Tuesday, May 19, 2015

आत्मकथा का समापन व्यक्तव्य

इस प्रकार इस आत्मकथा का लेखनकार्य पूर्ण हुआ। सन 2005 में मैंने जब डा॰ हरिवंश राय बच्चन की कथा पढ़ी, तब मुझे इसे लिखने की प्रेरणा मिली। 2006 में इसे मैंने इसे कागज पर उतारना आरंभ कर दिया। छः वर्षों के अंतराल में बचपन से लेकर 12 वर्ष की आयु तक के ही विवरण लिखे जा सके। इस बीच कैंसर ने मुझ पर दो बार और आक्रमण किया। मुझे लगा कि यह उपक्रम भी मेरे अतीत के अनेक प्रयासों की तरह अधूरा रह जाएगा।

इसके बाद सन 2012 में जब मैं कंप्यूटर के करीब आया, उसका अ ब स सीखा, मेरी बेटी संज्ञा ने 'ब्लॉग' बनाया, मेरा 'फेसबुक' एकाउंट खोला। मुझे अच्छी तरह याद है, मैंने संज्ञा से पूछा था- 'ये 'फेसबुक' क्या होता है ?'

सच कहूँ तो Google के Blogger और Facebook के मित्रों ने इस आत्मकथा को पूरा करवा दिया अन्यथा इसकी भी भ्रूणहत्या तय थी। Thanks to Google & Facebook to make this project done.

मेरे मित्रों के सहयोग से इसके दो हिस्सों ने पुस्तक का रूप ले लिया- "कहाँ शुरू कहाँ खत्म" और "पल पल ये पल" और तीसरा "दुनिया रंग बिरंगी" भी शीघ्र प्रकाशित हो जाएगा। Facebook में आज मेरे 4000 मित्र हैं जो केवल मित्र नहीं, मेरे मार्गदर्शक हैं, प्रेरक हैं। यह सही है कि शुरुआती कथा मैंने लिखी थी लेकिन Blogger और Facebook से जुडने के बाद की कथा मैंने नहीं लिखी, मेरे मित्रों ने मुझसे 'लिखवाई' है। मैं आप सबके प्रति अत्यंत कृतज्ञ हूँ कि आपने एक हलवाई को कथाकार बना दिया।

इसे लिखने का उद्देश्य अपने दुखों को बताना या उपलब्धियों को जताना या किस्से-कहानी सुनाकर मनोरंजन करना नहीं है बल्कि अपने जन्म से अब तक की सामाजिक स्थितियों का दस्तावेजीकरण है ताकि ये भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रहे। वे इन घटनाओं के माध्यम से बीसवी शताब्दी के इंसान की ज़द्दोज़हद को समझ सकें, इसे पढ़ें और आश्चर्य करें- 'अरे, क्या ऐसा भी होता था ?'

जीवन तो घटनाओं से परिपूर्ण था, सब कुछ बताना संभव न था इसलिए घटनाओं को 'फिल्टर' किया गया। मेरे जीवनकाल में वे रोचक घटनाएं भी थी इस आत्मकथा को चर्चित और लोकप्रिय बना सकती थी, उन संस्मरणों को मैंने निजता के दायरे में रखना उचित समझा, उन्हें लिखने का मोह त्यागा और शालीनता की दायरे में जो लिखा जा सकता था, उसे आपको बताया।

इस वृतांत को पढ़कर आपको घटनाओं से जुड़ाव महसूस हुआ होगा, इसमें वर्णित कई पात्रों से पुरानी पहचान सी निकली होगी, मन के उल्लास और अवसाद के भावों का स्पर्श भी हुआ होगा। दरअसल यह कथा 'मैं' की नहीं 'हम' की है। आम तौर पर मनुष्य इसकी-उसकी सबकी चर्चा कर लेता है लेकिन अपने घर की बातें बाहर ज़ाहिर नहीं कर पाता। रिश्तों की जंजीरें भी सपाट बयानी की राह में बाधक रहती हैं। पारिवारिक घटनाओं को लिखते समय बहुत कुछ सोचना और समझना पड़ता है, एकतरफा प्रलाप से बचना होता है और संभल कर इशारों में संकेत देने पड़ते हैं अन्यथा वर्तमान सम्बन्धों में कड़ुवाहट विकसित होने का खतरा रहता है। फिर भी, मैंने यह खतरा उठाया, सिर्फ इसलिए कि मेरी कहानी किसी और की ज़िंदगी को सँवारने के काम आए।

यह प्रयास मैं तब सफल समझूँगा जब आपका दिल भी आत्मकथा लिखने के लिए मचल उठे। आप अवश्य लिखिए, जी को बहुत ठंडक मिलती है।

मेरे जीवन में मैंने अपने हिस्से का अभिनय किया, जैसा बन सका, किया, अब भी बचा-खुचा काम सम्पूर्ण शक्ति से पूरा करना चाहता हूँ, बस, मेरी सांसें साथ देती रहें और आपका प्यार बना रहे। आपको प्रणाम।
   
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Monday, May 11, 2015

ये जिन्दगी के मेले

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          जीवनयापन का उपाय तलाशना और सार्थक जीवन जीना अलग-अलग बातें हैं। कबीर जैसे महात्मा दोनों को एक साथ साध लेते थे लेकिन अब की दुनिया में किसी एक को साधना भी चुनौतीपूर्ण है। अधिकतर लोग जीवनयापन को ही अपने सीने से चिपकाए संसार से विदा हो जाते हैं। इस समस्या के मूल में हमारी परिवार व्यवस्था है। जीवन के आरंभ से ही बच्चे में परिवार से इस तरह का मनोवैज्ञानिक जुड़ाव विकसित किया जाता है कि मनुष्य इकाई न होकर दहाई हो जाता है। कोई भी निर्णय लेने के पूर्व उसे अपने परिवारजनों की स्वीकृति-अस्वीकृति का ध्यान रखने के लिए 'प्रोग्राम' कर दिया जाता है, उसके निर्णय लेने की वैचारिक स्वतन्त्रता बड़ी चतुराई से छीन ली जाती है। समस्त भारतीय उपमहाद्वीप में विवाह करने जैसा व्यक्तिगत निर्णय सामूहिक सहमति का मोहताज़ है ! रोजगार भी परिवार तय करता है, जैसे, कृषक अपने बच्चों को खेत-खलिहान से जोड़ेगा तो व्यापारी अपने व्यापार से; नौकरीपेशा अपनी संतान को अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई में लगाएगा तो राजनीतिज्ञ अपनी विरासत से। इधर-उधर भागने का कोई भी प्रयास मनोवैज्ञानिक भावुकता के ज़ोर से ध्वस्त कर दिया जाता है ताकि संतान के आर्थिक भविष्य की सुरक्षा की आड़ में अभिभावकों के बुढ़ापे की व्यवस्था अक्षुण्ण बनी रहे।
          अधिकतर युवाओं को अपना लक्ष्य समझ में नहीं आता इसलिए तय नहीं हो पाता। यदि माता-पिता समृद्ध हैं तो संतान उनकी समृद्धि का भरपूर उपभोग करती है, मज़े करती है। इस समृद्धि के चक्रवात में वे लक्ष्यविहीन हो जाते हैं, आलसी हो जाते हैं; लड़के बेलगाम और लड़कियां लापरवाह हो जाती हैं। उन्हें अपना वर्तमान सुविधाजनक और भविष्य सुरक्षित नज़र आता है इसलिए वे बेफिक्र रहते हैं। आप गौर करिएगा, बहुत से सम्पन्न व्यापारियों, अधिकारियों और नेताओं के बच्चे इन्हीं वजहों से निकम्मे निकल जाते है जबकि वे सब अनेक संभावनाओं को साथ इस संसार में आए थे। वहीं पर अभाव के माहौल से निकलकर संघर्ष करने वाले युवा अपने जीवन में ऊंचाइयों के सोपान तय करते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आए हैं कि जिन लड़कों के सिर पर उनके पिता की छाया नहीं थी, उन्होंने कम उम्र में ही अपनी ज़िम्मेदारी समझ ली और विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए उल्लेखनीय तरक्की की। इसी प्रकार जिन लड़कियों को माँ का साथ नहीं मिला वे गृहस्थी के संचालन में निपुण बनी। बड़ी अज़ीब दुनिया है ये, माँ-बाप बच्चे की तरक्की में साधक सिद्ध हो सकते है तो बाधक भी !
          यदि भरपूर धन कमाना है तो धन में ध्यानस्थ होना पड़ेगा, कमाई के अलावा कुछ और नहीं सूझना चाहिए। इश्क़ में आशिक़ की दीवानगी की तरह, सोते-जागते एक ही धुन, पैसा कमाने की। जिन्होंने अकूत दौलत कमाई है, उनकी लाटरी नहीं निकली, उन्होंने सही दिशा में प्रयत्न किए, दूरदृष्टि का उपयोग किया, अनथक परिश्रम किया, परम स्वार्थी बने और फ़िजूलखर्ची से बचकर रहे। यही 'फंडा' जीवनयापन के समस्त क्षेत्रों में लागू होता है। जितना परिश्रम, उतना पुरस्कार।
          स्टीफ़न आर॰ कवी ने 'सेवेन हेबिट्स ऑफ इफेक्टिव पीपल' में लिखा है- 'गलत दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने से सफलता हाथ नहीं आती, केवल उतरना-चढ़ना हाथ आता है। सफलता 'सही' दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने से मिलती है।' प्रश्न यह है कि इस 'सही' दीवार को कैसे खोजा जाए ?

              हमारे आसपास अनेक आकर्षण होते हैं, कुछ 'बन जाना' या 'हासिल कर लेना'- ये सब काल्पनिक हैं। हम सब सपने देखते हैं, कुछ विद्वान सपने देखने की सलाह भी देते हैं लेकिन सपनों का क्या ? नींद खुली और टूट गए ! अधिकतर लोगों के जीवन में उनका रोजगार संयोग से बनता है। मनुष्य जो बनना चाहता है, वैसा शायद ही किसी को हासिल होता है, शेष लोग 'जो हाथ आया, उसी के साथ हो लिया' की मजबूरी में अपनी जीवनयात्रा आरंभ करते हैं। कुछ दूरदर्शी और पराक्रमी इस मज़बूरी को भी अपनी सीढ़ी बनाते हैं और अपनी अपेक्षाओं को साकार करने की कोशिश करते हैं। क्रमिक रूप से लक्ष्य तक पहुँचने का यह उपाय फलप्रद सिद्ध हो सकता है बशर्ते धैर्य के साथ लगातार आगे बढ़ते रहे। एक बोधकथा याद आ रही है: तेरह वर्षीय एक बालक रोज सुबह के समय सड़क पर  दैनिक समाचारपत्र बेचता था। किसी जिज्ञासु ने उससे पूछा- 'इस तरह 'पेपर' बेचकर तुम कितना कमा लेते हो ?'
'कुछ नहीं।' बालक ने उत्तर दिया।
'अरे, कुछ नहीं ! जब तुम्हें इससे कोई फायदा नहीं होता तो तुम यह काम क्यों करते हो ?'
'फायदा है मुझे।'
'क्या ?'
'वो जो सामने 'बुक स्टाल' वाला है, वह मुझे प्रतिदिन पेपर की 20 'कापी' बेचने के लिए देता है, मैं उसे बेचता हूँ लेकिन वह मुझे कोई 'कमीशन' नहीं देता।'
'फिर ?'
'मुझे रोज पेपर बेचना है इसलिए सुबह जल्दी जागने लगा, देर से उठने की बुरी आदत सुधर गई और इस काम के ज़रिये मैं व्यापार करना सीख रहा हूँ। पेपर बेचने के कारण आसपास के लोगों से मेरी जान-पहचान हो गई है, वे मुझसे प्यार से बातें करने लग गए हैं। मैं जिसका पेपर बेचता हूँ, ईमानदारी से उसके पैसे उसे देता हूँ, इस तरह मेरी 'गुडविल' बन रही है।'
'अरे वाह !'
'एक बात और, मुझे चिल्ला-चिल्लाकर पेपर बेचने में बहुत मज़ा आता है।' उस बालक ने खुश होकर बताया।
          जिस प्रकार फल प्राप्त करने के लिए वृक्ष की जड़ों में समय पर खाद और पानी देना जरूरी है, उसी प्रकार सतर्क देखरेख से एक छोटी सी शुरुआत धीरे-धीरे पुष्पित-पल्लवित होती है और समय आने पर बड़ा आकार ले लेती है। सर्वोच्च प्राथमिकता अपनी रुचि को देना चाहिए या फिर जिस भी काम से जुड़ें उसमें रुचि विकसित कर ली जाए। भावुकता और पारिवारिक दबाव से मुक्त होकर व्यावहारिक सोच के आधार पर कार्य का चयन करना फलप्रद होता है। इसके लिए अपनी कार्यक्षमता का स्वयं-मूल्यांकन करना, अपनी खूबियों और सीमाओं को ईमानदारी से समझना बहुत जरूरी है। जागरूकता के साथ किए गए प्रयत्न फल अवश्य देते हैं।
          घर के बाहर एक नीम का पौधा रोपिए, उसे नियमित पानी दीजिए, कुछ बड़ा होने दीजिए, उसके बाद न जाने कहाँ से उसकी डाल को तोड़ने वाले लोग प्रगट हो जाएंगे ! किसी को नीम की मुखारी चाहिए तो किसी को नीम की पत्तियाँ। उस अर्धविकसित पौधे की उस समय देखभाल नहीं की गई तो वह पौधा पनप नहीं पाएगा, अपना विस्तार नहीं कर सकेगा और असमय काल-कलवित हो जाएगा। छोटे पौधे को उसके बड़े होने तक सुरक्षित रखने के उपाय करने आवश्यक हैं, यही बात आर्थिक विकास के लिए भी लागू होती है। कम पूंजी के बढ्ने की गति बहुत धीमी होती है इसलिए उसे बचाए रखने के लिए अपने खर्च पर निर्मम नियंत्रण रखना जरूरी है। इस प्रकार बचाया गया धन, कमाया हुआ धन बन जाता है।          
                        
            अतीत में झाँकने पर यह निष्कर्ष निकला कि मेरा अधिकांश समय किसी नाविक की तरह नाव पर बैठे यात्रियों को पार ले जाने में निकल गया। जब यात्रीगण अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं, वे नाविक को भूल जाते हैं और नाविक अकेला रह जाता है, अपने घर वापस जाने के लिए। यात्रियों से भरी हुई नाव में पतवार खेना आसान है लेकिन अकेले की नाव को किनारे लगाना बेहद कठिन।  
          हम परिवार की छत्रछाया में पले-बढ़े, इसलिए परिवार के प्रति हमारा भी दायित्व बनता है कि हम उनके लिए कुछ करें। यह अपने परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सोच है जो सबके हृदय में बसती है। इसी भाव में परिवार का सामर्थ्य होता है और उसकी उपादेयता भी। संयुक्त परिवार की भावना में जितना लेने का भाव है, उतना ही देने का भी। यह 'सिनर्जी' का श्रेष्ठ उदाहरण है जिसमें सब एक दूसरे को पोषित करते हैं।एक-दूसरे के पोषण से परिवार सँवरते हैं, विकसित होते हैं।
          एक गाँव के लोग मंदिर का निर्माण करना चाहते थे, वे चाहते थे कि किसी पवित्र स्थल पर इसे बनाया जाए। उसी गाँव में एक परिवार था जिसमें दो भाई थे। बड़ा भाई विवाहित था, उसके दो पुत्र और एक पुत्री थी। छोटे भाई ने विवाह नहीं किया। दोनों भाइयों के पास पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त खेत थे जिन पर वे अपने-अपने हिस्से में कृषि करते थे, दोनों के पास अनाज सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग भंडार कक्ष थे किन्तु उनकी रिहाइश और रसोई एक साथ थी। 
          एक दिन बड़े भाई के दिमाग में एक बात आई- 'मेरे दोनों लड़के बड़े हो गए हैं, खेती करने में मेरा साथ देते हैं, इस कारण मेरे खेतों में अच्छी पैदावार होती है जबकि छोटा भाई एकदम अकेला है, इस कारण उसे कम उपज मिलती है। 'कुछ करना चाहिए'- सोचकर वह आधी रात के बाद जागा, झाँककर देखा कि छोटा भाई गहरी नींद सो रहा है, उसने गोदाम से अनाज की कुछ बोरियाँ अपनी पीठ पर लादकर छोटे भाई के गोदाम में रख दी और चुपचाप वापस आकर सो गया।         
          छोटे भाई के दिल में एक दिन विचार आया- 'बड़े भाई के तीन बच्चे है, खर्च ज़्यादा है, ज़िम्मेदारी भी अधिक है। मैं अकेला हूँ, इतने सारा अनाज मेरे किस काम का ?' वह भी रात में उठा, उसने अपने गोदाम से अनाज की कुछ बोरियाँ उठाकर बड़े भाई के गोदाम में रख दी। 
          यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा। दोनों भाई अनजान थे। एक रात अनाज 'शिफ्टिंग' करते समय दोनों भाई आमने-सामने पड़ गए। एक-दूसरे को देखा और दोनों ने शर्म से नज़रें झुका ली। 
          गाँव वालों को मंदिर के लिए वही स्थान सर्वाधिक पवित्र लगा जिस जगह पर दोनों भाई शर्मिंदा हुए थे। मंदिर वहीं बनाया गया।

