Monday, April 13, 2015

जीवन चलने का नाम

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          कैंसर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2002 में हुई थी, छः वर्ष बाद फिर से हो गई। अब तक दोनों बेटियाँ ब्याह गई थी, कर्ज़ पट गए थे, माधुरी लाज का काम-काज सीख-समझ गई थी इसलिए मुझे अपने जीवन से विदा लेने में कोई दुविधा या असुविधा नहीं थी। रही बात कष्ट की, सो जितनी तम्बाखू खाई थी, उसका जो मज़ा लिया था तो फल भी मुझे ही भुगतना था। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी थी लेकिन 40-50 पृष्ठ ही लिखे गए थे, मैं चला भी जाता तो भी कुछ खास बात नहीं थी, करोड़ों आत्मकथाएँ अधलिखी या बिनालिखी चिता की अग्नि में स्वाहा हो गई, मेरी भी हो जाती।
          असल में जून 2008 में ही मेरे मुंह में पनप रहे कैंसर ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। चौबीस घंटे कनपटी, दाढ़ और कान में तीखे दर्द का एहसास बना रहता था। मैंने दो माह तक होम्योपैथी दवा ली लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हो रहा था। 2 अगस्त को भोपाल के लायन्स क्लब में आयोजित 'केबिनेट मीटिंग' में मुझे 'संगठन प्रबंधन' पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था। मुँह में दर्द बहुत अधिक था, बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी आयोजक को किए गए वादे से मुकरना मुझे नापसंद था, मैं भोपाल गया और दो घंटे की प्रस्तुति दी। पूरे चेहरे में दर्द और बढ़ गया। भोपाल से मैं जबलपुर चला गया और अपने भांजे डा॰ विकेश अग्रवाल से सलाह ली। उन्होंने मुझे आंकोलाजिस्ट डा॰ अर्पण मिश्रा को दिखाया। डा॰ मिश्रा ने रोग के तेजी से बढ्ने की चेतावनी और तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? निर्णय लेने की किसी भी चूक का परिणाम घातक हो सकता था। मैं कैंसर से लड़ने की बजाय उसे तटस्थ भाव से देखना चाहता था जबकि संगीता और केदार मुझे यह आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने इंदौर में 21 अगस्त को सर्जरी निश्चित करवा ली। पहली सर्जरी में हुआ भयानक कष्ट मुझे याद था, अगली सर्जरी और भी गहरी और गंभीर होने वाली थी। संभावित पीड़ा की कल्पना से मैं रह-रहकर काँप उठता लेकिन मेरे सामने दो ही विकल्प थे, या तो सर्जरी का तात्कालीन कष्ट सहूँ या मृत्यु की प्रतीक्षा का अनिश्चितकालीन कष्ट। अंततः मैंने सर्जरी को चुना।
          एक दिन मैंने बाज़ार से आधा किलो छेने का चमचम खरीदा, घर लाया और डब्बा खोलकर खाने बैठा गया। माधुरी जी मुझे मीठा खाते देखकर चौंक गयी क्योंकि पिछले कई वर्षों से मैं मीठा नहीं खा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा- 'अरे, मिठाई खा रहे हो?'
'हाँ.' मैंने ठंडा सा उत्तर दिया.
'कैसे? तुम तो चाय तक बिनां शक्कर की पीते हो, आज क्या हो गया?'
'मैंने देखा है कि जिसे भी दोबारा कैंसर होता है, वह नहीं बचता। मुझे लगता है कि मेरा समय भी पूरा हो चुका है।'
'तुम कैसी बातें कर रहे हो? कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा लेकिन आज यह मिठाई खाने की क्या सूझी?'
'मैंने सोचा, अब आखिरी समय है, सब सब खा-पी कर मरूं.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब मरने का समय आएगा तो अतृप्त इच्छाओं के कारण मेरी आँखों के सामने बालूशाही, जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन नृत्य करेंगे। संभव है कि इसी वज़ह से अगले जन्म में मैं फिर हलवाई बन जाऊं! यार, अगले जन्म में हलवाई नहीं बनना मुझे.'
'इसलिए मीठा शुरू?'
'यस, आज से मीठा शुरू.' मैंने हंसते हुए कहा.  
          18 अगस्त की शाम को संगीता का फोन आया और मुझसे अगली सुबह 'सेकेंड ओपीनियन' हेतु मुंबई चलने के लिए कहा। 19 अगस्त की सुबह की 'फ्लाइट' से हम मुंबई पहुँच गए और मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल के आंकोलाजी विभाग में डा॰ मंदार देशपांडे के सामने बैठे थे। अस्पताल नया था, हाल-हाल में शुरू हुआ था जबकि डाक्टर पुराने और अनुभवी लेकिन युवा थे। डा॰ मंदार देशपांडे को मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में मुँह की शल्यक्रिया का दीर्घ अनुभव था, अब वे इस अस्पताल में कार्यरत थे। डा॰ देशपांडे ने मेरी जांच की, इंदौर की रिपोर्ट देखी और कहा- 'अंकल आपकी सर्जरी करनी पड़ेगी, 'सुप्रा मेजर सर्जरी' होगी। गाल खोलकर हड्डी निकालनी होगी और फिर 'प्लास्टिक सर्जरी' से उसे आपकी जांघ से मांस का टुकड़ा निकालकर वहाँ जोड़ेंगे ताकि आपका चेहरा एक तरफ धंसा हुआ न दिखे। चेहरा एकदम जस का तस नहीं बन पाएगा, या तो एक तरफ थोड़ा दबेगा या बढ़ सकता है। '
'ठीक है।' मैंने कहा।
'सर्जरी के बाद आपको बारह से चौदह दिनों तक अस्पताल में रहना होगा और छुट्टी होने के बाद लगभग दो माह मुंबई में ही रुकना पड़ेगा ताकि आपकी रेडियोथेरेपी की जा सके।'
'मैं सर्जरी करवाने के लिए तैयार हूँ लेकिन रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करवाऊंगा।'
'मेरा अनुमान है कि सर्जरी के पश्चात  रेडियोथेरेपी तो करनी पड़ेगी।'
'फिर मुझे न सर्जरी करवानी है न रेडियोथेरेपी, मैं चलता हूँ, आपको धन्यवाद।'
'मैं एक बात कहूँ अंकल ?'
'जी कहिए।'
'आप अगर मेरे पापा होते तो मैं यह 'चांस' अवश्य लेता।'
'आपने बहुत गभीर बात कह दी।'
'जी, मैं अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे रहा हूँ कि आप सर्जरी और रेडियोथेरेपी के लिए खुद को तैयार करें।'
'तो फिर ठीक है, कर दीजिए, कब करेंगे ?'
'आज आपकी 'बायप्सी' ले लेते हैं, आठ दिनों में रिपोर्ट आ जाएगी, उसके तीन दिन बाद आपकी सर्जरी।'
'डाक्टर साहब, यह बताइए, बायप्सी क्यों करते हैं ?'
'कैंसर 'कंफर्म' करने के लिए।'
'आपने अभी मेरा गाल 'चेक' किया, आपको ऐसा लगता है कि कुछ 'कंफर्म' करने की ज़रूरत है ?'  
'आपको कैंसर है, पक्का है, यह मुझे दिख रहा है लेकिन 'पेशेंट' की तसल्ली के लिए बायप्सी रिपोर्ट देखते हैं।'
क्यों आप आठ दिन का समय निरर्थक नष्ट कर रहे हैं ? आप कल मेरी सर्जरी कर दीजिए।'
'ऐसा क्या ?' डाक्टर ने पूछा।
'जी, शुभस्य शीघ्रम।' मैंने कहा।

          डाक्टर देशपांडे ने कहा- 'आज आप 'एडमिट' हो जाइए, कल दिन में आपके कुछ 'टेस्ट' होंगे और यदि 'ओ टी' खाली होगा तो परसों सर्जरी। उन्होंने 'ऑपरेशन थियेटर इंचार्ज' को फोन लगाया, इंचार्ज ने बताया- '21 को 'ओ टी' खाली नहीं है।'
'कोशिश करो, शायद कोई सर्जरी 'शिफ्ट' हो।' डाक्टर ने उनसे कहा। हमसे कहा- 'ऑपरेशन 21 को न हो सका तो 22 को करेंगे, आप आज रात को भर्ती हो जाइए, कल से आपका 'प्रोसीजर' शुरू कर देंगे।'
'सही है।' मैंने कहा।
          फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोरकुमार ने एक मज़ेदार गाना गाया था- 'जाते थे जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए न ?' इसी तरह मुझे सर्जरी के लिए इंदौर जाना था लेकिन मैं मुंबई पहुँच गया। रात को जब भर्ती होने के लिए काउंटर पर गए तो मालूम हुआ कि 'सुप्रा मेजर सर्जरी' का 'ट्विन शेयर' में पैकेज दो लाख पचहत्तर हजार का है और एक लाख अस्सी हजार रुपए अभी जमा करना है तब 'एडमिशन' होगा। हमने अस्पताल में स्थापित एटीएम से साठ हजार निकाल लिए लेकिन रात को दस बजे शेष एक लाख बीस हजार कहाँ से आते ? उस समय हमारे मित्र रमेश जोबनपुत्रा के बहनोई रजनीकान्त गढ़िया, जो मुंबई में रहते हैं, हमारे साथ थे, वे बोले- 'आधे घंटे रुकिए, मैं अपने घर से लेकर आता हूँ।'
          रात को ग्यारह बजे मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था, लेटते ही 'प्रोसीजर' शुरू हो गया। 20 अगस्त को माधुरी और केदार मुंबई आ गए। दिन भर 'स्केन', 'एक्स-रे', खून-पेशाब-एड्स' आदि की जांच हुई। डाक्टर देशपांडे ने शाम को फोन किया- 'आपकी सारी रिपोर्ट मेरे कंप्यूटर पर आ गई है, सब 'नार्मल' है। कल सुबह जिस 'पेशेंट' की सर्जरी होनी थी, 'सुगर' बढ़ने के कारण 'पोस्टपोन' हो गई है। आपकी सर्जरी के लिए 'ओ टी' खाली मिल गई, कल सुबह सात बजे आपको तैयार रहना है। ऑल द बेस्ट।'
          21 अगस्त की सुबह मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय सबने शुभकामना संकेत दिए, मैंने भी वापसी संकेत किए। मुझे 'स्ट्रेचर' पर लिटाकर 'प्री सर्जरी रूम' में ले जाया गया, वहाँ और भी मरीज थे। बहुत देर तक मैं वहाँ लेटा रहा, निर्विकार भाव से, बीच-बीच में उठकर अन्य मरीजों को देखता और फिर वापस लेट जाता। तब ही अनेस्थेटिस्ट डा॰ अपर्णा दाते मेरे समीप आई औए बोली- 'अंकल, चलें ?'
'मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूँ, चलिए।' मैंने उत्तर दिया। कुछ देर बाद मैं एक शानदार ऑपरेशन थिएटर की तेज रोशनी वाली लाइट के नीचे लेटा हुआ था। डा॰ दाते ने हाथ की नस में धीरे से एक 'इंजेक्शन' लगाया, उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या पता ! 'आंकोलाजिस्ट डा॰ मंदार देशपांडे और प्लास्टिक सर्जन डा॰ चारुदत्ता चौधरी ने मेरी सर्जरी की। हमारी बिटिया संगीता को भी ओटी में अपने पापा की सर्जरी देखने का सुअवसर मिला।

          'हूँ, देखो, मैं हूँ।' मुझे आवाज सुनाई पड़ी। मैंने आंखे खोली, सामने माधुरी खड़ी थी। उनकी आँखों से प्रसन्नता उमड़ रही थी, होठों में मुस्कान और चेहरा आश्वस्त। मैंने अपने बाएँ हाथ से उनके गाल छुए, उन्होंने मेरे हाथ की गदेलियों को अपनी दोनों गदेलियों से लपेट लिया। मेरी आँखें भर आई, गला रूँध गया, हम दोनों के मध्य एक मौन संभाषण हुआ। उस संभाषण को शब्दों में कैसे बताऊं ? मेरे मुंह में रुई ठुँसी हुई थी, किसी तरह बुदबुदाते हुए मैंने उनसे पूछा- 'ऑपरेशन कब तक चला ?'
'क्या पता, तुम दस घंटे बाद बाहर आए, कल की बात है, अब कैसा लग रहा है ?' माधुरी ने प्रश्न किया। मैंने अपने दाहिने अंगूठे से तर्जनी को जोड़कर इशारा किया जिसका अर्थ था- 'बढ़िया।' तीन-चार मिनट की इस छोटी सी मुलाक़ात को मैं अपने जीवन भर सँजोकर रखूँगा। यह पुनर्मिलन जैसा था। आई॰सी॰यू॰ में कुछ देर बाद संगीता आई- 'कैसे हो पापा ?' मैंने अपनी पलकें झपकाकर कुशल होने का संकेत दिया और एक हाथ उठाकर गाल को छू लिया। मेरे उस स्पर्श में उनके द्वारा किए गए अपूर्व प्रयासों के लिए आभार, शाबासी और न जाने क्या-क्या भाव थे !
'पापा, मैं तीन घंटे तक आपकी सर्जरी में खुद खड़ी रही, बहुत अच्छा ऑपरेशन हुआ है आपका, डा॰ देशपांडे और डा॰ चौधरी ने शानदार काम किया।' संगीता ने बताया। कुछ देर बाद हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ मुझे देखने आए, मुझे देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे।
          हम सबने मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जम कर लोहा लिया। अभी तक सब अनुकूल था लेकिन सर्जरी के बाद होने वाली रेडियोथेरेपी का दैत्य मेरे सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था जिसकी डरावनी गूंज मुझे अनवरत सुनाई पड़ रही थी।

                    ऑपरेशन के पश्चात मुझे 'इंटेन्सिव केयर यूनिट' में रखा गया। उसी शाम मुझे होश आ गया। अपने बिस्तर पर मैं चित लेटा हुआ था, नाक और मूत्रनली में 'पाइप' लगे हुए थे। एक हाथ से 'ग्लूकोज़' दिया जा रहा था और दूसरे हाथ पर रक्तचाप मापने का यंत्र लगा हुआ था जो प्रत्येक तीस मिनट में अपने-आप चालू होता और उसे कंप्यूटर में अंकित कर लेता। हृदय की धड़कन नापने वाली मशीन के पाइप छाती से चिपके हुए थे। गाल और गर्दन में हुई सर्जरी के कारण मेरा सिर स्थिर था और शरीर के अन्य अंगों के हिलने-डुलने की भी गुंजाइश न थी। मुझे लगातार नींद आ रही थी, बीच-बीच में टूटती, फिर सो जाता। 'सर्जरी एरिया' में असुविधा थी लेकिन दर्द नहीं था। आधी रात के पश्चात मेरी नींद उचट गई क्योंकि रात्रिकालीन देखरेख के लिए नियुक्त डाक्टर और नर्स तेज आवाज में बातचीत कर रहे थे। बातचीत क्या, ही-ही, खी-खी चल रही थी। तंद्रा की अवस्था में मैं सोना चाहता था लेकिन उनकी आवाजें मुझे चुभती रही, मैं लाचार पड़ा रहा। मुझे यह भी नहीं मालूम था की 'कालबेल' बिस्तर में लगी है अन्यथा उन्हें बुलाकर मना करता। मेरे मुंह में रुई से 'पैक' था इसलिए बोल नहीं पा रहा था। नर्सें मुझे दूर से आती-जाती दिखती, मैं हाथ उठाकर बुलाने का इशारा करता लेकिन वे मेरी तरफ न देखकर सीधे निकल जाती, ऐसे में उन्हें कैसे बुलाता ? घंटों बेचैनी में बीत गए, रात को लगभग दो बजे एक नर्स मेरे पास आई, मैंने उसे अपनी समस्या बताई, उसने डाक्टर की सलाह से मुझे 'मार्फिन' की एक 'डोज़' दे दी लेकिन उनकी ही-ही खी-खी के आगे मार्फिन ने भी घुटने टेक दिए। वे सुबह होने तक बतियाते रहे, मैं रात भर बेचैन जागता रहा। जब सुबह हुई तो मेरी बायीं ओर लगे पारदर्शी काँच से सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट होने लगा, मैंने मन ही मन कहा- 'गुड मार्निंग।' मुझे उम्मीद थी कि उन बे-शऊर डाक्टरों और नर्सों की 'ड्यूटी' का समय खत्म होने वाला होगा, जब ये सब यहाँ से विदा हो जाएंगे तब मैं चैन से सो सकूँगा। कुछ देर बाद वैसा ही हुआ तब मैं सुख की नींद ले सका।
          दोपहर को 'प्लास्टिक सर्जरी' विशेषज्ञ डा॰ चारुदत्ता मुझे देखने आए, मेरी जांच की और मुझे बताया- 'आपकी जांघ से निकाले गए मांस के जिस टुकड़े को चेहरे में 'ग्राफ्ट' किया गया था, वह सक्रिय हो गया है।' शाम को डा॰ मंदार देशपांडे मुझे देखने आए, उन्होंने मेरे मुंह के अंदर की रुई को बाहर निकाल दिया और पूछा- 'अंकल, कैसे हो।' मैंने इशारे से अपने ठीक होने का संकेत दिया तो उन्होंने कहा- 'बोलकर बताइए।' कुछ अस्फुट आवाज मेरे गले से निकली, वे मुझे और अधिक बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। मेरी प्रगति से वे संतुष्ट दिखे, उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ, आपकी 'रिकवरी' भी ठीक है, आज रात आपको आई॰सी॰यू॰ में रखेंगे, कल सुबह रूम में शिफ्ट करेंगे।' मैंने उनसे बीती रात का हाल बताया और हाथ जोड़कर कहा- 'डाक्टर साहब, मैं इस यातनागृह में अब और नहीं रहना चाहता, मुझे आज ही कमरे में शिफ्ट कर दीजिए ताकि मैं रात को आराम से सो सकूँ।' सहृदय डाक्टर ने मेरी बात मान ली और रात को नौ बजे मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
           आई॰सी॰यू॰ की रात वाली बात को छोड़ दिया जाए तो बारह दिनों के उस अस्पताली आवास को भुलाया नहीं जा सकता। डाक्टरों की लगातार देखरेख, आत्मीयतापूर्ण बातचीत, नर्स और अन्य स्टाफ का अनथक परिश्रम, उत्कृष्ट साफ-सफाई और स्वादिष्ट भोजन और पेय की जितनी प्रशंसा के जाए, कम है। सब काम एकदम समय पर, किसी से कुछ कहने या याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, मुझे वहाँ सम्पूर्ण व्यवस्थित प्रबंधन का व्यावहारिक रूप देखने के लिए मिला। सभी लोग अच्छे थे लेकिन नगालैंड से आई एक नर्स जिसका नाम था- बेबी, उसका व्यवहार और सरोकार आज भी याद आता है।
          मेरे आई॰सी॰यू॰ से बाहर आने के बाद माधुरी और केदारनाथ घर वापस चले गए। संगीता मेरी देखरेख के लिए मेरे साथ रही। इस बीमारी की पहचान से उपचार तक संगीता ने जिस सक्रियता से मेरी सेवा-सुश्रूषा की, मुझे लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, बेटा है।

