Tuesday, May 19, 2015

आत्मकथा का समापन व्यक्तव्य

इस प्रकार इस आत्मकथा का लेखनकार्य पूर्ण हुआ। सन 2005 में मैंने जब डा॰ हरिवंश राय बच्चन की कथा पढ़ी, तब मुझे इसे लिखने की प्रेरणा मिली। 2006 में इसे मैंने इसे कागज पर उतारना आरंभ कर दिया। छः वर्षों के अंतराल में बचपन से लेकर 12 वर्ष की आयु तक के ही विवरण लिखे जा सके। इस बीच कैंसर ने मुझ पर दो बार और आक्रमण किया। मुझे लगा कि यह उपक्रम भी मेरे अतीत के अनेक प्रयासों की तरह अधूरा रह जाएगा।

इसके बाद सन 2012 में जब मैं कंप्यूटर के करीब आया, उसका अ ब स सीखा, मेरी बेटी संज्ञा ने 'ब्लॉग' बनाया, मेरा 'फेसबुक' एकाउंट खोला। मुझे अच्छी तरह याद है, मैंने संज्ञा से पूछा था- 'ये 'फेसबुक' क्या होता है ?'

सच कहूँ तो Google के Blogger और Facebook के मित्रों ने इस आत्मकथा को पूरा करवा दिया अन्यथा इसकी भी भ्रूणहत्या तय थी। Thanks to Google & Facebook to make this project done.

मेरे मित्रों के सहयोग से इसके दो हिस्सों ने पुस्तक का रूप ले लिया- "कहाँ शुरू कहाँ खत्म" और "पल पल ये पल" और तीसरा "दुनिया रंग बिरंगी" भी शीघ्र प्रकाशित हो जाएगा। Facebook में आज मेरे 4000 मित्र हैं जो केवल मित्र नहीं, मेरे मार्गदर्शक हैं, प्रेरक हैं। यह सही है कि शुरुआती कथा मैंने लिखी थी लेकिन Blogger और Facebook से जुडने के बाद की कथा मैंने नहीं लिखी, मेरे मित्रों ने मुझसे 'लिखवाई' है। मैं आप सबके प्रति अत्यंत कृतज्ञ हूँ कि आपने एक हलवाई को कथाकार बना दिया।

इसे लिखने का उद्देश्य अपने दुखों को बताना या उपलब्धियों को जताना या किस्से-कहानी सुनाकर मनोरंजन करना नहीं है बल्कि अपने जन्म से अब तक की सामाजिक स्थितियों का दस्तावेजीकरण है ताकि ये भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रहे। वे इन घटनाओं के माध्यम से बीसवी शताब्दी के इंसान की ज़द्दोज़हद को समझ सकें, इसे पढ़ें और आश्चर्य करें- 'अरे, क्या ऐसा भी होता था ?'

जीवन तो घटनाओं से परिपूर्ण था, सब कुछ बताना संभव न था इसलिए घटनाओं को 'फिल्टर' किया गया। मेरे जीवनकाल में वे रोचक घटनाएं भी थी इस आत्मकथा को चर्चित और लोकप्रिय बना सकती थी, उन संस्मरणों को मैंने निजता के दायरे में रखना उचित समझा, उन्हें लिखने का मोह त्यागा और शालीनता की दायरे में जो लिखा जा सकता था, उसे आपको बताया।

इस वृतांत को पढ़कर आपको घटनाओं से जुड़ाव महसूस हुआ होगा, इसमें वर्णित कई पात्रों से पुरानी पहचान सी निकली होगी, मन के उल्लास और अवसाद के भावों का स्पर्श भी हुआ होगा। दरअसल यह कथा 'मैं' की नहीं 'हम' की है। आम तौर पर मनुष्य इसकी-उसकी सबकी चर्चा कर लेता है लेकिन अपने घर की बातें बाहर ज़ाहिर नहीं कर पाता। रिश्तों की जंजीरें भी सपाट बयानी की राह में बाधक रहती हैं। पारिवारिक घटनाओं को लिखते समय बहुत कुछ सोचना और समझना पड़ता है, एकतरफा प्रलाप से बचना होता है और संभल कर इशारों में संकेत देने पड़ते हैं अन्यथा वर्तमान सम्बन्धों में कड़ुवाहट विकसित होने का खतरा रहता है। फिर भी, मैंने यह खतरा उठाया, सिर्फ इसलिए कि मेरी कहानी किसी और की ज़िंदगी को सँवारने के काम आए।

यह प्रयास मैं तब सफल समझूँगा जब आपका दिल भी आत्मकथा लिखने के लिए मचल उठे। आप अवश्य लिखिए, जी को बहुत ठंडक मिलती है।

मेरे जीवन में मैंने अपने हिस्से का अभिनय किया, जैसा बन सका, किया, अब भी बचा-खुचा काम सम्पूर्ण शक्ति से पूरा करना चाहता हूँ, बस, मेरी सांसें साथ देती रहें और आपका प्यार बना रहे। आपको प्रणाम।
   
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