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          परिवार में समय के साथ-साथ, साथ बदलते रहते हैं, जैसे बचपन में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन; युवावस्था में पति-पत्नी, बच्चे; प्रौढ़ावस्था में वयस्क बच्चे और वृद्ध माता-पिता। हर अवस्था में हमारा 'रोल' बदलते रहता है और प्रत्येक रिश्ते में हमारा अभिनय व्यवहार की कसौटी पर परखा जाता है। पारिवारिक रिश्ते भावनाओं के सहारे पनपते हैं, भावनाएँ ही सम्बन्धों की उर्वरक हैं। 
          परिवार के भरण-पोषण के लिए धनार्जन आवश्यक है, यह धन उदर को भोजन देता है और मस्तिष्क को उत्पात। धन के प्रभाव में भावनाएँ अस्त होती जाती हैं और व्यक्तिगत व्यवहारिकता का उदय होने लगता है। समग्र परिवार के पोषण का भाव व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता है और संयुक्त परिवार की अवधारणा ध्वस्त हो जाती है। इस चक्रव्यूह में वे अभिमन्यु फंस जाते है जो परिवार के प्रति भावुक होते है, अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। यहाँ, सतर्क होने की ज़रूरत है क्योंकि यदि जिम्मेदार व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी का प्रतिफलन चाहता है तो उसे निराशा हाथ लगेगी, दुनिया बेहद चतुर है। 

          एक निष्कर्ष- 'पहले अपनी मदद करो, दूसरों की मदद तब करना जब उस लायक हो जाओ।'  

          जीवन की सफल यात्रा के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने होंगे। इसके बाद समय-समय पर उस समय की तात्कालीन स्थिति का मूल्यांकन करते हुए रणनीति में आवश्यक परिवर्तन करके छोटी-मोटी असफलताओं को सफलता की सीढ़ी मान कर बिना रुके आगे बढ़ना होगा, तब बात बनेगी। सही दीवार का रहस्य इन्हीं आरंभिक असफलताओं में छुपा रहता है। एक नाव पूर्व की ओर जाती है तो दूसरी पश्चिम की ओर जबकि हवा एक जैसी चलती हैं। किधर जाना है- यह हवा की दिशा पर निर्भर नहीं होता बल्कि पतवार चलाने वाला तय करता है।
          हमारे परिवारों में संस्कार देने के नाम पर बच्चों को वह सिखाया जाता है जो पुरातन हो चला जबकि दुनिया हर पल बदल रही है। मनुष्य बचपन में जो सीखता है वह उसके मस्तिष्क में गहरी जड़ें जमा लेता है इस कारण नई दुनिया की गति से उसका तालमेल नहीं बैठता और वह स्वयं को उस दौड़ में असमर्थ महसूस करता है। बक्मिंस्टर फुलर का मानना है- 'सभी बच्चे प्रतिभाशाली पैदा होते हैं लेकिन 10000 में से 9999 बच्चों को वयस्क लोग अनजाने में तेजी से प्रतिभाविहीन बना देते हैं।' 
           स्थापित मान्यताएँ और आस्थाएँ ध्वस्त हो रही हैं। पुरानी पीढ़ी के पास एक अदद भगवान था जो समस्त गतिविधियों का संचालक था, जिम्मेदार था लेकिन नई पौध ने इस अवधारणा से दूरी बना ली है, वे अपने व्यक्तिगत ज़िन्दगी में भगवान का दखल या उसकी मदद बहुत पसंद नहीं करते, उन्हें अपनी बुद्धि और शक्ति पर विश्वास है। यह एक अर्थपूर्ण संकेत है। 
           रिश्तों के अब अपने मायने बदल रहे हैं, उनकी उष्णता धीमी हो चली है क्योंकि समय सबको कुछ-न-कुछ सिखाते चलता है और सामान्य मनुष्य के व्यवहार पर अपनी अदृश्य पैठ बनाते रहता है। सामाजिक मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। हमारे आसपास जो कुछ होता है उस क्रिया की प्रतिक्रिया कुछ ही समय में उभरकर सामने आने लगती है। मूल्यों के परिवर्तन की धार इतनी तेज है कि स्त्रियाँ पुरुषोचित व्यवहार कर रही हैं तो पुरुषों में विपरीत व्यवहार परिलक्षित हो रहा है, वहीं पर बच्चे बड़ों जैसा तो बड़े बच्चों जैसा व्यवहार कर रहे हैं।
          दुनिया के अधिकतर लोग अपने जीवन भर आजीविका की तलाश में ही लगे रहते हैं लेकिन कुछ लोग जीवन में जीवन की तलाश करते हैं। इन दोनों परिस्थितियों में वही अंतर है जो 'स्वीमिंग पूल' या समुद्र में तैरने का है। जीवन में जीवन तलाशने वाले मुझे बेहद अचंभित करते हैं क्योंकि वे विलक्षण निर्णय लेने वाले होते हैं और आजीविका तलाशने वाले मुझे इसलिए व्यथित करते हैं क्योंकि उनका जो पेट है कि वह भरता ही नहीं !
           इस दुनिया में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मनुष्य जिस तरह जीना चाहता है वैसा लोग लोग उसे जीने नहीं देते इसलिए वह भी दूसरों से अपना बदला भुनाता है, वह भी दूसरों को उनकी मर्जी से जीने में पचास अड़ंगे लगाता है। यह खेल न जाने कब से जारी है ! दुख-सुख, सफलता-असफलता, मिलन-विछोह सब क्षणिक है लेकिन जब ये जीवन में घटते हैं तो इनकी तीव्रता इतनी अधिक होती है कि मनुष्य का मानसिक संतुलन डगमगा जाता है। जिसने उस पल संतुलन साध लिया, जो हर परिस्थिति में सम रहा, समझ लीजिए उसने जिन्दगी की बाज़ी जीत ली।  
          जीवन है तो उसके अपने रंग हैं। सारे रंग मिलकर एक ऐसा रंग विकसित करते हैं कि रंग नहीं रह जाता, पानी के रंग जैसा बेरंग। इसीलिए तो कहते हैं- यह दुनिया रंग-बिरंगी है। 

                                                     ( समाप्त )             

Thursday, April 23, 2015

सब कुछ सीखा हमने

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          'मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के...' इस चेतावनी के बाद भी मैंने अपने अतीत को मुड़ कर देखा। बहुत मज़ा आया जैसे कोई पुरानी फिल्म लंबे अर्से के बाद देखने को मिली हो। पीछे मुड़कर देखने में कोई खतरा न था लेकिन उसे लिपिबद्ध करके सार्वजनिक करने में कई खतरे थे। मैंने इस खतरे को उठाने का खतरा लिया लेकिन यह प्रयास खतरनाक नहीं, अतीत के व्यतीत को समझने में सहायक सिद्ध हुआ।
           उम्मीदों की जमीन पर परिवार बने है, रिश्ते-रिश्तेदारी है, दोस्ती-जानपहचान है, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारा, मस्जिद व अन्य प्रार्थना गृह निर्मित किए गए हैं। इन्हीं उम्मीदों को हासिल करने के लिए गुरु की खोज की जाती है, ईश्वर की कल्पना की गई और भगवत्ता की अवधारणा का आधार भी। ये उम्मीदें ही इन्सान की ज़िंदगी को थामने वाली डोर हैं। मनुष्य को सुख चाहिए, सुख को 'फील' करने दुख चाहिए जबकि हम सब जानते हैं कि दुख पाने की वज़ह उम्मीदें हैं और उम्मीदें तो रहती ही हैं, जबकि ये सब भ्रम है, जीने के बहाने हैं।

'निकले थे घर से हम तो खुशी की तलाश में
गम राह में खड़े थे वो ही साथ हो लिए
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए।'
          बचपन से अब तक की घटनाएँ जो हुई, वही तो होनी थी ! ज़्यादा कुछ तो जन्म से पहले तय हो जाता है, माँ का गर्भ, पिता, भाई-बहन और हमारा जन्मस्थान, क्या इन्हें बदलना हमारे हाथ में है ? अगर मैं चाहता हूँ कि मेरे पिता ऐसे होने चाहिए या माँ वैसी होनी चाहिए तो मेरे चाहने से क्या होगा ?
         हमारे आसपास के सभी लोग अपनी सोच और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार करते हैं, हमारी उम्मीदों के अनुरूप नहीं। सच पूछें तो हमारी मदद और हमारी रुकावट, दोनों आसपास के लोग ही हैं। यह हमारी दक्षता है कि हम उनकी मदद ले पाते हैं या रुकावट शिरोधार्य करते हैं। यहाँ पर हमारा स्वभाव सक्रिय भूमिका निभाता है, हमारा स्वभाव यदि 'अपना काम निकालने' वाला है तो येन-केन-प्रकारेण अपने लिए मदद हासिल कर लेंगे, उसके लिए खुशामद कर लेंगे, गाली खा लेंगे, चरणचुंबन कर लेंगे, मान-मनव्वल कर लेंगे या फिर धमका भी सकते हैं पर अपना काम करवा लेंगे। वहीं पर हमारा स्वभाव यदि संकोची है तो मदद लेना बहुत दूर की बात है, मदद के लिए किसी से कहने में भी लज्जा आती है। वह सोचता है- 'हमारे कष्ट को सामने वाला समझे तो अच्छी बात है अन्यथा जो है वह सही है।' इस प्रकार संकोची व्यक्ति अपने मान-अपमान के चक्कर में चुप रह जाता है, अपनी तकलीफ नहीं बताता परिणामस्वरूप उसके कष्ट स्वकेंद्रित हो जाते हैं और उन्हें वह अकेले भुगतता है।
          परिवार में संवाद की कमी से व्यवस्था बिगड़ती है। हमारे जमाने में एकांगी संवाद का प्रचलन था, अर्थात बोलता वही था जिसे बोलने का स्वाभाविक अधिकार था, मसलन, घर का मुखिया या जिसके हाथ में तिजोरी की चाबी है, या जो आक्रामक स्वभाव का है, शेष सब श्रोता थे। इस वज़ह से घर में तानाशाही का वातावरण होने के कारण चर्चा या विमर्श का अभाव था, केवल कथन और श्रवण होता था। जब तक बातचीत का अनुकूल वातावरण विकसित नहीं होता, कैसे एक-दूसरे की समस्या को समझा जाएगा और उनका समाधान खोजा जाएगा ?
          जिन परिवारों में बातचीत का लोकतान्त्रिक माहौल है, वहाँ सब लोग मिलजुल कर आगे बढ़ते हैं और एक दूसरे से सरोकार रखते हैं। किसी एक व्यक्ति का विकास सबका उत्तरदायित्व होता है और किसी व्यक्ति की समस्या पूरे परिवार का सरोकार। आधुनिक युग में परिवारों में बेहतर माहौल विकसित हो रहा है जिसमें खुलकर बात करने की सुविधा है और सब एक दूसरे का सुख-दुख समझते हैं जो परिवार के समग्र विकास के लिए परम आवश्यक है।

          हमारी जीवन शैली में श्रम को कष्ट का पर्याय क्यों माना जाता है, यह बात समझ के बाहर है। कोई किसानी कर रहा है या मजदूरी, नौकरी कर रहा है या व्यापार, इन जीवनयापन के कार्यों को कष्ट से जोड़ना अजीब है। 'किचन' में भोजन या नाश्ता बनाना, 'हाउस कीपिंग' करना, बाजार से राशन या साग-सब्ज़ी की खरीददारी करना जैसे जीवनोपयोगी कार्य भी परिश्रम की श्रेणी में आ गए हैं। पैदल चलना, योग-व्यायाम करना, जिम जाना भी कष्टसाध्य लगता है। दरअसल, जीवन के आरंभ से ही हमें 'आराम ही सुख है' की समझाइश मिली जिसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य काम न करने के रास्ते खोजने का विशेषज्ञ बन गया और शनैः शनैः आलसी और कामचोर बन गया। इसी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य अपनी क्षमता का समुचित प्रयोग नहीं कर पाता और 'काम न करने' का स्वभाव विकसित हो जाने के कारण उसकी प्रगति की राह स्वयं-अवरुद्ध हो जाती है। यद्यपि स्कूलों में युवाओं को सक्रिय करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन कालेज पहुँचते-पहुँचते शारीरिक सक्रियता कम होती जाती है और अधिकाँश युवा 'केरियर' बनाने के चक्कर में अपनी कुर्सी-टेबल में कैद हो जाते हैं फलस्वरूप शारीरिक श्रम करने का अभ्यास कम होते जाता है। इस आलस्य के मनोविज्ञान ने न केवल मनुष्य की असीमित व्यक्तिगत क्षमता का ह्रास किया वरन सम्पूर्ण समाज को भी गंभीर क्षति पहुंचाई है।
          समाज में अब दो वर्ग विकसित हो गए हैं, पहला वर्ग है गंदगी करने वाला, यह समर्थ वर्ग है जिसे गंदगी या कचरा फैलाने में कोई संकोच नहीं है। चूंकि उनकी जेब में पैसे हैं इसलिए वे इस धृष्टता को अपना अधिकार समझते हैं और उन्हें मालूम है कि कोई दूसरा व्यक्ति है जो सफाई करेगा। इस वर्ग के अच्छे-खासे, पढे-लिखे लोग गंदगी फैलाने के मामले में अनपढ़ों को भी मात दे देते हैं। अपने घर और दूकान का कचरा सड़क पर निःसंकोच फेकना, पान-गुटके की पीक इधर-उधर थूकना, रेल्वे प्लेटफार्म और रेल के डिब्बे में गंदगी फैलाना इस अदा से करते हैं जैसे उनका परम कर्तव्य हो। समाज में दूसरा वर्ग है, सफाई करने वाला जो वास्तव में सफाई करना नहीं चाहता, वह भी फैलाना ही चाहता है लेकिन इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है, गरीबी है, मज़बूरी है।  जापान में प्रचलित प्रबंधन शैली में 'हाउस-कीपिंग' की अवधारणा है जिसे '5 S' कहते हैं, उसका एक महत्वपूर्ण सूत्र है: 'कचरा करने वाला और उसे समेटने वाला व्यक्ति अलग-अलग नहीं, एक होना चाहिए।'
         मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन काल में सफाई के महत्व से जन सामान्य को जोड़ा और अपने प्रशंसकों को वैसा करने के लिए प्रेरित भी किया। गिरिराज किशोर के उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में गांधीजी के उस समय के भारत प्रवास का विवरण दिया है जब वे दक्षिण अफ्रीका से कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए कलकत्ता आए थे।

