसित हो रहा है जिसमें खुलकर बात करने की सुविधा है और सब एक दूसरे का सुख-दुख समझते हैं जो परिवार के समग्र विकास के लिए परम आवश्यक है।
हमारी जीवन शैली में श्रम को कष्ट का पर्याय क्यों माना जाता है, यह बात समझ के बाहर है। कोई किसानी कर रहा है या मजदूरी, नौकरी कर रहा है या व्यापार, इन जीवनयापन के कार्यों को कष्ट से जोड़ना अजीब है। 'किचन' में भोजन या नाश्ता बनाना, 'हाउस कीपिंग' करना, बाजार से राशन या साग-सब्ज़ी की खरीददारी करना जैसे जीवनोपयोगी कार्य भी परिश्रम की श्रेणी में आ गए हैं। पैदल चलना, योग-व्यायाम करना, जिम जाना कष्टसाध्य लगता है। दरअसल, जीवन के आरंभ से ही हमें 'आराम ही सुख है' की समझाइश मिली जिसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य काम न करने के रास्ते खोजने का विशेषज्ञ बन गया और शनैः शनैः आलसी और कामचोर बन गया। इसी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य अपनी क्षमता का समुचित प्रयोग नहीं कर पाता और 'काम न करने' का स्वभाव विकसित हो जाने के कारण उसकी प्रगति की राह स्वयं-अवरुद्ध हो जाती है। यद्यपि स्कूलों में युवाओं को सक्रिय करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन कालेज पहुँचते-पहुँचते शारीरिक सक्रियता कम होती जाती है और अधिकाँश युवा 'केरियर' बनाने के चक्कर में अपनी कुर्सी-टेबल में कैद हो जाते हैं फलस्वरूप शारीरिक श्रम करने का अभ्यास कम होते जाता है। इस आलस्य के मनोविज्ञान ने न केवल मनुष्य की असीमित व्यक्तिगत क्षमता का ह्रास किया वरन सम्पूर्ण समाज को भी गंभीर क्षति पहुंचाई है।
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समाज में अब दो वर्ग विकसित हो गए हैं, पहला वर्ग है गंदगी करने वाला, यह समर्थ वर्ग है जिसे गंदगी या कचरा फैलाने में कोई संकोच नहीं है। चूंकि उनकी जेब में पैसे हैं इसलिए वे इस धृष्टता को अपना अधिकार समझते हैं और उन्हें मालूम है कि कोई दूसरा व्यक्ति आएगा जो सफाई करेगा। इस वर्ग के अच्छे-खासे, पढे-लिखे लोग गंदगी फैलाने के मामले में अनपढ़ों को भी मात दे देते हैं। अपने घर और दूकान का कचरा सड़क पर निःसंकोच फेकना, पान-गुटके की पीक इधर-उधर थूकना, रेल्वे प्लेटफार्म और रेल के डिब्बे में गंदगी फैलाना इस अदा से करते हैं जैसे उनका परम कर्तव्य हो। समाज में दूसरा वर्ग है, सफाई करने वाला जो वास्तव में सफाई करना नहीं चाहता, वह भी फैलाना ही चाहता है लेकिन इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है, गरीबी है, मज़बूरी है। जापान में प्रचलित प्रबंधन शैली में 'हाउस-कीपिंग' की अवधारणा है जिसे '5 S' कहते हैं, उसका एक महत्वपूर्ण सूत्र है: 'कचरा करने वाला और उसे समेटने वाला व्यक्ति अलग-अलग नहीं, एक होना चाहिए।'
मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन काल में सफाई के महत्व से जन सामान्य को जोड़ा और अपने प्रशंसकों को वैसा करने के लिए प्रेरित भी किया। गिरिराज किशोर के उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में गांधीजी के उस समय के भारत प्रवास का विवरण दिया है जब वे दक्षिण अफ्रीका से कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए कलकत्ता आए थे।
''मोहनदास को शौच जाना था। शौचालयों की संख्या ठहरे हुए डेलीगेट्स के अनुपात में बहुत कम थी। मोहनदास सब शौचालयों के चक्कर काट आए, इतनी दुर्गंध थी कि लगा सिर फट जाएगा। वे लौट आए। एक स्वयंसेवक को बुलाकर पूछा- 'क्या सफाई का यहाँ कोई प्रबंध नहीं है ?'
'यह हमारा काम नहीं, भंगी का काम है।'
'क्या भंगी हम खुद नहीं हो सकते ?'
स्वयंसेवक उनकी बात पर हंस दिया, तब तक एक-दो स्वयंसेवक और आ गए। मोहनदास ने उनसे पूछा- 'क्या एक झाड़ू और बाल्टी का इंतजाम हो सकता है ?'
उन लोगों ने गांधी की ओर आश्चर्य से देखा। उनकी नाक ऐसे चढ़ गई जैसे दुर्गन्ध के ढेर के सामने खड़े हों। उनमें से एक बोला- 'क्यों ?'
'जब हम गंदगी फैलाते हैं तो सफ़ाई क्यों नहीं कर सकते ?'
