Thursday, April 23, 2015

सब कुछ सीखा हमने

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          'मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के...' इस चेतावनी के बाद भी मैंने अपने अतीत को मुड़ कर देखा। बहुत मज़ा आया जैसे कोई पुरानी फिल्म लंबे अर्से के बाद देखने को मिली हो। पीछे मुड़कर देखने में कोई खतरा न था लेकिन उसे लिपिबद्ध करके सार्वजनिक करने में कई खतरे थे। मैंने इस खतरे को उठाने का खतरा लिया लेकिन यह प्रयास खतरनाक नहीं, अतीत के व्यतीत को समझने में सहायक सिद्ध हुआ।
           उम्मीदों की जमीन पर परिवार बने है, रिश्ते-रिश्तेदारी है, दोस्ती-जानपहचान है, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारा, मस्जिद व अन्य प्रार्थना गृह निर्मित किए गए हैं। इन्हीं उम्मीदों को हासिल करने के लिए गुरु की खोज की जाती है, ईश्वर की कल्पना की गई और भगवत्ता की अवधारणा का आधार भी। ये उम्मीदें ही इन्सान की ज़िंदगी को थामने वाली डोर हैं। मनुष्य को सुख चाहिए, सुख को 'फील' करने दुख चाहिए जबकि हम सब जानते हैं कि दुख पाने की वज़ह उम्मीदें हैं और उम्मीदें तो रहती ही हैं, जबकि ये सब भ्रम है, जीने के बहाने हैं।

'निकले थे घर से हम तो खुशी की तलाश में
गम राह में खड़े थे वो ही साथ हो लिए
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए।'
          बचपन से अब तक की घटनाएँ जो हुई, वही तो होनी थी ! ज़्यादा कुछ तो जन्म से पहले तय हो जाता है, माँ का गर्भ, पिता, भाई-बहन और हमारा जन्मस्थान, क्या इन्हें बदलना हमारे हाथ में है ? अगर मैं चाहता हूँ कि मेरे पिता ऐसे होने चाहिए या माँ वैसी होनी चाहिए तो मेरे चाहने से क्या होगा ?
         हमारे आसपास के सभी लोग अपनी सोच और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार करते हैं, हमारी उम्मीदों के अनुरूप नहीं। सच पूछें तो हमारी मदद और हमारी रुकावट, दोनों आसपास के लोग ही हैं। यह हमारी दक्षता है कि हम उनकी मदद ले पाते हैं या रुकावट शिरोधार्य करते हैं। यहाँ पर हमारा स्वभाव सक्रिय भूमिका निभाता है, हमारा स्वभाव यदि 'अपना काम निकालने' वाला है तो येन-केन-प्रकारेण अपने लिए मदद हासिल कर लेंगे, उसके लिए खुशामद कर लेंगे, गाली खा लेंगे, चरणचुंबन कर लेंगे, मान-मनव्वल कर लेंगे या फिर धमका भी सकते हैं पर अपना काम करवा लेंगे। वहीं पर हमारा स्वभाव यदि संकोची है तो मदद लेना बहुत दूर की बात है, मदद के लिए किसी से कहने में भी लज्जा आती है। वह सोचता है- 'हमारे कष्ट को सामने वाला समझे तो अच्छी बात है अन्यथा जो है वह सही है।' इस प्रकार संकोची व्यक्ति अपने मान-अपमान के चक्कर में चुप रह जाता है, अपनी तकलीफ नहीं बताता परिणामस्वरूप उसके कष्ट स्वकेंद्रित हो जाते हैं और उन्हें वह अकेले भुगतता है।
          परिवार में संवाद की कमी से व्यवस्था बिगड़ती है। हमारे जमाने में एकांगी संवाद का प्रचलन था, अर्थात बोलता वही था जिसे बोलने का स्वाभाविक अधिकार था, मसलन, घर का मुखिया या जिसके हाथ में तिजोरी की चाबी है, या जो आक्रामक स्वभाव का है, शेष सब श्रोता थे। इस वज़ह से घर में तानाशाही का वातावरण होने के कारण चर्चा या विमर्श का अभाव था, केवल कथन और श्रवण होता था। जब तक बातचीत का अनुकूल वातावरण विकसित नहीं होता, कैसे एक-दूसरे की समस्या को समझा जाएगा और उनका समाधान खोजा जाएगा ?
          जिन परिवारों में बातचीत का लोकतान्त्रिक माहौल है, वहाँ सब लोग मिलजुल कर आगे बढ़ते हैं और एक दूसरे से सरोकार रखते हैं। किसी एक व्यक्ति का विकास सबका उत्तरदायित्व होता है और किसी व्यक्ति की समस्या पूरे परिवार का सरोकार। आधुनिक युग में परिवारों में बेहतर माहौल विकसित हो रहा है जिसमें खुलकर बात करने की सुविधा है और सब एक दूसरे का सुख-दुख समझते हैं जो परिवार के समग्र विकास के लिए परम आवश्यक है।

