Monday, May 11, 2015

ये जिन्दगी के मेले

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          जीवनयापन का उपाय तलाशना और सार्थक जीवन जीना अलग-अलग बातें हैं। कबीर जैसे महात्मा दोनों को एक साथ साध लेते थे लेकिन अब की दुनिया में किसी एक को साधना भी चुनौतीपूर्ण है। अधिकतर लोग जीवनयापन को ही अपने सीने से चिपकाए संसार से विदा हो जाते हैं। इस समस्या के मूल में हमारी परिवार व्यवस्था है। जीवन के आरंभ से ही बच्चे में परिवार से इस तरह का मनोवैज्ञानिक जुड़ाव विकसित किया जाता है कि मनुष्य इकाई न होकर दहाई हो जाता है। कोई भी निर्णय लेने के पूर्व उसे अपने परिवारजनों की स्वीकृति-अस्वीकृति का ध्यान रखने के लिए 'प्रोग्राम' कर दिया जाता है, उसके निर्णय लेने की वैचारिक स्वतन्त्रता बड़ी चतुराई से छीन ली जाती है। समस्त भारतीय उपमहाद्वीप में विवाह करने जैसा व्यक्तिगत निर्णय सामूहिक सहमति का मोहताज़ है ! रोजगार भी परिवार तय करता है, जैसे, कृषक अपने बच्चों को खेत-खलिहान से जोड़ेगा तो व्यापारी अपने व्यापार से; नौकरीपेशा अपनी संतान को अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई में लगाएगा तो राजनीतिज्ञ अपनी विरासत से। इधर-उधर भागने का कोई भी प्रयास मनोवैज्ञानिक भावुकता के ज़ोर से ध्वस्त कर दिया जाता है ताकि संतान के आर्थिक भविष्य की सुरक्षा की आड़ में अभिभावकों के बुढ़ापे की व्यवस्था अक्षुण्ण बनी रहे।
          अधिकतर युवाओं को अपना लक्ष्य समझ में नहीं आता इसलिए तय नहीं हो पाता। यदि माता-पिता समृद्ध हैं तो संतान उनकी समृद्धि का भरपूर उपभोग करती है, मज़े करती है। इस समृद्धि के चक्रवात में वे लक्ष्यविहीन हो जाते हैं, आलसी हो जाते हैं; लड़के बेलगाम और लड़कियां लापरवाह हो जाती हैं। उन्हें अपना वर्तमान सुविधाजनक और भविष्य सुरक्षित नज़र आता है इसलिए वे बेफिक्र रहते हैं। आप गौर करिएगा, बहुत से सम्पन्न व्यापारियों, अधिकारियों और नेताओं के बच्चे इन्हीं वजहों से निकम्मे निकल जाते है जबकि वे सब अनेक संभावनाओं को साथ इस संसार में आए थे। वहीं पर अभाव के माहौल से निकलकर संघर्ष करने वाले युवा अपने जीवन में ऊंचाइयों के सोपान तय करते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आए हैं कि जिन लड़कों के सिर पर उनके पिता की छाया नहीं थी, उन्होंने कम उम्र में ही अपनी ज़िम्मेदारी समझ ली और विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए उल्लेखनीय तरक्की की। इसी प्रकार जिन लड़कियों को माँ का साथ नहीं मिला वे गृहस्थी के संचालन में निपुण बनी। बड़ी अज़ीब दुनिया है ये, माँ-बाप बच्चे की तरक्की में साधक सिद्ध हो सकते है तो बाधक भी !
          यदि भरपूर धन कमाना है तो धन में ध्यानस्थ होना पड़ेगा, कमाई के अलावा कुछ और नहीं सूझना चाहिए। इश्क़ में आशिक़ की दीवानगी की तरह, सोते-जागते एक ही धुन, पैसा कमाने की। जिन्होंने अकूत दौलत कमाई है, उनकी लाटरी नहीं निकली, उन्होंने सही दिशा में प्रयत्न किए, दूरदृष्टि का उपयोग किया, अनथक परिश्रम किया, परम स्वार्थी बने और फ़िजूलखर्ची से बचकर रहे। यही 'फंडा' जीवनयापन के समस्त क्षेत्रों में लागू होता है। जितना परिश्रम, उतना पुरस्कार।
          स्टीफ़न आर॰ कवी ने 'सेवेन हेबिट्स ऑफ इफेक्टिव पीपल' में लिखा है- 'गलत दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने से सफलता हाथ नहीं आती, केवल उतरना-चढ़ना हाथ आता है। सफलता 'सही' दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने से मिलती है।' प्रश्न यह है कि इस 'सही' दीवार को कैसे खोजा जाए ?