उनका आश्चर्य दूसरे भाव में बदल गया। उन्होंने ऐसे देखा, या तो यह सूटेड-बूटेड आदमी सिरफिरा है या कोई निम्न कोटि का है। मांगकर सूट-बूट पहनकर आया है। वे उनकी बात अनसुनी करके सरक गए।
मोहनदास ने इधर-उधर घूम-फिरकर झाड़ू और बाल्टी का बड़ी मुश्किल से इंतजाम किया, मुंह पर ढाटा बांधा और एक शौचालय में घुस गए। उन्हें रह-रहकर उबकाई आ रही थी। मोहनदास ने बाल्टी भर-भरकर पानी लाना और पाखाने को बहाना शुरू किया। बदबू के मारे माथा फटा जा रहा था। जमीन पर पाखाना बुरी तरह लिहस गया था। वे उसे झाड़ू से रगड़-रगड़ कर छुड़ा रहे थे। स्वयंसेवक दूर से देख रहे थे और हंस रहे थे।
मोहनदास ने बाहर निकलकर कहा- 'आप बेफिक्र रहें, यह शौचालय मैंने अपने लिए साफ किया है। हम लोग जबतक अपनी सेवा आप करना नहीं सीखेंगे, दूसरों की सेवा जितना बड़ा काम कैसे कर पाएंगे ? आज अपने लिए किया, कल दूसरों के लिए करूंगा।'
'दूसरे....?' उनमें से कोई कुछ कहना चाहता था, मोहनदास बीच में बोले- 'दूसरों की सेवा के लिए पहले अपनी तैयारी ज़रूरी है।'
अगली सुबह मोहनदास उठे, तो दुर्गन्ध का भभका उन्हें घेरता महसूस हुआ। बरामदे तक मल की दुर्गन्ध आ रही थी। मोहनदास ने फिर से झाड़ू उठा ली और कुए से बाल्टी भर-भरकर सफाई करने लगे। डेलीगेट्स भी चिंतित थे, वे आपस में बातें कर रहे थे- 'पता नहीं कैसे-कैसे लोग आ जाते हैं !'
'सुना है दक्षिण अफ्रीका से आए हैं।'
'दक्षिण अफ्रीका जाकर क्या लोग धर्म-कर्म, सुच-असुच तक भूल जाते हैं ?'
'क्या यह आदमी पिछ्ले जन्म में भी तो वही नहीं था ?'
'या, फिर अब होगा।'
'दरअसल, ऐसे लोग दूसरों पर दबाव बनाए रखने के लिए इस तरह के पतित काम करते हैं।''
यह घटना लगभग एक सौ वर्ष पुरानी है, इन सौ वर्षों में शिक्षा के प्रभाव ने हमें आधुनिक अवश्य बना दिया लेकिन हमारी सोच आज भी वैसी ही पुरातन है- 'हमारा काम गंदगी फैलाना है, सफाई करना दूसरे का काम है।' क्यों है न ?
कारण ? कारण है, आलस्य और हमारी संवेदनहीनता। सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'जो काम करना जरूरी है, जो अवसर तुम्हारे सामने है- उसके लिए अभी सही समय है, कल नहीं।' इस बात को अगर जीवन की शुरुआत में समझ लिया जाए तो जीवन अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। घटनाओं को होते हुए चुपचाप देखने से कुछ हासिल नहीं होता। 'जेहि विधि राखे राम सोई विधि रहिए' की अवधारणा तसल्ली करने के लिए अच्छी है, भगवान पर भरोसा करना भी ठीक है लेकिन भगवान के भरोसे रहना बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं है।
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बचपन में मनुष्य को कुछ समझ में आता नहीं, माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को व्यतीत करना होता है, वे नाव को जिस दिशा में ले जाएं, वह सही। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में औसत किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देते हैं और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उन्हें आलसी बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
युवावस्था में दोस्त और उनकी दोस्ती अच्छी लगती है। उसी दौर में शरीर के 'हार्मोंस' विपरीतलिंगी आकर्षण उत्पन्न करना आरम्भ देते हैं। अधिकतर युवा सपनों की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं जो जीवन के यथार्थ से कोसों दूर होती है। उनकी रचनात्मक ऊर्जा कामोत्तेजना के आसपास भटकती रह जाती है, दिशाभ्रम हो जाता है, न लक्ष्य समझ में आता है और न सही राह। इसी चक्कर में अनेक संभावनाएं गड्डमड्ड राहों में भटक गई और जीवन भर गृहस्थी का बोझ ढोने के लिए मजबूर हो गई।
इस काल में जिसने परिश्रम कर लिया, वह सुविधापूर्ण जीवन की राह पर चल पड़ता है लेकिन जिसने आलस्य को अपनाया, समझ लीजिए वह जीवन भर कष्ट भुगतने के लिए अभिशप्त है। एक बोधकथा है: दो आलसी युवा बेर के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। उनकी नज़र पेड़ में लगे बेर के फल पर गई। उनमें से एक बोला- 'आ बेर, नीचे गिर।' वह चाहता था कि बेर अपने-आप गिर जाए तो उसे पेड़ पर चढ़ कर तोड़ने की मेहनत न करना पड़े। जब दूसरे ने यह सुना तो उसने पहले को ज़ोर से डांटा और चुप रहने का निर्देश दिया, फिर उसने सुधार कर कहा- 'आ बेर, मेरे मुँह में गिर।'