          हमारी जीवन शैली में श्रम को कष्ट का पर्याय क्यों माना जाता है, यह बात समझ के बाहर है। कोई किसानी कर रहा है या मजदूरी, नौकरी कर रहा है या व्यापार, इन जीवनयापन के कार्यों को कष्ट से जोड़ना अजीब है। 'किचन' में भोजन या नाश्ता बनाना, 'हाउस कीपिंग' करना, बाजार से राशन या साग-सब्ज़ी की खरीददारी करना जैसे जीवनोपयोगी कार्य भी परिश्रम की श्रेणी में आ गए हैं। पैदल चलना, योग-व्यायाम करना, जिम जाना भी कष्टसाध्य लगता है। दरअसल, जीवन के आरंभ से ही हमें 'आराम ही सुख है' की समझाइश मिली जिसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य काम न करने के रास्ते खोजने का विशेषज्ञ बन गया और शनैः शनैः आलसी और कामचोर बन गया। इसी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य अपनी क्षमता का समुचित प्रयोग नहीं कर पाता और 'काम न करने' का स्वभाव विकसित हो जाने के कारण उसकी प्रगति की राह स्वयं-अवरुद्ध हो जाती है। यद्यपि स्कूलों में युवाओं को सक्रिय करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन कालेज पहुँचते-पहुँचते शारीरिक सक्रियता कम होती जाती है और अधिकाँश युवा 'केरियर' बनाने के चक्कर में अपनी कुर्सी-टेबल में कैद हो जाते हैं फलस्वरूप शारीरिक श्रम करने का अभ्यास कम होते जाता है। इस आलस्य के मनोविज्ञान ने न केवल मनुष्य की असीमित व्यक्तिगत क्षमता का ह्रास किया वरन सम्पूर्ण समाज को भी गंभीर क्षति पहुंचाई है।
          समाज में अब दो वर्ग विकसित हो गए हैं, पहला वर्ग है गंदगी करने वाला, यह समर्थ वर्ग है जिसे गंदगी या कचरा फैलाने में कोई संकोच नहीं है। चूंकि उनकी जेब में पैसे हैं इसलिए वे इस धृष्टता को अपना अधिकार समझते हैं और उन्हें मालूम है कि कोई दूसरा व्यक्ति है जो सफाई करेगा। इस वर्ग के अच्छे-खासे, पढे-लिखे लोग गंदगी फैलाने के मामले में अनपढ़ों को भी मात दे देते हैं। अपने घर और दूकान का कचरा सड़क पर निःसंकोच फेकना, पान-गुटके की पीक इधर-उधर थूकना, रेल्वे प्लेटफार्म और रेल के डिब्बे में गंदगी फैलाना इस अदा से करते हैं जैसे उनका परम कर्तव्य हो। समाज में दूसरा वर्ग है, सफाई करने वाला जो वास्तव में सफाई करना नहीं चाहता, वह भी फैलाना ही चाहता है लेकिन इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है, गरीबी है, मज़बूरी है।  जापान में प्रचलित प्रबंधन शैली में 'हाउस-कीपिंग' की अवधारणा है जिसे '5 S' कहते हैं, उसका एक महत्वपूर्ण सूत्र है: 'कचरा करने वाला और उसे समेटने वाला व्यक्ति अलग-अलग नहीं, एक होना चाहिए।'
         मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन काल में सफाई के महत्व से जन सामान्य को जोड़ा और अपने प्रशंसकों को वैसा करने के लिए प्रेरित भी किया। गिरिराज किशोर के उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में गांधीजी के उस समय के भारत प्रवास का विवरण दिया है जब वे दक्षिण अफ्रीका से कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए कलकत्ता आए थे।