            29 अगस्त को सर्जरी के दौरान गाल से निकाले गए अंदरूनी टुकड़ों की जांच के परिणाम आ गए। कैंसर का प्रभाव आरंभिक और एक ही स्थान पर केन्द्रित था इसलिए डाक्टर ने मुझे 'रेडियोथेरेपी' करने की जरूरत से मुक्त कर दिया और 1 अक्तूबर की सुबह अस्पताल से छुट्टी मिलने का संकेत दे दिया। 30 अगस्त की शाम को ही अस्पताल में 'डिस्चार्ज' की तैयारी शुरू हो गई। पूर्व में ही हमें 2,75,000/- सर्जरी का 'पैकेज' बताया गया था और हमने उस बीच पूरी राशि जमा कर दी थी। जब संगीता 'बिल काउंटर' में भुगतान करने गई तो हमारी सर्जरी का कुल 2.44,000/- का 'बिल' बना। आश्चर्यचकित संगीता ने पूछा- 'आप कुछ भूल तो नहीं रहे हैं ?'
'नहीं, 'पेशेंट' पर हास्पिटल का खर्च इतना ही हुआ है।' उन्होंने कहा और 31,000/- वापस कर दिए।
          जब संगीता ने मुझे इस बात को बताया तो कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल की ईमानदारी पर मैं विस्मित सा हो गया। चिकित्सा जगत में व्याप्त लूट-खसोट के विपरीत उनका व्यवहार अविश्वसनीय लगा। मैं अपने शहर बिलासपुर में अखिल भारतीय स्तर के एक ख्यातिलब्ध ग्रुप के हास्पिटल की कारस्तानी को याद कर रहा था जहां अधिकतर मरीजों की बीमारी के साथ घिनौना खिलवाड़ किया जाता है, मृत मरीज के परिवारजनों को जीवन की उम्मीद की लालच में 'वेंटिलेटर' पर रखकर बिल बढ़ाने के लिए जिंदा बताया जाता है। मरीज के गैर ज़रूरी मंहगे परीक्षण इसलिए करवाए जाते हैं ताकि अस्पताल की आय बढ़े ! इलाज का अनाप-शनाप बिल बढ़ा कर उनकी मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाया जाता है !
          महत्वपूर्ण यह है कि संगीता आश्चर्यचकित क्यों हुई, मैं विस्मित क्यों हुआ ? ईमानदारी तो हमारा स्वाभाविक व्यवहार होना चाहिए। यही ईमानदारी किसी संस्थान की ख्याति में वृद्धि करती है, यही ईमानदारी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है तो फिर यह भावना अब दुर्लभ क्यों होती जा रही है ? चिकित्सा का कार्य व्यापार नहीं, सेवा और सहानुभूति का कार्य है। इस 'मिशन' का तानाबाना मानवीय संवेदनाओं के धागों से बुना हुआ है, इन धागों का टूटना भविष्य के संभावित खतरों की दुखदायी आहट है।
          वहाँ से सुरक्षित वापस आने के दो वर्ष बाद पुनः कैंसर ने मुझपर आक्रमण किया लेकिन इस बार दाएँ नहीं, बाएँ गाल पर। फिर वही कष्टदायक सर्जरी, वही हास्पिटल नंबर वन, वही डाक्टर नंबर वन, वही नर्सिंग नंबर वन, वही देखरेख नंबर वन और वही साथ मेरी अर्धांगिनी माधुरी और मेरे बेटी-बेटे संगीता और केदारनाथ का।
          सन 1971 में मैंने एक फिल्म देखी थी- 'आनंद', जिंदगी और मौत से हँसता-गाता संघर्ष। फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने उस कथानक को ऐसा चित्रित किया था कि कैंसर जैसी भयावह बीमारी जैसे एक कविता बन गई जिसने सबको रुलाया और वह अविस्मरणीय बन गई।
          तब मुझे मालूम न था कि वह कहानी मेरे जीवन में यथार्थ के रूप में घटित होगी। आठ वर्षों के अंतराल में कैंसर के तीन तीव्र आक्रमण मुझ पर हुए। इस गंभीर बीमारी का मैंने किस तरह सामना किया, उसे मेरे डाक्टर, परिवारजन और कुछ अंतरंग जानते हैं।
          फिल्म 'आनंद' का नायक राजेश खन्ना उन संकट के घड़ियों में हर समय मेरे आस-पास रहा, मुझे संभालता रहा, मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा। प्रचंड पीड़ा के दौरान उनके मुसकुराते चेहरे ने मुझे कैंसर से जूझने में बहुत मदद की जो आज भी जारी है। धन्यवाद हृषिकेश मुखर्जी, आभार राजेश खन्ना। एक दिन सभी को जाना है लेकिन ज़िंदगी में संघर्ष किस तरह किया जाता है- आपने सिखाया है।
          असलम हसन की इस कविता पर गौर करें :

'कितना मुश्किल है
आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर बाहर रंग-बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है
फिक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिन्द मचल जाना
कितना सख्त है
नर्म होना
मोम होना
और पिघल जाना
कितना आसाँ है
दिल का जाना
दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना।'

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आगे और भी है > >

Friday, April 3, 2015

ठंडी हवाएँ

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          इस बीच एक भीनी-भीनी सी खुशबू 29 नवंबर 2004 को हमारे परिवार में प्रविष्ट हुई- 'मैना', केदारनाथ और संगीता की बिटिया। मैना के आगमन से हम दोनों नाना-नानी बन गए। कुछ दिनों बाद केदारनाथ और संगीता को रायपुर के शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिल गई तो दोनों अपने प्यारे शहर इंदौर को छोडकर रायपुर आ गए। रायपुर से बिलासपुर की दूरी महज़ 115 किलोमीटर है इसलिए उनके पास हमारा आना-जाना सुविधाजनक हो गया।
          जैसे-तैसे दिन बीतते जा रहे थे। कर्ज़ चुकाने में एक पुश्तैनी जमीन, दद्दाजी के द्वारा दिया गया भूखंड और माधुरी के आभूषण बिक गए। यद्यपि लाज का काम बढ़ रहा था लेकिन धीरे-धीरे, प्रशिक्षण कार्यक्रम भी हो रहे थे लेकिन यदा-कदा, जितनी आय होती थी वह देनदारी के आगे एकदम बौनी लगती, समुद्र के सामने नदी की क्या औकात ?
          कुंतल ईशा फाउंडेशन के आश्रम में ही रम गए, हम लोग समझ गए कि उनको अपने परिवार में वापस लाना संभव नहीं है। संज्ञा के विवाह का निमंत्रणपत्र सद्गुरु को देने के लिए हम लोग आश्रम गए थे, सद्गुरु से मिले। माधुरी ने सद्गुरु से कहा- 'कुंतल आपके पास आ गया है, मुझे अच्छा नहीं लगता।'
'ये बताओ, कुंतल नौकरी करता तो कितने दिन आपके पास रहता ? दो-चार दिन के लिए ही घर आता।' सद्गुरु ने प्रतिप्रश्न किया।
'जी, आप ठीक कह रहे हैं।'
'तो फिर ? जब भी आपका मिलने का मन हो, यहाँ आ जाओ और मिल लिया करो। जितने दिन चाहो, यहाँ रह सकती हो।'
'संज्ञा के विवाह के कार्यक्रम में उसे दो-चार दिन के लिए भेज दीजिए।'
'मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन वह जिस मार्ग पर आगे बढ़ रहा है, ऐसे कार्यक्रमों में जाने से उसे मदद नहीं मिलेगी।'
'मैं उसे आपको सौंप कर जा रही हूँ, आज से आप उसके पिता हैं।'
'ठीक है।' सद्गुरु ने कहा। हम लोगों ने सद्गुरु से आशीर्वाद लिया और घर वापस आ गए। संज्ञा का विवाह कुंतल की अनुपस्थिति में हुआ, कुंतल की कमी हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ ने पूरी कर दी। पूरे कार्यक्रम में उन्होंने घर के लड़के की तरह अपूर्व दायित्व और लगन के साथ हमारा साथ दिया।
          हमें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि आखिर वह कौन सा आकर्षण है जिसने कुंतल को इस दुनियादारी से विमुख कर दिया ! उनका स्वभाव और व्यवहार आम युवाओं जैसा था। हमारे परिवार के जीने का तरीका फाँके-मस्ती का था, टीवी और सिनेमा देखना, हँसना-गाना-नाचना, चिढ़ना-चिढ़ाना- खुला-खुला सा। 'गंभीरता' जैसा कोई काम नहीं, कोई आध्यात्मिक या धार्मिक माहौल भी न था फिर कुंतल इतने गंभीर प्रयोजन के लिए कैसे उद्यत हो गए, यह हमारे लिए जिज्ञासा का कारण रहा। मैंने और माधुरी ने सोच-विचार कर तय किया कि इस प्रश्न का उत्तर आश्रम की गतिविधियों से जुड़कर ही मिल सकेगा इसलिए वहाँ हमने आना-जाना शुरू किया।
          उस आवागमन में एक अद्भुत कार्यक्रम में सहभागिता का अवसर मिला, उसका नाम था- 'Wholeness'. आठ दिवसीय इस कार्यक्रम में आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियाँ सिखाई गई। दिन भर में मुश्किल से छः घंटे का शयन, एक घंटा दैनिक क्रियाएँ , दो घंटे भोजन और पंद्रह घंटे का प्रशिक्षण।
          पहला दिन सामान्य रहा लेकिन अगले दिन मेरी कमर में असहनीय पीड़ा आरंभ हो गई। मेरी कमर में दर्द की शिकायत विगत दस वर्षों से चली आ रही थी, योगासन सीखते समय झुकने से उसमें झटका सा लगा और मैं अपूर्व पीड़ा के कारण त्राहिमाम करने लगा। न बैठते बने, न दो कदम चलते बने लेकिन प्रशिक्षक मेरी तकलीफ को समझने के लिए तैयार न थे। अपना दर्द बताया तो बोले- 'Carry on...no pain, no gain.' आप बताइए, एक इंसान दर्द के कारण हिल नहीं पा रहा है और वे कह रहे हैं-  'Carry on...'। प्रशिक्षक मुझे किसी क्रूर खलनायक जैसे लगने लगे, बताओ भला, यहाँ हिलते-डुलते नहीं बन रहा है और उधर से आदेश है- 'केरी ऑन' !

           योग प्रशिक्षण का कार्यक्रम कोयंबत्तुर के वेलियंगिरी पहाड़ की तलहटी में बसे पुंडी ग्राम में स्थापित ईशा योग केंद्र के स्पंद सभागार में चल रहा था जिसमें लगभग तीन सौ स्त्री-पुरुष योग की प्राचीन विधा को सद्गुरु जग्गी वासुदेव के मार्गनिर्देशन में अत्यंत मनोयोग से सीख रहे थे। उस समूह में मेरे साथ माधुरी भी थी। माधुरी भाषागत समस्या से जूझ रही थी क्योंकि कार्यक्रम अंग्रेजी भाषा में संचालित हो रहा था, अंग्रेजी से अनभिज्ञ माधुरी निर्देशों को समझ नहीं पा रही थी लेकिन अन्य प्रतिभागियों को देखकर अभ्यास कर रही थी। सद्गुरु के प्रवचन उन्हें समझ में नहीं आ रहे थे इसलिए वे हैरान थी। वहीं पर मैं अपने कमर के दर्द से हैरान था, मैं कामचलाऊ अंग्रेजी जानता हूँ, सभी निर्देश समझ रहा था लेकिन मेरा शरीर उस अंग्रेजी भाषा को न समझते हुए केवल मेरी कमर की पीड़ा को ही एकाग्रता से समझ रहा था।
          कार्यक्रम के मध्य में अवसर मिलने पर मैं सभागार से चुपचाप भाग कर आवासीय परिसर में अपने कमरे में जाकर लेट गया। मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा, 'कालबेल' बजी, मैंने दरवाजा खोला, एक विदेशी षोडशी कन्या बाहर खड़ी थी, उसने मुझसे कहा- 'प्रणाम।'
'प्रणाम।' मैंने उत्तर दिया।
'मैं योग कार्यक्रम की 'वालिंटियर' हूँ, लेबनान से आई हूँ।' उसने अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात शुरू की।
'जी ?'
'आप कार्यक्रम छोड़कर 'स्पंद' सभागार से यहाँ क्यों आ गए ?'
'पहले आप अंदर आइये, बैठिए। दरअसल, मैं कमर के दर्द से परेशान होकर यहाँ आ गया, मुझसे योगासन करते नहीं बन रहा था।' मैंने बिस्तर पर लेटते हुए बताया।
'क्या बहुत दर्द है ?'
'हाँ, बहुत अधिक।'
'क्या मैं आपके कमर में दवा लगा दूँ ?' वह अपने साथ 'वोलिनी आइंटमेंट' और दर्दनाशक गोलियां लेकर आई थी।
'ठीक है, लगा दीजिए।' मैंने कहा और अपने अधोवस्त्र ढीले करके पेट के बल लेट गया। उसने दवा लगाई, दस मिनट रुक कर पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'पहले से बेहतर।'
'एक 'टेबलेट' खा लीजिए, मैं पानी लेकर आती हूँ ।' उसने मुझे दवा खिलाई, पुनः दस मिनट शांत बैठी रही फिर उसने पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'और अच्छा।'
'तो फिर उठिए, खड़े हो जाइए और मेरे साथ सभागार में चलिए।'
'पर मैं नहीं चल पाऊँगा!'
'आप मेरे साथ चलिए तो, मैं आपको सहारा देकर ले चलूँगी, कोशिश कीजिए, बन जाएगा।' उसने आग्रह किया, मेरे पास उसके साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैं उसके कंधे का सहारा लेकर दर्द से कराहता सभागार की ओर चल पड़ा।
          सभागार में मैं अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गया और वहाँ फिर वही किस्सा- 'केरी ऑन.....।'

          मैं योग कार्यक्रम से जुड़ा रहा, जैसा भी बना, करता रहा। योगासन करने में असुविधा थी लेकिन प्राणायाम और ध्यान सीखने में कोई परेशानी न थी। दिनोंदिन वातावरण समृद्ध होता जा रहा था, इतने सारे लोग मिलजुलकर जब किसी विधा को सीखते हैं तो सब एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं और ऊर्जा को परस्पर संचरित भी करते हैं। हमने हठयोग, शक्तिचलन क्रिया और शून्य ध्यान का क्रमबद्ध अभ्यास किया। उस दौरान इस बात का एहसास होता रहा कि उम्र अधिक हो जाने के कारण हमारे शरीर का लोच कम हो गया है इसलिए योगासन करना कठिन लगता है, हमारा शरीर साथ नहीं देता। वैसे, कार्यक्रम के दौरान हमारा आहार इस विधि से नियोजित किया गया ताकि शरीर हल्का रहे और योगासन करना सुविधाजनक हो।
          यौगिक क्रियाओं के अतिरिक्त प्रतिदिन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के आध्यात्मिक प्रवचन होते थे जिन्हें सुनना मेरे लिए अपूर्व अवसर था। प्रवचन के पश्चात जिज्ञासु प्रश्न करते थे जिनके उत्तर सद्गुरु के उत्तर हास्यबोध से आरंभ होते और सरल उदाहरणों के सहारे गंभीर निष्कर्ष तक पहुँचते। उनकी बातों में आध्यात्म के साथ ब्रह्माण्ड, विज्ञान, धर्म, और मानवीय व्यवहार की परत-दर-परत चर्चा होती जिसे सुनकर मुझे जीवन शैली और व्यवहार की नई दिशाएँ समझ में आई। उनका विस्तृत ज्ञान, अँग्रेजी भाषा का अद्भुत प्रयोग और उनकी वाणी का प्रभाव मेरे जीवन के अहोभाग्य अवसर जैसा था।
          पांचवे दिन सुबह 9 बजे वेलियंगिरी पर्वत के शिखर तक पैदल चढ़ाई करनी थी। हमें तीन विकल्प दिए गए थे, एक- पर्वतारोहण करना है, दो- जो पर्वतारोहण न  करना चाहें वे आश्रम की चतुर्दिक पदयात्रा करें, और तीन- जो दोनों के लिए तैयार न हों वे अपने कमरे में आराम करें। तीसरे विकल्प ने मुझे प्रसन्न कर दिया और उस बड़े समूह में मैं अकेला मानुष था जिसने कमरे में आराम करने वाला विकल्प चुना ! 
          उस दिन सुबह नित्य की भांति छः बजे से अभ्यास आरंभ हुए। तीन घंटे बाद नौ बजा, सब लोग पर्वतारोहण के लिए उत्सुक थे और मैं उनके चेहरे की प्रसन्नता को देखकर कुढ़ रहा था- 'ये लोग वहाँ जा रहे हैं और मैं नहीं जा पा रहा हूँ।' अनायास मेरे मन ने कहा- 'चल, चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।' मैंने माधुरी से कहा- 'मैं भी चलूँगा। 
'कैसे चढ़ोगे तुम ? तुम्हारी कमर का दर्द ?' माधुरी ने पूछा। 
'दर्द तो है, लेकिन तुम सब लोग पर्वत-शिखर पर जाओगे, मस्ती करोगे और मैं यहाँ बिस्तर पर पड़ा रहूँगा !'
'रास्ते में तुम्हारी परेशानी बढ़ गई तो ?' 
'वह मेरी नहीं, सद्गुरु की समस्या है, वे करेंगे व्यवस्था।'
'तो, फिर चलो।' वे बोली।
          मैंने पर्वतारोहण के लिए खास तौर से उपलब्ध कराए गए जूते पहने और सबके साथ निकल पड़ा। शिखर तक पहुँचने के लिए कोई सड़क न थी, पगडंडियाँ थी, अगल-बगल झाड़-झंखाड़ थे, छोटे-बड़े टीले थे, तीखी चढ़ाई थी, सब एक के पीछे एक ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे थे। एक युवा 'वालेंटियर' मुझे सहारा देने के लिए  मेरे आसपास अनवरत चलते रहे। कुछ देर बाद तेज बारिश शुरू हो गई, राह में फिसलन हो गई, कपड़े भीग गए लेकिन किसी प्रकार अपने दर्द को दरकिनार करते हुए मैं चढ़ता ही रहा। लगभग साढ़े तीन घंटे की पगयात्रा के बाद मैं पर्वत के शिखर पर पहुँच ही गया जबकि माधुरी और अन्य कई लोग मेरे वहाँ पहुँचने के पंद्रह-बीस मिनट बाद वहाँ पहुँचे। उस दिन मैंने अपनी शारीरिक पीड़ा से भिड़कर संघर्ष किया और यह जाना कि कुछ भी असंभव नहीं और यह भी समझ आया कि हौसले की कभी हार नहीं होती। 
          पर्वत-शिखर पर पहुँच कर मैं जी भर कर नाचा, वे मेरे लिए खुशी के क्षण थे...आप बताइये, थे कि नहीं ? शिखर पर हमारे भोजन की व्यवस्था थी, सद्गुरु का प्रवचन भी हुआ। तीन घंटे रुक कर हम लोग वापस लौटे, वही पथरीला-फिसलन भरा रास्ता, वही हिम्मत, वही 'वालेंटियर' का सहारा, ढाई घंटे में तलहटी पर उतार आए। वहाँ से हम सब स्पंद सभागार में प्रविष्ट हुए, मैं थक कर चूर हो चुका था, चुपचाप पैर फैलाकर लेटने का मन हो रहा था लेकिन प्रशिक्षक ने निर्देश दिया- 'सब लोग आसन करना आरंभ करें।' फिर वही- 'केरी ऑन !' 
   