आलसी व्यक्ति का मनोविज्ञान अज़ब होता है, आलसी कहो तो उसे चोट नहीं लगती, बुरा लगता है ! ऐसे लोग रात हो या दिन, हर समय सपने देखते हैं और 'बातें बनाने' के विशेषज्ञ होते हैं। ये अपने जीवन में बबूल के पौधे रोपते रहते हैं और उसमें आम फलने की उम्मीद करते हैं।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः। नास्ति उद्यम समो बंधु कृत्वा नावसीदति॥
(मनुष्य के शरीर में आलस्य जैसा कोई शत्रु नहीं और न ही उद्यम के जैसा कोई बंधु। )
किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।
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मैंने जब स्कूल और कालेज में पढ़ाई की तब शिक्षा का वह माहौल न था जैसा अब दिखाई पड़ता है, संभवतः ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी वैसा ही हो जैसा हमारे जमाने में था। कक्षा में सबसे सामने बैठे आठ-दस 'विद्यार्थियों' को ही पढ़ाई-लिखाई से मतलब होता था, बाकी युवा अपने-अपने विभिन्न कारणों से कक्षा में बैठे रहते थे। मैंने कुल 18 वर्ष पढ़ाई की लेकिन मुझे उस समय यह समझ में नहीं आता था कि हम क्यों पढ़ रहे हैं, ये सब हमारे क्या काम आएगा ? सच बताऊँ ? पढ़ने के नाम से उकताहट होती थी, नींद आती थी। परीक्षा के एक सप्ताह पहले 'आई॰एम॰पी॰' पता लगाते थे, दिन-रात रटते थे, परीक्षा देते और पास हो जाते थे। उस 'बेवज़ह' की वज़ह अब समझ आती है। आज लगता है, फिर से स्कूल और कालेज में जाकर बैठूँ, वह सब पढ़ूँ जो उस समय छूट गया था।
युवावस्था में सही दिशा पकड़ने के लिए अच्छे मित्र चाहिए होते हैं जो भाग्य से ही मिलते हैं। हमारे आसपास हमें गलत राह पर ले जाने वाले बहुतेरे मिलेंगे लेकिन सही राह दिखाने वाले बहुत कम। गलत लोगों के साथ नरम होना घातक सिद्ध होता है, उन्हें दृढ़ता के साथ खुद से दूर रखना श्रेयस्कर है। मेरे एक मित्र जो कालांतर में एक विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, कालेज की पढ़ाई के दौरान सिगरेट पिया करते थे। हम दोनों साइकल में नगर-भ्रमण कर रहे थे, रास्ते में पान की एक दूकान पर रुके, दो सिगरेट खरीदी, एक मुझे दी। मैंने मना कर दिया तो वे मुझ पर नाराज हो गए और मुझसे कहा- 'तुम दोस्ती के लायक नहीं।' मैंने अपनी साइकल उठाई और उन्हें वहीं सिगरेट पीता छोड़कर चला गया। दोस्ती तोड़ दी।
पढ़ाई में आगे बढ़ना है तो कक्षा में सामने की बेंच में बैठनेवालों से दोस्ती ठीक रहेगी, व्यापार-उद्योग में आगे बढ़ना हो तो सफल व्यापारियों-उद्योगपतियों की संगत, 'प्रोफेशनल' बनना है तो प्रोफेशनल्स' से मेलजोल, साहित्यकार बनना है तो लेखकों और कवियों के साथ उठना-बैठना या आध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ना है साधु-सन्यासियों के चरणों में समर्पित होना पड़ेगा। जैसी सोहबत वैसी निस्बत।
'मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया' मनुष्य की संतोषजीविता का संकेत है लेकिन यह उस वक्त ठीक है जब अकेले जीवन व्यतीत करना हो लेकिन यदि गृहस्थी चलानी है तो 'जो मिल गया' से काम नहीं चलेगा, उसके लिए अतिरिक्त प्रयास और परिश्रम करना होगा। परिवार, गुरुजन और मित्रों से अपनी रुचि के विषय में खुलकर बातचीत करें। भरपूर 'होमवर्क' करें और सभी विकल्पों पर गौर करें, अपनी रुचि को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, आर्थिक पक्ष को समझते हुए उचित निर्णय लेकर आगे बढ़ें। विचार सबके जानिए लेकिन निर्णय स्वयं का होना चाहिए, किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित होकर या किसी के दबाव में नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति के अनुरूप। प्रश्न केवल आजीविका कमाने का नहीं है, वह करने का है जो करना आपको प्रिय है। सफलता के लिए सम्पूर्ण समर्पण, लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, भरपूर परिश्रम और धैर्य चाहिए। सफलता का कोई 'शार्टकट' नहीं होता, वह अपनी कीमत वसूल करती है, उसे अदा करना ही होगा।