          ''मोहनदास को शौच जाना था। शौचालयों की संख्या ठहरे हुए डेलीगेट्स के अनुपात में बहुत कम थी। मोहनदास सब शौचालयों के चक्कर काट आए, इतनी दुर्गंध थी कि लगा सिर फट जाएगा। वे लौट आए। एक स्वयंसेवक को बुलाकर पूछा- 'क्या सफाई का यहाँ कोई प्रबंध नहीं है ?'
'यह हमारा काम नहीं, भंगी का काम है।'
'क्या भंगी हम खुद नहीं हो सकते ?'
          स्वयंसेवक उनकी बात पर हंस दिया, तब तक एक-दो स्वयंसेवक और आ गए। मोहनदास ने उनसे पूछा- 'क्या एक झाड़ू और बाल्टी का इंतजाम हो सकता है ?'
          उन लोगों ने गांधी की ओर आश्चर्य से देखा। उनकी नाक ऐसे चढ़ गई जैसे दुर्गन्ध के ढेर के सामने खड़े हों। उनमें से एक बोला- 'क्यों ?'
'जब हम गंदगी फैलाते हैं तो सफ़ाई क्यों नहीं कर सकते ?'
          उनका आश्चर्य दूसरे भाव में बदल गया। उन्होंने ऐसे देखा, या तो यह सूटेड-बूटेड आदमी सिरफिरा है या कोई निम्न कोटि का है। मांगकर सूट-बूट पहनकर आया है। वे उनकी बात अनसुनी करके सरक गए।
          मोहनदास ने इधर-उधर घूम-फिरकर झाड़ू और बाल्टी का बड़ी मुश्किल से इंतजाम किया, मुंह पर ढाटा बांधा और एक शौचालय में घुस गए। उन्हें रह-रहकर उबकाई आ रही थी। मोहनदास ने बाल्टी भर-भरकर पानी लाना और पाखाने को बहाना शुरू किया। बदबू के मारे माथा फटा जा रहा था। जमीन पर पाखाना बुरी तरह लिहस गया था। वे उसे झाड़ू से रगड़-रगड़ कर छुड़ा रहे थे। स्वयंसेवक दूर से देख रहे थे और हंस रहे थे।
          मोहनदास ने बाहर निकलकर कहा- 'आप बेफिक्र रहें, यह शौचालय मैंने अपने लिए साफ किया है। हम लोग जबतक अपनी सेवा आप करना नहीं सीखेंगे, दूसरों की सेवा जितना बड़ा काम कैसे कर पाएंगे ? आज अपने लिए किया, कल दूसरों के लिए करूंगा।'
'दूसरे....?' उनमें से कोई कुछ कहना चाहता था, मोहनदास बीच में बोले- 'दूसरों की सेवा के लिए पहले अपनी तैयारी ज़रूरी है।'
          अगली सुबह मोहनदास उठे, तो दुर्गन्ध का भभका उन्हें घेरता महसूस हुआ। बरामदे तक मल की दुर्गन्ध आ रही थी। मोहनदास ने फिर से झाड़ू उठा ली और कुए से बाल्टी में पानी भरकर सफाई करने लगे। डेलीगेट्स भी चिंतित थे, वे आपस में बातें कर रहे थे- 'पता नहीं कैसे-कैसे लोग आ जाते हैं !'
'सुना है दक्षिण अफ्रीका से आए हैं।'
'दक्षिण अफ्रीका जाकर क्या लोग धर्म-कर्म, सुच-असुच तक भूल जाते हैं ?'
'क्या यह आदमी पिछ्ले जन्म में भी तो वही नहीं था ?'
'या, फिर अब होगा।'
'दरअसल, ऐसे लोग दूसरों पर दबाव बनाए रखने के लिए इस तरह के पतित काम करते हैं।''  

          यह घटना लगभग एक सौ वर्ष पुरानी है, इन सौ वर्षों में शिक्षा के प्रभाव ने हमें आधुनिक अवश्य बना दिया लेकिन हमारी सोच आज भी वैसी ही पुरातन है- 'हमारा काम गंदगी फैलाना है, सफाई करना दूसरे का काम है।' क्यों है न ?
          कारण ? कारण है, आलस्य और हमारी संवेदनहीनता।

          सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'जो काम करना जरूरी है, जो अवसर तुम्हारे सामने है- उसके लिए अभी सही समय है, कल नहीं।' इस बात को अगर जीवन की शुरुआत में समझ लिया जाए तो जीवन अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। घटनाओं को होते हुए चुपचाप देखने से कुछ हासिल नहीं होता। 'जेहि विधि राखे राम सोई विधि रहिए' की अवधारणा तसल्ली करने के लिए अच्छी है, भगवान पर भरोसा करना भी ठीक है लेकिन भगवान के भरोसे रहना बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं है।
          बचपन में मनुष्य को कुछ समझ में आता नहीं, माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को व्यतीत करना होता है, वे नाव को जिस दिशा में ले जाएं, जो कहें, वह सही। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देता है और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उसे आलसी स्वभाव का बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
          युवावस्था में दोस्त और उनकी दोस्ती अच्छी लगती है। उसी दौर में शरीर के 'हार्मोंस' विपरीतलिंगी आकर्षण उत्पन्न करना आरम्भ देते हैं। अधिकतर युवा सपनों की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं जो जीवन के यथार्थ से कोसों दूर होती है। उनकी रचनात्मक ऊर्जा कामोत्तेजना के आसपास भटकती रह जाती है, दिशाभ्रम हो जाता है, न लक्ष्य समझ में आता है और न सही राह। इसी चक्कर में अनेक संभावनाएं गड्डमड्ड राहों में खो गई और जीवन भर गृहस्थी का बोझ ढोने के लिए मजबूर हो गई।
          इस काल में जिसने परिश्रम कर लिया, वह सुविधापूर्ण जीवन की राह पर चल पड़ता है लेकिन जिसने आलस्य को अपनाया, समझ लीजिए वह जीवन भर कष्ट भुगतने के लिए अभिशप्त है। एक बोधकथा है:  दो आलसी युवा बेर के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। उनकी नज़र पेड़ में लगे बेर के फल पर गई। उनमें से एक बोला- 'आ बेर, नीचे गिर।' वह चाहता था कि बेर अपने-आप गिर जाए तो उसे पेड़ पर चढ़ कर तोड़ने की मेहनत न करना पड़े। जब दूसरे ने यह सुना तो उसने पहले को ज़ोर से डांटा और चुप रहने का निर्देश दिया, फिर उसने सुधार कर कहा- 'आ बेर, मेरे मुँह में गिर।'
          आलसी व्यक्ति का मनोविज्ञान अज़ब होता है, आलसी कहो तो उसे चोट नहीं लगती, बुरा लगता है ! ऐसे लोग रात हो या दिन, हर समय सपने देखते हैं और 'बातें बनाने' के विशेषज्ञ होते हैं। ये अपने जीवन में बबूल के पौधे रोपते रहते हैं और उसमें आम फलने की उम्मीद करते हैं।

          आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः। नास्ति उद्यम समो बंधु कृत्वा नावसीदति॥
          (मनुष्य के शरीर में आलस्य जैसा कोई शत्रु नहीं और न ही उद्यम के जैसा कोई बंधु। )

          किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।

          मैंने जब स्कूल और कालेज में पढ़ाई की तब शिक्षा का वह माहौल न था जैसा अब दिखाई पड़ता है, संभवतः ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी वैसा ही हो जैसा हमारे जमाने में था। कक्षा में सबसे सामने बैठे आठ-दस 'विद्यार्थियों' को ही पढ़ाई-लिखाई से मतलब होता था, बाकी युवा अपने-अपने विभिन्न कारणों से कक्षा में बैठे रहते थे। मैंने कुल 18 वर्ष पढ़ाई की लेकिन मुझे उस समय यह समझ में नहीं आता था कि हम क्यों पढ़ रहे हैं, ये सब हमारे क्या काम आएगा ? पढ़ने के नाम से उकताहट होती थी, नींद आती थी। परीक्षा के एक सप्ताह पहले 'आई॰एम॰पी॰' पता लगाते थे, दिन-रात रटते थे, परीक्षा देते थे, पास हो जाते थे। उस 'बेवज़ह' की वज़ह अब समझ आती है, आज लगता है, फिर से स्कूल और कालेज में जाकर बैठूँ, वह सब पढ़ूँ जो उस समय छूट गया था। 
          युवावस्था में सही दिशा पकड़ने के लिए अच्छे मित्र चाहिए होते हैं जो भाग्य से ही मिलते हैं। हमारे आसपास हमें बहकाने वाले बहुतेरे मिलेंगे लेकिन सही राह दिखाने वाले बहुत कम। गलत लोगों के साथ नरम होना घातक सिद्ध होता है, उन्हें दृढ़ता के साथ खुद से दूर रखना श्रेयस्कर है। मेरे एक मित्र जो कालांतर में एक विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, कालेज की पढ़ाई के दौरान सिगरेट पिया करते थे। हम दोनों साइकल में नगर-भ्रमण कर रहे थे, रास्ते में पान की एक दूकान पर रुके, दो सिगरेट खरीदी, एक मुझे दी। मैंने मना कर दिया तो वे मुझ पर नाराज हो गए और कहा- 'तुम दोस्ती के लायक नहीं।' मैंने अपनी साइकल उठाई और उन्हें वहीं सिगरेट पीता छोड़कर चला गया। दोस्ती तोड़ दी।
          पढ़ाई में आगे बढ़ना है तो कक्षा में सामने की बेंच में बैठनेवालों से दोस्ती ठीक रहेगी, व्यापार-उद्योग में आगे बढ़ना हो तो सफल व्यापारियों-उद्योगपतियों की संगत, 'प्रोफेशनल' बनना है तो प्रोफेशनल्स' से मेलजोल, साहित्यकार बनना है तो लेखकों और कवियों के साथ उठना-बैठना या आध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ना है साधु-सन्यासियों के चरणों में समर्पित होना पड़ेगा। जैसी सोहबत वैसी निस्बत।  
          'मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया' मनुष्य की संतोषजीविता का संकेत है लेकिन यह उस वक्त ठीक है जब अकेले जीवन व्यतीत करना हो लेकिन यदि गृहस्थी चलानी है तो 'जो मिल गया' से काम नहीं चलेगा, उसके लिए अतिरिक्त प्रयास और परिश्रम करना होगा। परिवार, गुरुजन और मित्रों से अपनी रुचि के विषय में खुलकर बातचीत करें। भरपूर 'होमवर्क' करें और सभी विकल्पों पर गौर करें, अपनी रुचि को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, आर्थिक पक्ष को समझते हुए उचित निर्णय लेकर आगे बढ़ें। विचार सबके जानिए लेकिन निर्णय स्वयं का होना चाहिए, किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित होकर या किसी के दबाव में नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति के अनुरूप। प्रश्न केवल आजीविका कमाने का नहीं है, वह करने का है जो करना आपको प्रिय है। सफलता के लिए सम्पूर्ण समर्पण, लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, भरपूर परिश्रम और धैर्य चाहिए। सफलता का कोई 'शार्टकट' नहीं होता, वह अपनी कीमत वसूल करती है, उसे अदा करना ही होगा।    
           विश्वप्रसिद्ध चित्रकार विन्सेन्ट वान गॉग ने अपनी जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ' में लिखा है- 'दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है। आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है, वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है। वह उदारता प्राप्त करने को आया है, उस बेहूदगी को पार करने आया है जिसमें ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है।'     

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आगे और भी है > ।             

Monday, April 13, 2015

जीवन चलने का नाम

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          कैंसर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2002 में हुई थी, छः वर्ष बाद फिर से हो गई। अब तक दोनों बेटियाँ ब्याह गई थी, कर्ज़ पट गए थे, माधुरी लाज का काम-काज सीख-समझ गई थी इसलिए मुझे अपने जीवन से विदा लेने में कोई दुविधा या असुविधा नहीं थी। रही बात कष्ट की, सो जितनी तम्बाखू खाई थी, उसका जो मज़ा लिया था तो फल भी मुझे ही भुगतना था। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी थी लेकिन 40-50 पृष्ठ ही लिखे गए थे, मैं चला भी जाता तो भी कुछ खास बात नहीं थी, करोड़ों आत्मकथाएँ अधलिखी या बिनालिखी चिता की अग्नि में स्वाहा हो गई, मेरी भी हो जाती।
          असल में जून 2008 में ही मेरे मुंह में पनप रहे कैंसर ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। चौबीस घंटे कनपटी, दाढ़ और कान में तीखे दर्द का एहसास बना रहता था। मैंने दो माह तक होम्योपैथी दवा ली लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हो रहा था। 2 अगस्त को भोपाल के लायन्स क्लब में आयोजित 'केबिनेट मीटिंग' में मुझे 'संगठन प्रबंधन' पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था। मुँह में दर्द बहुत अधिक था, बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी आयोजक को किए गए वादे से मुकरना मुझे नापसंद था, मैं भोपाल गया और दो घंटे की प्रस्तुति दी। पूरे चेहरे में दर्द और बढ़ गया। भोपाल से मैं जबलपुर चला गया और अपने भांजे डा॰ विकेश अग्रवाल से सलाह ली। उन्होंने मुझे आंकोलाजिस्ट डा॰ अर्पण मिश्रा को दिखाया। डा॰ मिश्रा ने रोग के तेजी से बढ्ने की चेतावनी और तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? निर्णय लेने की किसी भी चूक का परिणाम घातक हो सकता था। मैं कैंसर से लड़ने की बजाय उसे तटस्थ भाव से देखना चाहता था जबकि संगीता और केदार मुझे यह आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने इंदौर में 21 अगस्त को सर्जरी निश्चित करवा ली। पहली सर्जरी में हुआ भयानक कष्ट मुझे याद था, अगली सर्जरी और भी गहरी और गंभीर होने वाली थी। संभावित पीड़ा की कल्पना से मैं रह-रहकर काँप उठता लेकिन मेरे सामने दो ही विकल्प थे, या तो सर्जरी का तात्कालीन कष्ट सहूँ या मृत्यु की प्रतीक्षा का अनिश्चितकालीन कष्ट। अंततः मैंने सर्जरी को चुना।
          एक दिन मैंने बाज़ार से आधा किलो छेने का चमचम खरीदा, घर लाया और डब्बा खोलकर खाने बैठा गया। माधुरी जी मुझे मीठा खाते देखकर चौंक गयी क्योंकि पिछले कई वर्षों से मैं मीठा नहीं खा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा- 'अरे, मिठाई खा रहे हो?'
'हाँ.' मैंने ठंडा सा उत्तर दिया.
'कैसे? तुम तो चाय तक बिनां शक्कर की पीते हो, आज क्या हो गया?'
'मैंने देखा है कि जिसे भी दोबारा कैंसर होता है, वह नहीं बचता। मुझे लगता है कि मेरा समय भी पूरा हो चुका है।'
'तुम कैसी बातें कर रहे हो? कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा लेकिन आज यह मिठाई खाने की क्या सूझी?'
'मैंने सोचा, अब आखिरी समय है, सब सब खा-पी कर मरूं.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब मरने का समय आएगा तो अतृप्त इच्छाओं के कारण मेरी आँखों के सामने बालूशाही, जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन नृत्य करेंगे। संभव है कि इसी वज़ह से अगले जन्म में मैं फिर हलवाई बन जाऊं! यार, अगले जन्म में हलवाई नहीं बनना मुझे.'
'इसलिए मीठा शुरू?'
'यस, आज से मीठा शुरू.' मैंने हंसते हुए कहा.  
          18 अगस्त की शाम को संगीता का फोन आया और मुझसे अगली सुबह 'सेकेंड ओपीनियन' हेतु मुंबई चलने के लिए कहा। 19 अगस्त की सुबह की 'फ्लाइट' से हम मुंबई पहुँच गए और मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल के आंकोलाजी विभाग में डा॰ मंदार देशपांडे के सामने बैठे थे। अस्पताल नया था, हाल-हाल में शुरू हुआ था जबकि डाक्टर पुराने और अनुभवी लेकिन युवा थे। डा॰ मंदार देशपांडे को मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल में मुँह की शल्यक्रिया का दीर्घ अनुभव था, अब वे इस अस्पताल में कार्यरत थे। डा॰ देशपांडे ने मेरी जांच की, इंदौर की रिपोर्ट देखी और कहा- 'अंकल आपकी सर्जरी करनी पड़ेगी, 'सुप्रा मेजर सर्जरी' होगी। गाल खोलकर हड्डी निकालनी होगी और फिर 'प्लास्टिक सर्जरी' से उसे आपकी जांघ से मांस का टुकड़ा निकालकर वहाँ जोड़ेंगे ताकि आपका चेहरा एक तरफ धंसा हुआ न दिखे। चेहरा एकदम जस का तस नहीं बन पाएगा, या तो एक तरफ थोड़ा दबेगा या बढ़ सकता है। '
'ठीक है।' मैंने कहा।
'सर्जरी के बाद आपको बारह से चौदह दिनों तक अस्पताल में रहना होगा और छुट्टी होने के बाद लगभग दो माह मुंबई में ही रुकना पड़ेगा ताकि आपकी रेडियोथेरेपी की जा सके।'
'मैं सर्जरी करवाने के लिए तैयार हूँ लेकिन रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करवाऊंगा।'
'मेरा अनुमान है कि सर्जरी के पश्चात  रेडियोथेरेपी तो करनी पड़ेगी।'
'फिर मुझे न सर्जरी करवानी है न रेडियोथेरेपी, मैं चलता हूँ, आपको धन्यवाद।'
'मैं एक बात कहूँ अंकल ?'
'जी कहिए।'
'आप अगर मेरे पापा होते तो मैं यह 'चांस' अवश्य लेता।'
'आपने बहुत गभीर बात कह दी।'
'जी, मैं अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे रहा हूँ कि आप सर्जरी और रेडियोथेरेपी के लिए खुद को तैयार करें।'
'तो फिर ठीक है, कर दीजिए, कब करेंगे ?'
'आज आपकी 'बायप्सी' ले लेते हैं, आठ दिनों में रिपोर्ट आ जाएगी, उसके तीन दिन बाद आपकी सर्जरी।'
'डाक्टर साहब, यह बताइए, बायप्सी क्यों करते हैं ?'
'कैंसर 'कंफर्म' करने के लिए।'
'आपने अभी मेरा गाल 'चेक' किया, आपको ऐसा लगता है कि कुछ 'कंफर्म' करने की ज़रूरत है ?'  
'आपको कैंसर है, पक्का है, यह मुझे दिख रहा है लेकिन 'पेशेंट' की तसल्ली के लिए बायप्सी रिपोर्ट देखते हैं।'
क्यों आप आठ दिन का समय निरर्थक नष्ट कर रहे हैं ? आप कल मेरी सर्जरी कर दीजिए।'
'ऐसा क्या ?' डाक्टर ने पूछा।
'जी, शुभस्य शीघ्रम।' मैंने कहा।