          इस कार्यक्रम के पहले इधर-उधर से योगासन करना सीखा था, अनियमित था किन्तु करता था लेकिन कोयंबत्तुर के ईशा फाउंडेशन में हुए इस कार्यक्रम में मुझे सतर्क प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में अनेक आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियां सीखने को मिली, अपने शरीर और मन को व्यवस्थित रखने के उपाय ज्ञात हुए। क्रमबद्ध ढंग से शरीर को तैयार करते हुए जो अभ्यास करवाया गया उससे समस्त क्रियाएँ शुरुआती तकलीफ़ों से होते हुए क्रमशः सुविधाजनक होती गई और स्मृति में संरक्षित भी हो गई। कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात हमें निर्देश दिए गए- 'छः माह तक इसे नियमित रूप से करना है, यदि किसी वज़ह एक दिन भी अभ्यास न हो पाया तो अगले दिन से छः माह के लिए अभ्यास फिर से आरंभ करना होगा।' परिणामस्वरूप बिना नागा छः माह तक अभ्यास चला और उसके बाद शरीर इतना अभ्यस्त हो गया कि कि अब आठ वर्ष होने को आए, वह सब बिना किए अब जी नहीं मानता ! यहाँ तक कि रेलयात्रा में भी जैसी जगह मिली, शुरू हो गए, लोग स्वयं ही खिसक कर समुचित जगह बना देते हैं और अपना काम सध जाता है। यदि किसी दिन व्यस्ततावश अभ्यास न कर पाए तो दिन भर बेचैनी सी होती है। हाँ, एक महत्वपूर्ण बात आपको बतानी रह गई, मेरा दस वर्ष पुराना कमर दर्द अब इतिहास की बात हो गई !
           यह बात जुलाई 2007 की है, उसके बाद कुछ और आध्यात्मिक अनुभवों से मुलाक़ात हुई, बीच-बीच में बताता रहूंगा। मैं प्रतिदिन दो घंटे का समय पदयात्रा, योगासन और प्राणायाम को देता हूँ यद्यपि मेरा शरीर दिन में चौबीस घंटे मेरा साथ देता है। योग से जुड़ने के कारण दवाओं से दूरी बन गई है, कैंसर का मरीज हूँ इसलिए उससे भी लड़ने-भिड़ने में मदद मिलती है लेकिन कैंसर तो कैंसर है, कहने को इसे राजरोग कहा जाता है पर इसे राजा हो रंक, सबको लपेटना आता है ! जिसे भी बीमारी के प्रारम्भिक काल में समुचित उपचार नहीं मिला फिर समझिए उसका अंतकाल आ गया।
          कैंसर ने मुझ पर फिर से हमला किया। सन 2008 में उसी गाल के अंदर पुनः कैंसर के लक्षण उभरे जिस गाल की 2002 में 'सर्जरी' हुई थी। इस बीच मैं अपनी जांच करवाते रहता था, डाक्टर कहते थे- 'चार साल बीत गए, अब आप 'सेफ' हैं' लेकिन फिर मुसीबत आ खड़ी हुई। मेरे सर्जन डा॰ दीपक अग्रवाल ने कहा- 'द्वारिका प्रसाद जी, इस बार आपकी गहरी सर्जरी होगी, दाढ़ निकाली जाएगी और 'मेंडिबल' काटकर निकाला जाएगा। हड्डी काटकर अलग करने के कारण आपका चेहरा अजीब सा हो सकता है और उसके बाद आपकी 'रेडियोथेरेपी' भी करनी पड़ेगी।'
          मेरे देखने में आया था कि जिस व्यक्ति की भी कैंसर की दोबारा सर्जरी हुई, वह अधिक दिनों तक नहीं जी पाया। मुझे समझ में आ रहा था कि मेरा बचना अब मुश्किल है, केवल दुर्दशा बची है इसलिए मैंने परिवारजनों को अपना निर्णय सुनाया- 'जब तक चलूँगा, तब तक चलूँगा, अब सर्जरी और रेडियो थेरेपी नहीं करवाऊँगा।' मुझे छोड़ कर घर में सब चिंतित थे लेकिन संगीता और केदार मेरी बात मनाने वालों में से नहीं थे, दोनों ने इंदौर में मेरी सर्जरी 'फिक्स' कर दी और मुझे अंग-भंग के लिए पुनः मजबूर कर दिया गया।

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Saturday, March 28, 2015

ज़िंदगी का सफर ये कैसा सफर

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          भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन किया है, ये सभी रस साहित्य, नृत्य और सामान्य भावाभिव्यक्ति में इस तरह रच-बस गए हैं कि इनके गूढ़ार्थ सहज ही सबको समझ आ जाते हैं। एक और रस है जो इन उल्लेखित रसों में उद्घाटित नहीं हो पाया है- वह है- 'बतरस।' आदि-काल से बतरस का प्रभाव हमारे जनजीवन में अति-व्यापक रहा है। बतरस गंभीर वार्तालाप है, भाषण देना-सुनना है, प्रवचन-सत्संग है, निःशुल्क मनोरंजन है और मनुष्य के पेट में उठे दर्द को दूर करने की दवा भी है।
          मेरे बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया की गद्दी में अधिकतर समय उनके मित्रों और परिचितों की बैठक चलती जिसमें भाग लेने के लिए लोग पैदल या साइकल-स्कूटर चलाते या कार में बैठकर नियमित रूप से आते, घंटों विविध विषयों पर बातचीत होती, बहस होती, कहा-सुनी होती और उस बीच में चाय-नास्ता का दौर चलता। अपने विचार सभी लोग व्यक्त करते लेकिन स्वाभाविक रूप से स्थल व चाय-नास्ता मुहय्या करवाने वाले को बोलने का अवसर अधिक मिलता और उसकी बात अधिक मानी जाती। हमारे परिवार के पुरुषों को इस रस का निर्मल आनंद उठाते मैंने बचपन से युवावस्था तक नियमित देखा तो उसका असर मुझ पर भी पड़ा। यद्यपि बड़ी महफिल सजाने का चस्का नहीं लगा लेकिन आपसी संवाद करने का शौक लगातार बढ़ता गया। बचपन में हम लोग की बातचीत के विषय थे- हमारे मास्साब और पढ़ाई, किशोरावस्था में फिल्में, युवावस्था में लड़कियां और प्रौढ़ावस्था में राजनीति और साहित्य।  
          यूं तो बतरस वाली दोस्ती असंख्य लोगों से रही है लेकिन कुछ लोग मेरे जीवन में ऐसे रहे जिनके साथ बातें करते मेरे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता जिसमें सर्वोच्च हैं मेरी 'बेस्टेस्ट फ्रेंड' माधुरी। उनके अतिरिक्त किशोरावस्था के मित्र- (स्व॰) लक्ष्मीनारायण शर्मा; और सुधीर खंडेलवाल; वयस्क-प्रौढ़ वय के मित्र- (स्व॰) पंडित मुरलीधर मिश्र,  (स्व॰) प्रोफेसर बी॰के॰ श्रीवास्तव, (स्व॰) भागवत प्रसाद दुबे, (स्व॰) राम किशन खंडेलवाल, (स्व॰) कुतुबुद्दीन भारमल, (स्व॰) महेश भट्ट, (स्व॰) इंदर सोंथलिया, (स्व॰) रमाकांत मिश्र; और बजरंग लोहिया, जगत नारायण तिवारी, सतीश जायसवाल, कान्तिलाल जोबनपुत्रा, वी॰एस॰तैलंग, डा॰ महेश कासलीवाल, चन्द्रशेखर जालान, सुभाष दुबे, जगदीश दुआ, बजरंग केडिया, विनोद मिश्र, विवेक जोगलेकर आदि कुछ और भी। मित्रों के इस समूह के साथ बैठकर आपस में विभिन्न विषयों पर होती चर्चा से प्राप्त परम-आनंद के क्या कहने ! वह जीवंनदायी बतरस था जो बहुत कुछ सिखाता, व्यक्तित्व विकसित करता, प्रतिकूल परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत देता, मार्ग दर्शन देता, दुख कम करता और कभी-कभी हँसाता भी था। जब भी प्रतिकूल मनस्थिति में मेरे दिमाग को लकवा लगने जैसा लगता तब ये लोग मेरे विवेक-रक्षक-साथी थे। मैंने इतने बुरे दिन देखे कि यदि इन मित्रों का साथ न होता तो मैं किसी पागलखाने में होता या किसी तेजी से आती ट्रेन के आगे खड़ा होकर अपने प्राण दे चुका होता।
          कठिन समय में इनका साथ बहुत साथ देता था, इनकी बातें भी साथ देती थी। बातें करने से दिल बहल जाता था, थोड़ा 'डायवर्सन' हो जाता था और दिल को दिलासा भी। कुछ मित्र तो मुझसे इतनी दूर चले गए कि अब उनसे मिलना न होगा लेकिन कुछ का साथ अब भी बना हुआ है।
          श्री बजरंग केडिया मुझसे दस वर्ष बड़े हैं, सौभाग्य से मित्रवत है। उनसे दिल की बातें निःसंकोच की जा सकती हैं, वे मुझे 'प्रेक्टिकल' सलाहकार से लगते हैं। एक दिन अपनी चिन्ता का बोझ लिए मैं उनके घर पहुंचा, मेरी समस्या को वे गौर से सुने और बोले- 'देखो द्वारिका, मैं तुमको एक बात बताता हूँ, किसी लड़की की शादी आज तक पैसों की कमी के कारण नहीं रुकी। सब इंतजाम हो जाता है, कैसे हो जाता है, पता नहीं ! तुम मानो, हर लड़की इस संसार में अपना भाग्य लेकर आती है।'
     
          एक दिन भावी समधी जी का एसएमएस आया- 'मेरा तालाब सूख गया है उसमें जल भरें।' मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। अब मैं क्या जवाब देता ? मेरे नल से तो पानी की जगह हवा निकल रही थी और उसमें से 'सूँ-सूँ' की आवाज़ आ रही थी, इस आवाज़ से तो समधी जी का सूखा तालाब भरने से रहा। और तो और, एक दिन भावी दामाद का भी फोन पर तगादा आ गया- 'क्या हुआ ?'
          उधर वे हमसे हलाकान थे, इधर हम खुद से परेशान। विवाह की तिथि जितनी नजदीक आती जा रही थी, चिन्ता उतनी बढ़ती जा रही थी। हमारी हालत उस किसान की तरह थी जो अपनी सूखती फ़सल को बचाने के लिए बारिश के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहा हो और बादलों का कोई अता-पता न हो। मुझे निष्क्रिय और निश्चिंत देखकर माधुरी झल्ला उठती- 'क्या कर रहे हो तुम ?'
'कुछ नहीं।' मेरा बुझा सा उत्तर उसे और बुझा देता। उन्होंने मुझसे कहा- 'मेरे गहने 'बैंक लाकर' से निकाल लो, बेचो और झंझट खत्म करो।'
'उतने से भी काम नहीं बनने वाला।'
'फिर ?'
'देखते हैं।' मैंने तथागत गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठे-बैठे उत्तर दिया।

          एक दिन सुबह दस बजे मैं अपने एक पुराने सहपाठी के घर पहुँच गया। हम दोनों हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे। मुझे देख उसने पूछा- 'आओ द्वारिका, आज अचानक, सुबह-सुबह ?' मैंने अपनी समस्या बताई तो उसने कहा- 'फिक्र मत कर, तेरा काम हो जाएगा, रुक तेरे लिए चाय बनवाता हूँ। कैसी चाय पिएगा, शक्कर वाली या बिना शक्कर वाली ?'
'शक्कर वाली, ज़रा कडक।' मैंने कहा। हम दोनों के लिए चाय आई, मेरे लिए कड़ी-मीठी और उसके लिए बिना शक्कर वाली।
          घर आकर मैंने माधुरी को बताया- 'हो गया।'
'अरे वाह, किसने दिया ?'
'फकीरों ने।'
'फकीरों ने ?'
'हूँ, उन्होंने कहा था न, 'अल्लई देगा', उसी ने दिया।' मैंने कहा।

          इसके कुछ दिनों बाद हमारी लाज़ में एक ग्राहक आए, रीवा (मध्यप्रदेश) से, पंडित अखंड प्रताप नारायण मिश्र, अपनी बेटी को राज्य सेवा की परीक्षा दिलवाने। दो-तीन दिन रुके, परिचय बढ़ा, उनकी बातचीत की शैली प्रभावित करने वाली थी। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अगले माह बेटी का विवाह है। उन्होंने मुझसे पूछा- 'कुंडली मिलवा ली है न ?'
'हमें लड़के की कुंडली नहीं दी गई, लेकिन उनका जन्म समय और स्थान मालूम था इसलिए उस आधार पर कंप्यूटर से मिलान करवाया था, कुछ दोष हैं, पर चलता है।' मैंने बताया।
'एक बार मुझे दिखाएंगे क्या, अगर आप उचित समझें ?'
'क्यों नहीं।' मैंने उन्हें दोनों कुंडली दी, उन्होंने कुछ देर दोनों का अध्ययन किया और मुझसे बोले- 'अग्रवाल जी, मेरी राय है कि आप यह संबंध न करें।'
'क्यों ?' मैंने प्रश्न किया। उन्होंने संज्ञा के वैवाहिक भविष्य और ससुराल के बारे में कई ऐसी बातें बताई जो चिंताजनक थी, नकारात्मक दिशा में जा रही थी। मैं सोच में पड़ गया। दुविधा अज़ब थी, एक तरफ हमारी बेटी का प्यार और दूसरी तरफ हमारा अपनी बिटिया से प्यार !
'जो होगा, सो होगा पंडित जी, अब इस विवाह को रोकना हमारे लिए असंभव है।' मैंने कहा।
'तो जैसा प्रभु ने रच रखा है, होने दीजिए, सब उनकी माया है।' वे गंभीर होकर बोले।

          नियत तिथि पर दोनों परिवार एकत्रित हुए, वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए और हमने अपनी बिटिया को विदा किया। हमें खुशी थी कि हम अपनी बेटी के प्यार को सुखद परिणिति तक ले जाने में सहयोग कर सके।
          पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म 'नीलकमल' (1968) में रफी साहब ने साहिर लुधियानवी का लिखा यह मार्मिक गीत गाया था, इसे सरसरी निगाह से नहीं, जरा डूब कर पढिए:

'बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰

नाज़ों से तुझे पाला मैंने
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको
बाहों में मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की ऐ नाज़ुक डाली
तुझे हर पल नई बहार मिले॰

जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों में हंसी की धूप खिले
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी ज्योति न हो फीकी
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले॰

बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ
आराम की ठंडी छांव में,
कांटा भी न चुभने पाए कभी
मेरी लाडली तेरे पाँव में,
उस द्वार से सब दुख दूर रहे
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले॰

बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰'