विश्वप्रसिद्ध चित्रकार विन्सेन्ट वान गॉग ने अपनी जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ' में लिखा है- 'दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है। आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है, वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है। वह उदारता प्राप्त करने को आया है, उस बेहूदगी को पार करने आया है जिसमें ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है।'
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ये जिन्दगी के मेले
अधिकतर युवाओं को अपना लक्ष्य समझ में नहीं आता। यदि माता-पिता समृद्ध हैं तो संतान उनकी समृद्धि का भरपूर उपभोग करती है, मज़े करती है। इस समृद्धि के चक्रवात में वे लक्ष्यविहीन हो जाते हैं, आलसी हो जाते हैं; लड़के बेलगाम और लड़कियां लापरवाह हो जाती हैं। उन्हें अपना वर्तमान सुविधाजनक और भविष्य सुरक्षित नज़र आता है इसलिए वे बेफिक्र रहते हैं। आप गौर करिएगा, बहुत से सम्पन्न व्यापारियों, अधिकारियों और नेताओं के बच्चे इन्हीं वजहों से निकम्मे निकल जाते है जबकि वे सब अनेक संभावनाओं को साथ इस संसार में आए थे। वहीं पर अभाव के माहौल से निकलकर संघर्ष करने वाले युवा अपने जीवन में ऊंचाइयों के सोपान तय करते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आए हैं कि जिन लड़कों के सिर पर उनके पिता की छाया नहीं थी, उन्होंने कम उम्र में ही अपनी ज़िम्मेदारी समझ ली और विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए उल्लेखनीय तरक्की की। इसी प्रकार जिन लड़कियों को माँ का साथ नहीं मिला वे गृहस्थी के संचालन में निपुण बनी। बड़ी अज़ीब दुनिया है ये, माँ-बाप बच्चे की तरक्की में साधक सिद्ध हो सकते है तो बाधक भी !
यदि भरपूर धन कमाना है तो धन में ध्यानस्थ होना पड़ेगा, कमाई के अलावा कुछ और नहीं सूझना चाहिए। इश्क़ में आशिक़ की दीवानगी की तरह, सोते-जागते एक ही धुन, पैसा कमाने की। जिन्होंने अकूत दौलत कमाई है, उनकी लाटरी नहीं निकली, उन्होंने सही दिशा में प्रयत्न किए, दूरदृष्टि का उपयोग किया, अनथक परिश्रम किया, परम स्वार्थी बने और फ़िजूलखर्ची से बचकर रहे। यही 'फंडा' जीवनयापन के समस्त क्षेत्रों में लागू होता है। जितना परिश्रम, उतना पुरस्कार।
स्टीफ़न आर॰ कवी ने 'सेवेन हेबिट्स ऑफ इफेक्टिव पीपल' में लिखा है- 'गलत दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने से सफलता हाथ नहीं आती, केवल उतरना-चढ़ना हाथ आता है। सफलता 'सही' दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने से मिलती है।' प्रश्न यह है कि इस 'सही' दीवार को कैसे खोजा जाए ?
हमारे आसपास अनेक आकर्षण होते हैं, कुछ 'बन जाना' या 'हासिल कर लेना'- ये सब काल्पनिक हैं। हम सब सपने देखते हैं, कुछ विद्वान सपने देखने की सलाह भी देते हैं लेकिन सपनों का क्या ? नींद खुली और टूट गए ! अधिकतर लोगों के जीवन में उनका रोजगार संयोग से बनता है। मनुष्य जो बनना चाहता है, वैसा शायद ही किसी को हासिल होता है, शेष लोग 'जो हाथ आया, उसी के साथ हो लिया' की मजबूरी में अपनी जीवनयात्रा आरंभ करते हैं। कुछ दूरदर्शी और पराक्रमी इस मज़बूरी को भी अपनी सीढ़ी बनाते हैं और अपनी अपेक्षाओं को साकार करने की कोशिश करते हैं। क्रमिक रूप से लक्ष्य तक पहुँचने का यह उपाय फलप्रद सिद्ध हो सकता है बशर्ते धैर्य के साथ लगातार आगे बढ़ते रहे। एक बोधकथा याद आ रही है: तेरह वर्षीय एक बालक रोज सुबह के समय सड़क पर दैनिक समाचारपत्र बेचता था। किसी ने उससे पूछा- 'इस तरह 'पेपर' बेचकर तुम कितना कमा लेते हो ?'
'कुछ नहीं।' बालक ने उत्तर दिया।
'अरे, कुछ नहीं ! जब तुम्हें इससे कोई फायदा नहीं होता तो तुम यह काम क्यों करते हो ?'
'फायदा है मुझे।'
'क्या ?'
'वो जो सामने 'बुक स्टाल' वाला है, वह मुझे प्रतिदिन पेपर की 20 'कापी' बेचने के लिए देता है, मैं उसे बेचता हूँ लेकिन वह मुझे कोई 'कमीशन' नहीं देता।'
'फिर ?'