              हमारे आसपास अनेक आकर्षण होते हैं, कुछ 'बन जाना' या 'हासिल कर लेना'- ये सब काल्पनिक हैं। हम सब सपने देखते हैं, कुछ विद्वान सपने देखने की सलाह भी देते हैं लेकिन सपनों का क्या ? नींद खुली और टूट गए ! अधिकतर लोगों के जीवन में उनका रोजगार संयोग से बनता है। मनुष्य जो बनना चाहता है, वैसा शायद ही किसी को हासिल होता है, शेष लोग 'जो हाथ आया, उसी के साथ हो लिया' की मजबूरी में अपनी जीवनयात्रा आरंभ करते हैं। कुछ दूरदर्शी और पराक्रमी इस मज़बूरी को भी अपनी सीढ़ी बनाते हैं और अपनी अपेक्षाओं को साकार करने की कोशिश करते हैं। क्रमिक रूप से लक्ष्य तक पहुँचने का यह उपाय फलप्रद सिद्ध हो सकता है बशर्ते धैर्य के साथ लगातार आगे बढ़ते रहे। एक बोधकथा याद आ रही है: तेरह वर्षीय एक बालक रोज सुबह के समय सड़क पर  दैनिक समाचारपत्र बेचता था। किसी जिज्ञासु ने उससे पूछा- 'इस तरह 'पेपर' बेचकर तुम कितना कमा लेते हो ?'
'कुछ नहीं।' बालक ने उत्तर दिया।
'अरे, कुछ नहीं ! जब तुम्हें इससे कोई फायदा नहीं होता तो तुम यह काम क्यों करते हो ?'
'फायदा है मुझे।'
'क्या ?'
'वो जो सामने 'बुक स्टाल' वाला है, वह मुझे प्रतिदिन पेपर की 20 'कापी' बेचने के लिए देता है, मैं उसे बेचता हूँ लेकिन वह मुझे कोई 'कमीशन' नहीं देता।'
'फिर ?'
'मुझे रोज पेपर बेचना है इसलिए सुबह जल्दी जागने लगा, देर से उठने की बुरी आदत सुधर गई और इस काम के ज़रिये मैं व्यापार करना सीख रहा हूँ। पेपर बेचने के कारण आसपास के लोगों से मेरी जान-पहचान हो गई है, वे मुझसे प्यार से बातें करने लग गए हैं। मैं जिसका पेपर बेचता हूँ, ईमानदारी से उसके पैसे उसे देता हूँ, इस तरह मेरी 'गुडविल' बन रही है।'
'अरे वाह !'
'एक बात और, मुझे चिल्ला-चिल्लाकर पेपर बेचने में बहुत मज़ा आता है।' उस बालक ने खुश होकर बताया।
          जिस प्रकार फल प्राप्त करने के लिए वृक्ष की जड़ों में समय पर खाद और पानी देना जरूरी है, उसी प्रकार सतर्क देखरेख से एक छोटी सी शुरुआत धीरे-धीरे पुष्पित-पल्लवित होती है और समय आने पर बड़ा आकार ले लेती है। सर्वोच्च प्राथमिकता अपनी रुचि को देना चाहिए या फिर जिस भी काम से जुड़ें उसमें रुचि विकसित कर ली जाए। भावुकता और पारिवारिक दबाव से मुक्त होकर व्यावहारिक सोच के आधार पर कार्य का चयन करना फलप्रद होता है। इसके लिए अपनी कार्यक्षमता का स्वयं-मूल्यांकन करना, अपनी खूबियों और सीमाओं को ईमानदारी से समझना बहुत जरूरी है। जागरूकता के साथ किए गए प्रयत्न फल अवश्य देते हैं।
          घर के बाहर एक नीम का पौधा रोपिए, उसे नियमित पानी दीजिए, कुछ बड़ा होने दीजिए, उसके बाद न जाने कहाँ से उसकी डाल को तोड़ने वाले लोग प्रगट हो जाएंगे ! किसी को नीम की मुखारी चाहिए तो किसी को नीम की पत्तियाँ। उस अर्धविकसित पौधे की उस समय देखभाल नहीं की गई तो वह पौधा पनप नहीं पाएगा, अपना विस्तार नहीं कर सकेगा और असमय काल-कलवित हो जाएगा। छोटे पौधे को उसके बड़े होने तक सुरक्षित रखने के उपाय करने आवश्यक हैं, यही बात आर्थिक विकास के लिए भी लागू होती है। कम पूंजी के बढ्ने की गति बहुत धीमी होती है इसलिए उसे बचाए रखने के लिए अपने खर्च पर निर्मम नियंत्रण रखना जरूरी है। इस प्रकार बचाया गया धन, कमाया हुआ धन बन जाता है।          
                        