          जीवन की घटनाएँ क्या हमारे अनुमान के अनुरूप घटती हैं ? अनुमान से थोड़ा कम या ज़्यादा तो ठीक है लेकिन जब सब एकदम विपरीत हो तो अपनी ही अक्ल और समझदारी पर संदेह होने लगता है और अगर अपनी अक्ल पर दोष देने की हिम्मत न हो तो फिर 'भाग्य का लिखा' तो है ही। जिस छोटे से संसार में हम रहते हैं, उसी छोटी सी सीमा में लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, जानने-समझने की कोशिश करते हैं, सम्बन्धों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह सब अनुमान ही रहता है, इन अनुमानों का सटीक निकलना 'मेरी होशियारी' है और यदि अनुमान गलत निकल गए तो 'मैं नहीं, वह गलत' है।
          खुशी-खुशी विदा हुई संज्ञा की खुशियाँ अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। उसके बाद हमें ऐसा लगने लगा कि हमारे अनेक जन्मों के पाप के फल हमारे जीवन में दौड़ते चले आ रहे हैं। इतना कष्ट, इतना अपमान, इतना डर, इतनी लाचारी, इतनी उपेक्षा, इतनी बेहूदगी, इतनी नासमझी, इतनी गाली-गलौच मेरे इतने लंबे जीवन में न देखा, न सुना और न जाना। वह सब देख लिया जो पुरानी पारिवारिक फिल्मों में देखा करता था, आश्चर्य है, आज की पढ़ी-लिखी दुनियाँ में वैसा ही चल रहा है ! उस दौरान जो नरक-यातना हमने भुगती, उसे आपको कैसे बताऊँ ?
          न बता पाने की एक वैधानिक मजबूरी भी है, विवाह के तीन वर्ष बाद हमारे दामाद जी ने हमारी बेटी पर 'घरेलू क्रूरता' का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी और कुछ दिनों बाद उन्होंने कुटुंब न्यायालय में संज्ञा के विरुद्ध तलाक़ हेतु केस दायर कर दिया। चूंकि प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए विवाह के बाद की घटनाएँ बताना न्यायोचित नहीं है। वैसे, आपके लिए आगे की कथा बुनने के लिए विकल्प खुला है, आप दो तरीके से कहानी को आगे बढ़ा सकते हैं- एक- 'हमारी बेटी ने ससुराल वालों को सताया' या दो- 'ससुराल वालों ने हमारी बेटी को सताया'। प्रकरण दायर किए हुए अब लगभग सात वर्ष हो चुके हैं। आप जानते हैं कि समय की गति तेज होती है और न्याय की गति धीमी, न जाने कितना और समय लगेगा क्योंकि अभी इस न्यायालय के बाद उच्च न्यायालय है, फिर सर्वोच्च न्यायालय है ! जिस अदालत में हत्यारों और चोर-उचक्कों की भीड़ खड़ी रहती है वहाँ उनके इर्दगिर्द मेरी बेटी अपनी बेटी के साथ जज की होने वाली पुकार की प्रतीक्षा करते खड़ी रहती है क्योंकि उसने किसी से प्रेम करने का अपराध किया था। आज भी वे उसी पति से प्रेम करती हैं, उसी के साथ रहना चाहती हैं लेकिन उनका प्रेमी अब ऐसा पति बना दिया गया है जो उनके साथ नहीं रह सकता। हमारी नातिन अनन्या अब बड़ी हो गई है और इतना समझने लग गई है कि 'कुछ गड़बड़ है' लेकिन वह संभवतः यह नहीं समझ पा रही होगी कि 'मम्मी-पापा के बीच यह कैसी कट्टी है जो अगले दिन मिट्ठी में नहीं बदलती ?'
          जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं चुपचाप अपने जीवन की लहरों के उतार-चढ़ाव को देख रहा हूँ, सच बताऊँ, अब मुझ पर बाह्य परिस्थितियों का असर कम ही होता है। वैसे, बहुत से लोगों से तबीयत के साथ जिरह करने की तमन्ना है लेकिन इस अदालत में नहीं, 'उस' अदालत में करूंगा।
         हमें खुशी है कि हमारी बेटी हमारे साथ है, हमारी आँखों के सामने है और साथ में उनकी हँसती-खेलती बेटी अनन्या भी जो अब नौ वर्ष की होने जा रही है। इन वृद्ध कंधों में अभी भी इतनी शक्ति है कि अपनी बेटी और उनकी बेटी का भार, निर्भार समझ कर उठा सकता है। इस खुशी के साथ-साथ हमारे हृदय में एक अदृश्य पीड़ा भी समानान्तर में चल रही है जिसे वे माता-पिता आसानी से समझ सकते हैं जिनकी बेटी ससुराल में मर-खप गई हो या बचकर उनके घर वापस आ गई हो। आप भी इस अनुभूति को महसूस कर सकते हैं, बशर्ते, आप हमारी बेटी को अपनी बेटी मान लें तो उस अकथनीय पीड़ा के शब्द आप तक अपने-आप पहुँचने लगेंगे।
          राजिन्दर किशन ने इस गीत में मेरी व्यथा को कम शब्दों में ही पिरो दिया  :

'कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !

मुझको बर्बादी का कोई गम नहीं
गम है बर्बादी का क्यूँ चर्चा हुआ !

देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ !

कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !'

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Tuesday, March 10, 2015

पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई

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          अम्माजी के निधन के पश्चात गोलबाजार वाले घर में मृत्योपरांत होनेवाले कार्यक्रम तेरह दिन गहमागहमी के साथ चले, समस्त परिवारजन और रिश्तेदार एकत्रित हुए।  कुछ देर तो अम्माजी की चर्चा चलती और फिर कुंतल के आश्रम-गमन पर चर्चा होने लगती और बढ़ती ही जाती। कुंतल के आश्रम जाने के 11 दिन बाद ही अम्माजी का निधन हुआ था इसलिए सब उसी 'विचित्र किन्तु सत्य' घटना की तह तक पहुँचना चाहते थे। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो गया ? हमसे इस तरह के प्रश्न किए गए :
'क्यों चला गया ?'
'क्या बात हो गई ?'
'आपने समझाया नहीं ?'
'आपने रोका नहीं ?'
'ऐसे कैसे जाने दिया ?'
          तीसरे दिन अम्माजी की अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मैं इलाहाबाद निकल गया, इधर पुत्र-विछोह से दग्ध माधुरी किस्म-किस्म के पूछे जा रहे सवालों से अकेले जूझती रही और सबको समझाते-बताते खुद भी कुंतल के उस अबूझ निर्णय को समझने का असफल प्रयास करती रही। उन चर्चाओं से उनका दुख और अधिक गहरा गया, वे बेचैन हो गई, उनकी रातों की नींद उड़ गई। 'लोगों का सामना न करना पड़े' इसलिए उन्होंने खुद को अपने घर में सीमित कर लिया और गोलबाजार वाले घर में जाना कम कर दिया। मैं अस्थि-विसर्जन करके वापस लौटा तो वे मेरे कंधे में सिर रखकर रोने लगी और बोली- 'बताओ, क्या जवाब दूँ, सबको ?' मैं उनको क्या बताता, मैं खुद ही बे-जवाब था ! उन दिनों हम दोनों अपने आंसुओं को थामे एक-दूसरे को थामते हुए किसी तरह जी रहे थे। सच में, हम बेसहारा से हो गए थे; ऐसा लगे, कम्मू वापस आ जाए तो हमारी ज़िंदगी वापस आए।
           13 जुलाई 2004 को सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप विधि-विधान से अम्माजी की तेरहवी का पूजन और भोज का कार्यक्रम हुआ। रात को हम लोग थके-मांदे अपने घर वापस आए और सो गए। उस रात माधुरी की तबीयत खराब हुई लेकिन उन्होंने मुझे जगाया-बताया नहीं। अगली सुबह मैं यथासमय उठा, मैंने उन्हें देखा, वे गहरी नींद में सो रही थी। लगभग सात बजे वे जागी और बाथरूम जाने के लिए निकली। रास्ते में उन्हें संभवतः चक्कर आया और वे गलियारे में धम्म से बैठ गई, फिर जमीन पर पसर गई। मैं बाहर बरामदे में अखबार पढ़ रहा था, मुझे कुछ आहट मिली, अंदर जाकर देखा तो माधुरी पसीने से लथपथ फर्श पर पड़ी हुई थी। मैंने उन्हें नाम लेकर पुकारा लेकिन कोई उत्तर नहीं आया, वे अचेत हो चुकी थी, शरीर ठंडा पड़ गया था। मैं बुरी तरह घबरा गया, उनकी हालत देखकर मेरी हालत खराब होने लगी, मेरे कपड़े पसीने से तर-बतर हो गए। मैं उसे पुकार रहा था- 'माधुरी...माधुरी' और वह कुछ बोल नहीं रही थी, आंखे बंद और शरीर एकदम निश्चेष्ट था। एकबारगी मुझे ऐसा लगा- यह एक नई अनहोनी है जो आज होने जा रही है। मैं दौड़ते हुए अपने पड़ोसी डाक्टर अशोक दीक्षित के घर गया और माधुरी का हाल बताया, वे बोले- 'आप घर पहुंचिए, मैं तुरंत आता हूँ।' वहाँ से लौट कर मैंने माधुरी की मित्र सोनू सिहारे को फोन किया और उनसे तुरंत घर आने के लिए कहा। इस बीच डा॰ दीक्षित आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'शी इज़ सिंकिंग, 'ब्लड प्रेशर' और 'हार्टबीट' दोनों गड़बड़ है, इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाइए, यहाँ कुछ नहीं हो सकता।'
          इस बीच सोनू भाभी अपने पति डा॰ प्रदीप सिहारे को लेकर घर आ गई। डा॰ प्रदीप सिहारे अपने साथ 'ग्लूकोज़' के 'पाउच' लेकर आए थे, उन्होंने हाथ की नस टटोलकर सुई घुसेड़ी और 'ग्लूकोज़' चढ़ाने लगे। 'पाउच' को वे अपने हाथ की गदेलियों से दबाकर 'ग्लूकोज़' को शरीर के भीतर जल्दी-जल्दी भेजने का प्रयास कर रहे थे। मैं अपनी सांस रोके चुपचाप अपनी जीवनसंगिनी की डूबती काया को किंकर्तव्यविमूढ़ होकर निहार रहा था।    
          पंद्रह मिनट की मशक्कत के बाद माधुरी के शरीर में कुछ हरकत शुरू हुई, थोड़ी देर बाद डा॰ सिहारे उन्हें कार में बिठाकर अपने हास्पिटल ले गए और वहाँ भर्ती कर लिया। दो दिनों तक उन्हें लगातार ग्लूकोज़ और दवा दी गई।  डा॰ सिहारे तब तक लगातार उनकी देखरेख करते रहे जब तक माधुरी सामान्य नहीं हो गई। चूंकि डा॰ प्रदीप सिहारे शिशुरोग विशेषज्ञ हैं, उनके हास्पिटल में केवल बच्चों का इलाज़ होता है इसलिए वहाँ पर भर्ती अन्य बच्चों के परिजन इनती बड़ी 'साइज' की बच्ची को देखकर विस्मित हो रहे थे और हल्के-हल्के मुस्कुरा भी रहे थे। । माधुरी का और मेरा नास्ता, भोजन, चाय-दूध का जिम्मा सोनू सिहारे ने अपने ऊपर ले लिया था, सच में, उन्होने हमारी बहुत देखरेख की। हमारे घर-परिवार के लोग भी माधुरी को देखने पहुंचे, देखे और चले गए। सोनू भाभी और डा॰ प्रदीप ने उस दिन माधुरी के प्राण बचाए और हमारा परिवार तहस-नहस होने से बच गया। धन्यवाद सिहारे दंपति, आप दोनों की जोड़ी सदा बनी रहे।
          माधुरी घर वापस आ गई लेकिन उनका मन बहुत बेचैन रहता था। उन्हें मानसिक आघात लगा था जिसके कारण उनकी रातों की नींद उड़ गई। वे गुमसुम रहने लगी, मैं भी उदास रहता था और कुंतल को वापस बुलाने के उपाय खोजता रहता था लेकिन कुछ न सूझता। एक दिन मेरे मित्र रमाकांत मिश्रा ने मुझे बताया कि तमिलनाडु के राज्यपाल श्री पी॰ राममोहन राव अपनी बहन से मिलने बिलासपुर आए हुए हैं, क्यों न उनकी मदद ली जाए ! हम दोनों उनसे मिलने उनके बहनोई श्री अशोक राव के घर गए और अपनी व्यथा बताई। श्री राव ने कहा- 'मैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव को जानता हूँ, उन्होंने मुझे अपने आश्रम के कार्यक्रम में बुलाया भी था लेकिन मैं नहीं जा पाया। सद्गुरु जग्गी वासुदेव की निकट सहयोगी भारती जी के पति मुझसे मिलते रहते हैं, उनकी मदद से सद्गुरु तक आपकी बात पहुंचाई जा सकती है।'
'यह ठीक रहेगा, आपके कहने से यदि बात बन जाए तो आपकी बहुत कृपा होगी। कुंतल का आश्रम जाने का निर्णय हम पर बहुत भारी पड़ गया, उनकी माँ टूट गई हैं। हम यह चाहते हैं कि वे योग प्रशिक्षक के रूप में काम करते रहें और अपनी पारिवारिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे।' मैंने कहा।        
'आप लिखकर दीजिए, मैं बात करता हूँ।' राज्यपाल महोदय ने कहा।
           ऐसे प्रभावशाली सूत्र और राज्यपाल महोदय के सहयोगी रुख से हमारी हिम्मत बंधी लेकिन आप तो जानते हैं कि जब विपरीत दिन आते हैं तो अनुकूल प्रयास भी प्रतिकूल परिणाम देने लगते है। राज्यपाल महोदय को न जाने क्या सूझी उन्होने मेरे पत्र को कोयंबत्तुर के कलेक्टर को टीप लगाकर भेज दिया, कलेक्टर ने पुलिस अधीक्षक को और पुलिस अधीक्षक ने थाना-प्रभारी को। आश्रम में जांच के लिए पुलिसबल पहुँच गया और वहाँ के ब्रह्मचारियों, सन्यासियों और संचालकों से गहन पूछताछ करने लगा। अब, पुलिस कैसी जांच करती है, इसका अनुमान आपको होगा ही।
          उस दिन कुंतल संभवतः चेन्नई में थे। आश्रम से जब उन्हें पुलिस-कार्यवाई की खबर मिली तो उन्होने मुझे फोन किया- 'पापा, आपने राज्यपाल से आश्रम के बारे में शिकायत की क्या ?'
'नहीं तो।' मैंने उत्तर दिया।
'पुलिस आश्रम में है, मुझे अभी खबर मिली है। पुलिसवाले बता रहे हैं कि वे आपकी ही शिकायत पर जांच करने आए हैं।'
'मैं राज्यपाल महोदय से मिला था और उनसे निवेदन किया था कि मध्यस्थता करके तुम्हें वहाँ से मुक्त करवाएँ, परंतु मेरे पत्र में आश्रम के विरुद्ध शिकायत का एक भी शब्द नहीं है।'
'पर वहाँ तो तमाशा बन गया, मेरा भी।'
'ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।'
'जो हो गया सो हो गया लेकिन इसके बाद अगर इस ढंग की कोई बात हुई तो याद रखिए आपसे मेरा संपर्क हमेशा के लिए टूट जाएगा, आपको पता भी नहीं लगेगा कि मैं कहाँ हूँ।'
'जी, मैं समझ गया।' मैंने पिता होने के अहंकार को तिरोहित करते हुए कहा।
          जांच के बाद कलेक्टर ने कुंतल को अपने कार्यालय में बुलाया। कलेक्टर ने पूछा- 'क्या आप अपनी मर्जी से यहाँ आए हैं या आप पर कोई दबाव है ?'
'मैं अपनी मर्जी से यहाँ आया हूँ।' कुंतल ने उत्तर दिया।
'आप माता-पिता के इकलौते पुत्र हो, इस तरह उन्हें छोडकर आश्रम क्यों आ गए ?'
'घर में रहता तो केवल माता-पिता की सेवा करता, यहाँ मुझे बहुत सारे माता-पिता की सेवा करने का अवसर मिला है। मुझे सब में अपने माता-पिता ही दिखते हैं।' कुंतल ने बताया।

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          हमारे तीन में से दो बच्चे व्यवस्थित हो गए, संगीता बिटिया का विवाह हो गया, कुंतल आश्रम चले गए, अब घर में हमारे साथ छोटी बिटिया संज्ञा बची जो अपना भविष्य सँवारने में लगी हुई थी। संज्ञा का बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में दिल नहीं लगता था लेकिन 'सिविल सर्विस' प्रतियोगिता से जुडने के बाद उनमें पढ़ाई के प्रति अभूतपूर्व लगन जगी। अपने तेज दिमाग का समुचित प्रयोग करती संज्ञा को देख कर हम लोगों को बहुत खुशी होती थी। संज्ञा काम-काज करने में भले धीमी थी लेकिन किसी से काम लेने में उसे महारत हासिल थी, यदि वे किसी प्रशासनिक सेवा में प्रविष्ट हो जाती तो उनका स्वभाव और प्रभाव बहुत अनुकूल रहता। सन 2003 की छत्तीसगढ़ शासन की सेवाओं हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षा में भरपूर उम्मीद के बावजूद सफलता नहीं मिली, वे दोषपूर्ण 'स्केलिंग' की शिकार हो गई। फिर यह तय हुआ कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रयत्न किया जाए इसलिए उन्होंने इलाहाबाद और दिल्ली जाकर मार्गदर्शन लिया। इसी दौरान उन्हें दिल्ली में कोचिंग करते समय एक साथी मिल गया जिसे जीवनसाथी बनाने का मन बनाया और प्रतियोगिताओं से दूर एक गृहस्थन की परीक्षा देने का निर्णय ले लिया।
          संज्ञा विवाह योग्य हो गई थी, लड़का भी उन्होने खोज लिया, चार्टर्ड एकाउंटेंट था। बच्चे अपनी पसंद का विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है, यह बात ठीक थी लेकिन विवाह फोकट में तो होते नहीं। मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार न था इसलिए विवाह को टालने में ही भलाई समझ आई। यद्यपि खबर यह थी कि लड़के ने अपने घरवालों को अपनी पसंद की लड़की से विवाह के लिए राजी कर लिया है लेकिन हड़बड़ी का कुछ गलत मतलब न निकल जाए इसलिए मैं उस ओर से किसी गंभीर संकेत की प्रतीक्षा में था और वे लोग संभवतः 'लड़के वाले' होने के कारण पहल करने में हिचक रहे थे, परिणामस्वरूप मामला लटका रहा। इधर दोनों प्रेमी रोज रात घंटों तक मोबाइल में लटके रहते और मैं सोचता कि ये लोग सब बातें अभी कर लेंगे तो शादी के बाद बात करने के लिए भला क्या बचेगा !
         हमारा होटल कुछ आगे बढ़ा लेकिन देनदारी इतनी अधिक थी कि घर का खर्च और ब्याज पटाने में ही खप जाता। कई बार बैंक की किश्त अनियमित हो जाती तो सेंट्रलबैंक के शाखाप्रबंधक का फोन आता जिसमे उसके अपमानजनक उद्गार को सुनकर चुप रह जाना पड़ता और 'फोन पटक कर' रखने की आवाज़ भी सुनता जो आज भी मेरे कानों में गूँजती है। जेब में पैसा न हो तो इंसान को बहुत सहना पड़ता है, चुप रहना पड़ता है।
          संज्ञा के जन्मदिन के अवसर पर संज्ञा के संभावी श्वसुर ने एक रिस्टवाच भेजी जिससे हमें संबंध की बातचीत आगे बढ़ाने का संकेत मिल गया लेकिन फिर भी हमारी हिम्मत न पड़े। मेरे भय के दो कारण थे, एक तो मैं आपको बता चुका, हमारा घनघोर धनाभाव और दूसरा हमारे संभावी समधी पुलिस सेवा में थे। हम व्यापारी वर्ग के लोग पुलिस आफिसर और इन्कम टैक्स आफिसर से थर-थर कांपते हैं क्योंकि न जाने कब इनके दिमाग का बिगुल बज उठे और इनकी तलवार म्यान के बाहर निकल जाए ! आप आश्चर्य करेंगे, खरबूजा प्रजाति का यह व्यापारी समुदाय इन लोगों को अपने पारिवारिक उत्सव में निमंत्रण देने तक में हिचकिचाता है। दीवाली के अवसर पर 'लिफाफा' और मिठाई देने इनके घर जाएगा लेकिन शादी-ब्याह की निमंत्रणसूची में इनका नाम नहीं लिखता, हाँ, कुछ बहुत पुरानी जान-पहचान या 'सेटिंग' हो तो अलग बात है। 'इनसे दूरी बनी रहे, उसी में भलाई है'- यह सोच कर उनके यहाँ संबंध की बात आगे बढ़ाने में मेरा जी घबरा रहा था।
          मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि फोन पर दोनों प्रेमी इतनी अधिक बातें कर रहे हैं, कुछ दिनों में ऊब जाएंगे तो किस्सा अपने-आप फुस्स हो जाएगा लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला।
           मेरी होटल की जिस छत पर प्रतिदिन धूप आती थी, कभी-कभी पानी भी बरसता था, इस बीच 'कृपा' भी बरसी। छत पर 'एयरटेल' की 'सेटेलाइट टावर' लग गई जिसके किराये से प्रत्येक माह बैंक की किश्त देने की स्थायी व्यवस्था बन गई और उस अशिष्ट शाखाप्रबंधक का तगादा आना बंद हो गया।