'मुझे रोज पेपर बेचना है इसलिए सुबह जल्दी जागने लगा, देर से उठने की बुरी आदत सुधर गई और इस काम के ज़रिये मैं व्यापार करना सीख रहा हूँ। पेपर बेचने के कारण आसपास के लोगों से मेरी जान-पहचान हो गई है, वे मुझसे प्यार से बातें करने लग गए हैं। मैं जिसका पेपर बेचता हूँ, ईमानदारी से उसके पैसे उसे देता हूँ, इस तरह मेरी 'गुडविल' बन रही है।'
'अरे वाह !'
'एक बात और, मुझे चिल्ला-चिल्लाकर पेपर बेचने में बहुत मज़ा आता है।' उस बालक ने खुश होकर बताया।
जिस प्रकार फल प्राप्त करने के लिए वृक्ष की जड़ों में समय पर खाद और पानी देना जरूरी है, उसी प्रकार सतर्क देखरेख से एक छोटी सी शुरुआत धीरे-धीरे पुष्पित-पल्लवित होती है और समय आने पर बड़ा आकार ले लेती है। सर्वोच्च प्राथमिकता अपनी रुचि को देना चाहिए या फिर जिस भी काम से जुड़ें उसमें रुचि विकसित कर ली जाए। भावुकता और पारिवारिक दबाव से मुक्त होकर व्यावहारिक सोच के आधार पर कार्य का चयन करना फलप्रद होता है। इसके लिए अपनी कार्यक्षमता का स्वयं-मूल्यांकन करना, अपनी खूबियों और सीमाओं को ईमानदारी से समझना बहुत जरूरी है। जागरूकता के साथ किए गए प्रयत्न फल अवश्य देते हैं।
घर के बाहर एक नीम का पौधा रोपिए, उसे नियमित पानी दीजिए, कुछ बड़ा होने दीजिए, उसके बाद न जाने कहाँ से उसकी डाल को तोड़ने वाले लोग प्रगट हो जाएंगे ! किसी को नीम की मुखारी चाहिए तो किसी को नीम की पत्तियाँ। उस अर्धविकसित पौधे की उस समय देखभाल नहीं की गई तो वह पौधा पनप नहीं पाएगा, अपना विस्तार नहीं कर सकेगा और असमय काल-कलवित हो जाएगा। छोटे पौधे को उसके बड़े होने तक सुरक्षित रखने के उपाय करने आवश्यक हैं, यही बात आर्थिक विकास के लिए भी लागू होती है। कम पूंजी के बढ़ने की गति बहुत धीमी होती है इसलिए उसे बचाए रखने के लिए अपने खर्च पर बेरहम नियंत्रण रखना जरूरी है। इस प्रकार बचाया गया धन, कमाया हुआ धन बन जाता है।
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अतीत में झाँकने पर यह निष्कर्ष निकला कि मेरा अधिकांश समय किसी नाविक की तरह नाव पर बैठे अन्य यात्रियों को पार ले जाने में निकल गया। जब यात्रीगण अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं, वे नाविक को भूल जाते हैं और नाविक अकेला रह जाता है, अपने घर वापस जाने के लिए। यात्रियों से भरी हुई नाव में पतवार खेना आसान है लेकिन अकेले की नाव को किनारे लगाना बेहद कठिन।
हम परिवार की छत्रछाया में पले-बढ़े, इसलिए परिवार के प्रति हमारा भी दायित्व बनता है कि हम उनके लिए कुछ करें। यह अपने परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सोच है जो सबके हृदय में बसती है, खास तौर से भारतीय उपमहाद्वीप में। इसी भाव में परिवार का सामर्थ्य होता है और उसकी उपादेयता भी। संयुक्त परिवार की भावना में जितना लेने का भाव है, उतना ही देने का भी। यह 'सिनर्जी' का श्रेष्ठ उदाहरण है जिसमें सब एक दूसरे को पोषित करते हैं। एक-दूसरे के पोषण से परिवार सँवरते हैं, विकसित होते हैं।
एक गाँव के लोग मंदिर का निर्माण करना चाहते थे, वे चाहते थे कि किसी पवित्र स्थल पर इसे बनाया जाए। उसी गाँव में एक परिवार था जिसमें दो भाई थे। बड़ा भाई विवाहित था, उसके दो पुत्र और एक पुत्री थी। छोटे भाई ने विवाह नहीं किया। दोनों भाइयों के पास पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त खेत थे जिन पर वे अपने-अपने हिस्से में कृषि करते थे, दोनों के पास अनाज सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग भंडार कक्ष थे। उनकी रिहाइश और रसोई एक साथ थी। एक दिन बड़े भाई के दिमाग में एक बात आई- 'मेरे दोनों लड़के बड़े हो गए हैं, खेती करने में मेरा साथ देते हैं, इस कारण मेरे खेतों में अच्छी पैदावार होती है जबकि छोटा भाई एकदम अकेला है, इस कारण उसे कम उपज मिलती है। 'कुछ करना चाहिए'- सोचकर वह आधी रात के बाद जागा, झाँककर देखा कि छोटा भाई गहरी नींद सो रहा है, उसने गोदाम से अनाज की कुछ बोरियाँ अपनी पीठ पर लादकर छोटे भाई के गोदाम में रख दी और चुपचाप वापस आकर सो गया।