          ''मोहनदास को शौच जाना था। शौचालयों की संख्या ठहरे हुए डेलीगेट्स के अनुपात में बहुत कम थी। मोहनदास सब शौचालयों के चक्कर काट आए, इतनी दुर्गंध थी कि लगा सिर फट जाएगा। वे लौट आए। एक स्वयंसेवक को बुलाकर पूछा- 'क्या सफाई का यहाँ कोई प्रबंध नहीं है ?'
'यह हमारा काम नहीं, भंगी का काम है।'
'क्या भंगी हम खुद नहीं हो सकते ?'
          स्वयंसेवक उनकी बात पर हंस दिया, तब तक एक-दो स्वयंसेवक और आ गए। मोहनदास ने उनसे पूछा- 'क्या एक झाड़ू और बाल्टी का इंतजाम हो सकता है ?'
          उन लोगों ने गांधी की ओर आश्चर्य से देखा। उनकी नाक ऐसे चढ़ गई जैसे दुर्गन्ध के ढेर के सामने खड़े हों। उनमें से एक बोला- 'क्यों ?'
'जब हम गंदगी फैलाते हैं तो सफ़ाई क्यों नहीं कर सकते ?'
          उनका आश्चर्य दूसरे भाव में बदल गया। उन्होंने ऐसे देखा, या तो यह सूटेड-बूटेड आदमी सिरफिरा है या कोई निम्न कोटि का है। मांगकर सूट-बूट पहनकर आया है। वे उनकी बात अनसुनी करके सरक गए।
          मोहनदास ने इधर-उधर घूम-फिरकर झाड़ू और बाल्टी का बड़ी मुश्किल से इंतजाम किया, मुंह पर ढाटा बांधा और एक शौचालय में घुस गए। उन्हें रह-रहकर उबकाई आ रही थी। मोहनदास ने बाल्टी भर-भरकर पानी लाना और पाखाने को बहाना शुरू किया। बदबू के मारे माथा फटा जा रहा था। जमीन पर पाखाना बुरी तरह लिहस गया था। वे उसे झाड़ू से रगड़-रगड़ कर छुड़ा रहे थे। स्वयंसेवक दूर से देख रहे थे और हंस रहे थे।
          मोहनदास ने बाहर निकलकर कहा- 'आप बेफिक्र रहें, यह शौचालय मैंने अपने लिए साफ किया है। हम लोग जबतक अपनी सेवा आप करना नहीं सीखेंगे, दूसरों की सेवा जितना बड़ा काम कैसे कर पाएंगे ? आज अपने लिए किया, कल दूसरों के लिए करूंगा।'
'दूसरे....?' उनमें से कोई कुछ कहना चाहता था, मोहनदास बीच में बोले- 'दूसरों की सेवा के लिए पहले अपनी तैयारी ज़रूरी है।'
          अगली सुबह मोहनदास उठे, तो दुर्गन्ध का भभका उन्हें घेरता महसूस हुआ। बरामदे तक मल की दुर्गन्ध आ रही थी। मोहनदास ने फिर से झाड़ू उठा ली और कुए से बाल्टी में पानी भरकर सफाई करने लगे। डेलीगेट्स भी चिंतित थे, वे आपस में बातें कर रहे थे- 'पता नहीं कैसे-कैसे लोग आ जाते हैं !'
'सुना है दक्षिण अफ्रीका से आए हैं।'
'दक्षिण अफ्रीका जाकर क्या लोग धर्म-कर्म, सुच-असुच तक भूल जाते हैं ?'
'क्या यह आदमी पिछ्ले जन्म में भी तो वही नहीं था ?'
'या, फिर अब होगा।'
'दरअसल, ऐसे लोग दूसरों पर दबाव बनाए रखने के लिए इस तरह के पतित काम करते हैं।''  