          दिन बीतते जा रहे थे या यूं कहें, गुजरते जा रहे थे। रोज सुबह जागना, हॉटल जाना, रात में सो जाना, बस, ऐसी ही ज़िन्दगी चल रही थी। कोई चमत्कार होने से रहा जो ज़िन्दगी को चमका दे, यह मनगणित ज़रूर चलता था कि संज्ञा के विवाह के खर्च की व्यवस्था कैसे बनेगी ! इसी चक्कर में लगभग एक साल टल गया लेकिन न मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आया और न हमने विवाह का कोई प्रस्ताव किया। फोन पर हुई बातचीत के कुछ ऐसे सूत्र बने कि एक दिन मैं संज्ञा और उनकी मम्मी के साथ संभावी दामाद के घर पहुँच गया। स्वागत-सत्कार हुआ, कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान हुआ, उन्होंने हमें और हमने उन्हें देखा। वहाँ संभावी दामाद के वयोवृद्ध दादाजी भी मिले जो बेहद रोचक और खूब सारी बातें करने वाले मज़ेदार इंसान थे। वे मूल रूप से हरयाणा के थे, उन्होंने मुझे अपने बचपन और युवावस्था की वे बातें बताई जिन्हें सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने यह भी कहा- 'आप लड़की वाले हो, आपको तो हमने अपने बगल में कुर्सी पर बैठाया है, हमारे हरयाणा में लड़की वाले को जूते के पास बैठाते हैं।' उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ क्षणों के लिए सन्नाटे में आ गया फिर ठहाका मारकर हंस पड़ा, लड़की का बाप जो ठहरा !
          लौटते समय संज्ञा को संभावी सास ने कान के बुंदे दिए। हम सब प्रसन्न-मन लौट आए और समझ गए कि इस संबंध को अब और अधिक टाला नहीं जा सकता। मैंने लिखित प्रस्ताव भेज दिया। कुछ दिनों बाद मुझे समधी जी का फोन आया कि वे सपरिवार रतनपुर की महामाया के दर्शन के लिए बिलासपुर होकर जाएंगे इसलिए हम भी सपरिवार उनके साथ चलें। साथ बन गया, सबने महामाया के दर्शन किए और जब वापस लौटे तब मैं और समधी जी मेरी 'मारुति 800' में आए और शेष परिवार उनकी शासकीय गाड़ी में। रास्ते में समधी जी ने बातों-बातों में मुझसे कहा- 'आपसे एक बात कहनी है।'
'जी, कहिए।' मैंने कहा।
'आप लड़की के पिता हैं, लड़कियां अपने पिता के बहुत करीब रहती हैं और कहा भी मानती हैं।'
'जी।'
'आप संज्ञा को समझाएँ कि वह हमेशा हमारे संयुक्त परिवार से जुड़कर रहे, अलग घर बसाने की बात मन में न लाए। अगर हमारा बेटा कभी अलग होने के लिए कहे, तब भी।' वे बोले। कुछ देर के लिए मैं चुप रह गया, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दूँ ? उनकी बात को नकारा नहीं जा सकता था, उनकी अपेक्षा उचित थी लेकिन उनके पारिवारिक भविष्य के बारे में मैं 'कमिटमेंट' कैसे कर सकता था ?
'भाई साहब, 2 + 2 = कितना होता है ?' मैंने उनसे पूछा।
'चार।' वे आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे।
'भाई साहब, आप सही हैं लेकिन 2 + 2 = 22 हो सकता है और 0 भी।'
'मैं समझा नहीं।'
'जीवन गणित के नियमों से नहीं चलता। कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। कौन साथ देगा, कौन साथ छोड़ देगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। मेरे बेटे कुंतल का उदाहरण देखें, वह त्रिची में इंजीनियर बनने गया और पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबाजी बन गया, आश्रम चला गया। कल का क्या पता ?
'यह 'एक्सेप्नल केस' है।'
'जी, आप सही हैं लेकिन मैं यह मानता हूँ कि किसी से उम्मीद करने से कोई लाभ नहीं। आपने फिल्म 'चित्रलेखा' का साहिर का लिखा गीत सुना होगा- "उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे, जन्म मरण का संग है सपना ये सपना बिसरा दे, कोई न संग मरे, मन रे, तू काहे न धीर धरे।" मैंने उन्हें समझाया।
          इतने में बिलासपुर आ गया, वे सब कुछ देर के लिए हमारी लाज में पधारे, फिर अपने घर के लिए रवाना हो गए।

          कुछ दिनों बाद भावी समधी जी का फोन आया- 'आइये, विवाह के बारे में बातें करनी है।' अगले दिन मैं उनसे मिलने निकल पड़ा और सुबह साढ़े नौ बजे उनके शहर ट्रेन से पहुँच गया। स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने इधर-उधर अपनी नज़र घुमाई, उनकी गाड़ी मुझे लेने आने वाली थी, नहीं दिखी इसलिए मैं एक आटो में बैठकर उनके गेस्ट हाउस में पहुँच गया जहां वे अस्थाई रूप से निवास कर रहे थे। नमस्कार की औपचारिकता के पश्चात उन्होंने पूछा- 'आपको 'रिसीव' करने के लिए गाड़ी भेजा था, मिल गई ?'
'मैंने खोजा लेकिन दिखी नहीं।' मैंने कहा।
'अरे, मैंने ड्राइवर से गाड़ी लगाने के लिए कहा था !'
'कोई बात नहीं, मैं आटो से आ गया।' मैंने कहा।
          विवाह कार्यक्रम के सभी चरणों पर विस्तार से विचारों का आदानप्रदान हुआ फिर उन्होंने पूछा- 'आपका बजट क्या है ?'
'पाँच।' मैंने घबराते हुए उत्तर दिया।
'ठीक है, आप 'चार' हमें 'कैश' दे दीजिए, 'एक'आप अपने खर्च के लिए रख लीजिए।' उन्होंने कहा।
'ठीक है।' मैंने कहा।
          बात करते-करते दोपहर का एक बज गया। मैंने पूछा- 'तो मैं चलूँ, मुझे अनुमति दीजिए।'
'ओह, अब तो खाने का समय हो गया ! असल में, यहाँ मेरे लिए 'मेस' से खाना आता है, अतिरिक्त खाने के लिए किचन में खबर करनी पड़ती है लेकिन मैं भूल गया। सुबह हमारे बेटे ने मुझसे 'मेस' में खबर करने के लिए पूछा भी था लेकिन मुझे आपके लिए खाना बोलने का ध्यान ही न रहा।' उन्होंने कहा।
'तो क्या हो गया, आपका खाना आएगा न ? उसी में हम दोनों खा लेंगे।' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। हम दोनों ने मिलकर भोजन किया और उनसे विदा ली। लौटते वक्त ट्रेन में बैठे-बैठे मैं अपने बारे में सोच रहा था- 'लड़की का बाप....बेचारा।'
         घर वापस आकर मैंने माधुरी को पूरा वार्तालाप बताया तो वे मुझ पर भड़क गई- 'तुम्हारे पास भूँजी-भांग खरीदने के लिए पैसा नहीं है, इतना कहाँ से लाओगे ?'
'यार 'सी.ए॰' लड़कों का 'रेट' पंद्रह चल रहा है, मैं तो केवल पाँच बोल कर आया।' मैंने अपने बचाव में कहा।
'वो ठीक है, वादा कर आए हो तो कब भेजोगे ?'
'जब इंतजाम हो जाएगा।'
'कब होगा ?'
'क्या पता !'
'अजीब आदमी हो तुम, 'क्या पता' बोलने से हो जाएगा ?'
'हो जाएगा।'
'कैसे ?'
'देखो, जब मैं छोटा था, 'पेंड्रावाला' मिठाई दूकान में बैठता था तब दो फकीर सड़क के बीचों-बीच अपने हाथों में तासा लिए खैरात मांगते थे। उनमें से एक फकीर ज़ोर से आवाज़ लगाता- 'दे दे मौला।' दूसरा फकीर धीरे से बोलता- 'अल्लई (अल्लाह ही) देगा।' मैंने उन दोनों को कभी भी किसी की दूकान में जाकर या रुककर मांगते नहीं देखा। जिसको देना होता, वह खुद चलकर उनके पास जाता और उनके तासा में सिक्के डालता।'
'तुम्हारे कहने का क्या मतलब ?'
'अल्लई देगा।' मैंने हँसते हुए कहा, वे मेरे चेहरे को बड़ी देर तक घूरती रही।

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Thursday, February 19, 2015

एक और प्रस्थान

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          कुन्तल के आश्रम चले जाने के बाद जो सूनापन हमारे परिवार में पसरा उसे किन शब्दों में बाँधा जाए ! कुन्तल की माँ टूट सी गई. हर समय चुप रहने लगी, वे कई रात आंसुओं से भीगती हुई जागती रहती. उनकी बेचैनी को मैं भला कैसे समझ पाता ? मैंने कुंतल को अपनी कोख में रखा नहीं था, मैंने उन्हें अपना दूध पिलाया नहीं था, मैंने उनकी तरह 'होनेवाली बहू' की पायल की छम-छम सुनने की आशा नहीं की थी, मैंने पोते-पोतियों की उनके जैसी कल्पना और आनंदानुभूति नहीं की थी. वे मुझसे नाराज़ भी रहने लगी- उन्हें बहुत लंबे समय तक मुझसे शिकायत बनी रही कि कुन्तल को विदा करने का निर्णय अचानक मैंने खुद क्यों ले लिया, उनको विश्वास में क्यों नहीं लिया ? उन्हें लगता था कि कुन्तल यदि कुछ दिन और रोक लिए जाते तो शायद रुक जाते. उन्नीस दिनों के प्रवास में कुन्तल से हम सबका जो भी वार्तालाप हुआ और मुझे उनकी जो भाव-भंगिमा दिखी- मुझे उनको शीघ्र मुक्त कर देना उचित लगा क्योकि वे वैराग्य के भावातिरेक से परिपूर्ण थे, उन्हें और अधिक रोकना उनके साथ अन्याय हो जाता और जैसे-जैसे समय बीतता, हम दोनों और अधिक तनावग्रस्त होते जाते. यद्यपि मैं उस निर्णय के पक्ष में नहीं था, बहुत क्षुब्ध था, लेकिन यह मैं जानता था कि इस दुर्धर्ष निर्णय को मुझे ही लेना होगा, उनकी माँ उतना कठिन निर्णय नहीं ले पाएगी इसीलिए अचानक ही मैंने उनका विदाई कार्यक्रम बनाया और सहज विधि से विदा कर दिया.
          कम्मू का इस तरह परिवार से विमुख हो जाना हम सबको अखर गया। उन्होंने अपने जीवन की नई राह इतनी विचित्र चुनी थी कि हमारा भरोसा नहीं बन पा रहा था- वे आश्रम की कठिन डगर पर चल पाएंगे या नहीं ! कहीं बीच राह से वापस लौट आए तो न यहाँ का रहेंगे, न वहाँ के ! प्रतिदिन मेरा मन ऐसे उपायों की तलाश में लगा रहता जिसके माध्यम से उन्हें घर-परिवार में वापस बुलाया जा सके। एक रेलयात्रा के दौरान अकेले बैठे-बैठे मेरे मन में सारा घटनाक्रम घुमड़ता रहा और मुझे लगा- 'सद्गुरु ने मेरे पुत्र का 'अपहरण' कर लिया है।' उस समय मैं इस कदर 'वाइल्ड' हो गया कि मेरे सिर पर खून सवार हो गया और सद्गुरु को राह से हटा देने तक की बात मन में घर कर गई। मेरे जैसा संकोची मनुष्य जो किसी का जरा सा खून देखकर विचलित हो जाता है, वह किसी का खून करवाने की बात सोच रहा था, आप अनुमान लगाइए, मैं कितना दग्ध था ? उन क्षणों में तात्कालीन भावावेश के वशीभूत होकर मुझसे वह जघन्य अपराध हो गया। अपराध इसलिए हो गया क्योंकि भगवान महावीर ने कहा है- 'हिंसा का केवल भाव ही हृदय में आ गया तो समझ लो हिंसा हो गई।' वैसे, मेरी उत्तेजना क्षणिक थी, शांत हो गई। मैंने उस बात को जब माधुरी को बताया तो वे भी हिल गई, उन्होंने मुझे अपने ढंग से समझाया।
          सच पूछिए तो मेरा हाल भी बेहाल था। मुश्किल यह है कि हम पुरुष चाहकर भी रो नहीं पाते। सूने में भले ही मेरी आँखें भर आती थी लेकिन सबके सामने संयत रहना पड़ता है। मैं रोता तो कुंतल की माँ को कैसे समझाता ? दिल को पत्थर बना लिया, मन उदास हो गया लेकिन मुझे यह भलीभांति समझ में आ गया कि परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने और अपनी शाही बीमारी से लड़ने का मेरा कार्यकाल बढ़ गया है। मैंने स्वयं को और अधिक मजबूत बनाने का निर्णय लिया और उसकी आंतरिक तैयारी में भिड़ गया। मेरा दिल तो मजबूत था लेकिन 57 वर्ष के कैन्सरग्रस्त मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा कम होती जा रही थी। मैंने प्रत्येक सुबह 'जिम' जाना शुरू कर दिया। दो वर्ष तक नियमित रूप से जिम जाता रहा परिणामस्वरूप मेरा वजन 99 किलो से घटकर 90 किलो हो गया, मेरा मोटापा छंट गया और युवाओं के साथ व्यायाम करने का मुझे मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिला, हाँ, कुछ युवा जिम में मुझे अभ्यास करता देखकर हँसते तो कुछ विस्मित होते थे।
            इस बीच एक और घटना हो गई। मैंने आपको बताया था कि अम्माजी की दशा उनकी बढ़ती उम्र और अव्यवस्थित जीवन के कारण दयनीय होती जा रही थी। वृद्धावस्था की समस्याएँ भी कठिन होती हैं, शिकायतें बनी रहती हैं जैसे- 'कोई पास बैठकर बातें करता नहीं', 'कोई कुछ पूछता नहीं'। इस उम्र में शरीर निष्क्रिय हो जाता है, अनेक रोग घेर लेते हैं, अंट-शंट खाने का मन करता है लेकिन पचता नहीं, जब भूख लगती रहती है तो कोई ध्यान नहीं देता, रात को ठीक से नींद नहीं आती, सुबह ठीक से पेट साफ नहीं होता, गर्मी के दिनों में गर्मी बहुत लगती है, ठंड के दिनों में जाड़ा अधिक लगता है आदि। दरअसल, उनके तीनों पुत्र उनके साथ 'खो' का खेल रहे थे। ऐसा नहीं था कि उनकी उपेक्षा हो रही थी, वे जिसके घर में रहती थी, उनके खान-पान और इलाज़ का ध्यान रखा जाता था लेकिन पुत्रत्व का अभाव था।
          उन दिनों अम्माजी रायपुर में बड़े भैया के घर में रहती थी, एक शाम वे मेरी छोटी बहन आशा के साथ कार में बिलासपुर आई और सीधे श्री जगदीश लाज़ में उतरी। मैंने उन्हें कार से उतारा, उनका सामान उतरवाया, उन्हें बैठाया। कुछ देर सुस्ताकर वे बोली- 'भैया, मैं यहीं लाज़ में रहूँगी, अब किसी के घर नहीं जाऊँगी।'
          अम्माजी ने अपनी लॉज के एक कमरे को अपना आवास बना लिया। लॉज के सहायकगण सुबह से लेकर रात तक उनकी सेवा-सुश्रुषा में लगे रहते। सुबह के समय मैं उनको बाथरूम में सहारा देकर ले जाता और उनकी दैनिक क्रिया संपन्न करवाने के पश्चात कपड़े पहना कर आराम से लिटा देता। लॉज की प्रबन्धक-द्वय हेमा कपूर और मंजू ठाकुर उनको नास्ता-भोजन करवाती, समय-समय पर दवा देती, सिर-हाथ-पैर दबा देती और उनके पास घंटों बैठकर उनसे उनके अतीत के संस्मरण सुनती। अम्माजी शाम के समय 'रिसेप्शन' के पास आराम कुर्सी में घंटे-दो घंटे बैठी रहती और बाज़ार के चहल-पहल बड़े कौतूहल से देखती क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के विगत 85 वर्ष घर की चारदीवारी के भीतर ही गुजारे थे ! मेरे कुछ मित्र और ग्राहक जब उनका परिचय जानते तो उन्हें चरण-स्पर्श या प्रणाम करते तो वे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती। प्रत्येक शाम को वे आदेश देती- 'भैया आइसक्रीम मँगवाओ।'
          रात को आठ बजे के आसपास हमारी हॉटल में 'डिनर' के लिए ग्राहकों का आगमन आरंभ हो जाता। कई पारिवारिक समूह आते जिन्हें आते-जाते अम्माजी बड़े गौर से देखती। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा- 'ये सब के सब खाना खाने यहाँ आते हैं, इनके घर में खाना नहीं बनता क्या ?'
'बनता है, क्यों नहीं बनता लेकिन कभी-कभार खाना बनाने से छुट्टी भी तो मिलनी चाहिए !' मैंने कहा।
'हमको तो कभी छुट्टी नहीं मिली, हमको कभी किसी ने नहीं कहा कि चलो बाहर खा लो।'
'आजकल कभी-कभी कहना पड़ता है अम्मा, तब बाकी दिन घर में खाना बनता है।'
'पर घर जैसा अच्छा खाना बाहर तो नहीं मिलता होगा ?'
'तो क्या हम लोग रद्दी खाना बनाते हैं ?'
'नहीं, वैसा नहीं कह रही हूँ, घर जैसा स्वादिष्ट भला और कौन बना सकता है ?'
'अम्मा, स्वाद की बात नहीं है, बात कुछ और है।'
'क्या है, घर में आज काम न करना पड़े, यही न ?' अम्माजी ने पूछा, मैं उनकी बात का जवाब नहीं दे पाया।
          कुछ समय बाद अचानक उनके स्वास्थ्य में गिरावट आना शुरू हो गई, कमजोरी तेजी से बढ़ने लगी, वे बहुत बेचैन रहने लगी। उसी बीच कुंतल भी बिलासपुर आए हुए थे। वे दोपहर के समय उनके पास घंटों बैठे रहते। एक दिन कुंतल ने अपनी माँ से पूछा- 'माँ, बुढ़ापा क्या इतना कष्टप्रद होता है, मैं तो अम्माजी की हालत देख कर दहल गया ?'
'हाँ, ऐसा ही होता है।' माधुरी ने उत्तर दिया।
'तो अभी से शान्त रहने की तैयारी करो माँ, बुढ़ापे में शान्ति नहीं सधेगी।' कुंतल ने सुझाव दिया।
          अचानक अम्माजी के मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव दिखने लगे, वे कमरे से बाहर निकालकर चीखने लगती, ज़ोर-ज़ोर से असंगत बातें करती, पूरी रात जागती और दिन में कुछ देर के लिए सो पाती। 30 जून 2004 की सुबह उन्होंने मुझसे कहा- 'आज मेरी तबीयत बहुत खराब है, मैं अब नहीं बचूँगी, मुझे अस्पताल ले चल।'
'मैं डाक्टर को यहीं बुलवाता हूँ, अम्मा।' मैंने कहा, डाक्टर आए, उनकी जांच की और बताया- 'एज़ फेक्टर' है, अस्पताल में चाहें तो इन्हें भर्ती कर दीजिए, वहाँ 'ग्लूकोस' चढ़ाया जा सकता है परंतु अब तकलीफ कम नहीं हो सकती बल्कि बढ़नी ही है।'
          उनके कमरे से अपने काउंटर तक आते-आते मैं सोच रहा था- 'क्या करूँ ?' मैंने निर्णय लिया- 'अस्पताल में यदि इनकी तबियत थोड़ा सुधर गई तो और कष्ट पाने के लिए जीवित रहेंगी इसलिए बेहतर है कि अब इन्हें जाने दिया जाए.…।' मैं उन्हें अस्पताल नहीं ले गया। उसी शाम मैं बड़े भाई साहब के साथ 'अपोलो हास्पिटल' में अपने एक रिश्तेदार को देखने गया। शाम को सात बजे के आसपास जब मैं लॉज लौटा तो मुझे बताया गया कि अम्माजी की तबीयत और अधिक बिगड़ गई है, मैं दौड़कर उनके कमरे में गया, वे अपनी अंतिम सांसें ले रही थी। मैंने अपने हाथों से उनका माथा सहलाया, कुछ मिनटों में ही मेरे देखते-देखते उनका शरीर शांत हो गया। तीन लड़कों-बहुओं और छः लड़कियों की माँ ८४ वर्षीया सुंदरबाई ने श्री जगदीश लॉज के कमरा नंबर ४०१ में अपने प्राण त्यागे !
          