          डाक्टर देशपांडे ने कहा- 'आज आप 'एडमिट' हो जाइए, कल दिन में आपके कुछ 'टेस्ट' होंगे और यदि 'ओ टी' खाली होगा तो परसों सर्जरी। उन्होंने 'ऑपरेशन थियेटर इंचार्ज' को फोन लगाया, इंचार्ज ने बताया- '21 को 'ओ टी' खाली नहीं है।'
'कोशिश करो, शायद कोई सर्जरी 'शिफ्ट' हो।' डाक्टर ने उनसे कहा। हमसे कहा- 'ऑपरेशन 21 को न हो सका तो 22 को करेंगे, आप आज रात को भर्ती हो जाइए, कल से आपका 'प्रोसीजर' शुरू कर देंगे।'
'सही है।' मैंने कहा।
          फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोरकुमार ने एक मज़ेदार गाना गाया था- 'जाते थे जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए न ?' इसी तरह मुझे सर्जरी के लिए इंदौर जाना था लेकिन मैं मुंबई पहुँच गया। रात को जब भर्ती होने के लिए काउंटर पर गए तो मालूम हुआ कि 'सुप्रा मेजर सर्जरी' का 'ट्विन शेयर' में पैकेज दो लाख पचहत्तर हजार का है और एक लाख अस्सी हजार रुपए अभी जमा करना है तब 'एडमिशन' होगा। हमने अस्पताल में स्थापित एटीएम से साठ हजार निकाल लिए लेकिन रात को दस बजे शेष एक लाख बीस हजार कहाँ से आते ? उस समय हमारे मित्र रमेश जोबनपुत्रा के बहनोई रजनीकान्त गढ़िया, जो मुंबई में रहते हैं, हमारे साथ थे, वे बोले- 'आधे घंटे रुकिए, मैं अपने घर से लेकर आता हूँ।'
          रात को ग्यारह बजे मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था, लेटते ही 'प्रोसीजर' शुरू हो गया। 20 अगस्त को माधुरी और केदार मुंबई आ गए। दिन भर 'स्केन', 'एक्स-रे', खून-पेशाब-एड्स' आदि की जांच हुई। डाक्टर देशपांडे ने शाम को फोन किया- 'आपकी सारी रिपोर्ट मेरे कंप्यूटर पर आ गई है, सब 'नार्मल' है। कल सुबह जिस 'पेशेंट' की सर्जरी होनी थी, 'सुगर' बढ़ने के कारण 'पोस्टपोन' हो गई है। आपकी सर्जरी के लिए 'ओ टी' खाली मिल गई, कल सुबह सात बजे आपको तैयार रहना है। ऑल द बेस्ट।'
          21 अगस्त की सुबह मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय सबने शुभकामना संकेत दिए, मैंने भी वापसी संकेत किए। मुझे 'स्ट्रेचर' पर लिटाकर 'प्री सर्जरी रूम' में ले जाया गया, वहाँ और भी मरीज थे। बहुत देर तक मैं वहाँ लेटा रहा, निर्विकार भाव से, बीच-बीच में उठकर अन्य मरीजों को देखता और फिर वापस लेट जाता। तब ही अनेस्थेटिस्ट डा॰ अपर्णा दाते मेरे समीप आई औए बोली- 'अंकल, चलें ?'
'मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूँ, चलिए।' मैंने उत्तर दिया। कुछ देर बाद मैं एक शानदार ऑपरेशन थिएटर की तेज रोशनी वाली लाइट के नीचे लेटा हुआ था। डा॰ दाते ने हाथ की नस में धीरे से एक 'इंजेक्शन' लगाया, उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या पता ! 'आंकोलाजिस्ट डा॰ मंदार देशपांडे और प्लास्टिक सर्जन डा॰ चारुदत्ता चौधरी ने मेरी सर्जरी की। हमारी बिटिया संगीता को भी ओटी में अपने पापा की सर्जरी देखने का सुअवसर मिला।

          'हूँ, देखो, मैं हूँ।' मुझे आवाज सुनाई पड़ी। मैंने आंखे खोली, सामने माधुरी खड़ी थी। उनकी आँखों से प्रसन्नता उमड़ रही थी, होठों में मुस्कान और चेहरा आश्वस्त। मैंने अपने बाएँ हाथ से उनके गाल छुए, उन्होंने मेरे हाथ की गदेलियों को अपनी दोनों गदेलियों से लपेट लिया। मेरी आँखें भर आई, गला रूँध गया, हम दोनों के मध्य एक मौन संभाषण हुआ। उस संभाषण को शब्दों में कैसे बताऊं ? मेरे मुंह में रुई ठुँसी हुई थी, किसी तरह बुदबुदाते हुए मैंने उनसे पूछा- 'ऑपरेशन कब तक चला ?'
'क्या पता, तुम दस घंटे बाद बाहर आए, कल की बात है, अब कैसा लग रहा है ?' माधुरी ने प्रश्न किया। मैंने अपने दाहिने अंगूठे से तर्जनी को जोड़कर इशारा किया जिसका अर्थ था- 'बढ़िया।' तीन-चार मिनट की इस छोटी सी मुलाक़ात को मैं अपने जीवन भर सँजोकर रखूँगा। यह पुनर्मिलन जैसा था। आई॰सी॰यू॰ में कुछ देर बाद संगीता आई- 'कैसे हो पापा ?' मैंने अपनी पलकें झपकाकर कुशल होने का संकेत दिया और एक हाथ उठाकर गाल को छू लिया। मेरे उस स्पर्श में उनके द्वारा किए गए अपूर्व प्रयासों के लिए आभार, शाबासी और न जाने क्या-क्या भाव थे !
'पापा, मैं तीन घंटे तक आपकी सर्जरी में खुद खड़ी रही, बहुत अच्छा ऑपरेशन हुआ है आपका, डा॰ देशपांडे और डा॰ चौधरी ने शानदार काम किया।' संगीता ने बताया। कुछ देर बाद हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ मुझे देखने आए, मुझे देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे।
          हम सबने मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जम कर लोहा लिया। अभी तक सब अनुकूल था लेकिन सर्जरी के बाद होने वाली रेडियोथेरेपी का दैत्य मेरे सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था जिसकी डरावनी गूंज मुझे अनवरत सुनाई पड़ रही थी।

                    ऑपरेशन के पश्चात मुझे 'इंटेन्सिव केयर यूनिट' में रखा गया। उसी शाम मुझे होश आ गया। अपने बिस्तर पर मैं चित लेटा हुआ था, नाक और मूत्रनली में 'पाइप' लगे हुए थे। एक हाथ से 'ग्लूकोज़' दिया जा रहा था और दूसरे हाथ पर रक्तचाप मापने का यंत्र लगा हुआ था जो प्रत्येक तीस मिनट में अपने-आप चालू होता और उसे कंप्यूटर में अंकित कर लेता। हृदय की धड़कन नापने वाली मशीन के पाइप छाती से चिपके हुए थे। गाल और गर्दन में हुई सर्जरी के कारण मेरा सिर स्थिर था और शरीर के अन्य अंगों के हिलने-डुलने की भी गुंजाइश न थी। मुझे लगातार नींद आ रही थी, बीच-बीच में टूटती, फिर सो जाता। 'सर्जरी एरिया' में असुविधा थी लेकिन दर्द नहीं था। आधी रात के पश्चात मेरी नींद उचट गई क्योंकि रात्रिकालीन देखरेख के लिए नियुक्त डाक्टर और नर्स तेज आवाज में बातचीत कर रहे थे। बातचीत क्या, ही-ही, खी-खी चल रही थी। तंद्रा की अवस्था में मैं सोना चाहता था लेकिन उनकी आवाजें मुझे चुभती रही, मैं लाचार पड़ा रहा। मुझे यह भी नहीं मालूम था की 'कालबेल' बिस्तर में लगी है अन्यथा उन्हें बुलाकर मना करता। मेरे मुंह में रुई से 'पैक' था इसलिए बोल नहीं पा रहा था। नर्सें मुझे दूर से आती-जाती दिखती, मैं हाथ उठाकर बुलाने का इशारा करता लेकिन वे मेरी तरफ न देखकर सीधे निकल जाती, ऐसे में उन्हें कैसे बुलाता ? घंटों बेचैनी में बीत गए, रात को लगभग दो बजे एक नर्स मेरे पास आई, मैंने उसे अपनी समस्या बताई, उसने डाक्टर की सलाह से मुझे 'मार्फिन' की एक 'डोज़' दे दी लेकिन उनकी ही-ही खी-खी के आगे मार्फिन ने भी घुटने टेक दिए। वे सुबह होने तक बतियाते रहे, मैं रात भर बेचैन जागता रहा। जब सुबह हुई तो मेरी बायीं ओर लगे पारदर्शी काँच से सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट होने लगा, मैंने मन ही मन कहा- 'गुड मार्निंग।' मुझे उम्मीद थी कि उन बे-शऊर डाक्टरों और नर्सों की 'ड्यूटी' का समय खत्म होने वाला होगा, जब ये सब यहाँ से विदा हो जाएंगे तब मैं चैन से सो सकूँगा। कुछ देर बाद वैसा ही हुआ तब मैं सुख की नींद ले सका।
          दोपहर को 'प्लास्टिक सर्जरी' विशेषज्ञ डा॰ चारुदत्ता मुझे देखने आए, मेरी जांच की और मुझे बताया- 'आपकी जांघ से निकाले गए मांस के जिस टुकड़े को चेहरे में 'ग्राफ्ट' किया गया था, वह सक्रिय हो गया है।' शाम को डा॰ मंदार देशपांडे मुझे देखने आए, उन्होंने मेरे मुंह के अंदर की रुई को बाहर निकाल दिया और पूछा- 'अंकल, कैसे हो।' मैंने इशारे से अपने ठीक होने का संकेत दिया तो उन्होंने कहा- 'बोलकर बताइए।' कुछ अस्फुट आवाज मेरे गले से निकली, वे मुझे और अधिक बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। मेरी प्रगति से वे संतुष्ट दिखे, उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ, आपकी 'रिकवरी' भी ठीक है, आज रात आपको आई॰सी॰यू॰ में रखेंगे, कल सुबह रूम में शिफ्ट करेंगे।' मैंने उनसे बीती रात का हाल बताया और हाथ जोड़कर कहा- 'डाक्टर साहब, मैं इस यातनागृह में अब और नहीं रहना चाहता, मुझे आज ही कमरे में शिफ्ट कर दीजिए ताकि मैं रात को आराम से सो सकूँ।' सहृदय डाक्टर ने मेरी बात मान ली और रात को नौ बजे मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
           आई॰सी॰यू॰ की रात वाली बात को छोड़ दिया जाए तो बारह दिनों के उस अस्पताली आवास को भुलाया नहीं जा सकता। डाक्टरों की लगातार देखरेख, आत्मीयतापूर्ण बातचीत, नर्स और अन्य स्टाफ का अनथक परिश्रम, उत्कृष्ट साफ-सफाई और स्वादिष्ट भोजन और पेय की जितनी प्रशंसा के जाए, कम है। सब काम एकदम समय पर, किसी से कुछ कहने या याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, मुझे वहाँ सम्पूर्ण व्यवस्थित प्रबंधन का व्यावहारिक रूप देखने के लिए मिला। सभी लोग अच्छे थे लेकिन नगालैंड से आई एक नर्स जिसका नाम था- बेबी, उसका व्यवहार और सरोकार आज भी याद आता है।
          मेरे आई॰सी॰यू॰ से बाहर आने के बाद माधुरी और केदारनाथ घर वापस चले गए। संगीता मेरी देखरेख के लिए मेरे साथ रही। इस बीमारी की पहचान से उपचार तक संगीता ने जिस सक्रियता से मेरी सेवा-सुश्रूषा की, मुझे लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, बेटा है।