छोटे भाई के दिल में एक दिन विचार आया- 'बड़े भाई के तीन बच्चे है, खर्च ज़्यादा है, ज़िम्मेदारी भी अधिक है। मैं अकेला हूँ, इतने सारा अनाज मेरे किस काम का ?' वह भी रात में उठा, उसने अपने गोदाम से अनाज की कुछ बोरियाँ उठाकर बड़े भाई के गोदाम में रख दी।
यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा। दोनों भाई इन बातों से अनजान थे। एक रात अनाज 'शिफ्टिंग' करते समय दोनों भाई आमने-सामने पड़ गए। एक-दूसरे को देखा और दोनों ने शर्म से नज़रें झुका ली।
गाँव वालों को मंदिर के लिए वही स्थान सर्वाधिक पवित्र लगा जिस जगह पर दोनों भाई शर्मिंदा हुए थे। मंदिर वहीं बनाया गया।
परिवार में समय के साथ-साथ, साथ बदलते रहते हैं, जैसे बचपन में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन; युवावस्था में पति-पत्नी, बच्चे; प्रौढ़ावस्था में वयस्क बच्चे और वृद्ध माता-पिता। हर अवस्था में हमारा 'रोल' बदलते रहता है और प्रत्येक रिश्ते में हमारा अभिनय व्यवहार की कसौटी पर परखा जाता है। पारिवारिक रिश्ते भावनाओं के सहारे पनपते हैं, भावनाएँ ही सम्बन्धों के उर्वरक तत्व हैं।
परिवार के भरण-पोषण के लिए धनार्जन आवश्यक है, यह धन उदर को भोजन देता है और मस्तिष्क को उत्पात। धन के प्रभाव में भावनाएँ अस्त होती जाती हैं और व्यक्तिगत व्यवहारिकता का उदय होने लगता है। समग्र परिवार के पोषण का भाव व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता है और संयुक्त परिवार की अवधारणा ध्वस्त हो जाती है। इस चक्रव्यूह में वे अभिमन्यु फंस जाते है जो परिवार के प्रति भावुक होते है, अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। यहाँ, सतर्क होने की ज़रूरत है क्योंकि यदि जिम्मेदारी समझने वाला व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी का प्रतिफलन चाहता है तो उसे निराशा हाथ लगेगी, दुनिया बेहद चालक है।
मेरा निष्कर्ष है- 'पहले अपनी मदद करो, दूसरों की मदद तब करना जब उस लायक हो जाओ।'
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जीवन की सफल यात्रा के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने होंगे। इसके बाद समय-समय पर उस समय की तात्कालीन स्थिति का मूल्यांकन करते हुए रणनीति में आवश्यक परिवर्तन करके छोटी-मोटी असफलताओं को सफलता की सीढ़ी मान कर बिना रुके आगे बढ़ना होगा, तब बात बनेगी। सही दीवार का रहस्य इन्हीं आरंभिक असफलताओं में छुपा रहता है। एक नाव पूर्व की ओर जाती है तो दूसरी पश्चिम की ओर जबकि हवा एक जैसी चलती हैं। किधर जाना है- यह हवा की दिशा पर निर्भर नहीं होता बल्कि पतवार चलाने वाला तय करता है।
रिश्तों के अब अपने मायने बदल रहे हैं, उनकी उष्णता धीमी हो चली है क्योंकि समय सबको कुछ-न-कुछ सिखाते चलता है और सामान्य मनुष्य के व्यवहार पर अपनी अदृश्य पैठ बनाते रहता है। सामाजिक मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। हमारे आसपास जो कुछ होता है उस क्रिया की प्रतिक्रिया कुछ ही समय में उभरकर सामने आने लगती है। मूल्यों के परिवर्तन की धार इतनी तेज है कि स्त्रियाँ पुरुषोचित व्यवहार कर रही हैं तो पुरुषों में विपरीत व्यवहार परिलक्षित हो रहा है, वहीं पर बच्चे बड़ों जैसा तो बड़ी उम्र के लोग बच्चों जैसा व्यवहार कर रहे हैं।
दुनिया के अधिकतर लोग अपने जीवन भर आजीविका की तलाश में ही लगे रहते हैं लेकिन कुछ लोग जीवन में जीवन की तलाश करते हैं। इन दोनों परिस्थितियों में वही अंतर है जो 'स्वीमिंग पूल' या समुद्र में तैरने का है। जीवन में जीवन तलाशने वाले मुझे बेहद अचंभित करते हैं क्योंकि वे विलक्षण निर्णय लेने वाले होते हैं और आजीविका तलाशने वाले मुझे इसलिए व्यथित करते हैं क्योंकि उनका जो पेट है कि वह भरता ही नहीं !