          उस जमाने में किसी औरत का ब्याह कैसा होता रहा होगा, आज आप कल्पना करिए। तेरह-चौदह वर्ष की कच्ची उम्र, एक हाथ लम्बा घूँघट, भरे-पूरे घर का 'पूरा' कामकाज, पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में गर्भाधान, हर साल बच्चे का प्रसव, न अस्पताल, न डाक्टर ! पति के सामने घूँघट ओढ़कर संतान उत्पन्न करने का अद्भुत कारनामा आज की पीढ़ी को कैसे समझाया जा सकता है ? संतानों की संख्या भी कोई कम नहीं, आम तौर पर एक दंपति एक दर्जन का आंकड़ा छू लिया करता था। कुछ बच्चे जन्म के समय या बाल्यावस्था में इलाज के अभाव में मर-खप जाते थे या कुछ प्रसूता ही दिवंगत हो जाती। ऐसा होने पर विधुर पुरुष का नया विवाह हो जाता लेकिन विधवा स्त्री का पुनर्विवाह निषिद्ध था। कवि प्रदीप ने तात्कालीन नारी विवशता पर यह मार्मिक गीत लिखा था :
'पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोय
बाहर से तो खामोश रहे तू भीतर-भीतर रोय।
तेरा दर्द न जाने कोय।
कह न सके तू अपनी कहानी, तेरी भी पंछी क्या ज़िंदगानी
विधि ने तेरी कथा लिखी, आँसू में कलम डुबोय।
तेरा दर्द न जाने कोय।
चुपके-चुपके रोने वाले, रखना छुपाकर दिल के छाले
ये पत्थर का लेख पगले, कोई न तेरा होय।
तेरा दर्द न जाने कोय।'
          हमारी अम्माजी बेहद जीवट वाली थी। जितना मैंने उनसे उनके बारे में सुना और जो मैंने देखा, उसका विवरण आपको बताया जाए तो उस जमाने की गृहस्थन का सम्पूर्ण स्वरुप आपके समक्ष प्रगट हो जाएगा। तेरह वर्ष की आयु में वे मेरे पिता के पास ब्याह कर आई थी, तब से ६७ वर्ष तक दोनों का साथ रहा. अम्माजी गरीब परिवार की लड़की थी, ब्याह कर आई तो फिर गरीब घर ही मिला। आसमान से गिरी तो खजूर में अटक गई। रात-रात भर जागकर दिये की रोशनी में गेहूं की सफाई करती तो उनको एक बोरे ( लगभग नब्बे किलो) का मेहनताना एक रुपया मिलता जिसे वे जतन से बचाकर रखती ताकि वक्त-जरूरत पर परिवार के काम आए। कुछ अधिक जुड़ जाता तो उसका सोना खरीद लेती जो उन दिनों 20/- से 25/- तोला (लगभग 12 ग्राम) मिल जाया करता था। यही सोना उनके बच्चों के ब्याह में काम आया, जो बच गया वह उनके अंतिम दिनों में जिसके जो हाथ लगा, विलुप्त हो गया।
          उनके पति और श्वसुर दोनों अद्भुत प्राणी थे। अम्माजी भोजन बनाने में अपने प्राण भी लगा दे तो भी उनको स्वाद नहीं आता था, खाते जाते थे, दांत पीसते जाते थे और थाली-गिलास पटक कर अपना क्रोध प्रगट करते रहते, बेचारी अम्मा चुपचाप सुनती-सहती रहती। हमारे घर में रोज दो-चार मेहमानों का भोज होता था, समाज में दोनों बाप-बेटे की मेहमाननवाज़ी की तारीफ हुआ करती थी, अम्माजी की बदौलत। बेचारी चूल्हे की आग में तपती भोजन बनाती, खुद परोसती-खिलाती और सब खानेवाले मुंह पोछते बिना कुछ कहे चले जाते। जिस भोजन के स्वाद पर दोनों बाप-बेटे अम्माजी को गरियाते थे, उस भोजन को याद करके आज हम तरसते हैं।
          अम्माजी लाजवाब भोजन बनाती थी। चूल्हे में लकड़ी जलाकर बटुवे में पकी दाल और भात का स्वाद आज भी मुझे याद आता है। रोटी और पूड़ी को ऐसा गोल बेलती कि 'सर्कुलेटर' से 'चेक' कर लो। उनमें गजब की फुर्ती थी, रोटी सेंकते हर समय उनकी एक रोटी तवे पर होती, दूसरी अंगार पर और तीसरी पटे पर ! उनके हाथ से सेंकी हुई रोटियों की मुलायमियत अब स्मृति-शेष होकर रह गई। फूली हुई पूडियां और रसीली आलू या लौकी की सब्जी आज भी बहुत याद आती हैं। उनके हाथ से बने पापड़, बिजौरा, बड़ी, कचरिया, अथान (अचार) अब कहाँ ? मूंग और बेसन के लड्डू का वह सोंधापन, गुझिया और इन्दरसा की मिठास और प्रसव के पश्चात प्रसूता को खिलाए जाने वाले मेवा-मसालेदार 'सोंठइला लड्डू' का स्वाद न जाने कहाँ विलीन हो गया !
          अम्माजी की याद में कितनी घटनाएँ मेरे ज़ेहन में उमड़ रही हैं, उन सब यादों को जोड़कर यदि उनका व्यक्तित्व परिभाषित किया जाए तो वे अत्यंत परिश्रमी और सरल स्वभाव की महिला थी। उनकी सरलता ने उनको बहुत सताया और जिस मान-सम्मान की वे हकदार थी, वह उन्हें नहीं मिला।
          मुझे याद है कि अपने विवाह-समारोह के पश्चात जब हम पति-पत्नी सड़क मार्ग से जबलपुर से बिलासपुर आ रहे थे, मैंने अपनी पत्नी को अपने परिवार के बारे में बताते हुए उनसे कहा था- 'अम्माजी को जीवन में कभी सुख नहीं मिला, तुम उनके दुख को कम करने की कोशिश करना।' बेचारी माधुरी को पता ही नहीं था कि वह किस बीहड़ की बहू बनकर जा रही है। हमारे घर के कंटीले-पथरीले रास्तों ने उनको अवश्य निराश किया होगा लेकिन विपरीत स्थितियों का सामना करने का उनका साहस कभी कमजोर नहीं हुआ बल्कि उन्होंने इन कठिनाइयों को चुनौती के रूप में लिया और मेरा कहा मानने की पूरी कोशिश की।
          अम्माजी और दद्दाजी विपरीत स्वभाव वाले युगल थे, एक आग का गोला तो दूसरा बर्फ की चट्टान ! लेकिन दद्दाजी तो दद्दाजी थे, उनके स्वभाव का क्या कहने ? एक दिन की बात है, हम पिता-पुत्र रसोईघर में चटाई पर बैठकर भोजन कर रहे थे, अचानक किसी बात पर दद्दाजी भड़क गए और मुझसे बोले- 'देखो भैया, बहू ने आजतक एक दिन भी न अच्छा खाना बनाया और न प्रेम से खिलाया।' माधुरी सिगड़ी में रोटियाँ सेंक रही थी, हरदम चुप रहनेवाली बहू भड़क गई और घूँघट के अंदर से बोली- 'और आपने कभी अपने मुंह से बोला कि बहू आज तुमने अच्छा खाना बनाया ?' दद्दाजी ने गुस्से में आकर भोजन की थाली दोनों हाथ से उठाई और जमीन पर पटक दी और बोले- 'देखो, देखो अब मुंह भी लड़ाने लगी है।' मैं और अम्माजी सकते में आ गए, दद्दाजी को तो कोई कुछ कह नहीं सकता था मैं माधुरी को चुप रहने के लिए कहता रहा। दद्दाजी उठकर चले गए, माधुरी रोने लगी तो अम्माजी बोली- 'चुप हो जा बहू, इनकी तो आदत है, चाहे जितना अच्छा बना दो, इनको पसंद नहीं आता।' मैंने अम्माजी से कहा- 'अम्मा, तुम जब इस घर में बहू बनकर आई थी, उसी समय यदि आज जैसा जवाब दद्दाजी को मिल गया होता तो दद्दाजी कब के सुधर गए होते !'
'हमारे जमाने में हम लोग मुंह खोलना नहीं जानते थे।' अम्माजी उदास हो कर बोली।
          मैंने देखा है कि सीधे-सरल स्वभाव के व्यक्ति के साथ हमेशा अन्याय होता है। मनुष्य को फुफकारने वाले नाग की तरह जीवनशैली अपनानी चाहिए ताकि लोग उससे भयभीत रहें, यदि आप पिटपिटिया साँप के तरह अपना बचाव करते रहेंगे तो लोग आपको पैरों से कुचलते रहेंगे, आपको अपने अनुभव की बात बता रहा हूँ।

           अपनी माँ और पिता को उनके जीते-जी समझ पाना कठिन है लेकिन उनके न होने के बाद उन्हें समझना आसान हो जाता है। जो हमें हासिल है, उसकी बेकद्री है लेकिन जो साथ छोड़कर दूर हो गया या बहुत दूर हो गया तब उसकी कद्र की कद्र होती है। वैसे तो संसार के सभी रिश्ते इसी तरह बनते-निभते हैं लेकिन मेरे देखने में आया कि माँ का बेटे के साथ, पिता का बेटी के साथ कुछ अधिक ही नेह रहता है। सिगमंड फ्रायड के मतानुसार यह विपरीतलिंगी प्रभाव है, वैसा हो सकता है लेकिन भारतीय परिवेश में इसे समझने के लिए हमारी परिवारिक व्यवस्था के मनोविज्ञान पर गौर करना होगा।
          आम तौर पर किसी बालिका से प्रश्न किया जाए कि बड़ी होकर वह किसके जैसी बनना चाहेगी तो उसका संभावित उत्तर होगा- 'अपनी मम्मी जैसी' और यही प्रश्न किसी बालक से पूछा जाए तो जवाब होगा- 'अपने पापा जैसा।' उन दोनों को बड़ा होने दीजिए, पढ़ने-लिखने दीजिए, अक़्लमंद होने दीजिए, जैसे ही ये किशोर-वय को प्राप्त होंगे, दोनों 'यू टर्न' ले लेंगे। लड़की कहेगी- 'कैसी भी लेकिन माँ जैसी नहीं' और लड़का बोलेगा- 'कैसा भी लेकिन अपने बाप जैसा नहीं।' विचारणीय प्रश्न यह है कि बचपन से किशोरावस्था के मध्य उन दस वर्षों में इस तरह का 'पेराडाइम शिफ्ट' क्यों हो जाता है ?
          डा॰ एरिक बर्न ने 'ट्रांजेक्सनल एनालिसिस' नामक अद्भुत मनोवैज्ञानिक शोध किया है जिसमें वे मनुष्य के व्यवहार को गहराई से समझने में मदद करते हैं। इस विशद अध्ययन में उन्होंने 'I am okay, you are okay.' की मनस्थिति को विकसित करने के सूत्र बताए हैं। इसे आप समझने का प्रयत्न कीजिए, आपको मैं सरल ढंग से संक्षिप्त रूप में बताने का यत्न करता हूँ। सबसे पहले 'I am okay, you are okay.' का हिन्दी अनुवाद कर लिया जाए- 'मैं सही, तुम सही'।
          मनुष्य के जीवन में चार विभिन्न मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ बनती हैं- 
1 : मैं सही नहीं, तुम सही॰ (I am not okay, you are okay.)
2 : मैं सही नहीं, तुम भी सही नहीं॰ (I am not okay, you are not okay.)
3 : मैं सही, तुम सही नहीं॰ (I am okay, you are not okay.)
4 : मैं सही, तुम भी सही॰ (I am okay, you are okay.)
          1 : मैं सही नहीं, तुम सही : मनुष्य के जन्म से बचपन तक का समय दूसरों पर आश्रित रहता है। कदम-कदम पर उसे ऐसा महसूस होता है कि बहुत से कार्य ऐसे  हैं जिसे वह नहीं कर पाता लेकिन जो उम्र में बड़े हैं- वे कर सकते हैं। इस वज़ह से उसमें हीनभावना विकसित हो जाती है और उसे लगता है- 'मैं अक्षम हूँ लेकिन अन्य लोग सक्षम हैं।' 
          2 : मैं सही नहीं, तुम भी सही नहीं : बच्चा जब थोड़ा समझदार होता है तो वह अनुभव करता है कि गलतियां केवल उससे ही नहीं होती, दूसरे भी करते हैं तब वह अपनी गलतियों को 'जस्टिफाई' करने के लिए दूसरों पर उंगली उठाता है- 'अगर मैं गलत हूँ तो वह भी तो गलत है।'
           3 : मैं सही, तुम सही नहीं : वयस्क होने के बाद जब शारीरिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो जाती है तब उसे लगता कि वह सही है, सक्षम है, बुद्धिमान है और दूसरे गलत हैं। स्वयं के दोष उसे नहीं दिखते और अन्य के दोष उसे दिखाई देने लगते हैं, इस प्रकार उसे लगने लगता है- 'मैं सही हूँ, दूसरे गलत हैं।'
           4 : मैं सही, तुम भी सही : उपरोक्त 1, 2 और 3 मनस्थितियाँ नकारात्मक हैं। स्वयं को अक्षम समझना हमें हीन, कमजोर और लाचार बनाता है जबकि दूसरों में दोष देखना हमें परछिद्रान्वेषी, घमंडी, ईर्ष्यालु, बहानेबाज और गैरजिम्मेदार बनाता है। मनुष्य के लिए आदर्श और सकारात्मक सोच है- मैं सही, तुम भी सही।
          डा॰ एरिक बर्न की उक्त कसौटी पर माता-पिता और उनके बच्चों के मध्य विकसित होने वाले मनोभावों को आसानी से समझा जा सकता है। बचपन में माता-पिता पर निर्भरता बच्चे पर उनके प्रति अनुकूल प्रभाव रखती है लेकिन उस निर्भरता के समाप्त होते ही वह आत्म-स्वतन्त्रता की ओर उन्मुख होने लगता है। माता-पिता का मार्गदर्शन और आदेश उसे नहीं सुहाता। दरअसल, वयस्क मन स्वयं समझ विकसित करके निर्णय लेना चाहता है जिसमें माता-पिता उसे बाधक समझ आते हैं। यहीं से उनके मध्य मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं जो धीरे-धीरे मनभेद की ओर बढ़ जाते हैं और कालांतर में संघर्ष का रूप ले लेते हैं।
           हमारे परिवारों में लड़कियों को प्रशिक्षित करने की ज़िम्मेदारी माँ के कंधों पर होती है और लड़कों की उनके पिता पर। मनुष्य स्वभाव से आलसी प्राणी है इसलिए उसे काम करना स्वाभाविक रूप से नापसंद होता है और यदि कोई काम करने के लिए दबाव डालता है, या सौंपे गए काम को न करने पर प्रश्न उपस्थित करता है तो वह अप्रिय लगने लगता है। इस प्रकार माँ अपनी लड़की की 'फ्रेंड लिस्ट' से बाहर हो जाती है और पिता अपने बेटे की 'फ्रेंड लिस्ट' से। जब घर में ये विसंगतियाँ बड़ा रूप लेने लगती है और वाक्युद्ध में परिवर्तित होने लगती हैं तब लड़की की रक्षा करने के लिए पिता अवतरित हो जाते हैं- 'धीरे-धीरे सीख लेगी, क्यों पीछे पड़े रहती हो ?' वहीं पर लड़के की तरफदारी करने के लिए उसकी माँ सामने खड़ी हो जाती है- 'बच्चे की जान लोगे क्या ?' संभवतः इसीलिए माँ का बेटे के साथ और पिता का बेटी के साथ अधिक ही नेह विकसित हो जाता है। फ्रायड इसे विपरीतलिंगी आकर्षण ठहरा सकते हैं लेकिन मुझे तो यह सुविधा-असुविधा से जुड़ा मामला लगता है।