            29 अगस्त को सर्जरी के दौरान गाल से निकाले गए अंदरूनी टुकड़ों की जांच के परिणाम आ गए। कैंसर का प्रभाव आरंभिक और एक ही स्थान पर केन्द्रित था इसलिए डाक्टर ने मुझे 'रेडियोथेरेपी' करने की जरूरत से मुक्त कर दिया और 1 अक्तूबर की सुबह अस्पताल से छुट्टी मिलने का संकेत दे दिया। 30 अगस्त की शाम को ही अस्पताल में 'डिस्चार्ज' की तैयारी शुरू हो गई। पूर्व में ही हमें 2,75,000/- सर्जरी का 'पैकेज' बताया गया था और हमने उस बीच पूरी राशि जमा कर दी थी। जब संगीता 'बिल काउंटर' में भुगतान करने गई तो हमारी सर्जरी का कुल 2.44,000/- का 'बिल' बना। आश्चर्यचकित संगीता ने पूछा- 'आप कुछ भूल तो नहीं रहे हैं ?'
'नहीं, 'पेशेंट' पर हास्पिटल का खर्च इतना ही हुआ है।' उन्होंने कहा और 31,000/- वापस कर दिए।
          जब संगीता ने मुझे इस बात को बताया तो कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हास्पिटल की ईमानदारी पर मैं विस्मित सा हो गया। चिकित्सा जगत में व्याप्त लूट-खसोट के विपरीत उनका व्यवहार अविश्वसनीय लगा। मैं अपने शहर बिलासपुर में अखिल भारतीय स्तर के एक ख्यातिलब्ध ग्रुप के हास्पिटल की कारस्तानी को याद कर रहा था जहां अधिकतर मरीजों की बीमारी के साथ घिनौना खिलवाड़ किया जाता है, मृत मरीज के परिवारजनों को जीवन की उम्मीद की लालच में 'वेंटिलेटर' पर रखकर बिल बढ़ाने के लिए जिंदा बताया जाता है। मरीज के गैर ज़रूरी मंहगे परीक्षण इसलिए करवाए जाते हैं ताकि अस्पताल की आय बढ़े ! इलाज का अनाप-शनाप बिल बढ़ा कर उनकी मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाया जाता है !
          महत्वपूर्ण यह है कि संगीता आश्चर्यचकित क्यों हुई, मैं विस्मित क्यों हुआ ? ईमानदारी तो हमारा स्वाभाविक व्यवहार होना चाहिए। यही ईमानदारी किसी संस्थान की ख्याति में वृद्धि करती है, यही ईमानदारी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है तो फिर यह भावना अब दुर्लभ क्यों होती जा रही है ? चिकित्सा का कार्य व्यापार नहीं, सेवा और सहानुभूति का कार्य है। इस 'मिशन' का तानाबाना मानवीय संवेदनाओं के धागों से बुना हुआ है, इन धागों का टूटना भविष्य के संभावित खतरों की दुखदायी आहट है।
          वहाँ से सुरक्षित वापस आने के दो वर्ष बाद पुनः कैंसर ने मुझपर आक्रमण किया लेकिन इस बार दाएँ नहीं, बाएँ गाल पर। फिर वही कष्टदायक सर्जरी, वही हास्पिटल नंबर वन, वही डाक्टर नंबर वन, वही नर्सिंग नंबर वन, वही देखरेख नंबर वन और वही साथ मेरी अर्धांगिनी माधुरी और मेरे बेटी-बेटे संगीता और केदारनाथ का।
          सन 1971 में मैंने एक फिल्म देखी थी- 'आनंद', जिंदगी और मौत से हँसता-गाता संघर्ष। फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने उस कथानक को ऐसा चित्रित किया था कि कैंसर जैसी भयावह बीमारी जैसे एक कविता बन गई जिसने सबको रुलाया और वह अविस्मरणीय बन गई।
          तब मुझे मालूम न था कि वह कहानी मेरे जीवन में यथार्थ के रूप में घटित होगी। आठ वर्षों के अंतराल में कैंसर के तीन तीव्र आक्रमण मुझ पर हुए। इस गंभीर बीमारी का मैंने किस तरह सामना किया, उसे मेरे डाक्टर, परिवारजन और कुछ अंतरंग जानते हैं।
          फिल्म 'आनंद' का नायक राजेश खन्ना उन संकट के घड़ियों में हर समय मेरे आस-पास रहा, मुझे संभालता रहा, मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा। प्रचंड पीड़ा के दौरान उनके मुसकुराते चेहरे ने मुझे कैंसर से जूझने में बहुत मदद की जो आज भी जारी है। धन्यवाद हृषिकेश मुखर्जी, आभार राजेश खन्ना। एक दिन सभी को जाना है लेकिन ज़िंदगी में संघर्ष किस तरह किया जाता है- आपने सिखाया है।
          असलम हसन की इस कविता पर गौर करें :

'कितना मुश्किल है
आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर बाहर रंग-बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है
फिक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिन्द मचल जाना
कितना सख्त है
नर्म होना
मोम होना
और पिघल जाना
कितना आसाँ है
दिल का जाना
दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना।'

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आगे और भी है > >

Friday, April 3, 2015

ठंडी हवाएँ

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          इस बीच एक भीनी-भीनी सी खुशबू 29 नवंबर 2004 को हमारे परिवार में प्रविष्ट हुई- 'मैना', केदारनाथ और संगीता की बिटिया। मैना के आगमन से हम दोनों नाना-नानी बन गए। कुछ दिनों बाद केदारनाथ और संगीता को रायपुर के शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिल गई तो दोनों अपने प्यारे शहर इंदौर को छोडकर रायपुर आ गए। रायपुर से बिलासपुर की दूरी महज़ 115 किलोमीटर है इसलिए उनके पास हमारा आना-जाना सुविधाजनक हो गया।
          जैसे-तैसे दिन बीतते जा रहे थे। कर्ज़ चुकाने में एक पुश्तैनी जमीन, दद्दाजी के द्वारा दिया गया भूखंड और माधुरी के आभूषण बिक गए। यद्यपि लाज का काम बढ़ रहा था लेकिन धीरे-धीरे, प्रशिक्षण कार्यक्रम भी हो रहे थे लेकिन यदा-कदा, जितनी आय होती थी वह देनदारी के आगे एकदम बौनी लगती, समुद्र के सामने नदी की क्या औकात ?
          कुंतल ईशा फाउंडेशन के आश्रम में ही रम गए, हम लोग समझ गए कि उनको अपने परिवार में वापस लाना संभव नहीं है। संज्ञा के विवाह का निमंत्रणपत्र सद्गुरु को देने के लिए हम लोग आश्रम गए थे, सद्गुरु से मिले। माधुरी ने सद्गुरु से कहा- 'कुंतल आपके पास आ गया है, मुझे अच्छा नहीं लगता।'
'ये बताओ, कुंतल नौकरी करता तो कितने दिन आपके पास रहता ? दो-चार दिन के लिए ही घर आता।' सद्गुरु ने प्रतिप्रश्न किया।
'जी, आप ठीक कह रहे हैं।'
'तो फिर ? जब भी आपका मिलने का मन हो, यहाँ आ जाओ और मिल लिया करो। जितने दिन चाहो, यहाँ रह सकती हो।'
'संज्ञा के विवाह के कार्यक्रम में उसे दो-चार दिन के लिए भेज दीजिए।'
'मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन वह जिस मार्ग पर आगे बढ़ रहा है, ऐसे कार्यक्रमों में जाने से उसे मदद नहीं मिलेगी।'
'मैं उसे आपको सौंप कर जा रही हूँ, आज से आप उसके पिता हैं।'
'ठीक है।' सद्गुरु ने कहा। हम लोगों ने सद्गुरु से आशीर्वाद लिया और घर वापस आ गए। संज्ञा का विवाह कुंतल की अनुपस्थिति में हुआ, कुंतल की कमी हमारे दामाद डा॰ केदारनाथ ने पूरी कर दी। पूरे कार्यक्रम में उन्होंने घर के लड़के की तरह अपूर्व दायित्व और लगन के साथ हमारा साथ दिया।
          हमें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि आखिर वह कौन सा आकर्षण है जिसने कुंतल को इस दुनियादारी से विमुख कर दिया ! उनका स्वभाव और व्यवहार आम युवाओं जैसा था। हमारे परिवार के जीने का तरीका फाँके-मस्ती का था, टीवी और सिनेमा देखना, हँसना-गाना-नाचना, चिढ़ना-चिढ़ाना- खुला-खुला सा। 'गंभीरता' जैसा कोई काम नहीं, कोई आध्यात्मिक या धार्मिक माहौल भी न था फिर कुंतल इतने गंभीर प्रयोजन के लिए कैसे उद्यत हो गए, यह हमारे लिए जिज्ञासा का कारण रहा। मैंने और माधुरी ने सोच-विचार कर तय किया कि इस प्रश्न का उत्तर आश्रम की गतिविधियों से जुड़कर ही मिल सकेगा इसलिए वहाँ हमने आना-जाना शुरू किया।
          उस आवागमन में एक अद्भुत कार्यक्रम में सहभागिता का अवसर मिला, उसका नाम था- 'Wholeness'. आठ दिवसीय इस कार्यक्रम में आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियाँ सिखाई गई। दिन भर में मुश्किल से छः घंटे का शयन, एक घंटा दैनिक क्रियाएँ , दो घंटे भोजन और पंद्रह घंटे का प्रशिक्षण।
          पहला दिन सामान्य रहा लेकिन अगले दिन मेरी कमर में असहनीय पीड़ा आरंभ हो गई। मेरी कमर में दर्द की शिकायत विगत दस वर्षों से चली आ रही थी, योगासन सीखते समय झुकने से उसमें झटका सा लगा और मैं अपूर्व पीड़ा के कारण त्राहिमाम करने लगा। न बैठते बने, न दो कदम चलते बने लेकिन प्रशिक्षक मेरी तकलीफ को समझने के लिए तैयार न थे। अपना दर्द बताया तो बोले- 'Carry on...no pain, no gain.' आप बताइए, एक इंसान दर्द के कारण हिल नहीं पा रहा है और वे कह रहे हैं-  'Carry on...'। प्रशिक्षक मुझे किसी क्रूर खलनायक जैसे लगने लगे, बताओ भला, यहाँ हिलते-डुलते नहीं बन रहा है और उधर से आदेश है- 'केरी ऑन' !

           योग प्रशिक्षण का कार्यक्रम कोयंबत्तुर के वेलियंगिरी पहाड़ की तलहटी में बसे पुंडी ग्राम में स्थापित ईशा योग केंद्र के स्पंद सभागार में चल रहा था जिसमें लगभग तीन सौ स्त्री-पुरुष योग की प्राचीन विधा को सद्गुरु जग्गी वासुदेव के मार्गनिर्देशन में अत्यंत मनोयोग से सीख रहे थे। उस समूह में मेरे साथ माधुरी भी थी। माधुरी भाषागत समस्या से जूझ रही थी क्योंकि कार्यक्रम अंग्रेजी भाषा में संचालित हो रहा था, अंग्रेजी से अनभिज्ञ माधुरी निर्देशों को समझ नहीं पा रही थी लेकिन अन्य प्रतिभागियों को देखकर अभ्यास कर रही थी। सद्गुरु के प्रवचन उन्हें समझ में नहीं आ रहे थे इसलिए वे हैरान थी। वहीं पर मैं अपने कमर के दर्द से हैरान था, मैं कामचलाऊ अंग्रेजी जानता हूँ, सभी निर्देश समझ रहा था लेकिन मेरा शरीर उस अंग्रेजी भाषा को न समझते हुए केवल मेरी कमर की पीड़ा को ही एकाग्रता से समझ रहा था।
          कार्यक्रम के मध्य में अवसर मिलने पर मैं सभागार से चुपचाप भाग कर आवासीय परिसर में अपने कमरे में जाकर लेट गया। मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा, 'कालबेल' बजी, मैंने दरवाजा खोला, एक विदेशी षोडशी कन्या बाहर खड़ी थी, उसने मुझसे कहा- 'प्रणाम।'
'प्रणाम।' मैंने उत्तर दिया।
'मैं योग कार्यक्रम की 'वालिंटियर' हूँ, लेबनान से आई हूँ।' उसने अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात शुरू की।
'जी ?'
'आप कार्यक्रम छोड़कर 'स्पंद' सभागार से यहाँ क्यों आ गए ?'
'पहले आप अंदर आइये, बैठिए। दरअसल, मैं कमर के दर्द से परेशान होकर यहाँ आ गया, मुझसे योगासन करते नहीं बन रहा था।' मैंने बिस्तर पर लेटते हुए बताया।
'क्या बहुत दर्द है ?'
'हाँ, बहुत अधिक।'
'क्या मैं आपके कमर में दवा लगा दूँ ?' वह अपने साथ 'वोलिनी आइंटमेंट' और दर्दनाशक गोलियां लेकर आई थी।
'ठीक है, लगा दीजिए।' मैंने कहा और अपने अधोवस्त्र ढीले करके पेट के बल लेट गया। उसने दवा लगाई, दस मिनट रुक कर पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'पहले से बेहतर।'
'एक 'टेबलेट' खा लीजिए, मैं पानी लेकर आती हूँ ।' उसने मुझे दवा खिलाई, पुनः दस मिनट शांत बैठी रही फिर उसने पूछा- 'अब कैसा लग रहा है ?'
'और अच्छा।'
'तो फिर उठिए, खड़े हो जाइए और मेरे साथ सभागार में चलिए।'
'पर मैं नहीं चल पाऊँगा!'
'आप मेरे साथ चलिए तो, मैं आपको सहारा देकर ले चलूँगी, कोशिश कीजिए, बन जाएगा।' उसने आग्रह किया, मेरे पास उसके साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैं उसके कंधे का सहारा लेकर दर्द से कराहता सभागार की ओर चल पड़ा।
          सभागार में मैं अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गया और वहाँ फिर वही किस्सा- 'केरी ऑन.....।'

          मैं योग कार्यक्रम से जुड़ा रहा, जैसा भी बना, करता रहा। योगासन करने में असुविधा थी लेकिन प्राणायाम और ध्यान सीखने में कोई परेशानी न थी। दिनोंदिन वातावरण समृद्ध होता जा रहा था, इतने सारे लोग मिलजुलकर जब किसी विधा को सीखते हैं तो सब एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं और ऊर्जा को परस्पर संचरित भी करते हैं। हमने हठयोग, शक्तिचलन क्रिया और शून्य ध्यान का क्रमबद्ध अभ्यास किया। उस दौरान इस बात का एहसास होता रहा कि उम्र अधिक हो जाने के कारण हमारे शरीर का लोच कम हो गया है इसलिए योगासन करना कठिन लगता है, हमारा शरीर साथ नहीं देता। वैसे, कार्यक्रम के दौरान हमारा आहार इस विधि से नियोजित किया गया ताकि शरीर हल्का रहे और योगासन करना सुविधाजनक हो।
          यौगिक क्रियाओं के अतिरिक्त प्रतिदिन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के आध्यात्मिक प्रवचन होते थे जिन्हें सुनना मेरे लिए अपूर्व अवसर था। प्रवचन के पश्चात जिज्ञासु प्रश्न करते थे जिनके उत्तर सद्गुरु के उत्तर हास्यबोध से आरंभ होते और सरल उदाहरणों के सहारे गंभीर निष्कर्ष तक पहुँचते। उनकी बातों में आध्यात्म के साथ ब्रह्माण्ड, विज्ञान, धर्म, और मानवीय व्यवहार की परत-दर-परत चर्चा होती जिसे सुनकर मुझे जीवन शैली और व्यवहार की नई दिशाएँ समझ में आई। उनका विस्तृत ज्ञान, अँग्रेजी भाषा का अद्भुत प्रयोग और उनकी वाणी का प्रभाव मेरे जीवन के अहोभाग्य अवसर जैसा था।
          पांचवे दिन सुबह 9 बजे वेलियंगिरी पर्वत के शिखर तक पैदल चढ़ाई करनी थी। हमें तीन विकल्प दिए गए थे, एक- पर्वतारोहण करना है, दो- जो पर्वतारोहण न  करना चाहें वे आश्रम की चतुर्दिक पदयात्रा करें, और तीन- जो दोनों के लिए तैयार न हों वे अपने कमरे में आराम करें। तीसरे विकल्प ने मुझे प्रसन्न कर दिया और उस बड़े समूह में मैं अकेला मानुष था जिसने कमरे में आराम करने वाला विकल्प चुना ! 
          उस दिन सुबह नित्य की भांति छः बजे से अभ्यास आरंभ हुए। तीन घंटे बाद नौ बजा, सब लोग पर्वतारोहण के लिए उत्सुक थे और मैं उनके चेहरे की प्रसन्नता को देखकर कुढ़ रहा था- 'ये लोग वहाँ जा रहे हैं और मैं नहीं जा पा रहा हूँ।' अनायास मेरे मन ने कहा- 'चल, चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।' मैंने माधुरी से कहा- 'मैं भी चलूँगा। 
'कैसे चढ़ोगे तुम ? तुम्हारी कमर का दर्द ?' माधुरी ने पूछा। 
'दर्द तो है, लेकिन तुम सब लोग पर्वत-शिखर पर जाओगे, मस्ती करोगे और मैं यहाँ बिस्तर पर पड़ा रहूँगा !'
'रास्ते में तुम्हारी परेशानी बढ़ गई तो ?' 
'वह मेरी नहीं, सद्गुरु की समस्या है, वे करेंगे व्यवस्था।'
'तो, फिर चलो।' वे बोली।
          मैंने पर्वतारोहण के लिए खास तौर से उपलब्ध कराए गए जूते पहने और सबके साथ निकल पड़ा। शिखर तक पहुँचने के लिए कोई सड़क न थी, पगडंडियाँ थी, अगल-बगल झाड़-झंखाड़ थे, छोटे-बड़े टीले थे, तीखी चढ़ाई थी, सब एक के पीछे एक ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे थे। एक युवा 'वालेंटियर' मुझे सहारा देने के लिए  मेरे आसपास अनवरत चलते रहे। कुछ देर बाद तेज बारिश शुरू हो गई, राह में फिसलन हो गई, कपड़े भीग गए लेकिन किसी प्रकार अपने दर्द को दरकिनार करते हुए मैं चढ़ता ही रहा। लगभग साढ़े तीन घंटे की पगयात्रा के बाद मैं पर्वत के शिखर पर पहुँच ही गया जबकि माधुरी और अन्य कई लोग मेरे वहाँ पहुँचने के पंद्रह-बीस मिनट बाद वहाँ पहुँचे। उस दिन मैंने अपनी शारीरिक पीड़ा से भिड़कर संघर्ष किया और यह जाना कि कुछ भी असंभव नहीं और यह भी समझ आया कि हौसले की कभी हार नहीं होती। 
          पर्वत-शिखर पर पहुँच कर मैं जी भर कर नाचा, वे मेरे लिए खुशी के क्षण थे...आप बताइये, थे कि नहीं ? शिखर पर हमारे भोजन की व्यवस्था थी, सद्गुरु का प्रवचन भी हुआ। तीन घंटे रुक कर हम लोग वापस लौटे, वही पथरीला-फिसलन भरा रास्ता, वही हिम्मत, वही 'वालेंटियर' का सहारा, ढाई घंटे में तलहटी पर उतार आए। वहाँ से हम सब स्पंद सभागार में प्रविष्ट हुए, मैं थक कर चूर हो चुका था, चुपचाप पैर फैलाकर लेटने का मन हो रहा था लेकिन प्रशिक्षक ने निर्देश दिया- 'सब लोग आसन करना आरंभ करें।' फिर वही- 'केरी ऑन !' 
   