            अतीत में झाँकने पर यह निष्कर्ष निकला कि मेरा अधिकांश समय किसी नाविक की तरह नाव पर बैठे यात्रियों को पार ले जाने में निकल गया। जब यात्रीगण अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं, वे नाविक को भूल जाते हैं और नाविक अकेला रह जाता है, अपने घर वापस जाने के लिए। यात्रियों से भरी हुई नाव में पतवार खेना आसान है लेकिन अकेले की नाव को किनारे लगाना बेहद कठिन।  
          हम परिवार की छत्रछाया में पले-बढ़े, इसलिए परिवार के प्रति हमारा भी दायित्व बनता है कि हम उनके लिए कुछ करें। यह अपने परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सोच है जो सबके हृदय में बसती है। इसी भाव में परिवार का सामर्थ्य होता है और उसकी उपादेयता भी। संयुक्त परिवार की भावना में जितना लेने का भाव है, उतना ही देने का भी। यह 'सिनर्जी' का श्रेष्ठ उदाहरण है जिसमें सब एक दूसरे को पोषित करते हैं।एक-दूसरे के पोषण से परिवार सँवरते हैं, विकसित होते हैं।
          एक गाँव के लोग मंदिर का निर्माण करना चाहते थे, वे चाहते थे कि किसी पवित्र स्थल पर इसे बनाया जाए। उसी गाँव में एक परिवार था जिसमें दो भाई थे। बड़ा भाई विवाहित था, उसके दो पुत्र और एक पुत्री थी। छोटे भाई ने विवाह नहीं किया। दोनों भाइयों के पास पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त खेत थे जिन पर वे अपने-अपने हिस्से में कृषि करते थे, दोनों के पास अनाज सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग भंडार कक्ष थे किन्तु उनकी रिहाइश और रसोई एक साथ थी। 
          एक दिन बड़े भाई के दिमाग में एक बात आई- 'मेरे दोनों लड़के बड़े हो गए हैं, खेती करने में मेरा साथ देते हैं, इस कारण मेरे खेतों में अच्छी पैदावार होती है जबकि छोटा भाई एकदम अकेला है, इस कारण उसे कम उपज मिलती है। 'कुछ करना चाहिए'- सोचकर वह आधी रात के बाद जागा, झाँककर देखा कि छोटा भाई गहरी नींद सो रहा है, उसने गोदाम से अनाज की कुछ बोरियाँ अपनी पीठ पर लादकर छोटे भाई के गोदाम में रख दी और चुपचाप वापस आकर सो गया।         
          छोटे भाई के दिल में एक दिन विचार आया- 'बड़े भाई के तीन बच्चे है, खर्च ज़्यादा है, ज़िम्मेदारी भी अधिक है। मैं अकेला हूँ, इतने सारा अनाज मेरे किस काम का ?' वह भी रात में उठा, उसने अपने गोदाम से अनाज की कुछ बोरियाँ उठाकर बड़े भाई के गोदाम में रख दी। 
          यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा। दोनों भाई अनजान थे। एक रात अनाज 'शिफ्टिंग' करते समय दोनों भाई आमने-सामने पड़ गए। एक-दूसरे को देखा और दोनों ने शर्म से नज़रें झुका ली। 
          गाँव वालों को मंदिर के लिए वही स्थान सर्वाधिक पवित्र लगा जिस जगह पर दोनों भाई शर्मिंदा हुए थे। मंदिर वहीं बनाया गया।

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          परिवार में समय के साथ-साथ, साथ बदलते रहते हैं, जैसे बचपन में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन; युवावस्था में पति-पत्नी, बच्चे; प्रौढ़ावस्था में वयस्क बच्चे और वृद्ध माता-पिता। हर अवस्था में हमारा 'रोल' बदलते रहता है और प्रत्येक रिश्ते में हमारा अभिनय व्यवहार की कसौटी पर परखा जाता है। पारिवारिक रिश्ते भावनाओं के सहारे पनपते हैं, भावनाएँ ही सम्बन्धों की उर्वरक हैं। 
          परिवार के भरण-पोषण के लिए धनार्जन आवश्यक है, यह धन उदर को भोजन देता है और मस्तिष्क को उत्पात। धन के प्रभाव में भावनाएँ अस्त होती जाती हैं और व्यक्तिगत व्यवहारिकता का उदय होने लगता है। समग्र परिवार के पोषण का भाव व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता है और संयुक्त परिवार की अवधारणा ध्वस्त हो जाती है। इस चक्रव्यूह में वे अभिमन्यु फंस जाते है जो परिवार के प्रति भावुक होते है, अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। यहाँ, सतर्क होने की ज़रूरत है क्योंकि यदि जिम्मेदार व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी का प्रतिफलन चाहता है तो उसे निराशा हाथ लगेगी, दुनिया बेहद चतुर है। 

          एक निष्कर्ष- 'पहले अपनी मदद करो, दूसरों की मदद तब करना जब उस लायक हो जाओ।'  