इस दुनिया में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मनुष्य जिस तरह जीना चाहता है वैसा लोग लोग उसे जीने नहीं देते इसलिए वह भी दूसरों से अपना बदला भुनाता है, वह भी दूसरों को उनकी मर्जी से जीने में पचास अड़ंगे लगाता है। यह खेल न जाने कब से जारी है ! दुख-सुख, सफलता-असफलता, मिलन-विछोह सब क्षणिक है लेकिन जब ये जीवन में घटते हैं तो इनकी तीव्रता इतनी अधिक होती है कि मनुष्य का मानसिक संतुलन डगमगा जाता है। जिसने उस पल संतुलन साध लिया, जो हर परिस्थिति में सम रहा, समझ लीजिए उसने जिन्दगी की बाज़ी जीत ली।
जीवन है तो उसके अपने रंग हैं। सारे रंग मिलकर एक ऐसा रंग विकसित करते हैं कि रंग नहीं रह जाता, पानी के रंग जैसा बेरंग। इसीलिए तो कहते हैं- यह दुनिया रंग-बिरंगी है।
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यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा। दोनों भाई इन बातों से अनजान थे। एक रात अनाज 'शिफ्टिंग' करते समय दोनों भाई आमने-सामने पड़ गए। एक-दूसरे को देखा और दोनों ने शर्म से नज़रें झुका ली।
गाँव वालों को मंदिर के लिए वही स्थान सर्वाधिक पवित्र लगा जिस जगह पर दोनों भाई शर्मिंदा हुए थे। मंदिर वहीं बनाया गया।
परिवार में समय के साथ-साथ, साथ बदलते रहते हैं, जैसे बचपन में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन; युवावस्था में पति-पत्नी, बच्चे; प्रौढ़ावस्था में वयस्क बच्चे और वृद्ध माता-पिता। हर अवस्था में हमारा 'रोल' बदलते रहता है और प्रत्येक रिश्ते में हमारा अभिनय व्यवहार की कसौटी पर परखा जाता है। पारिवारिक रिश्ते भावनाओं के सहारे पनपते हैं, भावनाएँ ही सम्बन्धों के उर्वरक तत्व हैं।
परिवार के भरण-पोषण के लिए धनार्जन आवश्यक है, यह धन उदर को भोजन देता है और मस्तिष्क को उत्पात। धन के प्रभाव में भावनाएँ अस्त होती जाती हैं और व्यक्तिगत व्यवहारिकता का उदय होने लगता है। समग्र परिवार के पोषण का भाव व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता है और संयुक्त परिवार की अवधारणा ध्वस्त हो जाती है। इस चक्रव्यूह में वे अभिमन्यु फंस जाते है जो परिवार के प्रति भावुक होते है, अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। यहाँ, सतर्क होने की ज़रूरत है क्योंकि यदि जिम्मेदारी समझने वाला व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी का प्रतिफलन चाहता है तो उसे निराशा हाथ लगेगी, दुनिया बेहद चालक है।
मेरा निष्कर्ष है- 'पहले अपनी मदद करो, दूसरों की मदद तब करना जब उस लायक हो जाओ।'
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जीवन की सफल यात्रा के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने होंगे। इसके बाद समय-समय पर उस समय की तात्कालीन स्थिति का मूल्यांकन करते हुए रणनीति में आवश्यक परिवर्तन करके छोटी-मोटी असफलताओं को सफलता की सीढ़ी मान कर बिना रुके आगे बढ़ना होगा, तब बात बनेगी। सही दीवार का रहस्य इन्हीं आरंभिक असफलताओं में छुपा रहता है। एक नाव पूर्व की ओर जाती है तो दूसरी पश्चिम की ओर जबकि हवा एक जैसी चलती हैं। किधर जाना है- यह हवा की दिशा पर निर्भर नहीं होता बल्कि पतवार चलाने वाला तय करता है।
हमारे परिवारों में संस्कार देने के नाम पर बच्चों को वह सिखाया जाता है जो पुरातन हो चला जबकि दुनिया हर पल बदल रही है। मनुष्य बचपन में जो सीखता है वह उसके मस्तिष्क में गहरी जड़ें जमा लेता है इस कारण नई दुनिया की गति से उसका तालमेल नहीं बैठता और वह स्वयं को उस दौड़ में असमर्थ महसूस करता है। बक्मिंस्टर फुलर का मानना है- 'सभी बच्चे प्रतिभाशाली पैदा होते हैं लेकिन 10000 में से 9999 बच्चों को उनके माता-पिता और अन्य वयस्क लोग अनजाने में तेजी से प्रतिभाविहीन बना देते हैं।'