          इस कार्यक्रम के पहले इधर-उधर से योगासन करना सीखा था, अनियमित था किन्तु करता था लेकिन कोयंबत्तुर के ईशा फाउंडेशन में हुए इस कार्यक्रम में मुझे सतर्क प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में अनेक आसन, प्राणायाम और ध्यान की विधियां सीखने को मिली, अपने शरीर और मन को व्यवस्थित रखने के उपाय ज्ञात हुए। क्रमबद्ध ढंग से शरीर को तैयार करते हुए जो अभ्यास करवाया गया उससे समस्त क्रियाएँ शुरुआती तकलीफ़ों से होते हुए क्रमशः सुविधाजनक होती गई और स्मृति में संरक्षित भी हो गई। कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात हमें निर्देश दिए गए- 'छः माह तक इसे नियमित रूप से करना है, यदि किसी वज़ह एक दिन भी अभ्यास न हो पाया तो अगले दिन से छः माह के लिए अभ्यास फिर से आरंभ करना होगा।' परिणामस्वरूप बिना नागा छः माह तक अभ्यास चला और उसके बाद शरीर इतना अभ्यस्त हो गया कि कि अब आठ वर्ष होने को आए, वह सब बिना किए अब जी नहीं मानता ! यहाँ तक कि रेलयात्रा में भी जैसी जगह मिली, शुरू हो गए, लोग स्वयं ही खिसक कर समुचित जगह बना देते हैं और अपना काम सध जाता है। यदि किसी दिन व्यस्ततावश अभ्यास न कर पाए तो दिन भर बेचैनी सी होती है। हाँ, एक महत्वपूर्ण बात आपको बतानी रह गई, मेरा दस वर्ष पुराना कमर दर्द अब इतिहास की बात हो गई !
           यह बात जुलाई 2007 की है, उसके बाद कुछ और आध्यात्मिक अनुभवों से मुलाक़ात हुई, बीच-बीच में बताता रहूंगा। मैं प्रतिदिन दो घंटे का समय पदयात्रा, योगासन और प्राणायाम को देता हूँ यद्यपि मेरा शरीर दिन में चौबीस घंटे मेरा साथ देता है। योग से जुड़ने के कारण दवाओं से दूरी बन गई है, कैंसर का मरीज हूँ इसलिए उससे भी लड़ने-भिड़ने में मदद मिलती है लेकिन कैंसर तो कैंसर है, कहने को इसे राजरोग कहा जाता है पर इसे राजा हो रंक, सबको लपेटना आता है ! जिसे भी बीमारी के प्रारम्भिक काल में समुचित उपचार नहीं मिला फिर समझिए उसका अंतकाल आ गया।
          कैंसर ने मुझ पर फिर से हमला किया। सन 2008 में उसी गाल के अंदर पुनः कैंसर के लक्षण उभरे जिस गाल की 2002 में 'सर्जरी' हुई थी। इस बीच मैं अपनी जांच करवाते रहता था, डाक्टर कहते थे- 'चार साल बीत गए, अब आप 'सेफ' हैं' लेकिन फिर मुसीबत आ खड़ी हुई। मेरे सर्जन डा॰ दीपक अग्रवाल ने कहा- 'द्वारिका प्रसाद जी, इस बार आपकी गहरी सर्जरी होगी, दाढ़ निकाली जाएगी और 'मेंडिबल' काटकर निकाला जाएगा। हड्डी काटकर अलग करने के कारण आपका चेहरा अजीब सा हो सकता है और उसके बाद आपकी 'रेडियोथेरेपी' भी करनी पड़ेगी।'
          मेरे देखने में आया था कि जिस व्यक्ति की भी कैंसर की दोबारा सर्जरी हुई, वह अधिक दिनों तक नहीं जी पाया। मुझे समझ में आ रहा था कि मेरा बचना अब मुश्किल है, केवल दुर्दशा बची है इसलिए मैंने परिवारजनों को अपना निर्णय सुनाया- 'जब तक चलूँगा, तब तक चलूँगा, अब सर्जरी और रेडियो थेरेपी नहीं करवाऊँगा।' मुझे छोड़ कर घर में सब चिंतित थे लेकिन संगीता और केदार मेरी बात मनाने वालों में से नहीं थे, दोनों ने इंदौर में मेरी सर्जरी 'फिक्स' कर दी और मुझे अंग-भंग के लिए पुनः मजबूर कर दिया गया।

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Saturday, March 28, 2015

ज़िंदगी का सफर ये कैसा सफर

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          भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन किया है, ये सभी रस साहित्य, नृत्य और सामान्य भावाभिव्यक्ति में इस तरह रच-बस गए हैं कि इनके गूढ़ार्थ सहज ही सबको समझ आ जाते हैं। एक और रस है जो इन उल्लेखित रसों में उद्घाटित नहीं हो पाया है- वह है- 'बतरस।' आदि-काल से बतरस का प्रभाव हमारे जनजीवन में अति-व्यापक रहा है। बतरस गंभीर वार्तालाप है, भाषण देना-सुनना है, प्रवचन-सत्संग है, निःशुल्क मनोरंजन है और मनुष्य के पेट में उठे दर्द को दूर करने की दवा भी है।
          मेरे बब्बाजी, दद्दाजी और बड़े भैया की गद्दी में अधिकतर समय उनके मित्रों और परिचितों की बैठक चलती जिसमें भाग लेने के लिए लोग पैदल या साइकल-स्कूटर चलाते या कार में बैठकर नियमित रूप से आते, घंटों विविध विषयों पर बातचीत होती, बहस होती, कहा-सुनी होती और उस बीच में चाय-नास्ता का दौर चलता। अपने विचार सभी लोग व्यक्त करते लेकिन स्वाभाविक रूप से स्थल व चाय-नास्ता मुहय्या करवाने वाले को बोलने का अवसर अधिक मिलता और उसकी बात अधिक मानी जाती। हमारे परिवार के पुरुषों को इस रस का निर्मल आनंद उठाते मैंने बचपन से युवावस्था तक नियमित देखा तो उसका असर मुझ पर भी पड़ा। यद्यपि बड़ी महफिल सजाने का चस्का नहीं लगा लेकिन आपसी संवाद करने का शौक लगातार बढ़ता गया। बचपन में हम लोग की बातचीत के विषय थे- हमारे मास्साब और पढ़ाई, किशोरावस्था में फिल्में, युवावस्था में लड़कियां और प्रौढ़ावस्था में राजनीति और साहित्य।  
          यूं तो बतरस वाली दोस्ती असंख्य लोगों से रही है लेकिन कुछ लोग मेरे जीवन में ऐसे रहे जिनके साथ बातें करते मेरे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता जिसमें सर्वोच्च हैं मेरी 'बेस्टेस्ट फ्रेंड' माधुरी। उनके अतिरिक्त किशोरावस्था के मित्र- (स्व॰) लक्ष्मीनारायण शर्मा; और सुधीर खंडेलवाल; वयस्क-प्रौढ़ वय के मित्र- (स्व॰) पंडित मुरलीधर मिश्र,  (स्व॰) प्रोफेसर बी॰के॰ श्रीवास्तव, (स्व॰) भागवत प्रसाद दुबे, (स्व॰) राम किशन खंडेलवाल, (स्व॰) कुतुबुद्दीन भारमल, (स्व॰) महेश भट्ट, (स्व॰) इंदर सोंथलिया, (स्व॰) रमाकांत मिश्र; और बजरंग लोहिया, जगत नारायण तिवारी, सतीश जायसवाल, कान्तिलाल जोबनपुत्रा, वी॰एस॰तैलंग, डा॰ महेश कासलीवाल, चन्द्रशेखर जालान, सुभाष दुबे, जगदीश दुआ, बजरंग केडिया, विनोद मिश्र, विवेक जोगलेकर आदि कुछ और भी। मित्रों के इस समूह के साथ बैठकर आपस में विभिन्न विषयों पर होती चर्चा से प्राप्त परम-आनंद के क्या कहने ! वह जीवंनदायी बतरस था जो बहुत कुछ सिखाता, व्यक्तित्व विकसित करता, प्रतिकूल परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत देता, मार्ग दर्शन देता, दुख कम करता और कभी-कभी हँसाता भी था। जब भी प्रतिकूल मनस्थिति में मेरे दिमाग को लकवा लगने जैसा लगता तब ये लोग मेरे विवेक-रक्षक-साथी थे। मैंने इतने बुरे दिन देखे कि यदि इन मित्रों का साथ न होता तो मैं किसी पागलखाने में होता या किसी तेजी से आती ट्रेन के आगे खड़ा होकर अपने प्राण दे चुका होता।
          कठिन समय में इनका साथ बहुत साथ देता था, इनकी बातें भी साथ देती थी। बातें करने से दिल बहल जाता था, थोड़ा 'डायवर्सन' हो जाता था और दिल को दिलासा भी। कुछ मित्र तो मुझसे इतनी दूर चले गए कि अब उनसे मिलना न होगा लेकिन कुछ का साथ अब भी बना हुआ है।
          श्री बजरंग केडिया मुझसे दस वर्ष बड़े हैं, सौभाग्य से मित्रवत है। उनसे दिल की बातें निःसंकोच की जा सकती हैं, वे मुझे 'प्रेक्टिकल' सलाहकार से लगते हैं। एक दिन अपनी चिन्ता का बोझ लिए मैं उनके घर पहुंचा, मेरी समस्या को वे गौर से सुने और बोले- 'देखो द्वारिका, मैं तुमको एक बात बताता हूँ, किसी लड़की की शादी आज तक पैसों की कमी के कारण नहीं रुकी। सब इंतजाम हो जाता है, कैसे हो जाता है, पता नहीं ! तुम मानो, हर लड़की इस संसार में अपना भाग्य लेकर आती है।'
     
          एक दिन भावी समधी जी का एसएमएस आया- 'मेरा तालाब सूख गया है उसमें जल भरें।' मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। अब मैं क्या जवाब देता ? मेरे नल से तो पानी की जगह हवा निकल रही थी और उसमें से 'सूँ-सूँ' की आवाज़ आ रही थी, इस आवाज़ से तो समधी जी का सूखा तालाब भरने से रहा। और तो और, एक दिन भावी दामाद का भी फोन पर तगादा आ गया- 'क्या हुआ ?'
          उधर वे हमसे हलाकान थे, इधर हम खुद से परेशान। विवाह की तिथि जितनी नजदीक आती जा रही थी, चिन्ता उतनी बढ़ती जा रही थी। हमारी हालत उस किसान की तरह थी जो अपनी सूखती फ़सल को बचाने के लिए बारिश के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहा हो और बादलों का कोई अता-पता न हो। मुझे निष्क्रिय और निश्चिंत देखकर माधुरी झल्ला उठती- 'क्या कर रहे हो तुम ?'
'कुछ नहीं।' मेरा बुझा सा उत्तर उसे और बुझा देता। उन्होंने मुझसे कहा- 'मेरे गहने 'बैंक लाकर' से निकाल लो, बेचो और झंझट खत्म करो।'
'उतने से भी काम नहीं बनने वाला।'
'फिर ?'
'देखते हैं।' मैंने तथागत गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठे-बैठे उत्तर दिया।

          एक दिन सुबह दस बजे मैं अपने एक पुराने सहपाठी के घर पहुँच गया। हम दोनों हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे। मुझे देख उसने पूछा- 'आओ द्वारिका, आज अचानक, सुबह-सुबह ?' मैंने अपनी समस्या बताई तो उसने कहा- 'फिक्र मत कर, तेरा काम हो जाएगा, रुक तेरे लिए चाय बनवाता हूँ। कैसी चाय पिएगा, शक्कर वाली या बिना शक्कर वाली ?'
'शक्कर वाली, ज़रा कडक।' मैंने कहा। हम दोनों के लिए चाय आई, मेरे लिए कड़ी-मीठी और उसके लिए बिना शक्कर वाली।
          घर आकर मैंने माधुरी को बताया- 'हो गया।'
'अरे वाह, किसने दिया ?'
'फकीरों ने।'
'फकीरों ने ?'
'हूँ, उन्होंने कहा था न, 'अल्लई देगा', उसी ने दिया।' मैंने कहा।

          इसके कुछ दिनों बाद हमारी लाज़ में एक ग्राहक आए, रीवा (मध्यप्रदेश) से, पंडित अखंड प्रताप नारायण मिश्र, अपनी बेटी को राज्य सेवा की परीक्षा दिलवाने। दो-तीन दिन रुके, परिचय बढ़ा, उनकी बातचीत की शैली प्रभावित करने वाली थी। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अगले माह बेटी का विवाह है। उन्होंने मुझसे पूछा- 'कुंडली मिलवा ली है न ?'
'हमें लड़के की कुंडली नहीं दी गई, लेकिन उनका जन्म समय और स्थान मालूम था इसलिए उस आधार पर कंप्यूटर से मिलान करवाया था, कुछ दोष हैं, पर चलता है।' मैंने बताया।
'एक बार मुझे दिखाएंगे क्या, अगर आप उचित समझें ?'
'क्यों नहीं।' मैंने उन्हें दोनों कुंडली दी, उन्होंने कुछ देर दोनों का अध्ययन किया और मुझसे बोले- 'अग्रवाल जी, मेरी राय है कि आप यह संबंध न करें।'
'क्यों ?' मैंने प्रश्न किया। उन्होंने संज्ञा के वैवाहिक भविष्य और ससुराल के बारे में कई ऐसी बातें बताई जो चिंताजनक थी, नकारात्मक दिशा में जा रही थी। मैं सोच में पड़ गया। दुविधा अज़ब थी, एक तरफ हमारी बेटी का प्यार और दूसरी तरफ हमारा अपनी बिटिया से प्यार !
'जो होगा, सो होगा पंडित जी, अब इस विवाह को रोकना हमारे लिए असंभव है।' मैंने कहा।
'तो जैसा प्रभु ने रच रखा है, होने दीजिए, सब उनकी माया है।' वे गंभीर होकर बोले।