          मेरी गृहस्थी में भी इसी तरह से अनेक घटनाएँ हुई और यही कई बार हम पति-पत्नी के मध्य मतभेद के कारण बने। परिवार में सभी वरिष्ठ कडक हो जाएँ, ऐसा उचित नहीं। 'एक कड़क तो दूसरा नरम' की नीति उपयोगी रहती है लेकिन मेरी पत्नी की मुझसे शिकायत रहती है कि जब वे जब बच्चों के साथ कड़क हों तो मुझे उनका साथ देना चाहिए वरना डांट का असर कमजोर पड़ जाता है और अपेक्षित परिणाम नहीं आते। इस मुद्दे पर अनंत बहस की जा सकती है लेकिन मुझे लगता है कि घर-परिवार में किसी प्राणी का जन्म निरर्थक तनाव झेलने के लिए नहीं हुआ है, घर में शांति होनी चाहिए, परस्पर प्रेम होना चाहिए, आपस में मदद और देखरेख का भाव होना चाहिए और यह सब तब हो सकता है जब बच्चों को समझा जाए और उन्हें प्रेम से समझाया जाए। मेरे दद्दाजी बहुत कड़क इंसान थे लेकिन मैंने अनुभव किया कि वे न तो अपने बच्चों को सुधार पाए और न ही अपने अनुरूप नहीं बना पाए, हाँ, उन्होंने अपने जीते-जी हमारा जीना हराम करके जरूर रखा।
          मेरे बचपन में तीन तानाशाह मुझे सुधारने में लगे रहते थे- बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया। उस त्रिभुज के मध्य मैं इधर से उधर टकराता रहता, किसी से डाँट, किसी से घुड़की तो किसी से मार। इन तीनों आततायियों के आतंक से मुझे बचा पाने में अम्माजी असमर्थ थी क्योंकि वे विरोध नहीं करती थी लेकिन रोज ही मेरी हिम्मत बँधाते रहती और अगली यातना सहने के लिए मुझे तैयार करती। इन तीनों के प्रहारों पर नियंत्रण करना असंभव था क्योंकि इनका घर में विकट खौफ था, इनसे कोई कुछ नहीं कह सकता था और हमारी अम्माजी तो नरमदल वाली थी। अम्माजी के नरम होने की वजह से वे घर में इतनी महत्वहीन हो गई थी कि 'उनके' बच्चों का विवाह-संबंध तय करने के पूर्व उनकी राय लेना तो बहुत दूर की बात है, उनको बताया तक नहीं जाता था। ऐसे महत्व के निर्णय घर के पुरुषगण आपस में ले लेते थे, अम्माजी को हम लोग सुनी-सुनाई बातें बताया करते थे जिसे वे चुपचाप सुन लेती थी और धीरे से सिर हिला देती थी ! हे भगवान, आज के समय में ऐसा सम्भव है क्या ?
          दद्दाजी सवा छः फीट ऊंचे-पूरे व्यक्ति थे, धोती-कुरता-जाकिट-टोपी पहनते थे और जब हाथ में बेंत लेकर उसे लहराते हुए सड़क पर निकलते तो हर आने-जाने वाले की नजर उन पर ज़रूर पड़ती। यह बेंत सहारे के लिए नहीं, 'लुक' के लिए उनके साथ चलती थी। उनके पास दो बेंत थी जिसे उन्होंने बनारस से मंगवाया था, एक बेंत ऊपर से नीचे तक चिकनी थी और दूसरी अनानास के छिलके की तरह उभरी हुई नोकदार।
          एक शाम की बात है, मैं अपने घर के बाहर कबड्डी खेल रहा था। उसी समय बड़े भैया का आगमन हुआ, उनकी उम्र उस समय 18 वर्ष की रही होगी और मैं लगभग आठ-नौ वर्ष का रहा हूंगा, उन्होंने गुस्से में मुझे बांह से पकड़कर घसीटते हुए घर के अंदर किया और दद्दाजी की उसी नुकीली बेंत से मेरी जमकर कुटाई की। न जाने क्यों, वे मेरे धूल में खेलने के सख्त खिलाफ थे, अक्सर झपड़ियाते रहते थे लेकिन उस शाम उनका पारा अधिक चढ़ा हुआ था इसलिए बेंत के माध्यम से अपना रोष व्यक्त किया। मेरी दाहिनी बांह और पीठ पर चोट के निशान उभर आए, सूजन आ गई। अम्माजी ने देखा और भड़क गई और बड़े भैया को डांटा- 'अरे, ऐसा जानवरों की तरह मारा जाता है ?' मैंने अपने जीवन में केवल एक बार ही नाराज़ होते देखा, फिर कभी नहीं। वे दया और करुणा की साक्षात अनुकृति थी, मैं उनके निर्जीव देह के समक्ष खड़ा अनेक पुरानी बातें याद कर रहा था और सोच रहा था कि विपरीत स्थितियों को अनुकूल करने की चेष्ठा करने वाली यह अद्भुत स्त्री प्रतिकूल परिस्थितियों से अंततः मुक्त हो ही गई।
          अपने अंतिम दिनों में अम्माजी ने मुझसे कहा था- 'मुझे मेरे घर ले चल, एक बार दिखा दे मुझे।'
'वहाँ जाने के लिए मुन्ना भैया (छोटे भाई राजकुमार का घरेलू नाम) आएंगे तो उनसे कहना।' मैंने कहा। उन दोनों के बीच क्या बात हुई, मुझे नहीं मालूम लेकिन अम्माजी की यह इच्छा उनकी मृत्यु के पश्चात पूरी हो गई। उनकी पार्थिव देह को उसी रात 'उनके' घर ले जाया गया। सुबह तक सब परिवारजन और नागरिक एकत्रित हुए और अंतिम संस्कार किया गया। न जाने क्यों, मेरी आँखों से एक बूंद आँसू न गिरा। विदा अम्मा।

          निदा फ़ाजली की यह गजल अम्माजी के बहुत करीब है :

'बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ,
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ।

बान की खुरीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ।
चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसे माँ।
बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ।
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ।'

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Monday, February 2, 2015

सपना सलोना था

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          वायदे के मुताबिक संगीता के सास-श्वसुर जी, संगीता की विदा की अगली सुबह उसे उसके 'हॉस्टल' छोड़ गए ताकि वह परीक्षा की तैयारी कर सके। परीक्षा निरापद हो गई, 'रिजल्ट' आ गया। संगीता ने बी॰डी॰एस॰ के प्रमाणपत्र की छायाप्रति मुझे भेजा और उसी के पीछे एक पत्र भी लिखा :

12-5-2003

प्रिय पापा और मम्मी,

         आप लोगों के आशीर्वाद और अनथक सतत प्रयास से अंततः ये हमारा स्वप्न पूर्ण हुआ और आपकी आलसी बेटी एक उपाधि-प्राप्त चिकित्सक बन गई है।
          आगे भी यही प्रयास रहेगा कि इतने परिश्रम से जो कार्य की उत्कृष्टता प्राप्त की है उसका फायदा अपने पास आने वाले हर मरीज़ को दूँ। ये मेरी डिग्री पूरी तरह से आप लोगों को समर्पित है। 
          जैसे मैं और कम्मू एक रास्ते पर चल पड़े हैं, संज्ञा भी जल्दी ही एक राह पकड़ लेगी। अपना परिवार एक मिसाल बनने की राह पर है, आमीन ! !

आपकी बेटी
संगीता  

          छोटी बिटिया संज्ञा माइक्रो-बायलाजी में स्नातक होने के बाद राज्य-सेवा परीक्षा की तैयारी में लग गई। हमारे पुत्र कुंतल त्रिची में बी॰टेक॰ के अंतिम सेमेस्टर में थे। कुंतल के बारे में इसके बाद की घटनाएँ आपको बताऊँ, आपको मैं उस पहले पत्र के बारे में बताना चाहता हूँ जिसे मैंने उन्हें चार वर्ष पूर्व तब लिखा था जब उनके त्रिची कॉलेज में शुरूआती दिन थे। इस पत्र में लिखी बातें उनके आगामी जीवन को समझने में आपके लिए मददगार होंगी। पत्र यह था :

'बिलासपुर
16-9-1999

प्रिय कम्मू,

          नए परिवेश में एक आल्हादकारी भविष्य के लिए मिले सुअवसर की बधाई। निश्चिन्त और सुरक्षित व्यवस्था से दूर, एक स्वतंत्र तथा जिम्मेदार युग में तुमने प्रवेश किया है। मैं तुम्हारी मानसिक स्थिति का अनुमान लगा सकता हूँ, तुम्हारे रोमांच और उत्सुकता की कल्पना मुझे है। इसे समग्र रूप से जीना, अपने व्यक्तित्व को विकसित करना और समय का सुनियोजित उपयोग करना- ये सब कैसे होगा- इसे तुम देखो, समझो और करो। तुम भाग्यशाली हो की तुम्हें ऐसे संस्थान में पढ़ने का, स्वयं को विकसित करने का अवसर मिला जिसमें देश के सर्वश्रेष्ठ युवा साथ मिलजुल कर अपने भविष्य की कहानी लिख रहे हैं।
          तुमने मुझसे चर्चा में कहा था कि इन श्रेष्ठ छात्रों के साथ तुम्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक है लेकिन यदि गौर करो तो वास्तविक प्रतिस्पर्धा तुम्हारी स्वयं से है। प्रति-क्षण, तुम बीते क्षण के मुक़ाबले अब कैसे हो ? बताओ, मुख्य प्रतिस्पर्धी कौन है ? निश्चयतः व्यवस्थित परिश्रम के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। तुम योग्य हो और समझदार भी। हम सब, तुम पर, तुम्हारी प्रतिभा पर भरोसा करते हैं। 
          तुमसे दूर होने का दुख हम सबको है लेकिन हर समय तुम्हारी स्मृति हमारे आस-पास रहती है। इतनी दूर से हम तुम्हारे लिए कुछ खास नहीं कर पाते लेकिन हम यह जानते हैं कि तुम सक्षम हो, सुयोग्य हो और केवल अपने लिए नहीं- हम सबके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हो। तुम्हारे व्यक्तित्व का निर्माण- एक सार्थक मनुष्य के रूप में तुम्हारी परिणिति- हमें परम संतोष का सुख देगा।
          मम्मी तुम्हें खूब याद करती है, कभी बहुत खुश हो जाती है, कभी आँखें गीली हो जाती हैं, आखिर माँ हैं। संज्ञा की पढ़ाई तेजी से शुरू हो गई है, आसार अच्छे नज़र आते हैं। अपना ख्याल रखना।
          पापा॰'

          त्रिची इंजीनियरिंग कालेज तमिलनाडु में है जहां अंग्रेज़ी और तमिल भाषा का बोलबाला है। तमिलनाडु की अँग्रेजी भी तमिल भाषा के लहज़े से प्रभावित रहती है इसलिए कुंतल को शुरुआती दिनों में भाषा संबंधी असुविधा रही जिसके कारण उन्हें वहाँ के माहौल से स्वयं को अनुकूलित करना कठिन लगा लेकिन समय बीतता गया और कुंतल बी॰टेक॰ के अंतिम सेमेस्टर में पहुँच गए। उन्हीं दिनों देश की अनेक प्रतिष्ठित व्यापारिक संस्थान कालेज में 'केम्पस इंटरव्यू' के लिए पहुंचे। कुंतल ने पुणे के संस्थान 'टेल्को आटोमोबाइल्स' के लिए साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार पूरा हो जाने के बाद कुंतल ने उठते-उठते उनसे कहा- 'मैं आपकी कंपनी में केवल 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' विभाग में ही काम करूंगा, अन्य कार्यों में मेरी रुचि नहीं है।'
'हम ऐसा वादा नहीं कर सकते।' उन्होंने उत्तर दिया।
'तो फिर, यदि आपने मेरा चयन किया हो तो बेहतर है यह 'जाब' किसी दूसरे को दे दीजिए।'
'हम ऐसा कर सकते हैं कि 'प्रोबेशन पीरियड' में आपका काम देखेंगे, अगर उचित समझ में आया तो 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट' दे देंगे।'
'मुझे मंजूर है।' कुंतल ने सहमति दी। इस प्रकार कुंतल को अंतिम सेमेस्टर के दौरान 25 फरवरी 2003 को 'आफ़र लेटर' आ गया। नियुक्ति की शर्त यह थी कि 'ग्रेजुएट डिग्री' न्यूनतम 60% अंक लेकर उत्तीर्ण होना अनिवार्य था जबकि कुंतल ने 82% अंक हासिल किए। इसी कुंतल को बिलासपुर के हिन्दी माध्यम स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' के प्राचार्य ने परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका को कोरा छोड़ देने और उस पर आचार्य जी का कार्टून बनाने के अपराध में कड़ी चेतावनी दी गई थी. पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह कुंतल की जब आँख खुली तब उसने वह हासिल किया जो सच में किसी अजूबे से कम न था।
          26 मार्च 2003 को त्रिची से कुंतल ने एक पत्र हमें भेजा, उसके पूर्वार्द्ध हिस्से को आप पढिए :

'डीयर पापा, मम्मी और दीदी,

          मैं यहाँ एकदम ठीक हूँ और आप लोग भी मज़े में होंगे ऐसी कामना करता हूँ।
          अब बस, कालेज के कुछ आखिरी दिन बचे हैं। आज भी उस दिन की यादें एकदम सजीव हैं जिस दिन घर से निकला था यहाँ आने के लिए। पता ही नहीं चला कब समय निकल गया। चार साल तो बस यूं ही निकल गए। इन चार सालों में बहुत कुछ सीखा, कुछ पाया, कुछ खोया, अच्छा समय देखा। दोस्त बनाए, तमिल नहीं सीख पाया। काम किया, सोया, ज़्यादा पढ़ाई नहीं की पर एक अच्छी नौकरी लग गई। English improve हो गई, हिन्दी खराब हो गई, और भी बहुत कुछ ! बिना उम्मीद किए एक मौका भी मिला, इन सब चीजों से ऊपर उठकर ( या फिर नीचे जाकर) अपने आपको पहचानने का। एक गुरु, जिन्होंने जीवन को एक नई दिशा दी है। समझ में आया कि अभी तक जो कुछ भी कर रहा था- पता नहीं क्यों कर रहा था ? अभी भी लक्ष्य एकदम स्पष्ट नहीं है, पर atleast, एक दिशा है। मार्ग पर चलना अभी भी कठिन है। ढेर सारे दुश्मन हैं, बाहर नहीं, अंदर हैं। जब तक खुद पर काबू नहीं कर पाता, लक्ष्य तक पहुँचना असंभव रहेगा।
          आप लोगों को अज़ीब लग रहा होगा की छोटा सा कम्मू कैसी-कैसी बातें कर रहा है पर पता नहीं, कुछ तो परिवर्तन आया है। बाहर से शायद अभी भी वैसा दिखूँ, पर अंदर ही अंदर, जीवन के लिए पूरा दृष्टिकोण ही बदल गया है। शुरू-शुरू में बहुत कठिनाई हुई, अभी भी होती है क्योंकि आस-पास रहनेवाले लोग इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाते पर धीर-धीरे इन चीजों से निपटना भी आने लगा है। एक बात तो है, जीवन पहले जैसा नहीं रहा। अब यह कहीं ज़्यादा रोमांचक, अर्थपूर्ण और मज़ेदार होता जा रहा है।.....
          कंपनी से offer/joining letter आ गया है। उसकी जेरोक्स कापी भेज रहा हूँ, उसमें ढेर सारी बातें लिखी हैं। पता नहीं क्या मिलेगा...कितना मिलेगा ? पर, अनुमानतः दस-बारह हजार के आसपास हाथ में आना चाहिए। खैर, वहाँ जाकर ही पता चलेगा कि क्या होने वाला है। I am absolutely ready and very excited. पर उसके पहले घर में बीतनेवाली छुट्टियों का लालच आ रहा है। मैं इस बार भी घर से कहीं नहीं निकलने वाला। उम्मीद है आप लोग मुझे ज़्यादा नहीं हड़काएंगे।.....
          अब पत्र बंद करता हूँ। ढेर सारा प्यार।
आपका - कम्मू '