          यह घटना लगभग एक सौ वर्ष पुरानी है, इन सौ वर्षों में शिक्षा के प्रभाव ने हमें आधुनिक अवश्य बना दिया लेकिन हमारी सोच आज भी वैसी ही पुरातन है- 'हमारा काम गंदगी फैलाना है, सफाई करना दूसरे का काम है।' क्यों है न ?
          कारण ? कारण है, आलस्य और हमारी संवेदनहीनता।

          सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'जो काम करना जरूरी है, जो अवसर तुम्हारे सामने है- उसके लिए अभी सही समय है, कल नहीं।' इस बात को अगर जीवन की शुरुआत में समझ लिया जाए तो जीवन अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। घटनाओं को होते हुए चुपचाप देखने से कुछ हासिल नहीं होता। 'जेहि विधि राखे राम सोई विधि रहिए' की अवधारणा तसल्ली करने के लिए अच्छी है, भगवान पर भरोसा करना भी ठीक है लेकिन भगवान के भरोसे रहना बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं है।
          बचपन में मनुष्य को कुछ समझ में आता नहीं, माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को व्यतीत करना होता है, वे नाव को जिस दिशा में ले जाएं, जो कहें, वह सही। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देता है और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उसे आलसी स्वभाव का बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
          युवावस्था में दोस्त और उनकी दोस्ती अच्छी लगती है। उसी दौर में शरीर के 'हार्मोंस' विपरीतलिंगी आकर्षण उत्पन्न करना आरम्भ देते हैं। अधिकतर युवा सपनों की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं जो जीवन के यथार्थ से कोसों दूर होती है। उनकी रचनात्मक ऊर्जा कामोत्तेजना के आसपास भटकती रह जाती है, दिशाभ्रम हो जाता है, न लक्ष्य समझ में आता है और न सही राह। इसी चक्कर में अनेक संभावनाएं गड्डमड्ड राहों में खो गई और जीवन भर गृहस्थी का बोझ ढोने के लिए मजबूर हो गई।
          इस काल में जिसने परिश्रम कर लिया, वह सुविधापूर्ण जीवन की राह पर चल पड़ता है लेकिन जिसने आलस्य को अपनाया, समझ लीजिए वह जीवन भर कष्ट भुगतने के लिए अभिशप्त है। एक बोधकथा है:  दो आलसी युवा बेर के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। उनकी नज़र पेड़ में लगे बेर के फल पर गई। उनमें से एक बोला- 'आ बेर, नीचे गिर।' वह चाहता था कि बेर अपने-आप गिर जाए तो उसे पेड़ पर चढ़ कर तोड़ने की मेहनत न करना पड़े। जब दूसरे ने यह सुना तो उसने पहले को ज़ोर से डांटा और चुप रहने का निर्देश दिया, फिर उसने सुधार कर कहा- 'आ बेर, मेरे मुँह में गिर।'
          आलसी व्यक्ति का मनोविज्ञान अज़ब होता है, आलसी कहो तो उसे चोट नहीं लगती, बुरा लगता है ! ऐसे लोग रात हो या दिन, हर समय सपने देखते हैं और 'बातें बनाने' के विशेषज्ञ होते हैं। ये अपने जीवन में बबूल के पौधे रोपते रहते हैं और उसमें आम फलने की उम्मीद करते हैं।

          आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः। नास्ति उद्यम समो बंधु कृत्वा नावसीदति॥
          (मनुष्य के शरीर में आलस्य जैसा कोई शत्रु नहीं और न ही उद्यम के जैसा कोई बंधु। )

          किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।

          मैंने जब स्कूल और कालेज में पढ़ाई की तब शिक्षा का वह माहौल न था जैसा अब दिखाई पड़ता है, संभवतः ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी वैसा ही हो जैसा हमारे जमाने में था। कक्षा में सबसे सामने बैठे आठ-दस 'विद्यार्थियों' को ही पढ़ाई-लिखाई से मतलब होता था, बाकी युवा अपने-अपने विभिन्न कारणों से कक्षा में बैठे रहते थे। मैंने कुल 18 वर्ष पढ़ाई की लेकिन मुझे उस समय यह समझ में नहीं आता था कि हम क्यों पढ़ रहे हैं, ये सब हमारे क्या काम आएगा ? पढ़ने के नाम से उकताहट होती थी, नींद आती थी। परीक्षा के एक सप्ताह पहले 'आई॰एम॰पी॰' पता लगाते थे, दिन-रात रटते थे, परीक्षा देते थे, पास हो जाते थे। उस 'बेवज़ह' की वज़ह अब समझ आती है, आज लगता है, फिर से स्कूल और कालेज में जाकर बैठूँ, वह सब पढ़ूँ जो उस समय छूट गया था। 
          युवावस्था में सही दिशा पकड़ने के लिए अच्छे मित्र चाहिए होते हैं जो भाग्य से ही मिलते हैं। हमारे आसपास हमें बहकाने वाले बहुतेरे मिलेंगे लेकिन सही राह दिखाने वाले बहुत कम। गलत लोगों के साथ नरम होना घातक सिद्ध होता है, उन्हें दृढ़ता के साथ खुद से दूर रखना श्रेयस्कर है। मेरे एक मित्र जो कालांतर में एक विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, कालेज की पढ़ाई के दौरान सिगरेट पिया करते थे। हम दोनों साइकल में नगर-भ्रमण कर रहे थे, रास्ते में पान की एक दूकान पर रुके, दो सिगरेट खरीदी, एक मुझे दी। मैंने मना कर दिया तो वे मुझ पर नाराज हो गए और कहा- 'तुम दोस्ती के लायक नहीं।' मैंने अपनी साइकल उठाई और उन्हें वहीं सिगरेट पीता छोड़कर चला गया। दोस्ती तोड़ दी।
          पढ़ाई में आगे बढ़ना है तो कक्षा में सामने की बेंच में बैठनेवालों से दोस्ती ठीक रहेगी, व्यापार-उद्योग में आगे बढ़ना हो तो सफल व्यापारियों-उद्योगपतियों की संगत, 'प्रोफेशनल' बनना है तो प्रोफेशनल्स' से मेलजोल, साहित्यकार बनना है तो लेखकों और कवियों के साथ उठना-बैठना या आध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ना है साधु-सन्यासियों के चरणों में समर्पित होना पड़ेगा। जैसी सोहबत वैसी निस्बत।  
          'मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया' मनुष्य की संतोषजीविता का संकेत है लेकिन यह उस वक्त ठीक है जब अकेले जीवन व्यतीत करना हो लेकिन यदि गृहस्थी चलानी है तो 'जो मिल गया' से काम नहीं चलेगा, उसके लिए अतिरिक्त प्रयास और परिश्रम करना होगा। परिवार, गुरुजन और मित्रों से अपनी रुचि के विषय में खुलकर बातचीत करें। भरपूर 'होमवर्क' करें और सभी विकल्पों पर गौर करें, अपनी रुचि को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, आर्थिक पक्ष को समझते हुए उचित निर्णय लेकर आगे बढ़ें। विचार सबके जानिए लेकिन निर्णय स्वयं का होना चाहिए, किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित होकर या किसी के दबाव में नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति के अनुरूप। प्रश्न केवल आजीविका कमाने का नहीं है, वह करने का है जो करना आपको प्रिय है। सफलता के लिए सम्पूर्ण समर्पण, लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, भरपूर परिश्रम और धैर्य चाहिए। सफलता का कोई 'शार्टकट' नहीं होता, वह अपनी कीमत वसूल करती है, उसे अदा करना ही होगा।    
           विश्वप्रसिद्ध चित्रकार विन्सेन्ट वान गॉग ने अपनी जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ' में लिखा है- 'दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है। आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है, वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है। वह उदारता प्राप्त करने को आया है, उस बेहूदगी को पार करने आया है जिसमें ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है।'     

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आगे और भी है > ।             

4 comments:

  1. अद्भुत जीवन दर्शन या कि दर्शनों का सार हे ये .!!

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    1. यह आत्मकथा का अंतिम अध्याय है जिसमें सार-तत्व ही है.

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  2. अभी बहुत कुछ जानना बाकि है आपसे । इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगे ।

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    1. लिखना जारी रहेगा, विभिन लेखों के माध्यम से हम आप जुड़े रहेंगे। आत्मकथा में अब विराम...फिर कभी...यदि जीवन रहा और कुछ बताने का मन हुआ तो फिर जुड़ेंगे। आभार।

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