          नियत तिथि पर दोनों परिवार एकत्रित हुए, वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए और हमने अपनी बिटिया को विदा किया। हमें खुशी थी कि हम अपनी बेटी के प्यार को सुखद परिणिति तक ले जाने में सहयोग कर सके।
          पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म 'नीलकमल' (1968) में रफी साहब ने साहिर लुधियानवी का लिखा यह मार्मिक गीत गाया था, इसे सरसरी निगाह से नहीं, जरा डूब कर पढिए:

'बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰

नाज़ों से तुझे पाला मैंने
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको
बाहों में मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की ऐ नाज़ुक डाली
तुझे हर पल नई बहार मिले॰

जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों में हंसी की धूप खिले
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी ज्योति न हो फीकी
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले॰

बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ
आराम की ठंडी छांव में,
कांटा भी न चुभने पाए कभी
मेरी लाडली तेरे पाँव में,
उस द्वार से सब दुख दूर रहे
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले॰

बाबुल की दुआएं लेती जा
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी न याद आए
ससुराल में इतना प्यार मिले॰'


          जीवन की घटनाएँ क्या हमारे अनुमान के अनुरूप घटती हैं ? अनुमान से थोड़ा कम या ज़्यादा तो ठीक है लेकिन जब सब एकदम विपरीत हो तो अपनी ही अक्ल और समझदारी पर संदेह होने लगता है और अगर अपनी अक्ल पर दोष देने की हिम्मत न हो तो फिर 'भाग्य का लिखा' तो है ही। जिस छोटे से संसार में हम रहते हैं, उसी छोटी सी सीमा में लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, जानने-समझने की कोशिश करते हैं, सम्बन्धों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह सब अनुमान ही रहता है, इन अनुमानों का सटीक निकलना 'मेरी होशियारी' है और यदि अनुमान गलत निकल गए तो 'मैं नहीं, वह गलत' है।
          खुशी-खुशी विदा हुई संज्ञा की खुशियाँ अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। उसके बाद हमें ऐसा लगने लगा कि हमारे अनेक जन्मों के पाप के फल हमारे जीवन में दौड़ते चले आ रहे हैं। इतना कष्ट, इतना अपमान, इतना डर, इतनी लाचारी, इतनी उपेक्षा, इतनी बेहूदगी, इतनी नासमझी, इतनी गाली-गलौच मेरे इतने लंबे जीवन में न देखा, न सुना और न जाना। वह सब देख लिया जो पुरानी पारिवारिक फिल्मों में देखा करता था, आश्चर्य है, आज की पढ़ी-लिखी दुनियाँ में वैसा ही चल रहा है ! उस दौरान जो नरक-यातना हमने भुगती, उसे आपको कैसे बताऊँ ?
          न बता पाने की एक वैधानिक मजबूरी भी है, विवाह के तीन वर्ष बाद हमारे दामाद जी ने हमारी बेटी पर 'घरेलू क्रूरता' का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी और कुछ दिनों बाद उन्होंने कुटुंब न्यायालय में संज्ञा के विरुद्ध तलाक़ हेतु केस दायर कर दिया। चूंकि प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए विवाह के बाद की घटनाएँ बताना न्यायोचित नहीं है। वैसे, आपके लिए आगे की कथा बुनने के लिए विकल्प खुला है, आप दो तरीके से कहानी को आगे बढ़ा सकते हैं- एक- 'हमारी बेटी ने ससुराल वालों को सताया' या दो- 'ससुराल वालों ने हमारी बेटी को सताया'। प्रकरण दायर किए हुए अब लगभग सात वर्ष हो चुके हैं। आप जानते हैं कि समय की गति तेज होती है और न्याय की गति धीमी, न जाने कितना और समय लगेगा क्योंकि अभी इस न्यायालय के बाद उच्च न्यायालय है, फिर सर्वोच्च न्यायालय है ! जिस अदालत में हत्यारों और चोर-उचक्कों की भीड़ खड़ी रहती है वहाँ उनके इर्दगिर्द मेरी बेटी अपनी बेटी के साथ जज की होने वाली पुकार की प्रतीक्षा करते खड़ी रहती है क्योंकि उसने किसी से प्रेम करने का अपराध किया था। आज भी वे उसी पति से प्रेम करती हैं, उसी के साथ रहना चाहती हैं लेकिन उनका प्रेमी अब ऐसा पति बना दिया गया है जो उनके साथ नहीं रह सकता। हमारी नातिन अनन्या अब बड़ी हो गई है और इतना समझने लग गई है कि 'कुछ गड़बड़ है' लेकिन वह संभवतः यह नहीं समझ पा रही होगी कि 'मम्मी-पापा के बीच यह कैसी कट्टी है जो अगले दिन मिट्ठी में नहीं बदलती ?'
          जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं चुपचाप अपने जीवन की लहरों के उतार-चढ़ाव को देख रहा हूँ, सच बताऊँ, अब मुझ पर बाह्य परिस्थितियों का असर कम ही होता है। वैसे, बहुत से लोगों से तबीयत के साथ जिरह करने की तमन्ना है लेकिन इस अदालत में नहीं, 'उस' अदालत में करूंगा।
         हमें खुशी है कि हमारी बेटी हमारे साथ है, हमारी आँखों के सामने है और साथ में उनकी हँसती-खेलती बेटी अनन्या भी जो अब नौ वर्ष की होने जा रही है। इन वृद्ध कंधों में अभी भी इतनी शक्ति है कि अपनी बेटी और उनकी बेटी का भार, निर्भार समझ कर उठा सकता है। इस खुशी के साथ-साथ हमारे हृदय में एक अदृश्य पीड़ा भी समानान्तर में चल रही है जिसे वे माता-पिता आसानी से समझ सकते हैं जिनकी बेटी ससुराल में मर-खप गई हो या बचकर उनके घर वापस आ गई हो। आप भी इस अनुभूति को महसूस कर सकते हैं, बशर्ते, आप हमारी बेटी को अपनी बेटी मान लें तो उस अकथनीय पीड़ा के शब्द आप तक अपने-आप पहुँचने लगेंगे।
          राजिन्दर किशन ने इस गीत में मेरी व्यथा को कम शब्दों में ही पिरो दिया  :

'कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !

मुझको बर्बादी का कोई गम नहीं
गम है बर्बादी का क्यूँ चर्चा हुआ !

देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ !

कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ !'

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Tuesday, March 10, 2015

पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई

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          अम्माजी के निधन के पश्चात गोलबाजार वाले घर में मृत्योपरांत होनेवाले कार्यक्रम तेरह दिन गहमागहमी के साथ चले, समस्त परिवारजन और रिश्तेदार एकत्रित हुए।  कुछ देर तो अम्माजी की चर्चा चलती और फिर कुंतल के आश्रम-गमन पर चर्चा होने लगती और बढ़ती ही जाती। कुंतल के आश्रम जाने के 11 दिन बाद ही अम्माजी का निधन हुआ था इसलिए सब उसी 'विचित्र किन्तु सत्य' घटना की तह तक पहुँचना चाहते थे। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो गया ? हमसे इस तरह के प्रश्न किए गए :
'क्यों चला गया ?'
'क्या बात हो गई ?'
'आपने समझाया नहीं ?'
'आपने रोका नहीं ?'
'ऐसे कैसे जाने दिया ?'
          तीसरे दिन अम्माजी की अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मैं इलाहाबाद निकल गया, इधर पुत्र-विछोह से दग्ध माधुरी किस्म-किस्म के पूछे जा रहे सवालों से अकेले जूझती रही और सबको समझाते-बताते खुद भी कुंतल के उस अबूझ निर्णय को समझने का असफल प्रयास करती रही। उन चर्चाओं से उनका दुख और अधिक गहरा गया, वे बेचैन हो गई, उनकी रातों की नींद उड़ गई। 'लोगों का सामना न करना पड़े' इसलिए उन्होंने खुद को अपने घर में सीमित कर लिया और गोलबाजार वाले घर में जाना कम कर दिया। मैं अस्थि-विसर्जन करके वापस लौटा तो वे मेरे कंधे में सिर रखकर रोने लगी और बोली- 'बताओ, क्या जवाब दूँ, सबको ?' मैं उनको क्या बताता, मैं खुद ही बे-जवाब था ! उन दिनों हम दोनों अपने आंसुओं को थामे एक-दूसरे को थामते हुए किसी तरह जी रहे थे। सच में, हम बेसहारा से हो गए थे; ऐसा लगे, कम्मू वापस आ जाए तो हमारी ज़िंदगी वापस आए।
           13 जुलाई 2004 को सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप विधि-विधान से अम्माजी की तेरहवी का पूजन और भोज का कार्यक्रम हुआ। रात को हम लोग थके-मांदे अपने घर वापस आए और सो गए। उस रात माधुरी की तबीयत खराब हुई लेकिन उन्होंने मुझे जगाया-बताया नहीं। अगली सुबह मैं यथासमय उठा, मैंने उन्हें देखा, वे गहरी नींद में सो रही थी। लगभग सात बजे वे जागी और बाथरूम जाने के लिए निकली। रास्ते में उन्हें संभवतः चक्कर आया और वे गलियारे में धम्म से बैठ गई, फिर जमीन पर पसर गई। मैं बाहर बरामदे में अखबार पढ़ रहा था, मुझे कुछ आहट मिली, अंदर जाकर देखा तो माधुरी पसीने से लथपथ फर्श पर पड़ी हुई थी। मैंने उन्हें नाम लेकर पुकारा लेकिन कोई उत्तर नहीं आया, वे अचेत हो चुकी थी, शरीर ठंडा पड़ गया था। मैं बुरी तरह घबरा गया, उनकी हालत देखकर मेरी हालत खराब होने लगी, मेरे कपड़े पसीने से तर-बतर हो गए। मैं उसे पुकार रहा था- 'माधुरी...माधुरी' और वह कुछ बोल नहीं रही थी, आंखे बंद और शरीर एकदम निश्चेष्ट था। एकबारगी मुझे ऐसा लगा- यह एक नई अनहोनी है जो आज होने जा रही है। मैं दौड़ते हुए अपने पड़ोसी डाक्टर अशोक दीक्षित के घर गया और माधुरी का हाल बताया, वे बोले- 'आप घर पहुंचिए, मैं तुरंत आता हूँ।' वहाँ से लौट कर मैंने माधुरी की मित्र सोनू सिहारे को फोन किया और उनसे तुरंत घर आने के लिए कहा। इस बीच डा॰ दीक्षित आ गए, उन्होंने जांच की और कहा- 'शी इज़ सिंकिंग, 'ब्लड प्रेशर' और 'हार्टबीट' दोनों गड़बड़ है, इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाइए, यहाँ कुछ नहीं हो सकता।'
          इस बीच सोनू भाभी अपने पति डा॰ प्रदीप सिहारे को लेकर घर आ गई। डा॰ प्रदीप सिहारे अपने साथ 'ग्लूकोज़' के 'पाउच' लेकर आए थे, उन्होंने हाथ की नस टटोलकर सुई घुसेड़ी और 'ग्लूकोज़' चढ़ाने लगे। 'पाउच' को वे अपने हाथ की गदेलियों से दबाकर 'ग्लूकोज़' को शरीर के भीतर जल्दी-जल्दी भेजने का प्रयास कर रहे थे। मैं अपनी सांस रोके चुपचाप अपनी जीवनसंगिनी की डूबती काया को किंकर्तव्यविमूढ़ होकर निहार रहा था।    
          पंद्रह मिनट की मशक्कत के बाद माधुरी के शरीर में कुछ हरकत शुरू हुई, थोड़ी देर बाद डा॰ सिहारे उन्हें कार में बिठाकर अपने हास्पिटल ले गए और वहाँ भर्ती कर लिया। दो दिनों तक उन्हें लगातार ग्लूकोज़ और दवा दी गई।  डा॰ सिहारे तब तक लगातार उनकी देखरेख करते रहे जब तक माधुरी सामान्य नहीं हो गई। चूंकि डा॰ प्रदीप सिहारे शिशुरोग विशेषज्ञ हैं, उनके हास्पिटल में केवल बच्चों का इलाज़ होता है इसलिए वहाँ पर भर्ती अन्य बच्चों के परिजन इनती बड़ी 'साइज' की बच्ची को देखकर विस्मित हो रहे थे और हल्के-हल्के मुस्कुरा भी रहे थे। । माधुरी का और मेरा नास्ता, भोजन, चाय-दूध का जिम्मा सोनू सिहारे ने अपने ऊपर ले लिया था, सच में, उन्होने हमारी बहुत देखरेख की। हमारे घर-परिवार के लोग भी माधुरी को देखने पहुंचे, देखे और चले गए। सोनू भाभी और डा॰ प्रदीप ने उस दिन माधुरी के प्राण बचाए और हमारा परिवार तहस-नहस होने से बच गया। धन्यवाद सिहारे दंपति, आप दोनों की जोड़ी सदा बनी रहे।
          माधुरी घर वापस आ गई लेकिन उनका मन बहुत बेचैन रहता था। उन्हें मानसिक आघात लगा था जिसके कारण उनकी रातों की नींद उड़ गई। वे गुमसुम रहने लगी, मैं भी उदास रहता था और कुंतल को वापस बुलाने के उपाय खोजता रहता था लेकिन कुछ न सूझता। एक दिन मेरे मित्र रमाकांत मिश्रा ने मुझे बताया कि तमिलनाडु के राज्यपाल श्री पी॰ राममोहन राव अपनी बहन से मिलने बिलासपुर आए हुए हैं, क्यों न उनकी मदद ली जाए ! हम दोनों उनसे मिलने उनके बहनोई श्री अशोक राव के घर गए और अपनी व्यथा बताई। श्री राव ने कहा- 'मैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव को जानता हूँ, उन्होंने मुझे अपने आश्रम के कार्यक्रम में बुलाया भी था लेकिन मैं नहीं जा पाया। सद्गुरु जग्गी वासुदेव की निकट सहयोगी भारती जी के पति मुझसे मिलते रहते हैं, उनकी मदद से सद्गुरु तक आपकी बात पहुंचाई जा सकती है।'
'यह ठीक रहेगा, आपके कहने से यदि बात बन जाए तो आपकी बहुत कृपा होगी। कुंतल का आश्रम जाने का निर्णय हम पर बहुत भारी पड़ गया, उनकी माँ टूट गई हैं। हम यह चाहते हैं कि वे योग प्रशिक्षक के रूप में काम करते रहें और अपनी पारिवारिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे।' मैंने कहा।        
'आप लिखकर दीजिए, मैं बात करता हूँ।' राज्यपाल महोदय ने कहा।
           ऐसे प्रभावशाली सूत्र और राज्यपाल महोदय के सहयोगी रुख से हमारी हिम्मत बंधी लेकिन आप तो जानते हैं कि जब विपरीत दिन आते हैं तो अनुकूल प्रयास भी प्रतिकूल परिणाम देने लगते है। राज्यपाल महोदय को न जाने क्या सूझी उन्होने मेरे पत्र को कोयंबत्तुर के कलेक्टर को टीप लगाकर भेज दिया, कलेक्टर ने पुलिस अधीक्षक को और पुलिस अधीक्षक ने थाना-प्रभारी को। आश्रम में जांच के लिए पुलिसबल पहुँच गया और वहाँ के ब्रह्मचारियों, सन्यासियों और संचालकों से गहन पूछताछ करने लगा। अब, पुलिस कैसी जांच करती है, इसका अनुमान आपको होगा ही।
          उस दिन कुंतल संभवतः चेन्नई में थे। आश्रम से जब उन्हें पुलिस-कार्यवाई की खबर मिली तो उन्होने मुझे फोन किया- 'पापा, आपने राज्यपाल से आश्रम के बारे में शिकायत की क्या ?'
'नहीं तो।' मैंने उत्तर दिया।
'पुलिस आश्रम में है, मुझे अभी खबर मिली है। पुलिसवाले बता रहे हैं कि वे आपकी ही शिकायत पर जांच करने आए हैं।'
'मैं राज्यपाल महोदय से मिला था और उनसे निवेदन किया था कि मध्यस्थता करके तुम्हें वहाँ से मुक्त करवाएँ, परंतु मेरे पत्र में आश्रम के विरुद्ध शिकायत का एक भी शब्द नहीं है।'
'पर वहाँ तो तमाशा बन गया, मेरा भी।'
'ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।'
'जो हो गया सो हो गया लेकिन इसके बाद अगर इस ढंग की कोई बात हुई तो याद रखिए आपसे मेरा संपर्क हमेशा के लिए टूट जाएगा, आपको पता भी नहीं लगेगा कि मैं कहाँ हूँ।'
'जी, मैं समझ गया।' मैंने पिता होने के अहंकार को तिरोहित करते हुए कहा।
          जांच के बाद कलेक्टर ने कुंतल को अपने कार्यालय में बुलाया। कलेक्टर ने पूछा- 'क्या आप अपनी मर्जी से यहाँ आए हैं या आप पर कोई दबाव है ?'
'मैं अपनी मर्जी से यहाँ आया हूँ।' कुंतल ने उत्तर दिया।
'आप माता-पिता के इकलौते पुत्र हो, इस तरह उन्हें छोडकर आश्रम क्यों आ गए ?'
'घर में रहता तो केवल माता-पिता की सेवा करता, यहाँ मुझे बहुत सारे माता-पिता की सेवा करने का अवसर मिला है। मुझे सब में अपने माता-पिता ही दिखते हैं।' कुंतल ने बताया।