          जीवन की सफल यात्रा के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करना आवश्यक है बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने होंगे। इसके बाद समय-समय पर उस समय की तात्कालीन स्थिति का मूल्यांकन करते हुए रणनीति में आवश्यक परिवर्तन करके छोटी-मोटी असफलताओं को सफलता की सीढ़ी मान कर बिना रुके आगे बढ़ना होगा, तब बात बनेगी सही दीवार का रहस्य इन्हीं आरंभिक असफलताओं में छुपा रहता है। एक नाव पूर्व की ओर जाती है तो दूसरी पश्चिम की ओर जबकि हवा एक जैसी चलती हैं। किधर जाना है- यह हवा की दिशा पर निर्भर नहीं होता बल्कि पतवार चलाने वाला तय करता है
          हमारे परिवारों में संस्कार देने के नाम पर बच्चों को वह सिखाया जाता है जो पुरातन हो चला जबकि दुनिया हर पल बदल रही है। मनुष्य बचपन में जो सीखता है वह उसके मस्तिष्क में गहरी जड़ें जमा लेता है इस कारण नई दुनिया की गति से उसका तालमेल नहीं बैठता और वह स्वयं को उस दौड़ में असमर्थ महसूस करता है। बक्मिंस्टर फुलर का मानना है- 'सभी बच्चे प्रतिभाशाली पैदा होते हैं लेकिन 10000 में से 9999 बच्चों को वयस्क लोग अनजाने में तेजी से प्रतिभाविहीन बना देते हैं।' 
           स्थापित मान्यताएँ और आस्थाएँ ध्वस्त हो रही हैं। पुरानी पीढ़ी के पास एक अदद भगवान था जो समस्त गतिविधियों का संचालक था, जिम्मेदार था लेकिन नई पौध ने इस अवधारणा से दूरी बना ली है, वे अपने व्यक्तिगत ज़िन्दगी में भगवान का दखल या उसकी मदद बहुत पसंद नहीं करते, उन्हें अपनी बुद्धि और शक्ति पर विश्वास है। यह एक अर्थपूर्ण संकेत है। 
           रिश्तों के अब अपने मायने बदल रहे हैं, उनकी उष्णता धीमी हो चली है क्योंकि समय सबको कुछ-न-कुछ सिखाते चलता है और सामान्य मनुष्य के व्यवहार पर अपनी अदृश्य पैठ बनाते रहता है। सामाजिक मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। हमारे आसपास जो कुछ होता है उस क्रिया की प्रतिक्रिया कुछ ही समय में उभरकर सामने आने लगती है। मूल्यों के परिवर्तन की धार इतनी तेज है कि स्त्रियाँ पुरुषोचित व्यवहार कर रही हैं तो पुरुषों में विपरीत व्यवहार परिलक्षित हो रहा है, वहीं पर बच्चे बड़ों जैसा तो बड़े बच्चों जैसा व्यवहार कर रहे हैं।
          दुनिया के अधिकतर लोग अपने जीवन भर आजीविका की तलाश में ही लगे रहते हैं लेकिन कुछ लोग जीवन में जीवन की तलाश करते हैं। इन दोनों परिस्थितियों में वही अंतर है जो 'स्वीमिंग पूल' या समुद्र में तैरने का है। जीवन में जीवन तलाशने वाले मुझे बेहद अचंभित करते हैं क्योंकि वे विलक्षण निर्णय लेने वाले होते हैं और आजीविका तलाशने वाले मुझे इसलिए व्यथित करते हैं क्योंकि उनका जो पेट है कि वह भरता ही नहीं !
           इस दुनिया में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मनुष्य जिस तरह जीना चाहता है वैसा लोग लोग उसे जीने नहीं देते इसलिए वह भी दूसरों से अपना बदला भुनाता है, वह भी दूसरों को उनकी मर्जी से जीने में पचास अड़ंगे लगाता है। यह खेल न जाने कब से जारी है ! दुख-सुख, सफलता-असफलता, मिलन-विछोह सब क्षणिक है लेकिन जब ये जीवन में घटते हैं तो इनकी तीव्रता इतनी अधिक होती है कि मनुष्य का मानसिक संतुलन डगमगा जाता है। जिसने उस पल संतुलन साध लिया, जो हर परिस्थिति में सम रहा, समझ लीजिए उसने जिन्दगी की बाज़ी जीत ली।  
          जीवन है तो उसके अपने रंग हैं। सारे रंग मिलकर एक ऐसा रंग विकसित करते हैं कि रंग नहीं रह जाता, पानी के रंग जैसा बेरंग। इसीलिए तो कहते हैं- यह दुनिया रंग-बिरंगी है। 

                                                     ( समाप्त )             

2 comments:

  1. बहुत सुंदर। जीवन के प्रति ऐसे विवेकपूर्ण दृष्टिकोण प्रणामप्रणाम।

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