          दद्दाजी के निधन के पश्चात अम्माजी अकेली पड़ गई। दद्दाजी उन्हें आदतन डांटते रहते थे, वे उनकी डांट की इतनी आदी हो गई थी कि उन पर उसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। दद्दाजी कहा करते थे- 'ये मेरे ज़िन्दा रहते, मेरे सामने चली जाएँ तो अच्छा है' लेकिन ऐसा होते-होते रह गया। इस धरती पर आना या वापस जाना किसी के हाथ में तो है नहीं!
          हुआ यह कि सन १९९६ में अम्माजी को एक शाम 'माइनर हार्ट अटैक' आया, उन्हें शासकीय अस्पताल में भरती किया गया। आई॰सी॰सी॰यू॰ में उन्हें सघन देखभाल और चिकित्सा के लिए रखा गया। वहाँ के 'मेडिकल स्पेशलिस्ट' डा॰एस॰के॰निगम की देखरेख में इलाज़ चल रहा था। दूसरे दिन की बात है, एक बढ़ई आई॰सी॰यू॰ में आया और रोशनदान की 'रिपेयरिंग' करने लगा। हथौड़े से चल रही तोड़फोड़ के कारण तेज आवाज हो रही थी, इस कारण अम्माजी को सोने में व्यवधान हो रहा था। मैंने बढ़ई को टोका और काम करने से रोका। बढ़ई चला गया और थोड़ी देर बाद डाक्टर को अपने साथ ले आया। डाक्टर मुझ पर भड़क गए और कहा- 'आपने बढ़ई को काम करने से क्यों रोका ?'
'बहुत तेज आवाज़ के कारण मरीज को तकलीफ हो रही थी, इसलिए।' मैंने जवाब दिया।
'आपको मालूम है कि बढ़ई मिलना कितना कठिन है, बड़ी मुश्किल से यह आया है तो आपने इसे भगा दिया।'
'मरीज की तकलीफ भी तो देखिए, डाक्टर साहब!'
'मरीज तो अभी ठीक है, क्या हुआ है, आप हमारे काम में रोक-टोक मत करें, मरीज को कुछ होगा तो हम देखेंगे।' डाक्टर ने मुझे धमकाया। मुझे उन पर इतना गुस्सा आया कि मैं क्या बताऊँ लेकिन गुस्से को पी गया क्योंकि वह शहर की इकलौता अस्पताल था जहां अम्माजी का उपचार हो सकता था। बढ़ई का काम फिर शुरू हो गया। मुझे लग रहा था, जैसे बढ़ई नहीं, डाक्टर खुद मेरे सीने में खील ठोक रहा हो॰  क्या करोगे, जिसने भी भारतवर्ष में जन्म लिया है, सबको इसी तरह की परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है और सब की भलाई इसी में रहती है कि वह चुप रहे !
         खैर, किसी प्रकार बढ़ई जी का काम पूरा हुआ और वे चले गए। उस रात, छोटे भाई राजकुमार अम्माजी के पास सोए। अगली सुबह लगभग आठ बजे जब मैं कमरे में पहुंचा तो अम्माजी और राजकुमार दोनों गहरी निद्रा में लीन थे। मैंने अम्माजी को जगाने के लिए आवाज़ दी लेकिन वे नहीं जागी, उन्हें हिलाया लेकिन वे नहीं हिली तो मैंने नर्स को बुलाया। नर्स ने उनकी नब्ज चेक की, नब्ज गायब, धड़कन सुनी तो उसे कुछ समझ में न आया तो फटाफट ब्लड-प्रेशर नापा और घबरा कर बोली- 'सब कुछ गड़बड़ है, डाक्टर साहब ही कुछ बताएंगे लेकिन उनको आने में अभी एक घंटे की देर है वे नौ बजे के बाद अस्पताल आते हैं।' मुझे ऐसा लगा कि अम्माजी शांत हो चुकी हैं फिर भी मैंने राजकुमार से कहा- 'डाक्टर के क्वार्टर में जाओ और उन्हें तुरंत लेकर आओ।' राजकुमार डाक्टर को लेने चले गए और मैं अम्माजी के निश्चेष्ट पड़े शरीर को एकटक देखता खड़ा रहा। अचानक मुझे उनके एक घुटने में हल्की सी हरकत दिखी, उसी समय डाक्टर आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'इन्हें 'हाइपो-ग्लायसीमिया' हो गया, नब्ज और धड़कन नहीं के बराबर है, सांस भी नहीं चल रही है। जब मैंने डाक्टर को घुटने में हरकत होने की बात बताई तो वे बोले- 'कोशिश करता हूँ।' उन्होंने नर्स को एक गिलास पानी में शक्कर घोलकर तुरंत लाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में नर्स दौड़ती हुई पानी लेकर आई। डाक्टर ने पानी पिलाने की कोशिश की लेकिन अम्माजी के दाँत एक दूसरे से इस तरह भिंचे हुए थे कि पानी को मुंह में डालना संभव न था। डाक्टर ने ज़ोर लगाकर किसी प्रकार जबड़े को इतना खोला कि पानी जाने की जगह बन गई। कुछ पानी अंदर चला गया, कुछ बाहर बह गया। हम लोग सांस रोके वह सब देखते रहे। दो मिनट बाद नब्ज, सांस और धड़कन वापस आने लगी, दस मिनट बाद उनके शरीर में हरकत होने लगी, उन्होंने आँखें खोल दी। चमत्कार हो गया। कल दोपहर को वह डाक्टर मुझे दैत्य लग रहा था, आज वह देवता-तुल्य लगने लगा।
          इस प्रकार दद्दाजी की अम्माजी को अपने सामने विदा करने की इच्छा फलीभूत न हो पाई और इस घटना के चार वर्ष बाद दद्दाजी स्वयं विदा हो गए और अम्माजी को अकेला छोड़ गए। दद्दाजी के महाप्रयाण के बाद अम्माजी चार वर्ष और जीवित रही, 80+ की आयु, हाई-ब्लड प्रेशर, हाई-डायबिटीज़, संक्रमित किडनी, बेतरह कमर का दर्द, बेकार दोनों घुटने, कमजोर आँखें और हर तरह से निर्बल शरीर ओढ़े अम्माजी ने जिस तरह अपना वैधव्य बिताया, मैं आपको क्या बताऊँ ! नौ बच्चों की माँ पेड़ से गिरे सूखे पत्ते की तरह इधर से उधर भटकती रही, उपेक्षित जीवन जीती रही, न जाने क्यों जीती रही ? मुझे इस बात का अक्सर अफसोस होता था कि अम्माजी 1996 की उस सुबह क्यों पुनर्जीवित हो गई ?

                    इस बीच कुन्तल की पढ़ाई पूरी हो गई, त्रिची से वापस लौटना था. कुन्तल ने मुझे सूचित किया वे मुझे कोयम्बत्तुर में मिलेंगे, वहां एक दिन रूककर त्रिची जाएंगे फिर सब सामान लेकर वापस बिलासपुर. निश्चित तिथि पर मैं कोयम्बत्तुर पहुँच गया. वहां से हम लोग कोई ३५ किलोमीटर दूर वेलियंगिरी पर्वत श्रंखला की तलहटी पर बसे एक आश्रम में पहुंचे. अत्यंत मनोरम वातावरण, 'ध्यान लिंग' का भव्य मंदिर, शांत माहौल वाली यह जगह मनमोहक लगी। वहाँ से हम दोनों सड़क परिवहन से त्रिची के लिए रवाना हुए। बस में कुंतल ने मुझसे कहा- 'पापा, मैं नौकरी नहीं करूंगा।'
'अरे, फिर क्या, व्यापार करोगे ?' मैंने पूछा।
'नहीं।'
'तो ?'
'मैंने कुछ और सोचा है।'
'क्या ?'
'पापा, इस दौरान मैंने देखा कि हमारे आसपास के लोग बहुत दुखी हैं, कष्टों से जूझ रहे हैं, अपने जीवन को सही ढंग से नहीं जी पा रहे हैं।'
'यह सच है, मैं भी ऐसा ही देख रहा हूँ।'
'मैं इस दिशा में कुछ करना चाहता हूँ।'
'क्या करना चाहते हो ?'
'मुझे एक गुरु मिल गए हैं, सद्गुरु जग्गी वासुदेव। मैं उनके साथ काम करना चाहता हूँ।'
'क्या काम ?'
'लोगों को योग-साधना से जोड़ने का।  मैंने स्वयं गौर किया, कई ढंग से समझने की कोशिश की तब इस निर्णय पर पहुंचा कि केवल अपने लिए जीने का कोई अर्थ नहीं, मुझे कष्टों से जूझ रहे लोगों के लिए जनजागरण करना चाहिए। योग को अपनाकर वे अपने मन और शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सद्गुरु अद्भुत व्यक्ति हैं, मैं उनके साथ इसी काम को करना चाहता हूँ।' कुंतल ने अपना निर्णय बताया। मैं चुप रह गया। ऐसा समझिए जैसे किसी अनजान सन्नाटे ने मुझे अपने आगोश में समेट लिया हो। हमारी बस तेजी से आगे बढ़ रही थी, मैंने बाहर की ओर देखा, हरे-भरे खेतों की फस्लें पीछे की ओर भागती जा रही थी, सड़क के किनारे लगे ताड़ और नारियल के वृक्ष भी जैसे उल्टे पैर दौड़ रहे थे।
          हवा के झोकें आ रहे थे और मैं बस में बैठ-बैठे न जाने कब सो गया। मैंने अनुभव किया है कि जब मेरा दिमाग सुन्न होने लगता है तो नींद मेरी मदद के लिए उपस्थित हो जाती है। त्रिची पहुंचने के बाद हम एक हॉटल में पहुँचे। मेरी दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि कुंतल के इस निर्णय को किन शब्दों में उनकी माँ को बताऊँ ? कैसे संगीता और संज्ञा को बताऊँ ? उस बात को अकेले सह लेने की ताकत मुझमें न थी इसलिए मैंने संगीता को ही बताना तय किया। उन दिनों संगीता इंदौर में रहती थी, मैंने फोन पर जब सब जानकारी दी, वह भी आश्चर्यचकित रह गई। संगीता ने कहा- 'आने दो कम्मू को वापस, फिर बात करेंगे।'
          हॉस्टल पहुँच कर सारा सामान पैक किया और कुंतल के विभागाध्यक्ष से मिलने के लिए मैं कुंतल के साथ 'इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेन्ट' पहुँचा। विभाग-प्रमुख मुझसे बेहद गर्मजोशी से मिले और कहा- 'मिस्टर अग्रवाल, यू शेल बी प्राउड ऑफ योर सन, ही इज़ अ मेग्नीफिसेंट एंड डीसेंट ब्वाय।' मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और त्रिची शहर को प्रणाम करके बिलासपुर अपने घर के लिए रवाना हो गए।
          डेढ़ दिन का त्रिची से बिलासपुर तक का रेल-सफर एकदम चुप रहा। कभी कुंतल मुझे हौले से देखकर मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता, कभी मैं उसे देखकर कुछ समझने की। ढेर सारी पुरानी यादें दिमाग में घुमड़ने लगी, बचपन का मोटा-ताज़ा कम्मू, बालों में दो चोटी वाला कम्मू, सर्कस में शेर की दहाड़ सुनकर 'पापा, सू-सू लगी है'- कहने वाला कम्मू, सबका प्यारा-दुलारा कम्मू आज कितना बड़ा हो गया ! इतना बड़ा हो गया कि उसे समझना तक मुश्किल हो गया।

                    कुंतल घर आए, कुल उन्नीस दिन हमारे साथ रहे। सबसे खुलकर बातें की, सबकी बातें धैर्य से सुनी। कठोर और कड़वी बातों को भी सहज भाव से लिया। अत्यंत धीमे स्वर में अपनी बात बताने और समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन उनकी बात किसी को समझ में नहीं आ रही थी। असल में, उनकी बातों के सूत्र कठिन थे, प्रचलित परिपाटी से भिन्न थे इसलिए सहज स्वीकार नहीं हो पा रहे थे। मुझे ऐसा भी लगा कि हम सबके कुछ प्रश्नों के उत्तर जब उन्हें नहीं सूझते थे तो गले से थूक निगल कर चुप हो जाते और मौन साध लेते थे। यह बताना कठिन है कि हम उन्हें नहीं समझा पा रहे थे या हम उन्हें समझ नहीं रहे थे, फिर भी हम सब आश्वस्त थे कि देर-सबेर वे हमारी भावना को अवश्य समझेंगे और अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगे। हमारी चर्चा के अनेक दौर चले, उनकी माँ ने रात-रात भर जागकर उनसे बात की, उनको समझाने की कोशिश की लेकिन कुंतल निरंतर प्रबल होते गए और उनके उत्साह के सामने हम लोग कमजोर पड़ते गए।
          अब, माधुरी और मैं अपना मन बनाने में लगे थे लेकिन सांसारिक मनुष्य या तो अतीत में जीता है या भविष्य की योजनाओं में, वर्तमान तो उसकी परिधि से बाहर रहता है इसलिए अनेक विचार-कुविचार दिमाग में आते- जैसे, क्या हो गया है इस लड़के को ? इसे सम्मोहित कर लिया गया है क्या ? इसका दिमाग बहक गया है क्या ? इसकी तबियत ठीक नहीं है क्या ? इसे त्रिची पढ़ने के लिए भेजना क्या हमारा गलत निर्णय था ? यह कोयम्बत्तूर के आश्रम में क्यों गया और वहां कैसे अरझ गया ? इसके गुरु का नाम हमने आज तक नहीं सुना, यह कहीं गलत-सलत बाबा जी के चक्कर में तो नहीं पड़ गया ? इसका भविष्य क्या होगा ? क्या इसको परिवार की जिम्मेदारियां समझ में नहीं आती ?- इस प्रकार के अनंत अनुत्तरित प्रश्न उमड़ते थे। सच बताऊँ, हम लोगों की बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया था।  
          उसी समय कुंतल अपनी बड़ी बहन संगीता से मिलने इंदौर गए, साथ में संज्ञा भी गई। संगीता, संज्ञा और हमारे दामाद केदार जी के साथ उनकी सुदीर्घ वार्ता हुई। संगीता ने मुझे फोन किया और बताया- 'कुंतल निर्णय कर चुका है, उसे कुछ समझाना असंभव है, मेरे ख्याल से उसे रोकना उचित नहीं होगा, जाने दीजिए।' संगीता के निष्कर्ष से मुझे एक बोध-कथा का स्मरण हो आया- भगवान महावीर एक राजपुत्र थे। किशोरावस्था में भी वे सामान्यतया मौन रहा करते थे। राज्य की गतिविधियों और आमोद-प्रमोद में उनकी रुचि न थी। उनके इस व्यवहार से उनके माता-पिता चिन्तित रहा करते थे क्योंकि महावीर उनके वरिष्ठ पुत्र थे, आगे चलकर राज-काज का काम उन्हें ही सम्हालना था। अचानक पिता की मृत्यु हो गई तब माँ ने राज्य की बागडोर सम्हालने के लिए महावीर से कहा तो वे बोले- 'मेरी राज-काज में रुचि नहीं है, छोटे भाई को राजा बना दीजिए, मैं वन जाना चाहता हूँ, मुझे अनुमति दीजिए।' माँ ने महावीर के स्थान पर छोटे भाई का राजतिलक कर दिया लेकिन महावीर को वन-गमन की अनुमति नहीं दी। महावीर चुप रहे और माँ की बात मान गए लेकिन वे हर समय अपने कक्ष में सिमटे रहते और नितांत एकाकी जीवन बिताने लगे। कई वर्ष बीत गए, महावीर यथावत रहे। जब उनकी माँ ने देखा कि महावीर के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं है तो एक दिन उनसे कहा- 'पुत्र, हमें लगता है कि हमने तुम्हें यहाँ निरर्थक रोक रखा है, तुम वन प्रस्थान कर सकते हो।'
'माँ, मैं तो कब का जा चुका !' महावीर ने उत्तर दिया।
           कुंतल इंदौर से वापस आ गए। अब मेरे लिए केवल इतनी उत्सुकता शेष रह गई थी कि कुंतल के सन्यास-संकल्प में कितनी मज़बूती है ! शायद उनका भी मन तनिक डगमगाया भी इसलिए उन्होंने सद्गुरु को 'मेल' से संदेश भेजा, अपनी भावना बताई और मार्गदर्शन माँगा। उत्तर में सद्गुरु ने उन्हें आश्रम पहुँचने के लिए कहा और अपने पास बुला लिया। कुंतल ने सद्गुरु की बात मानी, हमारी नहीं। इस प्रकार कुंतल के द्वारा लिया गया निर्णय पुष्ट हो गया और उनका आश्रम में प्रविष्ट होना तय हो गया। हमारे पास उन्हें अनुमति देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहा। कुंतल ने हमसे कहा- 'इस राह में जाने वाले आम तौर से अपने परिवार को बिना बताए निकल जाते हैं, उनका पता भी नहीं लगता क्योंकि वे जानते हैं कि परिवार के लोग इसके लिए कभी सहमत नहीं होंगे लेकिन मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया। मुझे आप लोगों पर भरोसा है कि आप मेरी बात समझेंगे और इस राह पर आगे बढ्ने की सहर्ष अनुमति देंगे।' हम समझ गए कि उन्हें गुरु मिल गए, वैराग्य घट चुका, संसारिक मोह छूट गया।      
          ओशो ने पतंजलि योग सूत्र में कहा है - 'सद्गुरु एक 'केटलिटिक एजेंट' है; वह कुछ करता नहीं फिर भी उसके द्वारा बहुत कुछ होता है। वह कर्ता नहीं होता बल्कि एक मौजूदगी होता है जिसके आसपास चीजें घटित होती हैं। ....मात्र उसकी मौजूदगी- यदि तुम प्रवेश करने दो उसकी मौजूदगी को। यह शिष्य पर निर्भर करता है और शिष्य होने का अर्थ यही है कि तुम प्रवेश करने देते हो, कि तुम सहयोग करते हो, कि तुम ग्रहणशील होते हो, कि अब तुम कोई बाधा खड़ी नहीं करते मौजूदगी को प्रवेश करने में। गुरु स्वयं कुछ नहीं करता है, उसकी मौजूदगी ही काम करती है- कुछ होने लगता है।....गुरु और कुछ नहीं है सिवाय एक गर्भ के; उसके द्वारा तुम दोबारा जन्म लेते हो।'
          १९ जून २००४ की शाम हमने उन्हें आदर के साथ आसन पर बिठाया, उनका तिलक किया, नारियल और पुष्प भेंट किए और उन्हें जाने की अनुमति देते हुए उन्हें छोड़ने रेलवे स्टेशन गए, उन्हें विदा किया और जाते-जाते कहा- 'हम दोनों इस बात पर विश्वास रखते हैं कि मनुष्य जिस काम को दिल से करता है, उसे ही अच्छे से करता है। तुम जो करना चाहते हो करो, अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ करना, जाओ बेटे, हम तुम्हारे साथ हैं। कभी भी हमारी ज़रूरत हो, हमें ज़रूर याद करना।'

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