==========

          हमारे तीन में से दो बच्चे व्यवस्थित हो गए, संगीता बिटिया का विवाह हो गया, कुंतल आश्रम चले गए, अब घर में हमारे साथ छोटी बिटिया संज्ञा बची जो अपना भविष्य सँवारने में लगी हुई थी। संज्ञा का बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में दिल नहीं लगता था लेकिन 'सिविल सर्विस' प्रतियोगिता से जुडने के बाद उनमें पढ़ाई के प्रति अभूतपूर्व लगन जगी। अपने तेज दिमाग का समुचित प्रयोग करती संज्ञा को देख कर हम लोगों को बहुत खुशी होती थी। संज्ञा काम-काज करने में भले धीमी थी लेकिन किसी से काम लेने में उसे महारत हासिल थी, यदि वे किसी प्रशासनिक सेवा में प्रविष्ट हो जाती तो उनका स्वभाव और प्रभाव बहुत अनुकूल रहता। सन 2003 की छत्तीसगढ़ शासन की सेवाओं हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षा में भरपूर उम्मीद के बावजूद सफलता नहीं मिली, वे दोषपूर्ण 'स्केलिंग' की शिकार हो गई। फिर यह तय हुआ कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रयत्न किया जाए इसलिए उन्होंने इलाहाबाद और दिल्ली जाकर मार्गदर्शन लिया। इसी दौरान उन्हें दिल्ली में कोचिंग करते समय एक साथी मिल गया जिसे जीवनसाथी बनाने का मन बनाया और प्रतियोगिताओं से दूर एक गृहस्थन की परीक्षा देने का निर्णय ले लिया।
          संज्ञा विवाह योग्य हो गई थी, लड़का भी उन्होने खोज लिया, चार्टर्ड एकाउंटेंट था। बच्चे अपनी पसंद का विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है, यह बात ठीक थी लेकिन विवाह फोकट में तो होते नहीं। मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार न था इसलिए विवाह को टालने में ही भलाई समझ आई। यद्यपि खबर यह थी कि लड़के ने अपने घरवालों को अपनी पसंद की लड़की से विवाह के लिए राजी कर लिया है लेकिन हड़बड़ी का कुछ गलत मतलब न निकल जाए इसलिए मैं उस ओर से किसी गंभीर संकेत की प्रतीक्षा में था और वे लोग संभवतः 'लड़के वाले' होने के कारण पहल करने में हिचक रहे थे, परिणामस्वरूप मामला लटका रहा। इधर दोनों प्रेमी रोज रात घंटों तक मोबाइल में लटके रहते और मैं सोचता कि ये लोग सब बातें अभी कर लेंगे तो शादी के बाद बात करने के लिए भला क्या बचेगा !
         हमारा होटल कुछ आगे बढ़ा लेकिन देनदारी इतनी अधिक थी कि घर का खर्च और ब्याज पटाने में ही खप जाता। कई बार बैंक की किश्त अनियमित हो जाती तो सेंट्रलबैंक के शाखाप्रबंधक का फोन आता जिसमे उसके अपमानजनक उद्गार को सुनकर चुप रह जाना पड़ता और 'फोन पटक कर' रखने की आवाज़ भी सुनता जो आज भी मेरे कानों में गूँजती है। जेब में पैसा न हो तो इंसान को बहुत सहना पड़ता है, चुप रहना पड़ता है।
          संज्ञा के जन्मदिन के अवसर पर संज्ञा के संभावी श्वसुर ने एक रिस्टवाच भेजी जिससे हमें संबंध की बातचीत आगे बढ़ाने का संकेत मिल गया लेकिन फिर भी हमारी हिम्मत न पड़े। मेरे भय के दो कारण थे, एक तो मैं आपको बता चुका, हमारा घनघोर धनाभाव और दूसरा हमारे संभावी समधी पुलिस सेवा में थे। हम व्यापारी वर्ग के लोग पुलिस आफिसर और इन्कम टैक्स आफिसर से थर-थर कांपते हैं क्योंकि न जाने कब इनके दिमाग का बिगुल बज उठे और इनकी तलवार म्यान के बाहर निकल जाए ! आप आश्चर्य करेंगे, खरबूजा प्रजाति का यह व्यापारी समुदाय इन लोगों को अपने पारिवारिक उत्सव में निमंत्रण देने तक में हिचकिचाता है। दीवाली के अवसर पर 'लिफाफा' और मिठाई देने इनके घर जाएगा लेकिन शादी-ब्याह की निमंत्रणसूची में इनका नाम नहीं लिखता, हाँ, कुछ बहुत पुरानी जान-पहचान या 'सेटिंग' हो तो अलग बात है। 'इनसे दूरी बनी रहे, उसी में भलाई है'- यह सोच कर उनके यहाँ संबंध की बात आगे बढ़ाने में मेरा जी घबरा रहा था।
          मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि फोन पर दोनों प्रेमी इतनी अधिक बातें कर रहे हैं, कुछ दिनों में ऊब जाएंगे तो किस्सा अपने-आप फुस्स हो जाएगा लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला।
           मेरी होटल की जिस छत पर प्रतिदिन धूप आती थी, कभी-कभी पानी भी बरसता था, इस बीच 'कृपा' भी बरसी। छत पर 'एयरटेल' की 'सेटेलाइट टावर' लग गई जिसके किराये से प्रत्येक माह बैंक की किश्त देने की स्थायी व्यवस्था बन गई और उस अशिष्ट शाखाप्रबंधक का तगादा आना बंद हो गया।

          दिन बीतते जा रहे थे या यूं कहें, गुजरते जा रहे थे। रोज सुबह जागना, हॉटल जाना, रात में सो जाना, बस, ऐसी ही ज़िन्दगी चल रही थी। कोई चमत्कार होने से रहा जो ज़िन्दगी को चमका दे, यह मनगणित ज़रूर चलता था कि संज्ञा के विवाह के खर्च की व्यवस्था कैसे बनेगी ! इसी चक्कर में लगभग एक साल टल गया लेकिन न मेरी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आया और न हमने विवाह का कोई प्रस्ताव किया। फोन पर हुई बातचीत के कुछ ऐसे सूत्र बने कि एक दिन मैं संज्ञा और उनकी मम्मी के साथ संभावी दामाद के घर पहुँच गया। स्वागत-सत्कार हुआ, कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान हुआ, उन्होंने हमें और हमने उन्हें देखा। वहाँ संभावी दामाद के वयोवृद्ध दादाजी भी मिले जो बेहद रोचक और खूब सारी बातें करने वाले मज़ेदार इंसान थे। वे मूल रूप से हरयाणा के थे, उन्होंने मुझे अपने बचपन और युवावस्था की वे बातें बताई जिन्हें सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने यह भी कहा- 'आप लड़की वाले हो, आपको तो हमने अपने बगल में कुर्सी पर बैठाया है, हमारे हरयाणा में लड़की वाले को जूते के पास बैठाते हैं।' उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ क्षणों के लिए सन्नाटे में आ गया फिर ठहाका मारकर हंस पड़ा, लड़की का बाप जो ठहरा !
          लौटते समय संज्ञा को संभावी सास ने कान के बुंदे दिए। हम सब प्रसन्न-मन लौट आए और समझ गए कि इस संबंध को अब और अधिक टाला नहीं जा सकता। मैंने लिखित प्रस्ताव भेज दिया। कुछ दिनों बाद मुझे समधी जी का फोन आया कि वे सपरिवार रतनपुर की महामाया के दर्शन के लिए बिलासपुर होकर जाएंगे इसलिए हम भी सपरिवार उनके साथ चलें। साथ बन गया, सबने महामाया के दर्शन किए और जब वापस लौटे तब मैं और समधी जी मेरी 'मारुति 800' में आए और शेष परिवार उनकी शासकीय गाड़ी में। रास्ते में समधी जी ने बातों-बातों में मुझसे कहा- 'आपसे एक बात कहनी है।'
'जी, कहिए।' मैंने कहा।
'आप लड़की के पिता हैं, लड़कियां अपने पिता के बहुत करीब रहती हैं और कहा भी मानती हैं।'
'जी।'
'आप संज्ञा को समझाएँ कि वह हमेशा हमारे संयुक्त परिवार से जुड़कर रहे, अलग घर बसाने की बात मन में न लाए। अगर हमारा बेटा कभी अलग होने के लिए कहे, तब भी।' वे बोले। कुछ देर के लिए मैं चुप रह गया, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दूँ ? उनकी बात को नकारा नहीं जा सकता था, उनकी अपेक्षा उचित थी लेकिन उनके पारिवारिक भविष्य के बारे में मैं 'कमिटमेंट' कैसे कर सकता था ?
'भाई साहब, 2 + 2 = कितना होता है ?' मैंने उनसे पूछा।
'चार।' वे आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे।
'भाई साहब, आप सही हैं लेकिन 2 + 2 = 22 हो सकता है और 0 भी।'
'मैं समझा नहीं।'
'जीवन गणित के नियमों से नहीं चलता। कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। कौन साथ देगा, कौन साथ छोड़ देगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। मेरे बेटे कुंतल का उदाहरण देखें, वह त्रिची में इंजीनियर बनने गया और पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबाजी बन गया, आश्रम चला गया। कल का क्या पता ?
'यह 'एक्सेप्नल केस' है।'
'जी, आप सही हैं लेकिन मैं यह मानता हूँ कि किसी से उम्मीद करने से कोई लाभ नहीं। आपने फिल्म 'चित्रलेखा' का साहिर का लिखा गीत सुना होगा- "उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे, जन्म मरण का संग है सपना ये सपना बिसरा दे, कोई न संग मरे, मन रे, तू काहे न धीर धरे।" मैंने उन्हें समझाया।
          इतने में बिलासपुर आ गया, वे सब कुछ देर के लिए हमारी लाज में पधारे, फिर अपने घर के लिए रवाना हो गए।

          कुछ दिनों बाद भावी समधी जी का फोन आया- 'आइये, विवाह के बारे में बातें करनी है।' अगले दिन मैं उनसे मिलने निकल पड़ा और सुबह साढ़े नौ बजे उनके शहर ट्रेन से पहुँच गया। स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने इधर-उधर अपनी नज़र घुमाई, उनकी गाड़ी मुझे लेने आने वाली थी, नहीं दिखी इसलिए मैं एक आटो में बैठकर उनके गेस्ट हाउस में पहुँच गया जहां वे अस्थाई रूप से निवास कर रहे थे। नमस्कार की औपचारिकता के पश्चात उन्होंने पूछा- 'आपको 'रिसीव' करने के लिए गाड़ी भेजा था, मिल गई ?'
'मैंने खोजा लेकिन दिखी नहीं।' मैंने कहा।
'अरे, मैंने ड्राइवर से गाड़ी लगाने के लिए कहा था !'
'कोई बात नहीं, मैं आटो से आ गया।' मैंने कहा।
          विवाह कार्यक्रम के सभी चरणों पर विस्तार से विचारों का आदानप्रदान हुआ फिर उन्होंने पूछा- 'आपका बजट क्या है ?'
'पाँच।' मैंने घबराते हुए उत्तर दिया।
'ठीक है, आप 'चार' हमें 'कैश' दे दीजिए, 'एक'आप अपने खर्च के लिए रख लीजिए।' उन्होंने कहा।
'ठीक है।' मैंने कहा।
          बात करते-करते दोपहर का एक बज गया। मैंने पूछा- 'तो मैं चलूँ, मुझे अनुमति दीजिए।'
'ओह, अब तो खाने का समय हो गया ! असल में, यहाँ मेरे लिए 'मेस' से खाना आता है, अतिरिक्त खाने के लिए किचन में खबर करनी पड़ती है लेकिन मैं भूल गया। सुबह हमारे बेटे ने मुझसे 'मेस' में खबर करने के लिए पूछा भी था लेकिन मुझे आपके लिए खाना बोलने का ध्यान ही न रहा।' उन्होंने कहा।
'तो क्या हो गया, आपका खाना आएगा न ? उसी में हम दोनों खा लेंगे।' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। हम दोनों ने मिलकर भोजन किया और उनसे विदा ली। लौटते वक्त ट्रेन में बैठे-बैठे मैं अपने बारे में सोच रहा था- 'लड़की का बाप....बेचारा।'
         घर वापस आकर मैंने माधुरी को पूरा वार्तालाप बताया तो वे मुझ पर भड़क गई- 'तुम्हारे पास भूँजी-भांग खरीदने के लिए पैसा नहीं है, इतना कहाँ से लाओगे ?'
'यार 'सी.ए॰' लड़कों का 'रेट' पंद्रह चल रहा है, मैं तो केवल पाँच बोल कर आया।' मैंने अपने बचाव में कहा।
'वो ठीक है, वादा कर आए हो तो कब भेजोगे ?'
'जब इंतजाम हो जाएगा।'
'कब होगा ?'
'क्या पता !'
'अजीब आदमी हो तुम, 'क्या पता' बोलने से हो जाएगा ?'
'हो जाएगा।'
'कैसे ?'
'देखो, जब मैं छोटा था, 'पेंड्रावाला' मिठाई दूकान में बैठता था तब दो फकीर सड़क के बीचों-बीच अपने हाथों में तासा लिए खैरात मांगते थे। उनमें से एक फकीर ज़ोर से आवाज़ लगाता- 'दे दे मौला।' दूसरा फकीर धीरे से बोलता- 'अल्लई (अल्लाह ही) देगा।' मैंने उन दोनों को कभी भी किसी की दूकान में जाकर या रुककर मांगते नहीं देखा। जिसको देना होता, वह खुद चलकर उनके पास जाता और उनके तासा में सिक्के डालता।'
'तुम्हारे कहने का क्या मतलब ?'
'अल्लई देगा।' मैंने हँसते हुए कहा, वे मेरे चेहरे को बड़ी देर तक घूरती रही।

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