स्थापित मान्यताएँ और आस्थाएँ ध्वस्त हो रही हैं। पुरानी पीढ़ी के पास एक अदद भगवान था जो समस्त गतिविधियों का संचालक था, जिम्मेदार था लेकिन नई पौध ने इस अवधारणा से दूरी बना ली है, वे अपने व्यक्तिगत ज़िन्दगी में भगवान का दखल या उसकी मदद बहुत पसंद नहीं करते, उन्हें अपनी बुद्धि और शक्ति पर विश्वास है। यह एक अर्थपूर्ण संकेत है। रिश्तों के अब अपने मायने बदल रहे हैं, उनकी उष्णता धीमी हो चली है क्योंकि समय सबको कुछ-न-कुछ सिखाते चलता है और सामान्य मनुष्य के व्यवहार पर अपनी अदृश्य पैठ बनाते रहता है। सामाजिक मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। हमारे आसपास जो कुछ होता है उस क्रिया की प्रतिक्रिया कुछ ही समय में उभरकर सामने आने लगती है। मूल्यों के परिवर्तन की धार इतनी तेज है कि स्त्रियाँ पुरुषोचित व्यवहार कर रही हैं तो पुरुषों में विपरीत व्यवहार परिलक्षित हो रहा है, वहीं पर बच्चे बड़ों जैसा तो बड़ी उम्र के लोग बच्चों जैसा व्यवहार कर रहे हैं।
दुनिया के अधिकतर लोग अपने जीवन भर आजीविका की तलाश में ही लगे रहते हैं लेकिन कुछ लोग जीवन में जीवन की तलाश करते हैं। इन दोनों परिस्थितियों में वही अंतर है जो 'स्वीमिंग पूल' या समुद्र में तैरने का है। जीवन में जीवन तलाशने वाले मुझे बेहद अचंभित करते हैं क्योंकि वे विलक्षण निर्णय लेने वाले होते हैं और आजीविका तलाशने वाले मुझे इसलिए व्यथित करते हैं क्योंकि उनका जो पेट है कि वह भरता ही नहीं !
इस दुनिया में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मनुष्य जिस तरह जीना चाहता है वैसा लोग लोग उसे जीने नहीं देते इसलिए वह भी दूसरों से अपना बदला भुनाता है, वह भी दूसरों को उनकी मर्जी से जीने में पचास अड़ंगे लगाता है। यह खेल न जाने कब से जारी है ! दुख-सुख, सफलता-असफलता, मिलन-विछोह सब क्षणिक है लेकिन जब ये जीवन में घटते हैं तो इनकी तीव्रता इतनी अधिक होती है कि मनुष्य का मानसिक संतुलन डगमगा जाता है। जिसने उस पल संतुलन साध लिया, जो हर परिस्थिति में सम रहा, समझ लीजिए उसने जिन्दगी की बाज़ी जीत ली।
जीवन है तो उसके अपने रंग हैं। सारे रंग मिलकर एक ऐसा रंग विकसित करते हैं कि रंग नहीं रह जाता, पानी के रंग जैसा बेरंग। इसीलिए तो कहते हैं- यह दुनिया रंग-बिरंगी है।
समापन
जीवन तो घटनाओं से परिपूर्ण था, सबकुछ बताना संभव न था इसलिए घटनाओं को 'फिल्टर' किया गया। मेरे जीवनकाल में वे रोचक घटनाएं भी थी इस आत्मकथा को चर्चित और लोकप्रिय बना सकती थी, उन संस्मरणों को मैंने निजता के दायरे में रखना उचित समझा, उन्हें लिखने का मोह त्यागा और शालीनता की दायरे में जो लिखा जा सकता था, उसे आपको बताया।
इस वृतांत को पढ़कर आपको घटनाओं से जुड़ाव महसूस हुआ होगा, इसमें वर्णित कई पात्रों से पुरानी पहचान सी निकली होगी, मन के उल्लास और अवसाद के भावों का स्पर्श भी हुआ होगा, दरअसल यह कथा 'मैं' की नहीं 'हम' की है। आम तौर पर मनुष्य इसकी-उसकी सबकी चर्चा कर लेता है लेकिन अपने घर की बातें बाहर ज़ाहिर नहीं कर पाता। रिश्तों की जंजीरें भी सपाट बयानी की राह में बाधक रहती हैं। पारिवारिक घटनाओं को लिखते समय बहुत देखना और समझना पड़ता है, एकतरफा प्रलाप से बचना होता है और संभल कर इशारों में संकेत देने पड़ते हैं अन्यथा वर्तमान सम्बन्धों में कड़ुवाहट विकसित होने का खतरा रहता है। फिर भी, मैंने यह खतरा उठाया, सिर्फ इसलिए कि मेरी कहानी किसी और की ज़िंदगी को सँवारने के काम आए। यह प्रयास मैं तब सफल समझूँगा जब आपका दिल भी आत्मकथा लिखने के लिए मचल उठे। आप अवश्य लिखिए, जी को बहुत ठंडक मिलती है।
मेरे जीवन में मैंने अपने हिस्से का अभिनय किया, जैसा बन सका किया, अब भी बचा-खुचा काम सम्पूर्ण शक्ति से पूरा करना चाहता हूँ, बस, मेरी सांसें साथ देती रहें और आपका प्यार बना रहे। आपको प्रणाम।
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